मेरा नाम सीमा है। उम्र सत्ताईस साल।
दिल्ली के एक मध्यम आकार की प्राइवेट कंपनी में पिछले डेढ़ साल से जूनियर अकाउंटेंट के पद पर काम करती हूँ। तनख्वाह बत्तीस हजार के आसपास है। घर से ऑफिस पैदल लगभग बारह मिनट की दूरी पर है। मम्मी की तबीयत बार-बार खराब रहती है, पापा की पेंशन बहुत कम है, और छोटे भाई की कॉलेज फीस भी चल रही है। नौकरी मेरे लिए सिर्फ़ रोजगार नहीं, मजबूरी थी। घर का खर्च इसी पर टिका था।
काम इतना मुश्किल नहीं होना चाहिए था। लेकिन मैं बार-बार गलतियाँ कर देती हूँ। छोटी-छोटी गलतियाँ। कभी फाइल में गलत आंकड़ा लिख जाती हूँ, कभी ईमेल गलत व्यक्ति को भेज देती हूँ, कभी रिपोर्ट में कॉलम मिस मैच हो जाते हैं, कभी क्लाइंट के अकाउंट में दशमलव का स्थान गलत लगा देती हूँ। हर बार दिल बैठ जाता है कि इस बार नौकरी चली जाएगी। और नौकरी गई तो घर कैसे चलेगा?
हमारे बॉस का नाम है राजेश मल्होत्रा। उम्र करीब पैंतालीस साल। लंबे, थोड़े भारी-भरकम शरीर वाले, हमेशा स्ट्रिक्ट चेहरे के साथ। ऑफिस में सब उनसे डरते हैं। उनकी आवाज में एक ऐसा रौब है कि गलती करने वाला कर्मचारी उनके सामने आँख उठाकर बात भी नहीं कर पाता। मैं तो उनकी आँखों में आँखें डालकर खड़ी भी नहीं हो पाती थी। वे जब गुस्से में होते तो उनकी माथे पर नस फड़कने लगती थी और आवाज भारी हो जाती थी।
पहली गंभीर गलती उस दिन हुई जब मैंने एक महत्वपूर्ण क्लाइंट के अकाउंट में दशमलव का गलत स्थान लगा दिया। दस लाख की जगह एक लाख दिखने लगा। क्लाइंट ने शाम को ही शिकायत कर दी। बॉस के चेहरे पर गुस्सा साफ दिख रहा था। उन्होंने मुझे अपने केबिन में बुलाया। दरवाजा बंद किया। बाहर ऑफिस का शोर था, लेकिन केबिन के अंदर सन्नाटा।
“सीमा, यह तीसरी बार है इस महीने। आपसे काम नहीं हो पा रहा। मैं आपको रखने का कोई मतलब नहीं समझता।”
मेरे आँसू आ गए। गला रुँध गया। “सर… प्लीज एक मौका और दे दीजिए। गलती नहीं होगी अब। घर की हालत ठीक नहीं है। मम्मी बीमार रहती हैं…”
वे कुर्सी पर बैठे मुझे घूर रहे थे। उनकी नज़रें मेरे चेहरे से होती हुई मेरे स्तनों पर रुकीं, फिर नीचे स्कर्ट की तरफ गईं। फिर अचानक बोले, “मौका तो दे सकता हूँ। लेकिन इस बार साधारण माफी से काम नहीं चलेगा। कुछ विशेष करना होगा।”
मैं समझ नहीं पाई। वे उठे और मेरे करीब आए। उनकी साँस मेरे चेहरे पर पड़ रही थी। “दरवाजा लॉक है। यहाँ कोई नहीं आएगा। अगर नौकरी बचानी है तो घुटनों के बल बैठो।”
मेरा दिमाग सुन्न हो गया। शरीर काँपने लगा। लेकिन नौकरी का ख्याल आकर हावी हो गया। मम्मी की दवाई, भाई की फीस, घर का किराया… सब कुछ आँखों के सामने घूम गया। मैं धीरे-धीरे घुटनों के बल बैठ गई। फर्श ठंडा था। उन्होंने अपनी पैंट का जिपर खोला। उनका लंड बाहर निकला — मोटा, लंबा और पहले से आधा तना हुआ। नसें साफ दिख रही थीं। सिर चमक रहा था।
“चूसो। अच्छे से। और आँखें ऊपर रखकर चूसो। गलती करने वाली लड़कियों को यही सजा मिलनी चाहिए।”
मैंने काँपते हाथों से उनका लंड पकड़ा और मुँह में ले लिया। नमकीन और गरम स्वाद। उन्होंने मेरे सिर पर हाथ रखा और धीरे-धीरे धक्के देने लगे। मैं उनकी लंड चूसती रही। गला भर रहा था। आँखों से पानी आने लगा। वे कभी-कभी जोर से धक्का देकर गले तक ले जाते। मेरी आँखों में आँसू आ गए थे। थूक उनके लंड पर गिर रहा था।
