रमेश की उम्र पच्चीस साल थी। वह दिल्ली के एक छोटे से मोहल्ले में रहता था, जहाँ घर एक-दूसरे से सटे हुए थे और दीवारें पतली। उसकी माँ ने एक हफ्ते के लिए गाँव जाने का फैसला किया था, और रमेश अकेला पड़ गया था। गर्मी का मौसम था, पंखे भी राहत नहीं दे रहे थे। शाम को जब वह छत पर बैठा था, तभी पड़ोस की आंटी शान्ति ने आवाज़ दी।
“रमेश बेटा, थोड़ा इधर आना।”
शान्ति आंटी करीब बयालीस साल की थीं। गोरी रंगत, लंबे काले बाल जो अक्सर खुले रहते, और शरीर जो साड़ी के नीचे से भी साफ झलकता था। उनके पति अक्सर बाहर रहते थे, महीने में दो-तीन बार ही घर आते। मोहल्ले वाले उन्हें “अकेली आंटी” कहते थे, लेकिन कोई कुछ खुलेआम नहीं बोलता था।
रमेश सीढ़ियाँ उतरकर नीचे आया। शान्ति आंटी के घर का दरवाजा आधा खुला था। वह रसोई में खड़ी थीं, साड़ी की पल्लू थोड़ी सी सरक गई थी। उनकी पीठ का निचला हिस्सा साफ दिख रहा था, और साड़ी कमर पर कसकर बँधी हुई थी। रमेश की नजर वहीं अटक गई।
“क्या हुआ आंटी?” उसने पूछा, आवाज थोड़ी कड़क।
शान्ति ने मुस्कुराते हुए कहा, “बेटा, आज गैस नहीं जल रही। थोड़ा चेक कर देना। और हाँ, ठंडा पानी भी निकाल देना फ्रिज से।”
रमेश अंदर घुसा। घर में हल्की सी खुशबू फैली हुई थी—तेल और इत्र की मिली-जुली। शान्ति आंटी उसके पास आकर खड़ी हो गईं। उनकी साड़ी का पल्लू फिर सरक गया, और इस बार उनकी गोल, भरी हुई छातियों का ऊपरी हिस्सा साफ नजर आ गया। रमेश ने जल्दी से नजर फेर ली, लेकिन दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।
गैस चेक करते हुए उसकी नजर बार-बार आंटी की तरफ चली जा रही थी। शान्ति जानबूझकर उसके करीब खड़ी थीं। जब रमेश झुका, तो उनकी जाँघ उसकी बांह से छू गई। गर्म छुअन। रमेश का शरीर सख्त हो गया।
“आंटी, गैस ठीक लग रही है। शायद सिलेंडर खत्म हो रहा हो,” उसने कहा, आवाज में हल्की सी कम्पन।
शान्ति ने धीरे से हँसते हुए कहा, “तो कल बदलवा लेंगे। अभी तो कुछ देर बैठ जा। अकेला घर में क्या करता है?”
