गर्लफ्रेंड को बाहर भेजकर शालिनी आंटी ने चुदवा लिया | आंटी की गंदी चुदाई

दोस्तो, नमस्ते। मेरा नाम रोहित है। उम्र पच्चीस साल। मैं इंदौर का रहने वाला हूँ। कद पाँच फुट नौ इंच, रंग गेहुँआ, बॉडी औसत है लेकिन जिम जाता हूँ इसलिए थोड़ी टाइट रहती है। लंड सात इंच का है, मोटाई ठीक-ठाक।

यह कहानी काल्पनिक नहीं है। यह मेरे जीवन की सच्ची घटना है जो पिछले साल घटी थी। मैं आपको उसी अंदाज में बता रहा हूँ जैसे हुई थी।

मेरी गर्लफ्रेंड का नाम प्रिया है। हम दोनों दो साल से साथ थे। प्रिया कॉलेज में थी, मैं प्राइवेट कंपनी में जॉब करता था। हम दोनों किराए के एक छोटे से फ्लैट में रहते थे। फ्लैट दो कमरों का था। नीचे वाली मंजिल पर शालिनी आंटी रहती थीं।

शालिनी आंटी की उम्र बयालीस के आसपास होगी। गोरी चमकदार त्वचा, लंबा काला बाल, चेहरा अभी भी जवान दिखता था। बदन भरा-भरा। छाती भारी, कमर पतली और गाँड इतनी गोल और भारी कि साड़ी या नाइटी में भी साफ उभरती थी। पति उनका विदेश में जॉब करते थे। साल में एक-दो बार ही आते थे। आंटी अकेली रहती थीं।

शुरुआत में सिर्फ नमस्ते-नमस्ते होता था। कभी-कभी दाल-सब्जी माँगने आ जातीं या मैं उनकी मदद कर देता। धीरे-धीरे बातें बढ़ने लगीं। आंटी मुझसे बात करते समय मुस्कुरातीं, कभी-कभी अपना आँचल ठीक करतीं तो उनकी छाती की रेखा साफ दिख जाती। एक बार उन्होंने कहा था, “रोहित, तुम प्रिया के साथ अच्छे से रहते हो। अच्छी बात है। अकेलापन बुरी चीज होती है।”

मुझे उनकी बात में कुछ और लगा था, लेकिन मैंने ज्यादा ध्यान नहीं दिया।

फिर वह दिन आया।

प्रिया की कॉलेज में तीन दिन की ट्रिप निकली थी। मनाली जाना था। प्रिया बहुत उत्साहित थी। जाने से एक दिन पहले उसने मुझसे कहा, “तुम अकेले मत रहना। आंटी के पास चले जाना खाने को। वो अकेली हैं।” मैंने हँसी में हाँ कह दिया।

प्रिया सुबह साढ़े छह बजे निकल गई। मैं ऑफिस गया, शाम को घर लौटा। फ्लैट सूना लगा। खाना बनाने का मन नहीं था। तभी दरवाजे पर दस्तक हुई।

शालिनी आंटी खड़ी थीं। हाथ में एक थाली थी। “रोहित, प्रिया चली गई ना? मैंने सोचा तुम्हारे लिए थोड़ा खाना बना दूँ। अकेले रहोगे तो सही से खाओगे भी नहीं।”

मैंने थाली ली। आंटी अंदर आ गईं। उन्होंने हल्के गुलाबी रंग की नाइटी पहनी हुई थी। नाइटी पतली थी। उनके स्तनों का आकार और निप्पलों की छाया साफ दिख रही थी। गाँड नाइटी के अंदर भारी लग रही थी।

हम दोनों सोफे पर बैठे। खाना खाते-खाते बातें होने लगीं। आंटी ने पूछा, “प्रिया के बिना कैसा लग रहा है?”
मैंने कहा, “थोड़ा अजीब सा।”
आंटी मुस्कुराईं, “अकेलापन होता है। मुझे पता है।”