“हाँ… ऐसे ही… और गहरा… पूरी लंड मुँह में ले… गलती की सजा यही है…”
थोड़ी देर बाद उन्होंने लंड निकाली। मैं साँस लेने के लिए हाँफ रही थी। उन्होंने मुझे उठने का इशारा किया। मेरी स्कर्ट ऊपर की और पैंटी एक तरफ सरका दी। उन्होंने मुझे अपने डेस्क पर झुकाया। ठंडी डेस्क से मेरे स्तन टकराए। फिर पीछे से अपना मोटा लंड मेरी चूत में डाल दिया। एक झटके में आधा अंदर। मैंने मुँह दबा लिया।
“सर… धीरे… आह्ह…” “चुपचाप सहो। नौकरी बचानी है तो सहना सीखो।”
वे जोर-जोर से चोदने लगे। डेस्क हिल रही थी। उनके हर धक्के पर मेरा शरीर आगे को झटक रहा था। उन्होंने मेरे बाल पकड़ लिए और और गहराई तक जाने लगे।
“आह्ह… सर… बहुत गहरा… दर्द हो रहा है…” “गाली नहीं दे रहा अभी। अगली बार गाली भी मिलेगी। आज सिर्फ़ सजा है।”
वे लगभग बीस मिनट तक जोर से चोदते रहे। फिर मेरे अंदर ही झड़ गए। गर्म पानी की तेज धार महसूस हुई। उन्होंने लंड निकाली और पैंट ठीक करते हुए बोले, “आज की गलती माफ। अगली बार और कुछ करना पड़ेगा। जाओ अपने काम पर। और चेहरा साफ कर लो। कोई शक न करे।”
मैं काँपते हुए केबिन से निकली। बाथरूम जाकर चेहरा धोया। पैंटी में उनका पानी लग रहा था। शरीर में उनकी लंड का अहसास बाकी रह गया। उस दिन काम पर मन नहीं लगा। बार-बार केबिन का ख्याल आता रहा। रात को घर जाकर भी नींद नहीं आई।
उसके बाद से मेरी गलतियाँ कम होने के बजाय बढ़ने लगीं। या शायद मैं अनजाने में करने लगी थी। हर गलती के बाद बॉस मुझे केबिन में बुलाते।
दूसरी बार सिर्फ़ मुँह से सेवा ली। उन्होंने मुझे कुर्सी के नीचे बैठाया और अपनी लंड चूसवाई। इस बार उन्होंने मेरे बाल पकड़कर जोर-जोर से धक्के दिए। गले तक लंड जाती। आँखों से पानी बहने लगा। आखिर में उन्होंने मेरे मुँह में ही झड़ दिया। मुझे सब निगलने को कहा। मैंने निगल लिया। मुँह में उनका स्वाद घंटों तक रहा।
तीसरी बार उन्होंने मुझे खिड़की के पास खड़ा करके चोदा। बाहर ऑफिस का कॉरिडोर था। किसी के आने का डर बना हुआ था। डर की वजह से मेरी चूत और ज्यादा पानी छोड़ रही थी। वे पीछे से जोर-जोर से धक्के मार रहे थे और मेरे कान में बोल रहे थे, “अगर कोई देख ले तो? नौकरी तो जाएगी ही, इज्जत भी चली जाएगी। फिर भी पानी छोड़ रही है तू। शरीर तो ईमानदार है।”
चौथी बार उन्होंने मुझे अपनी कुर्सी पर बैठाया और खुद नीचे से लंड ऊपर की तरफ मारने लगे। मेरे स्तन उनके चेहरे के सामने थे। वे दोनों स्तनों को बारी-बारी से चूसते और काटते हुए चोदते रहे।
एक दिन मैंने बहुत बड़ी गलती कर दी। क्लाइंट की पूरी पेमेंट डिटेल्स गलत ईमेल पर भेज दी। बॉस का गुस्सा इस बार बहुत ज्यादा था। उन्होंने केबिन में बुलाया और दरवाजा लॉक किया। चेहरे पर गुस्सा साफ था। आवाज भारी थी।
“आज साधारण चुदाई से बात नहीं बनेगी सीमा। आज तुम्हारी गाँड भी लेनी होगी। गलती बड़ी है तो सजा भी बड़ी होगी।”
मैं डर गई। आँखों में आँसू आ गए। “सर… पहली बार है… दर्द होगा बहुत… प्लीज…” “नौकरी बचानी है या नहीं? फैसला करो। वरना अभी रिलीविंग लेटर लिखता हूँ।”
मैं चुप हो गई। उन्होंने मुझे डेस्क पर पेट के बल लिटाया। स्कर्ट ऊपर की, पैंटी नीचे खींची। ड्रॉअर से एक छोटी बोतल निकाली और मेरी गाँड की सेंध पर खूब लगाया। फिर अपना मोटा लंड वहाँ रख दिया और धीरे-धीरे दबाव दिया। तेज दर्द हुआ। मैंने डेस्क का किनारा कसकर पकड़ लिया। आँसू बहने लगे।