रमेश बैठ गया। शान्ति उसके सामने कुर्सी पर बैठीं। साड़ी घुटनों तक ऊपर खिसक गई थी। उनकी मोटी, चिकनी जाँघें साफ दिख रही थीं। रमेश की नजर वहाँ से हट नहीं पा रही थी। शान्ति ने नोटिस किया, लेकिन कुछ नहीं कहा। सिर्फ मुस्कुराईं।
“पानी पिलाऊँ?” उन्होंने पूछा।
“हाँ आंटी।”
जब वे पानी लेकर आईं, तो रमेश का गला सूख चुका था। शान्ति ने गिलास देते समय जानबूझकर उसकी उंगलियों को छुआ। ठंडा गिलास, गर्म छुअन। रमेश ने पानी पीते हुए उनकी तरफ देखा। शान्ति की आँखें मुस्कुरा रही थीं, लेकिन उनमें कुछ और भी था—एक भूख, जो छुपाने की कोशिश कर रही थीं।
रात हो गई। रमेश अपने घर लौट आया, लेकिन नींद नहीं आ रही थी। दिमाग में बार-बार आंटी की जाँघें, उनकी सरकी हुई साड़ी, और वह छुअन घूम रही थी। उसने खुद को समझाया कि ये गलत है, आंटी हैं, पड़ोस की। लेकिन शरीर नहीं मान रहा था।
अगले दिन दोपहर में फिर आवाज आई।
“रमेश, थोड़ा मदद कर देना।”
इस बार शान्ति आंटी छत पर थीं। धूप तेज थी। वे पुरानी साड़ी में थीं, जो पसीने से चिपक गई थी। कपड़ा उनके शरीर से चिपककर हर मोड़ को उभार रहा था। छातियाँ भारी लग रही थीं, और साड़ी की गाँठ कमर पर ढीली पड़ गई थी।
“क्या हुआ आंटी?”
“ये कपड़े सुखा रही थी, रस्सी टूट गई। थोड़ा बाँध दे।”
रमेश रस्सी बाँधने लगा। शान्ति उसके बिल्कुल पास खड़ी थीं। जब वह हाथ ऊपर उठाता, तो उनकी साँस उसके गाल पर पड़ती। पसीने की हल्की खुशबू। रमेश का शरीर फिर से तनाव में आ गया।
रस्सी बाँधते-बाँधते शान्ति का हाथ उसकी कमर पर पड़ गया।
“सॉरी बेटा… संतुलन खो दिया,” उन्होंने धीरे से कहा, लेकिन हाथ हटाया नहीं। कुछ सेकंड और रखा।
रमेश की साँस तेज हो गई। वह मुड़कर उनकी तरफ देखा। शान्ति की आँखें उसके चेहरे पर थीं। दोनों चुप थे। हवा में सिर्फ पंखे की आवाज और दूर किसी बच्चे के रोने की आवाज।
“आंटी…” रमेश की आवाज फट गई।
शान्ति ने धीरे से मुस्कुराते हुए कहा, “कुछ नहीं बेटा। गर्मी बहुत है। अंदर चल, ठंडा पानी पियो।”
अंदर आकर शान्ति ने फ्रिज से पानी निकाला। इस बार वे और करीब आ गईं। रमेश बैठे-बैठे पानी पी रहा था। शान्ति उसके सामने खड़ी होकर अपनी साड़ी ठीक करने लगीं। पल्लू फिर सरक गया। इस बार उनकी ब्रा का हल्का सा किनारा दिख गया।
रमेश की नजर वहीं अटक गई। शान्ति ने देखा, लेकिन दूर नहीं हटीं। बल्कि थोड़ा और आगे झुक गईं, जैसे कोई चीज ढूँढ रही हों।
“रमेश,” उन्होंने अचानक कहा, आवाज बहुत धीमी, “तुम्हारी माँ कब तक आएंगी?”
“एक हफ्ता और।”
शान्ति ने सिर हिलाया। “अकेला घर में… ध्यान रखना। कोई जरूरत हो तो बता देना।”
उसकी आँखों में कुछ और था। रमेश समझ गया। तनाव कमरे में भर गया था। हवा भारी लग रही थी।
शाम को फिर से वही घर। शान्ति ने कहा था कि टीवी नहीं चल रहा। रमेश गया। इस बार वे घर के अंदर ही थीं, बाल खुले, और साड़ी की जगह एक ढीला सा नाईटगाउन पहना हुआ था। कपड़ा पतला था। रोशनी के सामने खड़े होने पर उनके शरीर का आकार साफ झलक रहा था।
रमेश का गला सूख गया।
“आंटी, ये… नाईटगाउन…”
शान्ति हँसीं। “घर में अकेली हूँ न। आराम से रहती हूँ। तुम्हें दिक्कत तो नहीं?”
