बॉस ने खुद बुलाया कमरे में | HR मैडम की चुदाई

मेरा नाम रेखा है। उम्र चौंतीस साल। शादी को नौ साल हो चुके हैं। पति रोहित एक मल्टीनेशनल में काम करता है और ज्यादातर समय मीटिंग्स और ट्रैवल में ही रहता है। घर में हम दोनों हैं, कोई बच्चा नहीं। रिश्ता सामान्य है। न कोई खास लड़ाई, न कोई खास गर्मी। सेक्स हफ्ते में एक बार हो जाता है, बस निभाने के लिए। मैंने कभी शिकायत नहीं की। आदत पड़ गई थी।

मैं एक प्राइवेट कंपनी में सीनियर एचआर मैनेजर हूँ। ऑफिस में मेरी इमेज सख्त की है। लोग मुझे नाम से कम, “मैडम” कहकर ही बुलाते हैं। मैं देर तक ऑफिस में रहती हूँ, रिपोर्ट्स चेक करती हूँ, और जूनियर्स की गलतियाँ पकड़ने में मुझे एक अजीब सा मजा आता है। शायद इसलिए क्योंकि घर में मेरा कोई कंट्रोल नहीं बचता।

तीन हफ्ते पहले एक नया लड़का जॉइन किया। नाम अमन। उम्र छब्बीस। फ्रेशर। एचआर में ही असिस्टेंट के पद पर आया था, और उसकी रिपोर्टिंग सीधे मुझे करनी थी। पहला दिन जब वो मेरे केबिन में आया तो मैंने सिर उठाकर सिर्फ एक नजर देखा। साफ-सुथरा, हल्की सी दाढ़ी, शांत आँखें। ज्यादा लंबा नहीं, लेकिन बदन संभला हुआ। उसने नमस्ते किया। आवाज में हल्की सी घबराहट थी।

मैंने फाइल उसके सामने रखी और बोली, “ये सारे डॉक्युमेंट्स कल तक अपडेट करके दो। गलती हुई तो मुझे फिर से समझाना नहीं आएगा।”

वो सिर हिलाकर चला गया। उस दिन मैंने ज्यादा ध्यान नहीं दिया।

अगले कुछ दिनों में मैंने नोटिस करना शुरू किया। अमन चुपचाप काम करता था। सवाल कम पूछता था। जब पूछता तो बहुत ध्यान से सुनता। एक दिन मैंने उसकी रिपोर्ट में तीन गलतियाँ निकालीं। केबिन में बुलाया।

“ये क्या है?” मैंने फाइल उसके सामने पटक दी। वो खड़ा रहा। “सॉरी मैडम। मैं दोबारा कर देता हूँ।” “दोबारा नहीं। अभी करो। यहाँ बैठो।”

मैंने उसे अपने केबिन में ही लaptop लगाकर काम करने को कहा। मैं अपनी कुर्सी पर बैठी रिपोर्ट्स देखती रही। वो मेरे सामने टेबल पर सिर झुकाए टाइप कर रहा था। कभी-कभी जब मैं नजर उठाती तो पाती कि वो मेरी तरफ देख रहा है। जैसे ही मेरी नजर उससे मिलती, वो झट से आँखें झुका लेता।

उस दिन काम खत्म होने में देर हो गई। बाकी ऑफिस लगभग खाली हो चुका था। मैंने कहा, “अब जा सकते हो।” वो उठा। फाइल मेरे टेबल पर रखी और बोला, “मैडम, अगर कोई और काम हो तो बताइएगा।” मैंने सिर्फ सिर हिलाया। लेकिन जब वो कमरे से बाहर जा रहा था तो मेरी नजर उसकी पीठ पर चली गई। शर्ट में कंधे सही थे। कमर पतली। मैंने खुद को झिड़का और काम में लग गई।

अगले हफ्ते ऐसे कई मौके आए। कभी मैं उसे लेट तक रोकती, कभी छोटी-छोटी गलतियों पर बार-बार बुलाती। खुद को लगता कि मैं सिर्फ काम के लिए ऐसा कर रही हूँ। लेकिन रात को घर जाकर जब अकेली होती तो उसका चेहरा याद आ जाता। वो शांत आँखें। वो तरीका जिससे वो “सॉरी मैडम” बोलता।

एक दिन मैंने जानबूझकर एक रिपोर्ट में छोटी सी गलती छोड़ दी और उसे केबिन में बुलाया।

“ये कैसे हो गया अमन?” वो फाइल देखने लगा। “मैडम, ये तो…” “ये तो क्या? तुम्हें तीन बार बता चुकी हूँ। ध्यान कहाँ रहता है तुम्हारा?”

