कामवाली रमा की प्यासी चूत | नौकरानी सेक्स स्टोरी हिंदी

मेरा नाम रोहित शर्मा है। उम्र चौबीस साल। दिल्ली के एक मध्यम वर्गीय सोसाइटी के तीसरे फ्लोर पर माता-पिता के साथ रहता हूँ। पापा सरकारी ऑफिस में हैं, मम्मी घर संभालती हैं। मैं प्राइवेट कंपनी में जूनियर एग्जीक्यूटिव हूँ। सुबह दस बजे जाता हूँ, शाम सात बजे लौटता हूँ। घर में एक कामवाली आती है जिसका नाम रमा है। उम्र कोई बत्तीस-तैंतीस साल होगी। गोरी-चिट्टी त्वचा, गोल चेहरा, बड़ी-बड़ी काली आँखें, मोटे होठ। शरीर भारी भरकम है। चूचियाँ इतनी बड़ी और भारी कि साड़ी के ब्लाउज में से बाहर आने को बेताब रहती हैं। निप्पल हमेशा थोड़े उभरें रहते हैं। कमर मोटी है लेकिन कूल्हे और गांड इतनी गोल और मांसल हैं कि जब वह झुकती है तो दिमाग घूम जाता है। जाँघें मोटी और मुलायम। रोज सुबह आठ बजे आती है, झाड़ू-पोछा, बर्तन, कपड़े धोती और दो-ढाई बजे तक काम खत्म करके चली जाती है।

पहले-पहले मैं उसे सिर्फ कामवाली समझता था। लेकिन पिछले चार-पाँच महीनों से मेरी निगाहें उसके शरीर पर अटकने लगीं। जब वह पोछा लगाने के लिए झुकती तो साड़ी की फाँक से उसकी मोटी गांड की दरार साफ दिख जाती। कभी-कभी पेटीकोट ऊपर उठ जाता और उसकी चूत की मोटी फाँक की हल्की सी झलक मिल जाती। चूचियाँ ब्लाउज में से इस तरह धँसी रहतीं कि मेरी लंड तन जाती। मैं बाथरूम में जाकर मुठ मार लेता। रात को सोच-सोच कर पानी निकालता कि काश एक दिन इस रमा को नंगा करके चोदूं।

एक हफ्ते पहले मम्मी-पापा दोनों नैनीताल चले गए। तीन दिन के लिए। घर में सिर्फ मैं अकेला रह गया। पहली सुबह रमा आई। उसने दरवाजा खोला तो मैं अभी तक बेड पर ही था। रमा ने देखा और बोली, “बाबूजी, आज अकेले हैं? मेमसाब-साहब कहाँ गए?”
“तीन दिन के लिए पहाड़ों पर। तू आराम से काम कर।”

रमा ने नीली साड़ी और लाल ब्लाउज पहना था। ब्लाउज बहुत टIGHT था। चूचियों के निप्पल साफ उभर रहे थे। वह झाड़ू लगाने लगी। मैं सोफे पर बैठकर मोबाइल में स्क्रोल करने का नाटक कर रहा था लेकिन मेरी पूरी तवज्जो उसकी गांड पर थी। हर बार जब वह झुकती, मेरी लंड पैंट में तन जाती। एक बार तो साड़ी इतनी सरक गई कि उसकी गांड की आधी गोलाई नंगी दिख गई। मेरा दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।

दोपहर को रमा बर्तन धोने रसोई में थी। मैं प्यास के बहाने रसोई में गया। वह सिंक पर झुकी हुई थी। गांड मेरी तरफ। मैंने पीछे से जाकर उसकी कमर पर हाथ रख दिया। रमा अचानक काँप गई।
“बाबूजी…?”
मैंने धीरे से कहा, “रमा… तेरी गांड रोज पागल कर देती है मुझे।”
रमा चुप रही। मैंने हाथ आगे बढ़ाकर उसकी एक चूची ब्लाउज के ऊपर से पकड़ ली और मसल दिया। रमा की साँस रुक गई लेकिन उसने मेरा हाथ नहीं हटाया। मैंने दोनों चूचियाँ जोर से दबोच लीं। निप्पल अंगूठे और उँगली के बीच ऐंठे। रमा की कमर पीछे की तरफ मेरे लंड से जा लगी।

“बाबूजी… यह गलत है… मैं गरीब औरत हूँ…”
“गलत कुछ नहीं है रमा। तेरी चूत में कितने दिन से उँगलियाँ डाल रही है तू? बता।”
रमा की आवाज काँप गई, “बहुत दिन से… पति गाँव में है… तीन महीने हो गए… चूत में जलन होती है बाबूजी…”