“आह्ह्ह… सर… दर्द हो रहा है बहुत… रुक जाइए…” “सहो। आज गाँड की सजा है। पूरी लंड अंदर जाएगी। बोलो अगर नौकरी नहीं चाहिए तो रुक जाऊँ।”
मैंने सिर हिलाया। वे धीरे-धीरे पूरा लंड अंदर तक ले गए। मेरी गाँड फटने जैसी लग रही थी। फिर धक्के शुरू किए। दर्द के साथ एक अजीब भारी दबाव महसूस हो रहा था। वे जोर-जोर से मेरी गाँड चोदने लगे। एक हाथ से मेरे बाल पकड़े हुए थे, दूसरे से मेरी कमर दबाए हुए।
“बोल… नौकरी चाहिए या नहीं?” “चाहिए सर… प्लीज जोर से मत… आह्ह… गाँड फट रही है…” “जोर से ही चलेगा। गलती की है तो सजा भोगो। गाँड फाड़ दूँगा आज। आदी बना दूँगा।”
वे लगभग तीस मिनट तक मेरी गाँड चोदते रहे। मैं रो रही थी। फिर उन्होंने लंड निकालकर मेरी चूत में डाल दी और कुछ ही देर में अंदर झड़ गए।
उस दिन के बाद से मेरी गाँड भी उनकी संपत्ति बन गई।
अब स्थिति यह हो गई थी कि महीने में छह-सात बार मैं उनकी केबिन में होती। कभी सुबह ऑफिस शुरू होने से पहले, कभी लंच टाइम, कभी ऑफिस के बाद जब सब चले जाते। वे मुझे अलग-अलग अंदाज में चोदते। कभी कुर्सी पर बैठाकर ऊपर से, कभी खिड़की के पास खड़ा करके, कभी फर्श पर लिटाकर, कभी डेस्क के नीचे मुँह से सेवा लेकर, कभी डेस्क पर पेट के बल लिटाकर गाँड में।
गालियाँ अब आम हो गई थीं। “गलती करने वाली रंडी… सिर्फ़ लंड से ही सुधर सकती है…” “आज दिन भर मेरी लंड चूसती रहेगी दिमाग में…” “गाँड कितनी टाइट है तेरी… रोज फाड़ने का मन करता है…” “चूत भी पानी छोड़ने लगी है जल्दी। आदी हो गई है तू।”
एक दिन उन्होंने कहा, “अगली बार अगर गलती की तो सिर्फ़ मैं नहीं… अपने पार्टनर को भी बुलाऊँगा। दोनों मिलकर तुम्हें चोदेंगे। दोनों की लंड एक साथ लेनी पड़ेगी। तैयार रहना।”
मैं डर गई। लेकिन शरीर अब उनकी लंड की आदी हो चुका था। बिना उनके अधूरा लगने लगा था। रात को घर जाकर भी उनकी याद आती। कभी-कभी उँगलियों से अपनी चूत सहलाती और उनके मोटे लंड की कल्पना करती। गाँड में उँगली डालकर भी सोचती कि अगली बार कैसा होगा।
और सबसे खतरनाक बात यह थी… कि अब मैं जानबूझकर छोटी-मोटी गलतियाँ करने लगी थी। ताकि वे मुझे केबिन में बुलाएँ। ताकि उनका मोटा लंड फिर से मेरी चूत और गाँड में जाए।
नौकरी बचाने के लिए शुरू हुआ था। अब नौकरी के साथ-साथ मेरी भूख भी जुड़ गई थी।
एक शाम ऑफिस के बाद उन्होंने मुझे केबिन में रोका। दरवाजा लॉक किया। इस बार वे बहुत उत्तेजित थे। उन्होंने मुझे कुर्सी पर बैठाया और खुद सामने खड़े होकर अपना लंड मेरे मुँह में ठूंस दिया। गले तक। फिर मुझे उठाकर डेस्क पर लिटाया। पहले चूत में जोर-जोर से चोदा। फिर गाँड में। फिर वापस चूत में। गालियाँ देते रहे। थप्पड़ भी मारे गाँड पर।
“आज बहुत मजा आया सीमा। तू अब सिर्फ़ कर्मचारी नहीं रही। तू मेरी ऑफिस रंडी है। जब चाहूँगा बुलाऊँगा। समझ गई?”
मैंने पसीने से तरबतर चेहरे के साथ सिर हिलाया।
अब मेरी जिंदगी ऑफिस और उनकी केबिन के बीच बँट गई थी। गलतियाँ जारी थीं। और सजा भी।
लेकिन अब वह सजा नहीं लगती थी। वह आदत बन चुकी थी। जरूरत बन चुकी थी।
और मैं… मैं खुद को रोक नहीं पा रही थी।

Adarsh