साली की गर्मी और छत की रातें | भाभी साली लेस्बियन सेक्स स्टोरी हिंदी

रीता की शादी को ठीक तीन साल हो चुके थे। पति अजय बैंगलोर में एक बड़ी आईटी कंपनी के प्रोजेक्ट पर गया हुआ था। तीन हफ्ते हो गए थे उसे गए हुए। गाँव का बड़ा पुराना मकान था। नीचे सास सुशीला और ससुर रामलाल का कमरा, ऊपर रीता का कमरा और एक खुली छत। घर में सिर्फ तीन लोग रह गए थे। रीता पच्चीस साल की थी। गोरा-सा चेहरा, भारी स्तन, गोल कूल्हे और साड़ी में बंधा बदन। पति के दूर रहने से उसके अंदर एक अजीब बेचैनी बढ़ती जा रही थी। रात को बिस्तर पर लेटते ही शरीर याद दिलाता था कि कब से छुआ नहीं गया।

होली से दस दिन पहले रीता की छोटी बहन नेहा आई। नेहा बाईस साल की थी, शहर में एमए फाइनल ईयर में पढ़ रही थी। गोरा चमकदार चेहरा, लंबे काले बाल कमर तक, पतली कमर, छोटी-सी छाती और साड़ी पहनने पर भी जो बदन झलकता था, वो किसी को भी घुमा सकता था। रीता ने उसे अपने ही कमरे में जगह दी। एक चारपाई रीता की, दूसरी नेहा की।

पहले तीन दिन बिल्कुल सामान्य रहे। नेहा सुबह जल्दी उठकर दूध लेने चली जाती। दोपहर में छत पर चारपाई डालकर किताब पढ़ती। शाम को सास के साथ रसोई में आटा गूँधती, सब्जी काटती। अजय जब फोन पर रीता से बात करता तो नेहा कभी-कभी पास आकर हँसकर बोल देती, “जीजा जी, दीदी बहुत याद करती हैं आपको।” रीता शरमा जाती। नेहा की आवाज़ में एक हल्की सी शरारत थी जो रीता को अंदर तक छू जाती।

चौथे दिन शाम को अचानक बिजली चली गई। गर्मी बहुत तेज़ थी। पसीना शरीर पर चिपक रहा था। सास-ससुर नीचे वाले कमरे में पंखे के बिना ही सो गए। रीता और नेहा छत पर दो चारपाई लगाकर लेट गईं। आसमान में तारे थे। हवा हल्की चल रही थी। नेहा ने सूती सफेद नाइटगाउन पहन रखा था। पतला कपड़ा। हवा के झोंके से नाइटगाउन जाँघों पर चिपक जाता, छाती की गोलाई साफ दिखने लगती।

रीता ने धीरे से पूछा, “नेहा, शादी के बारे में सोचा कुछ?”
नेहा मुड़ी। उसकी आँखों में छत की अंधेरी रोशनी में एक अजीब चमक थी। “दीदी, तुम बताओ। पति तीन हफ्ते से दूर है तो शरीर क्या करता है? रात को कैसे कटती है?”

रीता चुप रही। गला सूख गया। नेहा करीब सरक आई। उसका घुटना रीता की जाँघ से सट गया। दोनों देर तक चुप रहे। सिर्फ साँसें चल रही थीं। फिर नेहा ने धीरे से हाथ बढ़ाया और रीता की साड़ी का पल्लू हटा दिया। ब्लाउज के ऊपर से उँगली फिराई। रीता काँप उठी।
“नेहा… यह क्या कर रही है तू…”
“जो तुम चाहती हो और मैं भी।” नेहा की आवाज़ बहुत धीमी थी, लेकिन साफ।

नेहा ने रीता के होंठों पर अपने होंठ रख दिए। पहला चुंबन हल्का था, सिर्फ होंठ से होंठ। फिर नेहा की जीभ अंदर घुस गई। रीता ने विरोध नहीं किया। उसके हाथ अपने आप नेहा की पीठ पर चले गए। नेहा की पीठ गरम थी, पसीने से चिकनी। चुंबन गहरा होता गया। दोनों की जीभें लड़ रही थीं। नेहा ने रीता के ब्लाउज के हुक एक-एक करके खोले। चार हुक। ब्लाउज ढीला पड़ गया। रीता के स्तन बाहर आ गए — भारी, गोल, गरम। निप्पल पहले से ही खड़े थे, गहरे गुलाबी।