इतना सुनते ही मेरी हिम्मत पूरी हो गई। मैंने उसे घुमाया और उसके मोटे होठों पर अपने होठ रख दिए। पहले तो रमा सहम गई, फिर उसकी जीभ भी मेरी जीभ से लड़ने लगी। मैंने ब्लाउज के हुक एक-एक करके खोले। उसकी भारी चूचियाँ बाहर आ गिरीं। बड़े-बड़े, गोल, नसों वाली, निप्पल काले और सख्त। मैंने एक निप्पल मुँह में लिया और जोर से चूसा। दाँतों से काटा, जीभ से घुमाया। रमा की कराह निकल गई। “आह्ह… बाबूजी… जोर से… बहुत दिन बाद…” मैं दूसरी चूची पर गया। दोनों हाथों से मसलते हुए चूसता रहा। रमा के हाथ मेरे बालों में थे। वह मेरे सिर को अपनी चूचियों में और जोर से दबा रही थी।

मैंने उसकी साड़ी और पेटीकोट एक झटके में नीचे गिरा दिए। पैंटी भी। रमा पूरी नंगी रसोई में खड़ी थी। मोटी जाँघों के बीच घनी काली झाड़ी। झाड़ी के बीच से उसकी चूत की मोटी फाँक चमक रही थी। पहले से गीली। मैंने दो उँगलियाँ अंदर डाल दीं। चूत गरम, तंग और बहुत चिकनी थी। अंदर की दीवारें पानी से लबालब। “क्या प्यासी चूत है तेरी रमा… देख कैसे पानी छोड़ रही है।” मैंने उँगलियाँ जोर-जोर से अंदर-बाहर करनी शुरू कीं। अंगूठे से क्लिटोरिस रगड़ा। रमा की जाँघें काँपने लगीं। वह सिंक पकड़कर खड़ी थी।

मैंने पैंट खोली। मेरी नौ इंच लंबी, मोटी, नसों वाली लंड बाहर निकल आई। सिरे से पहले ही पानी टपक रहा था। रमा की आँखें फटी रह गईं। “बाबूजी… ये तो बहुत मोटी है… मेरी चूत फट जाएगी…”
“फटने दे… आज फाड़ूँगा ही।”

मैंने रमा को सिंक पर बैठाया। उसकी दोनों टाँगें फैलाईं। लंड का सिरा उसकी चूत की फाँक पर रखा और एक जोरदार धक्के में आधा अंदर घुसा दिया। रमा जोर से चिल्लाई। “आह्ह्ह… दर्द… बाबूजी रुक…” लेकिन मैंने दूसरा धक्का और लगाया। पूरी लंड उसकी चूत में समा गई। रमा की आँखों से आँसू बहने लगे। मैंने कमर पकड़कर जोर-जोर से पेलना शुरू कर दिया। हर धक्के में उसकी चूचियाँ मेरे चेहरे पर उछल-उछल कर मार रही थीं। मैं निप्पल काट-काट कर चोदता रहा।

“फाड़ दो बाबूजी… मेरी चूत फाड़ दो… हरामी… और जोर से पेलो… पूरी लंड अंदर तक…”
मैंने धक्के और बर्बर कर दिए। थप्पड़-थप्पड़ की आवाज पूरे घर में गूंज रही थी। रमा की चूत से पानी की रप-रप आवाज आ रही थी। पंद्रह मिनट तक लगातार पेलने के बाद रमा का पूरा शरीर काँप उठा। वह जोर से चिल्लाते हुए झड़ गई। चूत ने मेरी लंड को इतनी जोर से जकड़ा कि मुझे भी आ गया। मैंने चार-पाँच तेज धक्के मारकर अंदर ही गाढ़ा गर्म वीर्य छोड़ दिया। वीर्य की धार उसकी चूत में भर गई। दोनों पसीने से नहाए हुए थे।

आधे घंटे बाद हम बेड रूम में थे। रमा ने खुद मेरे लंड को हाथ में लिया और हिलाने लगी। फिर मुँह में ले लिया। पहले सिर्फ सिरा, फिर धीरे-धीरे गहराई तक। गला तक। लार टपकने लगी। वह गोलों को मुँह में लेकर चूसती, लंड को चाटती, फिर फिर से गला तक निगल जाती। मैंने उसके बाल पकड़कर मुँह में जोर-जोर से पेलना शुरू कर दिया। रमा की आँखों से आँसू आ रहे थे लेकिन वह “रुक” नहीं बोल रही थी। दस मिनट बाद मैंने उसके मुँह में ही दूसरा वीर्य छोड़ दिया। रमा ने गले तक निगल लिया और जीभ निकालकर लंड को चाट-चाट कर साफ किया।