“नहीं…” रमेश ने जल्दी से कहा।
टीवी चेक करते हुए शान्ति उसके बिल्कुल पीछे खड़ी हो गईं। जब रमेश झुका, तो उनकी छातियाँ उसकी पीठ से छू गईं। गर्म, नरम, भारी। रमेश का शरीर एकदम सख्त हो गया। उसने साँस रोक ली।
शान्ति ने धीरे से कहा, “सॉरी… जगह कम है।”
लेकिन हटीं नहीं। कुछ पल और खड़ी रहीं। रमेश महसूस कर रहा था कि उनकी साँस उसकी गर्दन पर पड़ रही है। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था।
टीवी ठीक हो गया। रमेश मुड़ा। शान्ति अभी भी करीब थीं। दोनों की नजरें मिलीं। इस बार कोई मुस्कान नहीं थी। सिर्फ एक भारी, चुपचाप तनाव।
“आंटी… मुझे जाना चाहिए,” रमेश ने धीरे से कहा।
शान्ति ने सिर हिलाया, लेकिन आवाज में कुछ और था। “हाँ… जा। लेकिन कल फिर आ जाना। कुछ काम है।”
रमेश निकला। रात भर नींद नहीं आई। दिमाग में बार-बार वही छुअन, वही नजारा घूम रहा था। शरीर में एक अजीब सी गर्मी दौड़ रही थी। वह समझ रहा था कि कुछ होने वाला है। शान्ति आंटी भी जानती थीं। दोनों के बीच की दीवार पतली पड़ रही थी।
अगले दिन दोपहर में जब रमेश फिर गया, तो घर में और भी शांति थी। शान्ति ने दरवाजा खोला। इस बार उनके बाल गीले थे, जैसे अभी नहाकर आई हों। नाईटगाउन और भी पतला लग रहा था। पानी की बूँदें उनकी गर्दन से नीचे सरक रही थीं।
“अंदर आ,” उन्होंने कहा, आवाज बहुत धीमी।
रमेश अंदर घुसा। दरवाजा बंद हो गया। कमरे में सिर्फ पंखे की आवाज थी। शान्ति उसके सामने खड़ी थीं। उनकी साँस तेज थी। रमेश की भी।
दोनों एक-दूसरे को देख रहे थे। तनाव चरम पर था। कोई कुछ नहीं बोल रहा था, लेकिन दोनों जानते थे कि अब सिर्फ एक कदम बाकी है।
शान्ति ने धीरे से आगे बढ़कर रमेश का हाथ पकड़ लिया। उनकी उंगलियाँ गर्म थीं। रमेश का हाथ काँप रहा था।
“बेटा…” उन्होंने फुसफुसाया, “आज… घर में कोई नहीं है।”
रमेश की साँस रुक गई। तनाव अब काबू के बाहर जा रहा था। दोनों की नजरें मिली हुई थीं। कमरे में हवा भारी पड़ गई थी।
शान्ति ने रमेश का हाथ पकड़कर अपने कमरे में खींच लिया। दरवाजा बंद करते ही कमरे में सिर्फ पंखे की धीमी आवाज रह गई। दोनों एक-दूसरे के सामने खड़े थे। शान्ति की साँसें तेज थीं, छातियाँ नाईटगाउन के अंदर उतार-चढ़ाव कर रही थीं। रमेश की नजर उनकी गीली गर्दन से होती हुई नीचे जा रही थी, जहाँ कपड़ा पसीने से चिपककर शरीर के हर उभार को साफ दिखा रहा था।
शान्ति ने आगे बढ़कर रमेश का चेहरा दोनों हाथों में ले लिया। उनकी हथेलियाँ गर्म थीं। उन्होंने रमेश के होठों पर अपने होठ रख दिए। पहले हल्के से, फिर जोर से। जीभ अंदर घुस आई। दोनों की जीभें लड़ने लगीं। रमेश ने उनकी कमर पकड़ ली। नाईटगाउन के नीचे कोई अंदरूनी कपड़ा नहीं था। उसकी हथेलियों के नीचे सिर्फ नरम, गर्म मांस था। शान्ति ने कराहते हुए उसके मुँह में और गहरा चुंबन दिया।