मेरी आवाज सख्त थी। वो चुपचाप खड़ा रहा। मैं कुर्सी से उठी और उसके करीब जाकर फाइल दिखाई। इतनी करीब कि मुझे उसकी साँस महसूस हुई। मेरे इत्र की खुशबू शायद उसे भी आ रही होगी। मैंने नोटिस किया कि उसका गला हिला।

“अब सही करके दो। आज ही। ऑफिस खाली होने तक।”

वो बैठ गया। मैं अपनी कुर्सी पर वापस जाकर बैठ गई। लेकिन मन काम में नहीं लग रहा था। बार-बार उसकी तरफ नजर चली जा रही थी। वो सिर झुकाए काम कर रहा था। कभी-कभी कानों तक लाल हो जाता।

सात बज गए। ऑफिस में सिर्फ हम दो रह गए थे। मैंने जानबूझकर कोई और फाइल खोली और बोली, “अमन, एक काम और है। ये वाली रिपोर्ट भी आज ही देख लो।”

वो मेरी तरफ देखा। आँखों में थोड़ी थकान थी, लेकिन इंकार नहीं किया। “जी मैडम।”

मैंने कुर्सी घुमाई और सीधे उसकी तरफ देखती रही। इस बार उसने नजर नहीं हटाई। कुछ सेकंड तक दोनों एक-दूसरे को देखते रहे। फिर उसने आँखें झुका लीं।

मैंने धीमे से कहा, “तुम बहुत जल्दी झुक जाते हो अमन।”

वो फिर से मेरी तरफ देखा। इस बार उसकी आँखों में एक सवाल था। मैं मुस्कुराई नहीं। बस देखती रही।

कमरे में सन्नाटा था। एयर कंडीशनर की हल्की आवाज के अलावा कुछ नहीं। मैंने महसूस किया कि मेरी साँसें थोड़ी तेज हो गई हैं। अमन के हाथ रुक गए थे कीबोर्ड पर।

मैंने आवाज को और नरम किया, लेकिन सख्ती बनाए रखी, “आज देर हो गई है। तुम्हारे घर वाले पूछेंगे नहीं?” “नहीं मैडम। अकेला रहता हूँ।” “अच्छा।”

मैंने फिर कुछ नहीं कहा। बस कुर्सी पर बैठकर उसे देखती रही। अमन ने फिर से काम शुरू कर दिया, लेकिन उसकी उँगलियाँ पहले जैसी स्थिर नहीं थीं।

उस रात मैंने उसे नौ बजने के बाद ही जाने दिया। जब वो केबिन से बाहर निकला तो उसने एक बार फिर मुड़कर देखा। मैं अभी भी उसी कुर्सी पर बैठी उसे देख रही थी।

दरवाजा बंद होते ही मैंने आँखें बंद कर लीं। दिल जोर से धड़क रहा था। घर जाकर मुझे समझ नहीं आया कि आज मैंने जानबूझकर उसे रोका क्यों। गलतियाँ निकालना, देर तक बैठाना, करीब जाकर बात करना… सब मुझे खुद ही अजीब लग रहा था।

लेकिन एक बात साफ थी। अब मैं अमन को सिर्फ जूनियर Emp loyee की तरह नहीं देख पा रही थी।

अगले दिन ऑफिस में मेरी और अमन की मुलाकात सामान्य रही। मैंने जानबूझकर उसे कम बुलाया। खुद को समझाया कि कल रात की बात बस थकान की वजह से थी। लेकिन दोपहर होते-होते मेरी नजर बार-बार उसके डेस्क पर चली जा रही थी। वो सिर झुकाए काम कर रहा था। कभी-कभी जब मैं गलियारे से गुजरती तो महसूस करती कि उसकी निगाह मेरी पीठ पर है।

शाम को साढ़े छह बजे मैंने उसे केबिन में बुलाया।

“ये रिपोर्ट फिर से चेक करो। कल वाली गलती दोबारा नहीं होनी चाहिए।”

वो अंदर आया। फाइल ली और खड़ा रहा। मैंने कुर्सी की तरफ इशारा किया। “बैठ जाओ। यहाँ ही करो।”

