वो चुदती रही, मैं चोदता रहा | डेस्क पर रांड बन गई मधु

मैं हरीश। चौंतीस साल का, तलाकशुदा नहीं हूँ पर शादीशुदा होने का कोई फायदा भी नहीं। मेरी वाइफ प्रिया, बत्तीस साल की, एक MNC में HR मैनेजर। सुबह सात बजे निकलती है, रात को नौ-दस बजे आती है। जब आती है तो इतनी थकी होती है कि उसकी चूत सूखी रेगिस्तान बन जाती है।

“हरीश, आज नहीं… बहुत थकान है…” यही उसकी रात की लोरी है।

मैं तीन साल से इसी लोरी सुनकर अपना लंड हिलाता हूँ। सात इंच का, मोटा, लाल लंड जो रोज़ रात को रोता है। किसी चूत के लिए, किसी गीली जगह के लिए। पर प्रिया की चूत तो हमेशा सूखी, हमेशा बंद।

“कम से कम एक बार हफ्ते में तो…” मैंने एक बार कहा था।

“हरीश, तुम्हें पता है ना मेरा काम कितना स्ट्रेसफुल है। मुझे सोना है।” और वो सो जाती, मैं बाथरूम में अपना लंड हिलाता।

मेरी ज़िंदगी – काम, घर, हिलाना। बस।


मधु – वो रांड जिसने मेरा लंड फिर से जिंदा किया

फिर वो आई। मधु। बाईस साल की, ताज़ी MBA, नई जोइनी।

पहला दिन। HR ने उसे मेरे पास भेजा। मैंने सिर उठाया और मेरा लंड तुरंत खड़ा हो गया। इतने महीनों बाद।

काली लटें, गोरा बदन जैसे दूध से नहाया हो। और वो कसी हुई कमर, उसकी चूचियाँ ब्लाउज में से ऐसे उभरी हुईं जैसे कोई फल तोड़ने को तरस रहे हों। मैंने अपनी पैंट ठीक की, लंड को दबाया।

“सर, मैं मधु। नई जोइनी।” उसकी आवाज़ इतनी मीठी, इतनी पतली।

“वेलकम मधु।” मैंने हाथ बढ़ाया। उसने हाथ मिलाया। इतने नरम हाथ, इतने गर्म। मैंने जानबूझकर थोड़ी देर पकड़े रखा। उसने शरारती मुस्कान दी, आँखें झुकाईं, और मेरी पैंट के सामने झुकी। उसकी गांड मेरे लंड से इंच भर दूर थी।

“सर, आपका हाथ बहुत गर्म है।” उसने कहा और धीरे से मेरे हाथ को अपनी चूची पर रगड़ते हुए हटाया।

मेरा लंड पागल हो गया।


पहले हफ्ते मैं बस उसे देखता रहा। और वो जानबूझकर दिखाती थी।

एक दिन वो फाइल उठाने के लिए झुकी। उसकी पेंसिल स्कर्ट ऊपर चढ़ गई, उसकी सफेद पैंटी साफ दिख रही थी। गोरी गांड, पैंटी में से उभरी हुई। मेरा लंड खड़ा हो गया। वो पलटी, मुझे देखा, मुस्कुराई।

“सर, कुछ चाहिए था?” उसने पूछा, जानबूझकर अपनी स्कर्ट ठीक नहीं की।

“नहीं… वो… फाइल…” मैं हकलाया।

“कौन सी फाइल सर?” वो झुकी, उसकी चूचियाँ ब्लाउज से बाहर आने को तरस रही थीं।

मैं बाथरूम गया, लंड हिलाया। उसी दिन, दो बार।


एक रात दस बजे, ऑफिस खाली। वो मेरी केबिन में आई। काली साड़ी, इतनी पतली कि उसकी जाँघें साफ झाँक रही थीं। नाभि दिख रही, कमर इतनी पतली कि मन कर रहा था पकड़ लूँ।

“सर, ये रिपोर्ट।” वो झुकी, उसका ब्लाउज चौड़ा, उसकी चूचियाँ और सफेद ब्रा साफ दिख रही थीं। गोरी, कसी हुई, इतनी बड़ी।

