मेरा नाम रिया है। उम्र इक्कीस साल।
कॉलेज के अंतिम सेमेस्टर के खत्म होते ही मैंने शहर के एक प्रतिष्ठित प्राइवेट फर्म में जॉइन कर लिया था। पहली बार परिवार से इतनी दूर। अपनी जिंदगी, अपना किराया, अपना खाना, अपनी जिम्मेदारियाँ। अंदर एक आत्मविश्वास था, लेकिन उसके नीचे एक हल्की बेचैनी और जिज्ञासा भी थी। नई जगह, नए लोग, और एक अधूरा सा अकेलापन जो रात को ज्यादा महसूस होता था।
मैं औसत से थोड़ी लंबी हूँ। गेहुँआ साफ रंग। लंबे घने बाल जो ज्यादातर बाँधे रखती हूँ। चेहरा तेज और आँखें बात करती हैं। शरीर युवा और फिट है — पतली कमर, गोल और सघन स्तन, सुडौल गाँड और लंबी टाँगें। ऑफिस में मैं फॉर्मल कपड़े पहनती हूँ। फिटेड शर्ट और पैंट में मेरी बनावट पूरी तरह छुप नहीं पाती। कई सहकर्मी नज़रें डालते थे, लेकिन मैंने अभी तक किसी के साथ कोई संबंध नहीं रखा था। मन में एक भूख जरूर थी, लेकिन हिम्मत और मौका दोनों नहीं मिले थे।
ऑफिस में मेरे डायरेक्ट सीनियर थे विक्रम मल्होत्रा। उम्र तीस साल। लंबे कद के, सीधी तनकर चलने वाले। गेहुँआ रंग, साफ मुंडा चेहरा, हल्की दाढ़ी की लाइन, और काली गहरी आँखें। हमेशा अच्छी क्वालिटी की शर्ट, महंगी घड़ी और धीमी लेकिन आत्मविश्वास भरी आवाज। ऑफिस में सब उन्हें리스pect करते थे। काम में सख्त, लेकिन गलती पर अनावश्यक अपमान नहीं करते थे। मैंने जॉइन करने के पहले ही हफ्ते में नोटिस किया कि कई लड़कियाँ उनकी तरफ देखती हैं। वह ज्यादातर प्रोफेशनल दूरी बनाए रखते।
हमारी पहली औपचारिक बातचीत एक नए प्रोजेक्ट को लेकर हुई। मुझे उनके अंडर काम करना था। वह निर्देश साफ और छोटे वाक्यों में देते। जब मैं सही करती तो सिर हिला देते, गलती होती तो शांत स्वर में सुधार करते। धीरे-धीरे हमारी बातें सिर्फ़ काम तक सीमित नहीं रहीं। कभी कॉफी मशीन के पास खड़े-खड़े, कभी लिफ्ट में, कभी डेस्क के पास फाइल देते समय। वह मुझसे पूछते कि शहर में अकेले रहना कैसा लग रहा है, खाना खुद बनाती हूँ या नहीं, परिवार कितनी बार फोन करता है। मैं जवाब देती। उनकी आँखों में एक थकान और गहराई थी जो सिर्फ़ ऑफिस वाले चेहरे में नहीं दिखती थी।
एक दिन ऑफिस में बहुत दबाव वाला काम था। डेडलाइन करीब थी। लगभग सब लोग जा चुके थे। रात के साढ़े नौ बज रहे थे। केबिन और वर्कस्टेशन पर सिर्फ़ मैं और विक्रम बचे थे। कमरे में सन्नाटा था। सिर्फ़ कीबोर्ड की हल्की आवाज और बाहर सड़क के वाहनों का दूर का शोर आ रहा था।