वो बैठ गया। मैं अपनी जगह पर वापस जाकर लैपटॉप देखने लगी, लेकिन ध्यान उसकी तरफ ही था। उसकी उँगलियाँ कीबोर्ड पर चल रही थीं। कभी-कभी वो रुक जाता और मेरी तरफ देखता। इस बार मैंने नजर नहीं हटाई। कुछ पल तक आँखें मिली रहीं। फिर उसने सिर झुका लिया।

सात बज गए। ऑफिस खाली होने लगा। मैंने उठकर दरवाजा बंद कर दिया। अमन ने सिर उठाया।

“मैडम?” “शोर न हो। फोकस से काम करो।”

मैं उसके पीछे जाकर खड़ी हो गई। उसके कंधे के ऊपर से स्क्रीन देखने का बहाना किया। इतनी करीब थी कि मेरे शरीर की गर्माहट उसे महसूस हो रही होगी। मेरी साँस उसके बालों में पड़ रही थी। उसने टाइप करना धीमा कर दिया।

“यहाँ ये नंबर गलत है,” मैंने कहा और उसका हाथ पकड़कर माउस की तरफ ले गई। मेरा हाथ उसके हाथ पर था। कुछ सेकंड तक हटाया नहीं। उसकी त्वचा गरम थी। मैंने महसूस किया कि उसके कंधे तन गए।

मैंने हाथ हटाया। “सुधारो।”

वो चुपचाप सुधारने लगा। मैं वापस अपनी कुर्सी पर बैठ गई। मन अजीब अवस्था में था। गुस्सा नहीं था। बल्कि एक अलग किस्म का संतोष था। उसे इस तरह नियंत्रण में रखना… मुझे अच्छा लग रहा था।

आठ बज गए। मैंने कहा, “आज इतना काफी है। कल जारी रखेंगे।”

वो उठा। फाइल मेरे टेबल पर रखी। जाने से पहले थोड़ी देर रुका। “मैडम… अगर कोई और काम हो तो मैं रुक सकता हूँ।” मैंने उसकी तरफ देखा। आँखों में थकान थी, लेकिन इंकार नहीं था। “नहीं। जाओ।”

वो चला गया। लेकिन इस बार दरवाजा बंद करते समय उसने फिर मुड़कर देखा। मैंने जानबूझकर उसकी तरफ देखा और हल्का सा सिर हिलाया। वो निकल गया।

उस रात घर जाकर मुझे नींद नहीं आई। रोहित लेट आया और सीधा सो गया। मैं बाथरूम में जाकर आईने के सामने खड़ी रही। खुद को देखा। चौंतीस साल का चेहरा। अभी भी टाइट शरीर। लेकिन आँखों में एक नई चीज थी। कोई भूख नहीं… बल्कि कोई अधिकार। जैसे मैं कुछ लेना चाहती हूँ और ले सकती हूँ।

अगले दिन मैंने अमन को दो बार केबिन में बुलाया। छोटी-छोटी गलतियों पर। हर बार उसे पास खड़ा किया। एक बार तो मैंने उसके कॉलर की तरफ इशारा करते हुए कहा, “अगली बार शर्ट ठीक से प्रेस करके आना। एचआर में काम करते हो।”

मेरी उँगली उसके कॉलर के पास थी। छू नहीं रही थी, लेकिन बहुत करीब थी। उसने “जी मैडम” कहा। आवाज थोड़ी भारी थी।

उस हफ्ते ऐसे कई मौके बनाए। कभी रिपोर्ट के बहाने, कभी फाइल के। हर बार ऑफिस खाली होने के बाद। हर बार थोड़ा करीब। हर बार थोड़ा लंबा। अमन कभी मना नहीं करता था। वो बस चुपचाप आता, काम करता, और मेरी निगाहों को सहन करता।

शुक्रवार की शाम को मैंने फैसला किया।

साढ़े छह बजे उसे केबिन में बुलाया। दरवाजा बंद किया। “आज की रिपोर्ट अभी नहीं। कुछ और बात करनी है।”

वो खड़ा रहा। मैं कुर्सी पर बैठी रही। “तुम मुझे देखते हो अमन। मैं नोटिस करती हूँ।”

वो सकपका गया। “मैडम… मैं…” “झूठ मत बोलना। जब मैं गलियारे से गुजरती हूँ, जब मैं केबिन में बैठती हूँ… तुम्हारी नजरें मुझ पर होती हैं।”

वो चुप रहा। उसका गला हिला। मैं उठी और उसके करीब गई। इतनी करीब कि मेरे स्तन लगभग उसके सीने से छूने वाले थे।

“बोलो। देखते हो या नहीं?”