बातचीत धीरे-धीरे निजी होने लगी। आंटी ने बताया कि उनके पति साल में सिर्फ एक महीने रहते हैं। बाकी समय अकेला ही कटता है। उनकी आँखों में कुछ था जो मैं पहले नहीं देख पाया था।

खाना खत्म हुआ। मैं बर्तन लेकर किचन गया। आंटी भी पीछे आ गईं। किचन छोटा था। उनकी कमर मेरे हाथ से छू गई। दोनों चुप हो गए। मैंने पीछे मुड़कर देखा। आंटी मेरी आँखों में देख रही थीं।

“रोहित…” उन्होंने धीमे से कहा।
“हाँ आंटी?”
“तुम मुझे कभी… उस नजर से देखते हो।”

मैं कुछ नहीं बोला। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। आंटी ने एक कदम आगे बढ़ाया। उनकी छाती मेरे सीने से छू गई। “प्रिया गई हुई है। तीन दिन। कोई नहीं आएगा।”

मैंने उनकी कमर पकड़ ली। आंटी ने अपनी बाँहें मेरे गले में डाल दीं। पहला चुंबन नरम था, फिर गहरा होता गया। उनकी जीभ मेरे मुँह में घुस आई। मैंने उनकी नाइटी ऊपर उठाई। नीचे कुछ नहीं था। न ब्रा, न पैंटी।

उनके स्तन बड़े और भारी थे। निप्पल गहरे भूरे और कड़े। मैंने एक को मुँह में लिया और जोर से चूसा। आंटी कराह उठीं। “आह… हल्के से… नहीं, जोर से चूसो।”

मैंने दोनों स्तनों को बारी-बारी से चूसा, दाँतों से हल्का काटा। आंटी की साँसें तेज हो गईं। मैंने हाथ नीचे ले जाकर उनकी चूत पर रखा। वो पूरी तरह गीली थी। मैंने एक उंगली अंदर डाली। आंटी की कमर लचक गई।

“रोहित… बेडरूम चलो।”

हम दोनों कमरे में गए। आंटी ने खुद नाइटी उतार दी। नंगी खड़ी थीं। बदन अभी भी कसौटी पर खरा था। गाँड गोल और तनी हुई। मैंने उन्हें बिस्तर पर लिटाया और उनकी टाँगें फैला दीं। चूत के बाल साफ कटे हुए थे। मैंने जीभ चूत पर रख दी।

आंटी ने मेरे बाल पकड़ लिए। “हाँ… ऐसे… वहाँ… ऊपर वाला हिस्सा… आह्ह!”

मैं उनकी चूत चाटता रहा। क्लिट को चूसता, जीभ अंदर डालता। आंटी की कमर बार-बार उठ रही थी। दो उंगलियाँ अंदर डालकर मैंने तेजी से हिलाना शुरू किया। आंटी जोर से कराहने लगीं।

“मैं झड़ने वाली हूँ… मत रोको… रोहित… आह्ह!”

उनका शरीर काँप उठा। चूत से पानी निकला। मैंने सब चाट लिया।

फिर आंटी ने मुझे ऊपर खींचा। मेरे कपड़े खुद उतारे। लंड निकलते ही उनकी आँखें चमक उठीं। “इतना… मोटा।” उन्होंने लंड को मुँह में ले लिया। पहले सिर्फ सिर, फिर गहरा। गले तक लेने की कोशिश की। आवाजें गंदी आने लगीं। मैंने उनके बाल पकड़कर हल्का धक्का दिया। आंटी ने आँखें बंद कर लीं और पूरा लेने लगीं।

थोड़ी देर बाद मैंने उन्हें घोड़ी बना दिया। पीछे से चूत में लंड रखा और एक झटके में अंदर तक घुसा दिया। आंटी चीख पड़ीं।

“आह्ह… धीरे… पूरा मत डाल… फट जाएगी…”