विक्रम ने अपना काम रोककर मेरी तरफ देखा। “इतनी रात तक बैठकर काम करके अकेला नहीं लगता?” “लगता है,” मैंने सच कहा। “लेकिन आदत पड़ रही है।” “परिवार से दूर रहना आसान नहीं होता। खासकर लड़कियों के लिए।” “आपको कैसे पता?” वह थोड़ी देर कुर्सी पर पीछे झुका। फिर बोला, “मैं भी जानता हूँ अकेलापन क्या होता है। शादी के बाद भी अकेलापन हो सकता है।”
मैंने सिर उठाकर उनकी आँखों में देखा। “आप शादीशुदा हैं?” “हाँ। तीन साल हो गए।” “अच्छा।” मैंने बस इतना कहा। लेकिन अंदर एक अजीब सा ख्याल उठा। शादीशुदा होने के बावजूद उनकी आँखों में वह अकेलापन और थकान साफ झलक रही थी। उस रात हम लगभग डेढ़ घंटे तक काम के अलावा भी बातें करते रहे। उन्होंने अपनी पत्नी के बारे में ज्यादा विस्तार नहीं दिया, बस इतना कहा कि रिश्ता अब एक समझौते जैसा रह गया है। कमरे में साथ होते हैं, लेकिन बातें और छुअन दोनों कम हो गई हैं। मैंने अपनी जिंदगी के बारे में थोड़ा बताया — परिवार की उम्मीदें, अकेले रहने का डर, और नई जिंदगी की जिज्ञासा। जब हम ऑफिस से निकले तो लिफ्ट में हमारे कंधे हल्के से छू गए। दोनों ने कुछ नहीं कहा, लेकिन वह छोटा सा स्पर्श मेरे दिमाग में बार-बार दोहराया गया।
अगले दस-बारह दिनों में विक्रम का व्यवहार धीरे-धीरे बदला। वह मुझे प्रोजेक्ट पर ज्यादा समय देने लगे। कभी-कभी मेरी कुर्सी के पीछे खड़े होकर स्क्रीन देखने के बहाने बहुत करीब आ जाते। उनकी खुशबू — हल्की, महंगी और साफ — महसूस होती। कभी फाइल देते समय उनकी उँगली मेरे हाथ की पीठ से धीरे से फिसल जाती। आँखों का मिलना अब सामान्य से ज्यादा देर तक रहता। एक बार तो इतना लंबा हो गया कि मैंने पहले नज़रें झुका लीं।
मैं खुद को बार-बार समझाती कि वह शादीशुदा हैं। कुछ नहीं हो सकता। यह गलत है। लेकिन शरीर नहीं मानता था। उनकी आवाज, उनका करीब आना, उनका धीमे से मुस्कुराना, लिफ्ट में उनके कंधे का छूना — सब कुछ अंदर तक असर कर रहा था। रात को अपने छोटे फ्लैट में अकेली लेटी हुई मैं उनके बारे में सोचती। उनके लंबे हाथ, उनकी चौड़ी छाती, उनकी गहरी आँखें, और यह ख्याल कि शादीशुदा होने के बावजूद वे मुझमें स्पष्ट दिलचस्पी ले रहे हैं। कभी-कभी शरीर में गर्मी फैल जाती और मैं करवटें बदलती रहती।
एक शाम ऑफिस के बाद वह मेरे डेस्क के पास आए। हाथ में गाड़ी की चाबी थी। “कॉफी पिएँगे?” “अभी इतनी रात?” “हाँ। पास में ही एक शांत जगह है। काम की बात भी करनी है। डेडलाइन करीब है।”
मैंने हाँ कह दी। हम उनकी गाड़ी में बैठे। रास्ते में ज्यादा बातें नहीं हुईं। कॉफी शॉप में कोने वाली टेबल पर बैठे। बात काम से शुरू हुई, लेकिन बीस मिनट बाद निजी हो गई। विक्रम ने इस बार थोड़ा और खोला।