कुछ देर बाद शान्ति पीछे हटीं। उन्होंने नाईटगाउन के दोनों बाजू पकड़े और धीरे-धीरे ऊपर खींच लिया। कपड़ा सरकते हुए उनकी भारी गोल छातियाँ बाहर आ गईं। निप्पल कड़े हो चुके थे। फिर कपड़ा और ऊपर गया, पेट, नाभि, और फिर पूरी तरह उतर गया। शान्ति अब नंगी खड़ी थीं। उनकी जाँघें मोटी और चिकनी थीं, चूत पर काले घने बालों की हल्की लकीर थी, और चूत की फाँक पहले से ही चमक रही थी।
रमेश ने भी अपने कपड़े उतारे। शर्ट, पैंट, अंडरवियर—सब जल्दी से फर्श पर गिर गए। उसका लंड पहले से ही पूरी तरह खड़ा था, नसों से भरा हुआ, आगे से थोड़ा गीला। शान्ति की नजर वहीं अटक गई। उन्होंने होंठ भींच लिए।
“इतना बड़ा…” उन्होंने फुसफुसाया, आवाज में भूख साफ थी।
शान्ति घुटनों के बल बैठ गईं। रमेश का लंड उनके चेहरे के बिल्कुल सामने था। उन्होंने पहले दोनों हाथों से उसे पकड़ा। एक हाथ से नीचे अंडों को सहलाया, दूसरे से ऊपर-नीचे सहलाने लगीं। फिर जीभ निकाली और निचले हिस्से से शुरू करके धीरे-धीरे ऊपर तक चाटा। लंड की नसों पर जीभ फेरती हुई वे ऊपर पहुँचीं और सुराख पर घुमाया। फिर पूरा मुँह खोलकर आगे का हिस्सा अंदर ले लिया।
गर्म, गीला मुँह। शान्ति ने धीरे-धीरे और अंदर लिया। लंड उनके गले की तरफ बढ़ता गया। वे रुक गईं, साँस ली, फिर और गहराई तक धकेल दिया। गला भर गया। आवाज आने लगी—घुट-घुट की। लार उनके होठों से बाहर निकलकर लंड पर बहने लगी। शान्ति ने सिर आगे-पीछे करना शुरू किया। पहले धीरे, फिर तेज। हर बार लंड गले तक जाता और वापस आता। उनका एक हाथ अंडों को मसल रहा था, दूसरा लंड के निचले हिस्से को सहला रहा था जो मुँह में नहीं समा रहा था।
रमेश की उंगलियाँ उनके बालों में घुस गईं। वह धीरे-धीरे कमर हिलाने लगा। शान्ति ने विरोध नहीं किया। बल्कि और गहराई तक लेने लगीं। उनकी आँखों में पानी आ गया था, लेकिन वे रुक नहीं रहीं थीं। लार की धार ठोड़ी से होती हुई छातियों पर गिर रही थी। कमरा चूसने और कराहने की आवाजों से भर गया था।
कुछ देर बाद शान्ति ने लंड मुँह से निकाला। वह चमक रहा था, पूरी तरह गीला। उन्होंने फिर से चाटा, अंडों को मुँह में लिया, चूसा, फिर वापस लंड पर आ गईं। इस बार और जोर से, और तेजी से। रमेश की साँसें तेज हो गईं। वह लगभग झड़ने वाला था, लेकिन शान्ति ने समय रहते छोड़ दिया।
“अब मेरी बारी,” उन्होंने कहा, आवाज भारी।