मैं रुक गया, फिर धीरे-धीरे पूरा अंदर तक ले गया। उनकी चूत बहुत टाइट और गर्म थी। मैंने कमर पकड़कर धक्के लगाने शुरू किए। पहले धीमे, फिर तेज। गाँड मेरे पेट से टकरा रही थी। थप-थप की आवाज पूरे कमरे में गूँज रही थी।

“चोदो… जोर से चोदो… सालों बाद असली मजा आ रहा है…” आंटी चिल्ला रही थीं।

मैंने उनकी गाँड पर थप्पड़ मारा। लाजवाब आवाज निकली। फिर और जोर से पेलने लगा। आंटी के स्तन बिस्तर पर रगड़ खा रहे थे। मैंने उनका बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा और और गहराई तक ठोका।

“आंटी की चूत कितनी कस रही है… पकड़ के रखी हुई है लंड को…”

“तुम्हारा लंड… बहुत मोटा है… अंदर तक जा रहा है… आह्ह… और तेज…”

मैंने पोजीशन बदली। आंटी को उल्टा किया, टाँगें कंधों पर रखीं और पूरा वजन डालकर चोदने लगा। हर धक्के पर उनकी चीख निकल रही थी। चूत से पानी की आवाज आ रही थी।

फिर मैंने लंड निकाला, थूक लगाया और उनके गाँड के छेद पर रखा। आंटी ने पीछे देखा। “वहाँ… कभी नहीं किया… धीरे से…”

मैंने धीरे दबाव डाला। सिर्फ नोक अंदर गई। आंटी ने दाँत भींच लिए। “दर्द… हो रहा है…”
मैं रुक गया नहीं। धीरे-धीरे आधा लंड गाँड में घुसा दिया। आंटी की साँस रुक गई। फिर पूरा अंदर तक।

“आह्ह्ह… मादरचोद… गाँड फट गई… निकाल मत… अब अंदर ही रख…”

मैंने उनकी कमर पकड़कर गाँड चोदनी शुरू कर दी। पहले बहुत धीरे, फिर रफ्तार बढ़ाई। गाँड की दीवारें लंड को निचोड़ रही थीं। हर धक्के पर आंटी की आवाज बदल रही थी।

“चोदो… गाँड चोदो… पूरा माल अंदर छोड़ना… प्रिया को पता नहीं चलना चाहिए…”

मैं लगभग बीस मिनट उनकी गाँड में पेलता रहा। बीच-बीच में चूत में डालता, फिर वापस गाँड में। आंटी पागल हो चुकी थीं। खुद पीछे धक्के मार रही थीं।

आखिर में मैंने पूरा लंड गाँड में धँसा दिया और झड़ गया। गर्म वीर्य की धार उनकी गाँड के अंदर छूटती रही। आंटी भी उसी समय झड़ गईं। उनका शरीर काँप रहा था।

मैं उनके ऊपर गिरा पड़ा। दोनों की साँसें उखड़ी हुई थीं। थोड़ी देर बाद आंटी ने धीरे से कहा, “यह सिर्फ हमारे बीच रहेगा। प्रिया को कभी पता नहीं चलना चाहिए।”

मैंने उनके गाल पर हाथ फेरा। “आंटी… कल भी आना।”

वे मुस्कुराईं। “प्रिया तीन दिन बाद आएगी। तब तक तुम मेरे हो।”

उस रात हमने दो बार और किया। एक बार बाथरूम में, एक बार फिर बिस्तर पर। सुबह चार बजे आंटी अपने फ्लैट गईं। जाते-जाते मेरे लंड को एक बार और दबाया और कहा, “शाम को खाना लेकर आना। अकेली हूँ।”

प्रिया लौटने तक शालिनी आंटी लगभग रोज आती रहीं। कभी खाने के बहाने, कभी कुछ माँगने के बहाने। और हर बार उनकी चूत और गाँड दोनों तरसती थीं।

यह थी वह सच्ची घटना जब मेरी गर्लफ्रेंड को बाहर भेजकर शालिनी आंटी ने खुद को मुझसे चुदवाया।

दोस्तो, कहानी कैसी लगी, जरूर बताना।

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