नेहा ने एक निप्पल मुँह में लिया। पहले सिर्फ होंठों से दबाया, फिर जीभ से गोल-गोल घुमाया, फिर जोर से चूसा। दाँतों से हल्का काटा। रीता की साँस तेज़ हो गई। उसने नेहा के लंबे बाल पकड़ लिए। “आह… नेहा… धीरे…” नेहा दूसरे स्तन पर चली गई। दोनों स्तनों को बारी-बारी से चूसती रही, दबाती रही, जीभ से चाटती रही। रीता की कमर हिलने लगी।

नेहा ने साड़ी को कमर से नीचे खिसका दिया। पेटीकोट भी। रीता की सफेद पैंटी पूरी तरह गीली हो चुकी थी। बीच में एक गीला धब्बा साफ दिख रहा था। नेहा ने पैंटी को एक तरफ सरकाया और दो उँगलियाँ अंदर डाल दीं। रीता की योनि गर्म और तंग थी। अंदर की दीवारें चिकनी और गीली। उँगलियाँ धीरे-धीरे अंदर-बाहर होने लगीं। रीता ने मुँह नेहा के कंधे में दबा लिया ताकि आवाज़ न निकले। नेहा की उँगलियाँ और गहराई तक चली गईं। तीन उँगलियाँ हो गईं। अंगूठे से क्लिटोरिस को रगड़ने लगी। रीता की जाँघें काँप रही थीं।

नेहा नीचे उतरी। उसने रीता की दोनों टाँगें फैलाईं और योनि के ठीक सामने मुँह रख दिया। पहले हल्के चाट। जीभ सिर्फ बाहर। फिर क्लिटोरिस को मुँह में लेकर चूसा। जोर से। फिर जीभ अंदर तक घुसा दी। रीता की कमर उछलने लगी। नेहा ने दोनों हाथों से रीता की जाँघें दबा रखी थीं। जीभ अंदर-बाहर, कभी क्लिट चूसना, कभी नीचे तक चाटना। रीता की योनि से पानी निकल रहा था। नेहा सब चाट रही थी। दस-बारह मिनट बाद रीता का पूरा शरीर काँप उठा। वह जोर से साँस छोड़ते हुए झड़ गई। उसका रस नेहा के होंठों, ठुड्डी और गले तक लग गया। नेहा ने सब चाट लिया।

फिर नेहा खुद लेट गई। रीता ने उसका नाइटगाउन ऊपर कर दिया। नेहा के स्तन छोटे और कसे हुए थे। निप्पल छोटे लेकिन बहुत सख्त। रीता ने उन्हें चूसा, दाँतों में दबाया, जीभ से घुमाया। नेहा कराहने लगी। रीता ने नेहा की पैंटी उतार दी। नेहा की योनि भी पूरी गीली थी। हल्के बाल। रीता ने तीन उँगलियाँ एक साथ अंदर तक घुसा दीं। अंगूठे से क्लिटोरिस को जोर-जोर से रगड़ा। नेहा दाँत भींचकर कराहती रही। उसकी टाँगें फैल गईं। रीता की उँगलियाँ तेज़ हो गईं। नेहा भी काँपते हुए झड़ गई। उसका पानी रीता की हथेली पर लग गया।

रात भर दोनों बारी-बारी से एक-दूसरे को चाटती रहीं। कभी रीता ऊपर, कभी नेहा। कभी दोनों आमने-सामने लेटकर एक-दूसरे की योनि में उँगलियाँ डाले हुए। सुबह से पहले नेहा रीता की जाँघों के बीच मुँह रखकर सो गई। रीता के बाल उसकी जाँघों पर बिखरे थे।

अगले दिन सास ने कुछ नहीं पूछा। सिर्फ इतना बोली, “रात को गर्मी ज्यादा थी क्या? दोनों की आँखें सूजी हुई हैं।” रीता ने सिर हिला दिया। शाम को फिर बिजली नहीं आई। छत पर दोनों और हिम्मत से आगे बढ़ीं।

नेहा रसोई से एक खीरा लेकर आई। धोया, छीलने के बाद फिर धोया। रीता लेटी हुई थी। नेहा ने खीरे को रीता की योनि के मुँह पर रखा और धीरे-धीरे अंदर धकेलने लगी। रीता की आँखें बंद हो गईं। खीरा ठंडा और चिकना था। अंदर तक चला गया। नेहा ने खीरे को अंदर-बाहर करना शुरू किया। खुद अपनी दो उँगलियाँ अपनी योनि में डाल लीं। दोनों की कराहें एक साथ निकल रही थीं। खीरा पूरी तरह गीला हो चुका था। नेहा ने खीरे को और तेज़ किया। रीता जोर से काँपी और झड़ गई। खीरे पर उसका पानी लग गया। नेहा ने खीरे को निकालकर चाटा, फिर अपनी योनि में उँगलियाँ तेज़ करते हुए खुद भी झड़ गई। दोनों साथ-साथ साँस ले रही थीं।