“मेरी शादी एक परिवार वाला समझौता था। दोनों परिवारों ने तय कर दी। पत्नी अच्छी हैं, समझदार हैं, लेकिन हम दोनों में अब कोई भावनात्मक जुड़ाव नहीं बचा। एक ही कमरे में सोते हैं, लेकिन दूर-दूर। बातें औपचारिक हो गई हैं। छुअन लगभग खत्म।”
मैं चुपचाप सुन रही थी। कप अपने हाथों में घुमा रही थी। “आपको यह सब क्यों बता रहा हूँ रिया?” उसने खुद से पूछा। आवाज में थकान थी। “पता नहीं। शायद इसलिए क्योंकि आप सुन रही हैं। और शायद इसलिए क्योंकि आप अकेली हैं और समझ सकती हैं।”
वापस ऑफिस की तरफ लौटते समय रास्ता काफी शांत था। एक पल के लिए हमारी चाल एक जैसी हो गई। उनके हाथ का मेरे हाथ से छूना इस बार जानबूझकर लगा। मैंने नहीं हटाया। कुछ कदम बाद उन्होंने धीरे से मेरी उँगलियाँ पकड़ लीं। बस कुछ सेकंड के लिए। फिर छोड़ दीं। दोनों ने कुछ नहीं कहा।
उस रात उन्होंने मुझे मैसेज किया। “घर सुरक्षित पहुँच गईं?” “हाँ।” “अच्छे से सोना।”
सामान्य मैसेज था। लेकिन उसके बाद से मैसेजिंग नियमित हो गई। पहले काम और डेडलाइन के बारे में, फिर धीरे-धीरे निजी। वह पूछते कि खाना खाया या नहीं, अकेला तो नहीं लग रहा, नींद आ रही है या नहीं। मैं जवाब देती। बातें रात के बारह-एक बजे तक चलती रहतीं।
एक रात उन्होंने वीडियो कॉल किया। बहाना प्रोजेक्ट का था। लेकिन बातें काम की बहुत कम हो गईं। मैं हल्की नाइटी में थी। उन्होंने नोटिस किया। “आप घर पर भी इतनी फॉर्मल नहीं रहतीं।” मैं हँसी। “अब ऑफिस तो बंद हो गया। घर की आजादी है।” उनकी आँखें स्क्रीन पर मेरे चेहरे, बालों और गले पर रुकी रहीं। मैंने महसूस किया कि वे मुझे देख रहे हैं — सिर्फ़ बात नहीं कर रहे।
अगले दिनों में टेंशन और बढ़ती गई। ऑफिस में जब वे मेरे करीब आते तो मेरा दिल तेज धड़कता। कभी-कभी वे जानबूझकर मेरे कान के बहुत पास आकर कुछ काम की बात कहते। उनकी गरम साँस कान की लौ से टकराती। मैं खुद को याद दिलाती कि वे शादीशुदा हैं, यह गलत है, आगे कुछ नहीं होना चाहिए। लेकिन शरीर की प्रतिक्रिया उल्टी थी। रात को अकेली लेटी हुई मैं उनके हाथों, उनकी आवाज और उनके करीब आने की कल्पना करती। कभी-कभी उँगलियाँ अपने शरीर पर फिर जातीं।
एक दिन उन्होंने देर रात मैसेज किया, “मुझे तुमसे बात करनी है रिया। ऑफिस में नहीं। कहीं और। जहाँ कोई हमें न देखे और न सुने।”
मैंने काफी देर तक फोन को घूरा। दिल जोर-जोर से धधक रहा था। फिर जवाब दिया, “कहाँ?”