फिर मैंने रमा को कुत्ते की पोजीशन में कर दिया। गांड ऊपर उठी हुई। मोटी गांड और नीचे चमकती गीली चूत। मैंने पहले चूत में लंड डाली और जोर से बीस-पच्चीस धक्के लगाए। फिर थूक और चूत के पानी से उसकी गांड के छेद को चिकना किया। एक उँगली अंदर डाली। रमा कराह उठी। “बाबूजी… गांड में…?”
“हाँ रमा… आज तेरी गांड भी मेरी हो जाएगी।”

मैंने उँगली निकालकर लंड का सिरा गांड पर रखा और धीरे-धीरे दबाव दिया। रमा की चीख निकल गई। “आह्ह्ह… बहुत दर्द… बाबूजी…” लेकिन मैं धीरे-धीरे आधी लंड अंदर घुसाता गया। फिर पूरी। रमा के नाखून चादर में गड़ गए। आँखों से आँसू बह रहे थे। मैंने बहुत धीरे-धीरे पेलना शुरू किया। एक हाथ से उसकी चूत में तीन उँगलियाँ डाल रखी थीं। “देख रमा… गांड और चूत दोनों मेरे लंड और उँगलियों से भरी हुई हैं…” रमा रोते-रोते बोल रही थी, “पेलते रहो बाबूजी… गांड फाड़ दो… रंडी बना दो मुझे… पूरी रंडी…” मैंने गति तेज कर दी। थप्पड़ मार-मार कर गांड चोदता रहा। लगभग पच्चीस मिनट बाद रमा फिर से जोर से झड़ गई। मैंने भी गांड में ही अपना तीसरा वीर्य छोड़ दिया।

दोपहर तक हमने पाँच बार चुदाई की। रसोई की स्लैब पर, बेड पर, सोफे पर, फर्श पर, बालकनी के दरवाजे के पीछे। रमा की चूत और गांड दोनों सूज चुकी थीं। वह मेरे बगल में नंगी लेटी थी और मेरी लंड को धीरे-धीरे सहला रही थी। “बाबूजी, जब भी अकेले हो… मुझे फोन कर लेना। मेरी चूत अब सिर्फ आपके लंड की भूखी रहेगी। गांड भी…”

अगले दिन सुबह रमा आई तो सीधे मेरे कमरे में घुस गई। कपड़े उतारते हुए बोली, “आज पहले गांड चोदो बाबूजी… फिर चूत… फिर मुँह।” मैंने उसी के कहा के अनुसार पहले उसकी गांड में पूरी लंड पेल दी। वह कुतिया की तरह चारों पैरों पर थी और भौंक-भौंक कर बोल रही थी, “और जोर से… हरामी बाबूजी… गांड के अंदर तक ठोक दो…” फिर चूत में। फिर मुँह में। दिन भर रमा की तीनों छेद मेरी लंड की सेवा करते रहे। मैंने उसके मुँह में, चूचियों पर, चूत में और गांड में अलग-अलग बार वीर्य छोड़ा। रमा ने सब जगह से चाट-चाट कर साफ किया।

तीसरे दिन मम्मी-पापा आने वाले थे। सुबह रमा आई तो मैंने उसे आखिरी बार पूरे बर्बर तरीके से चोदा। टेबल पर लिटाकर दोनों टाँगें कंधों पर रखीं और इतनी जोर से पेलता रहा कि टेबल हिलने लगी। रमा लगातार तीन बार झड़ गई। उसकी चूत से पानी की धार बह रही थी। आखिर में मैंने उसके मुँह में लंड डालकर गले तक वीर्य छोड़ दिया। रमा ने निगल लिया। जाते समय उसने मेरे कान में कहा, “बाबूजी, अगली बार जब मेमसाब-साहब बाहर जाएँ… तो मेरी दोनों छेद तैयार रहेंगे। आप जब चाहें, जहाँ चाहें, जैसे चाहें… चोदना।”

उस दिन के बाद जब भी घर में अकेला होता, रमा की प्यासी चूत और गांड मेरा इंतजार करतीं। कभी झाड़ू लगाते-लगाते मैं पीछे से साड़ी उठाकर चोद देता, कभी बर्तन धोते समय स्लैब पर चोदता, कभी बेड पर लेटा-लेटा घंटों उसकी चूत और गांड दोनों का मजा लेता। रमा अब सिर्फ कामवाली नहीं रह गई थी। वह मेरी निजी रंडी बन चुकी थी।

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