दोनों बिस्तर पर लेट गए। शान्ति रमेश के ऊपर उलटी दिशा में चढ़ गईं—69। उनका चेहरा उसके लंड के पास था, और उनकी चूत रमेश के मुँह के बिल्कुल ऊपर। रमेश ने दोनों हाथों से उनके मोटे चूतड़ पकड़ लिए और नीचे खींच लिया। उसकी जीभ सीधे चूत की फाँक पर पड़ गई। गर्म, गीली, थोड़ी खट्टी-मीठी। उसने जीभ अंदर घुसा दी। शान्ति का शरीर काँप उठा।
उसी समय शान्ति ने फिर से उसका लंड मुँह में ले लिया। अब दोनों एक-दूसरे को चाट रहे थे, चूस रहे थे। रमेश की जीभ चूत के अंदर-बाहर हो रही थी, कभी ऊपर के संवेदनशील हिस्से पर घूम रही थी, कभी अंदर गहराई तक जा रही थी। शान्ति की जाँघें उसके सिर को दबोच रही थीं। वे जोर-जोर से कराह रही थीं, और उसी कराह के साथ लंड को गले तक ठूँस रही थीं। लार और चूत का पानी दोनों तरफ बह रहा था। बिस्तर गीला होने लगा था।
रमेश ने उनकी चूत में एक उंगली भी डाल दी, फिर दो। उंगलियाँ अंदर घुमाते हुए जीभ बाहर से चाट रही थी। शान्ति का शरीर झटके खा रहा था। वे लंड चूसना लगभग भूल गईं थीं, सिर्फ कराह रही थीं। फिर खुद को संभालते हुए फिर से मुँह में ले लिया और और तेज चूसने लगीं। दोनों का शरीर पसीने से तर हो चुका था। कमरे में सिर्फ चाटने, चूसने और गीली आवाजें गूँज रही थीं।
थोड़ी देर बाद शान्ति उठ खड़ी हुईं। उनकी टाँगें काँप रही थीं। उन्होंने बिस्तर के पास रखी तेल की बोतल उठाई। ढक्कन खोला। सुगंधित तेल की हल्की खुशबू फैली। उन्होंने तेल अपनी हथेली पर निकाला और रमेश के लंड पर लगाने लगीं। पूरे लंड को तेल से चिकना कर दिया—ऊपर से नीचे, अंडों तक। लंड चमकने लगा, और भी मोटा और फिसलन भरा। फिर उन्होंने वही तेल अपनी चूत पर लगाया। उंगलियों से अंदर तक रगड़ा, फाँक को खोलकर तेल लगाती रहीं।
“अब… लगा के तेल… जम के पेल,” उन्होंने भारी आवाज में कहा।
शान्ति चारों हाथ-पैरों पर बिस्तर पर झुक गईं। पीठ मुड़ी हुई, चूतड़ ऊपर उठे हुए। रमेश उनके पीछे खड़ा हो गया। तेल से चिकने लंड को उनकी चूत के मुँह पर रखा। पहले सिर्फ आगे का हिस्सा अंदर किया। शान्ति ने साँस ली। फिर रमेश ने कमर पकड़ी और एक लंबे, गहरे धक्के में पूरा लंड अंदर तक धकेल दिया।
शान्ति जोर से चिल्ला उठीं। “आह्ह… पूरा… अंदर…”
रमेश रुका नहीं। उसने दोनों हाथों से उनके मोटे चूतड़ पकड़ लिए और पेलना शुरू किया। पहले धीरे, पूरे लंड को अंदर-बाहर करते हुए। तेल की वजह से हर धक्के के साथ चिकनी, गीली आवाज आ रही थी—छप… छप… छप। फिर रफ्तार बढ़ गई। कमर जोर-जोर से आगे बढ़ रही थी। हर धक्का गहरा था, शान्ति के शरीर को आगे धकेल रहा था। उनकी छातियाँ बिस्तर पर रगड़ खा रही थीं, निप्पल कड़े हो चुके थे।