उन्होंने एक जगह का नाम और समय भेजा। शहर के बाहर एक शांत कैफे, अगले दिन शाम को।
मैं जानती थी कि यह सिर्फ़ बात करने के लिए नहीं है। मैं जानती थी कि मैं गलत दिशा में जा रही हूँ। लेकिन मैंने फिर भी “ठीक है” लिख दिया।
अगले दिन शाम को मैं उस कैफे पहुँची। दिल इतनी जोर से धधक रहा था कि साँस फूल रही थी। विक्रम पहले से कोने की टेबल पर बैठा था। काली शर्ट में। उसने मुझे देखकर धीरे से मुस्कुराया। बातें सामान्य शुरू हुईं — काम, डेडलाइन, मौसम। लेकिन हवा में तनाव इतना गाढ़ा था कि हर वाक्य भारी लग रहा था। आधे घंटे बाद उसने आवाज कम करके कहा,
“यहाँ बात नहीं हो पाएगी रिया। मेरे पास एक जगह है। सर्विस अपार्टमेंट। शांत है। कोई नहीं आएगा।”
मैं जानती थी कि हाँ कहना गलत है। मैं जानती थी कि यह फैसला मेरी जिंदगी बदल सकता है। फिर भी मैंने सिर हिला दिया।
बीस मिनट बाद हम एक ऊँची बिल्डिंग के सर्विस अपार्टमेंट में थे। दरवाजा बंद होते ही विक्रम ने मुझे दीवार से जोर से लगा लिया और भूखे की तरह चूम लिया। इस बार कोई झिझक नहीं थी। उसकी जीभ मेरे मुँह में गहराई तक घुस आई। एक हाथ मेरे बालों में था, दूसरा मेरी गाँड पर। उसने जींस के ऊपर से मेरी गाँड को जोर से मसला और दबाया।
“इतने दिनों से खुद को रोक रहा था रिया,” वह मेरे मुँह में ही गरम साँस छोड़ते हुए बोला। “तेरी बाँधी बालों वाली शरीफ सूरत… फॉर्मल कपड़ों के नीचे छुपा शरीर… आज सब खोलना है।”
मैंने उसका जवाब और गहरे चुंबन से दिया। उसने मेरी शर्ट के बटन एक-एक करके खोले। ब्रा के ऊपर से मेरे स्तनों को जोर से मसला। निप्पल पहले से सख्त थे। उसने ब्रा के हुक खोले और फेंक दिए। मेरे स्तन बाहर आते ही उसने एक निप्पल मुँह में ले लिया और जोर से चूसने लगा। दाँतों से काटा। जीभ से मरोड़ा। मैं दीवार से लगी कराह उठी।
“आह्ह… विक्रम… जोर से… काटो…”
वह दोनों स्तनों को बारी-बारी से चूसता रहा। फिर मुझे बिस्तर पर धकेल दिया। मेरी जींस और पैंटी एक साथ नीचे खींच ली। मैं पूरी नंगी उसके सामने लेटी थी। उसने मुझे घूरते हुए कहा, “इतनी जवान चूत… अभी तक किसी ने नहीं चोदी ना?”
मैंने सिर हिलाया। “अच्छा। तो आज पहली बार पूरा फाड़ूँगा।”
उसने भी कपड़े उतारे। उसका मोटा लंड निकला — लंबा, मोटा, नसों वाला और सिर चमकता हुआ। मैंने देखा और गला सूख गया। उसने मेरे मुँह के सामने लंड पकड़ लिया।
“चूस। गहराई तक ले। गले तक।”
मैंने मुँह खोला। वह धीरे-धीरे अंदर घुसाने लगा। मैंने चूसना शुरू किया। वह मेरे बाल पकड़कर हल्के धक्के देने लगा। गले तक लंड जा रही थी। आँखों से पानी आने लगा। थूक लंड पर गिर रहा था।
“हाँ… ऐसे ही… शरीफ जूनियर लड़की… सीनियर का लंड चूस रही है… मजा आ रहा है?”
थोड़ी देर बाद उसने लंड निकाली और मेरे पैर फैला दिए। अपना मोटा लंड मेरी चूत पर रगदा। फिर एक झटके में आधा अंदर डाल दिया।
“आह्ह्ह… विक्रम… धीरे… बहुत बड़ा है… फट जाएँगी…”
“सह ले… थोड़ा और… पूरी लेनी है आज…”
वह धीरे-धीरे पूरा अंदर तक घुस गया। मेरी चूत उसके मोटे लंड से पूरी तरह फैल गई। वह कुछ पल रुका रहा। फिर लंबे-लंबे भारी धक्के लगाने लगा। हर धक्के पर मेरे स्तन जोर से हिल रहे थे। उसने मेरी दोनों टाँगें अपने कंधों पर रख लीं और और गहराई तक मारने लगा।
“बोल… कैसा लग रहा है मेरा लंड?”