उसने धीमे से कहा, “हाँ मैडम।”

मैंने मुस्कुराया। पहली बार। “अच्छा। तो फिर आज देर तक रुकोगे।”

मैंने वापस जाकर कुर्सी पर बैठ गई। “दरवाजा लॉक कर दो।”

अमन ने कुछ पल देखा। फिर धीरे से मुड़ा और दरवाजे का लॉक घुमा दिया। क्लिक की आवाज पूरे केबिन में साफ सुनाई दी।

वो वापस मुड़ा। इस बार उसकी आँखों में घबराहट के साथ कुछ और भी था। मैंने धीमे से कहा,

“यहाँ आकर खड़े हो जाओ।”

वो मेरे टेबल के पास आ गया। मैं कुर्सी पर बैठी उसे नीचे से देख रही थी। पहली बार किसी मर्द को इस तरह अपने सामने खड़ा करके मैंने महसूस किया कि असली कंट्रोल क्या होता है। घर में रोहित के सामने मैं कभी ऐसी नहीं थी। यहाँ… यहाँ मैं कुछ भी कह सकती थी।

“आज कोई रिपोर्ट नहीं। आज सिर्फ तुम और मैं।”

अमन की साँसें तेज हो गई थीं। मैंने कुर्सी घुमाई और सीधे उसकी तरफ देखा।

“डरे हुए हो?” “थोड़ा… मैडम।” “डरना छोड़ दो। आज मैडम नहीं… रेखा बात कर रही है।”

कमरे में सन्नाटा था। बाहर ऑफिस पूरी तरह खाली हो चुका था। सिर्फ हम दो। लॉक लगा हुआ। और एक लंबा तनाव जो अब टूटने ही वाला था।

मैंने धीमे से कहा, “पास आओ।”

अमन मेरे टेबल के पास खड़ा था। साँसें तेज। मैं कुर्सी पर बैठी उसे देख रही थी।

“पास आओ।”

वो करीब आया। मैंने उसकी शर्ट के निचले बटन खोले और हाथ उसके पेट पर फेर दिया। गर्म त्वचा। फिर नीचे बेल्ट पर हाथ रखा।

“खोल,” मैंने आदेश दिया।

अमन ने बेल्ट और जिपर खोला। मैंने अंडरवियर नीचे सरकाया। उसका लंड झटके से बाहर आ गया — तना हुआ, नसों से भरा। मैंने उसे हाथ में लिया और कसकर पकड़ा।

“इतने दिन से इसी लंड को छुपाए घूम रहा था मेरे सामने?” “हाँ मैडम…” “मैडम मत बोल। आज रेखा बोल।”

मैंने लंड को धीरे-धीरे ऊपर-नीचे किया। अमन की कमर हिल गई। मैंने कुर्सी से उठकर उसे दीवार से लगा दिया और झुककर उसके लंड को मुँह में ले लिया। पहले सिर्फ टोपा। फिर गहरा। गला तक। अमन ने दीवार पकड़ ली।

“आह्ह… रेखा… धीरे…” मैंने लंड निकाला और थूक से चमकता छोड़ दिया। “धीरे नहीं चोदूँगी आज। तू मेरे नीचे आएगा।”

मैंने अपनी स्कर्ट ऊपर की और पैंटी एक झटके में नीचे गिरा दी। फिर अमन को कुर्सी पर धकेलकर बैठा दिया। मैंने उसके कंधे पकड़े और अपने को उसके लंड पर केंद्रित किया। गीली चूत के मुँह पर टोपा रखकर धीरे से धकेला।

“देख मेरे चेहरे को,” मैंने कहा।

फिर एक झटके में पूरा लंड अंदर ले लिया। दोनों की साँसें रुक गईं। मैंने कुछ पल रुकी, फिर कमर घुमाना शुरू किया।

“कितना टाइट है ना तेरा लंड… साले… इतने दिन से इसी के लिए रोक-रोककर बुला रही थी तुझे।” अमन ने मेरे कूल्हे पकड़ लिए। “रेखा… इतना गहरा…” “गहरा ही तो चोदना है। बोल, कैसा लग रहा है बॉस की चूत?”