“और जोर से… जम के…” शान्ति कराह रही थीं।
रमेश ने और पकड़ कस ली। अब वह पूरी ताकत से ठोक रहा था। लंड पूरा अंदर जाता, चूत की दीवारों को फैलता, फिर बाहर आता। तेल और शान्ति का पानी मिलकर उनकी जाँघों पर बह रहा था। आवाजें तेज हो गईं—माँस की थप-थप, गीली छप-छप, और शान्ति की दबी हुई चीखें। रमेश कभी उनके बाल पकड़कर पीछे खींचता, कभी कमर दबाकर और गहराई तक जाता।
कुछ देर बाद उसने पोजीशन बदली। शान्ति को पलटा, पीठ के बल लिटाया। उनके दोनों पैर उसके कंधों पर रख दिए। चूत पूरी तरह खुल गई। रमेश ने फिर से लंड अंदर किया और ऊपर से ठोकना शुरू किया। इस एंगल में और गहराई तक जा रहा था। शान्ति की आँखें बंद थीं, मुँह खुला, कराहें निकल रही थीं। उनकी छातियाँ हर धक्के के साथ ऊपर-नीचे हो रही थीं। रमेश ने एक हाथ से उनकी छाती मसलनी शुरू की, निप्पल को उंगलियों में लेकर दबाया।
“इतना जोर… मत छोड़… पूरा पेल…” शान्ति हांफते हुए कह रही थीं।
रमेश की रफ्तार और बढ़ गई। पसीना दोनों के शरीर से बह रहा था। बिस्तर चरमरा रहा था। कमरे में सिर्फ सेक्स की आवाजें थीं। तेल की चिकनाहट अभी भी बाकी थी, हर धक्का फिसलन भरा और गहरा। रमेश ने उनके पैर और चौड़े कर दिए, लगभग मोड़ दिए, और और तेज ठोकने लगा। शान्ति की चूत अब पूरी तरह खुल चुकी थी, लंड आसानी से अंदर-बाहर हो रहा था, लेकिन हर बार दीवारें उसे कसकर पकड़ लेती थीं।
आखिर में रमेश की गति अनियंत्रित हो गई। उसने दोनों हाथों से शान्ति की कमर पकड़ी और आखिरी कई जोरदार धक्के मारे। हर धक्के के साथ शान्ति चीख रही थीं। फिर रमेश के शरीर में झटके आए। उसने पूरा लंड अंदर दबाए रखा और गर्म तरल अंदर उड़ेलने लगा। एक के बाद एक झटके। शान्ति भी उसी समय काँप उठीं। उनकी चूत रमेश के लंड को और कसकर पकड़ रही थी, शरीर ऐंठ रहा था। दोनों एक-दूसरे से चिपके हुए काँपते रहे।
जब सब शांत हुआ, तो रमेश अभी भी उनके अंदर था। दोनों की साँसें तेज थीं, शरीर पसीने और तेल से चमक रहे थे। शान्ति ने धीरे से आँखें खोलीं। उनकी आँखों में थकान और संतुष्टि दोनों थी। रमेश ने लंड बाहर निकाला। उसके साथ तेल और उसका पानी दोनों बह निकला, शान्ति की जाँघों पर फैल गया।
दोनों बिस्तर पर लेटे रहे। पंखा ऊपर से हवा फेंक रहा था। कमरे में सेक्स की गंध फैली हुई थी—तेल, पसीना, और शरीर की गर्मी। शान्ति ने रमेश का हाथ पकड़ लिया। कोई ज्यादा बात नहीं हुई। सिर्फ दोनों की साँसें धीरे-धीरे सामान्य हो रही थीं।
बाहर मोहल्ले में कोई आवाज नहीं थी। घर अभी भी खाली था। और दोनों जानते थे कि यह सिर्फ शुरुआत थी।