“बहुत… बहुत मोटा… और गहरा… जोर से चोदो… फाड़ दे…”
“शादीशुदा आदमी से चुदवा रही हो… घर वाली को धोखा देकर… डर नहीं लगता?”
“लगता है… लेकिन रुक नहीं पा रही… आahh… और जोर से… मेरी चूत फाड़ दे साले…”
विक्रम की रफ्तार बढ़ गई। वह गालियाँ देने लगा।
“छोटी रंडी… ऑफिस की शरीफ लड़की… सीनियर का मोटा लंड ले रही है… चूत कितनी टाइट और गीली हो रही है…”
“फाड़ दे… मेरी चूत फाड़ दे… गाली दे… और जोर से मार…”
उसने मुझे एक झटके में पलटा। कुत्ते की पोजीशन में कर दिया। पीछे से एक ही धक्के में मोटा लंड फिर से मेरी चूत में डाल दिया। एक हाथ से मेरे बाल कसकर पकड़े और दूसरे से मेरी गाँड पर जोर-जोर से थप्पड़ मारने लगा।
“साली… शादीशुदा सीनियर से चुदवा रही है… कितनी बेशर्म हो गई है इतने दिनों में…”
“हाँ… बेशर्म हूँ… चोद मुझे… जोर से चोद… थप्पड़ मार… गाँड लाल कर दे…”
वह बहुत जोर से पीछे से चोद रहा था। फिर लंड निकालकर मेरी गाँड की सेंध पर रख दी।
“यहाँ भी डालूँ?”
मैंने दाँत भींचकर कहा, “डाल… दर्द होगा लेकिन डाल… पूरी रंडी बना दे मुझे…”
उसने थूक लगाकर धीरे-धीरे अपना मोटा लंड मेरी गाँड में धकेला। मैं तकिया दबाए चीख रही थी। जब पूरा अंदर गया तो उसने जोर के धक्के शुरू कर दिए।
“आह्ह… गाँड फट रही है… साले… कितना मोटा है… लेकिन मत रुक… चोदते रह… फाड़ दे मेरी गाँड…”
“शादीशुदा आदमी तेरी गाँड फाड़ रहा है… मजा आ रहा है ना रंडी…”
“हाँ… आ रहा है… फाड़ दे… मेरी दोनों होल फाड़ दे… घर वाली को याद करके चोद मुझे…”
वह बारी-बारी से मेरी चूत और गाँड में लंड मारता रहा। कभी चूत में बीस-बीस जोरदार धक्के, फिर गाँड में। गालियाँ, थप्पड़, बाल खींचना, स्तन मसलना… सब कुछ। मैं कई बार झड़ चुकी थी। शरीर काँप रहा था। आखिर में उसने मुझे फिर से सीधा लिटाया और बहुत जोर से चूत में धक्के मारते हुए झड़ गया। गर्म गाढ़ा पानी मेरी चूत में भर गया।
वह मेरे ऊपर गिर पड़ा। दोनों पसीने से तरबतर थे। साँसें उखड़ी हुईं।
कुछ देर बाद उसने मेरे बाल सहलाते हुए कहा, “अब तुम सिर्फ़ ऑफिस की जूनियर नहीं रहीं रिया। अब तुम मेरी रखैल हो। जब चाहूँगा बुलाऊँगा। समझ गई?”
मैंने आँखें बंद करके सिर हिलाया। शरीर में दर्द था। चूत और गाँड दोनों जल रहे थे। लेकिन अंदर एक अजीब सी तृप्ति भी थी।
शादीशुदा सीनियर। और मैं। अब वापस नहीं जा सकती थी।