तीसरी रात नेहा ने रीता को कुत्ते की तरह घुटनों के बल बैठा दिया। रीता के कूल्हे ऊपर थे। नेहा पीछे बैठ गई। पहले उँगलियाँ अंदर डालीं — तीन उँगलियाँ। जोर-जोर से अंदर-बाहर। फिर मुँह लगा दिया। जीभ योनि के अंदर तक। कभी क्लिट चूसना, कभी नीचे तक चाटना, कभी उँगलियाँ और जीभ दोनों साथ। रीता की आवाज़ दबी रही लेकिन शरीर बुरी तरह काँप रहा था। नेहा ने एक उँगली रीता की गुदा के मुँह पर रखी और हल्का दबाया। रीता और जोर से काँपी। नेहा ने गुदा में उँगली अंदर तक डाल दी और योनि में जीभ। रीता दो बार झड़ गई। दूसरी बार तो उसके पैर ही जवाब दे गए। वह चारपाई पर गिर पड़ी। नेहा उसके ऊपर लेट गई और उसके होंठ चूमने लगी। रीता के मुँह में अपना रस लगा हुआ था।

चौथी रात नेहा ने कहा, “दीदी, मुझे भी अंदर कुछ चाहिए। तुम्हारी उँगलियाँ… और कुछ।” रीता ने नेहा को लिटाया। अपनी तीन उँगलियाँ नेहा की योनि में डाल दीं। दूसरी हाथ से क्लिटोरिस को तेज़ रगड़ा। नेहा की टाँगें हवा में उठ गईं। रीता ने उँगलियाँ और तेज़ कीं। नेहा जोर से साँस छोड़ते हुए झड़ गई। पानी रीता के हाथ पर लग गया। दोनों ने एक-दूसरे के रस को चाटा। नेहा ने रीता की उँगलियाँ मुँह में लीं और चूसीं। रीता ने नेहा की।

पाँचवीं रात सबसे लंबी रही। दोनों पूरी तरह नंगी लेटीं। चारपाई पर चादर बिछाई हुई थी। नेहा ने रीता के स्तनों को दोनों हाथों से दबाकर चूसा। निप्पल को दाँतों में लेकर खींचा। फिर नीचे चली गई। योनि को पूरा मुँह से ढक लिया। जीभ अंदर-बाहर, दाँत हल्के से क्लिट पर, होंठों से चूसना। रीता ने नेहा के बाल पकड़कर और जोर से दबाया। “और अंदर… जीभ और अंदर डाल…” नेहा ने जीभ पूरी ताकत से अंदर तक घुसा दी। रीता का शरीर एक बार फिर काँप उठा। वह जोर से झड़ गई। पानी नेहा के पूरे चेहरे पर लग गया। नेहा ने सब चाट लिया।

झड़ने के बाद रीता ने नेहा को ऊपर बिठा दिया। नेहा की योनि रीता के मुँह के ठीक ऊपर। रीता ने नीचे से चाटना शुरू किया। जीभ अंदर, क्लिट चूसना, उँगलियाँ भी साथ। नेहा की टाँगें काँप रही थीं। वह रीता के बाल पकड़े हुए ऊपर-नीचे हो रही थी। “दीदी… और… वहाँ… हाँ…” रीता ने एक उँगली नेहा की गुदा में भी डाल दी। नेहा चीखते-चीखते झड़ गई। पानी रीता के मुँह और गले पर लग गया।

आखिर में दोनों ने एक-दूसरे की योनि में उँगलियाँ डाल लीं। रीता की तीन उँगलियाँ नेहा में, नेहा की तीन उँगलियाँ रीता में। दोनों आमने-सामने लेटी हुईं। उँगलियाँ तेज़-तेज़ अंदर-बाहर। क्लिटोरिस को अंगूठे से रगड़ते हुए। दोनों की साँसें एक हो गईं। दोनों एक साथ काँपने लगीं। एक साथ झड़ीं। पानी दोनों के हाथों पर, जाँघों पर, चादर पर लग गया। दोनों थककर एक-दूसरे से चिपक गईं। पसीना, रस, साँसें — सब मिला हुआ।

अजय के लौटने से एक दिन पहले नेहा की ट्रेन थी। स्टेशन पर रीता ने उसके कान में कहा, “अगली होली फिर आना। छत खाली रहेगी। और इस बार… और कुछ लेकर आना।” नेहा मुस्कुराई। उसकी आँखों में वही शरारत थी। वह ट्रेन में बैठ गई। रीता देर तक प्लेटफॉर्म पर खड़ी रही। शरीर अभी भी नेहा के स्पर्श को याद कर रहा था।

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