“बहुत… बहुत गरम और टाइट…”

मैंने गति तेज कर दी। अब मैं पूरी तरह ऊपर-नीचे हो रही थी। मेरी भारी छातियाँ उसके चेहरे के सामने उछल रही थीं। अमन ने एक निप्पल मुँह में ले लिया और जोर से चूसा। मैंने उसके बाल पकड़कर और जोर से दबाया।

“काट… हल्के से काट… हाँ… ऐसे… चुस साले…”

मैंने उसकी गर्दन पर दाँत गड़ा दिए। अमन के मुँह से कराह निकल गई। मैंने उसके हाथ पकड़कर अपनी गाँड पर रख दिए।

“दबा… जोर से दबा मेरी गाँड… आज तू सिर्फ लंड नहीं, पूरा मुझे इस्तेमाल कर।”

अमन ने दोनों हाथों से मेरी गाँड कसकर मसली। मैंने और तेज गति पकड़ ली। केबिन में चप-चप की आवाजें गूँजने लगीं। मेरी चूत पूरी तरह खुल चुकी थी और उसके लंड को चूस रही थी।

“बोल अमन… बोल गंदी बात…” “रेखा… तेरी चूत इतनी गरम है… जैसे मुझे निगल रही हो…” “निगल ही रही हूँ साले। तू मेरे नीचे है आज। बॉस की चूत चोद रहा है तू। मजा आ रहा है?” “बहुत आ रहा है… प्लीज और तेज…”

मैंने तेज कर दिया। अब मैं पटक-पटककर चोद रही थी। अमन की आँखें बंद हो रही थीं। मैंने उसके गाल पर एक हल्की थप्पड़ मारी।

“आँखें खोल। मुझे देख। देख कि कौन तुझे चोद रही है।”

उसने आँखें खोलीं। मैंने उसके निचले होंठ को दाँतों से पकड़ लिया और खींचा। फिर गहरा चुंबन किया। जीभ से जीभ लड़ी। नीचे मेरी चूत उसके लंड को निचोड़ रही थी।

थोड़ी देर बाद मैंने कहा, “अब तू चल। मुझे कुर्सी पर लिटा।”

अमन उठा। उसने मुझे कुर्सी पर बैठाया, मेरी दोनों टाँगें उसके कंधों पर रखीं और एक झटके में फिर से अंदर घुस गया। इस बार उसने खुद गति बढ़ाई।

“हाँ… ऐसे… जोर से पेल… बॉस की चूत फाड़…” “रेखा… मैं फाड़ रहा हूँ… तेरी इतनी टाइट चूत…” “फाड़… साले… और गहरा… मेरे पति ने कभी इतना गहरा नहीं चोदा…”

अमन पागलों की तरह धक्के मारने लगा। कुर्सी पीछे सरक रही थी। मेरी छातियाँ जोर-जोर से हिल रही थीं। मैंने उसके बाल पकड़कर सिर नीचे किया और कहा,

“मेरे स्तन चूसते हुए चोद… दोनों…”

उसने एक निप्पल मुँह में लिया और जोर से चूसते हुए पेलता रहा। मैं कराह रही थी।

“आह्ह… चुद रही हूँ… बॉस चुद रही हूँ अपने जूनियर से… कितना मोटा लंड है तेरा… भर दे अंदर…”

अमन की साँसें उखड़ने लगीं। “रेखा… मैं आने वाला हूँ…” “अंदर ही छोड़… पूरा… मेरी चूत में भर दे…”

कुछ और जोरदार धक्कों के बाद अमन का शरीर अकड़ गया। गर्म वीर्य की तेज धार मेरे अंदर छूटने लगी। मैंने उसके कूल्हे दबाए और खुद भी झड़ गई। चूत ने उसके लंड को बार-बार जकड़ा। दोनों काँप रहे थे।

थोड़ी देर तक वो मेरे अंदर ही रहा। फिर धीरे से बाहर निकाला। वीर्य मेरी जाँघों पर बहने लगा। मैं कुर्सी पर फैली रही। साँसें तेज। शरीर पसीने से चमक रहा था।

अमन खड़ा था। लंड अभी भी आधा तना हुआ। मैंने उसे देखा और धीमे से कहा,

“कपड़े पहन। लेकिन रविवार को दोपहर दो बजे यहीं आना। लॉक लगाकर। आज तो बस शुरुआत की है।”

अमन ने सिर हिलाया। उसके चेहरे पर थकान और संतुष्टि दोनों थे। वो कपड़े पहनकर केबिन से बाहर चला गया।

मैं अकेली बैठी रही। जाँघों के बीच उसकी गंदगी सूख रही थी। मैंने मुस्कुराया।

आज पहली बार मैंने सिर्फ चुदाई नहीं करवाई… खुद मर्जी से, खुद कंट्रोल में रहकर एक जूनियर के लंड से अपनी प्यास बुझाई थी।

और यह आखिरी बार कतई नहीं था।

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