मेरा लंड खड़ा। मैंने फाइल ली और जानबूझकर उसके हाथ पर अपना हाथ रखा। वो हटी नहीं। हम दोनों चुप, हाथ छुए रहे।

“सर…” उसने धीरे कहा, “आपका हाथ बहुत गर्म है।”

“और तुम्हारा बहुत ठंडा।” मैंने कहा, उसके हाथ को अपनी जाँघ पर ले गया। मेरा लंड पैंट में से उभर रहा था।

“सर, ये क्या…” उसने नाटकीय आश्चर्य किया, पर हाथ हटाया नहीं।

“जो तुम सोच रही हो।” मैंने कहा।

वो मुस्कुराई, मेरे कान में फुसफुसाई, “सर, मैं कुछ नहीं सोच रही। पर अगर आप सोच रहे हैं, तो… शायद…”

और वो चली गई। पर पलटकर देखा, उसकी आँखों में वही चाहत थी जो मेरे लंड में थी।


एक प्रोजेक्ट में सिर्फ हम दोनों। रात को ग्यारह बजे, ऑफिस खाली। उसने नीली साड़ी पहनी, बहुत पतली। उसकी नाभि दिख रही, कमर इतनी पतली। मेरा लंड पूरे दिन खड़ा।

वो आई, मेरे पास बैठी, इतने पास कि उसकी साड़ी मेरी पैंट से सटी। मैंने उसके हाथ पर अपना हाथ रखा। वो हटी नहीं।

“सर, आपकी वाइफ…” उसने पूछा।

“प्रिया? वो तो रात को आती है, सो जाती है। उसकी चूत सूखी रेगिस्तान है।” मैंने गुस्से में कहा।

“ओह… तो सर… आपका लंड…” उसने मेरी पैंट की ओर देखा।

“भूखा है। तीन साल से भूखा।” मैंने कहा।

“कितना भूखा?” उसने शरारती मुस्कान दी।

“इतना कि तुम्हारी चूत देखकर पागल हो जाए।” मैंने हिम्मत की।

“मेरी चूत?” उसने अपनी साड़ी थोड़ी ऊपर की, उसकी जाँघें साफ दिखीं। “ये चूत?”

“हाँ, वही।” मैंने कहा, मेरा हाथ उसकी जाँघ पर चढ़ गया।

“सर, ये गलत है…” उसने कहा, पर हटी नहीं।

“जानता हूँ।” मैंने कहा, मेरा हाथ और ऊपर बढ़ गया।

“पर अगर आप रुकेंगे नहीं…” उसने कहा, “तो शायद… मैं भी नहीं रुकूँगी…”

मैंने रुकना नहीं चाहा। मेरा हाथ उसकी चूत के पास था, गर्म, गीली।

“आज नहीं सर…” उसने मेरा हाथ हटाया, “पर जल्दी… बहुत जल्दी…”

और वो चली गई। मैं बाथरूम गया, लंड हिलाया। तीन बार।


आज की रात – तीन महीने बाद

आज रात के ग्यारह बजे, पूरा ऑफिस खाली। प्रिया घर पर है, सो रही है, उसकी सूखी चूत मुझे याद भी नहीं कर रही।

मधु ने काली साड़ी पहनी है, बहुत पतली। उसकी जाँघें साफ झाँक रही हैं, ब्लाउज इतना कटा कि उसकी चूचियों का आधा हिस्सा दिख रहा है। उसकी चूचियाँ ब्लाउज में से उभर रही हैं, मेरा लंड खड़ा है, और मैं जानता हूँ आज कुछ होगा।

“मधु, यहाँ आओ।” मैंने आवाज़ लगाई।

वो आई। उसकी चूचियाँ ब्लाउज में से उभर रही हैं, मेरा मुँह सूख गया। मैंने केबिन का दरवाज़ा बंद किया।

“सर, आज तो कुछ अलग माहौल है…” उसने कहा, अपनी आँखों में वो शरारती चमक।

“आज कुछ अलग होगा।” मैंने कहा, उसके पास गया, बहुत पास।

“क्या?” उसने पूछा, मेरी साँसें उसके गालों को छू रही थीं।

“जो तीन महीने से होना चाहिए था।” मैंने कहा।

“और प्रिया?”

“वो सो रही है। उसकी सूखी चूत मुझे याद नहीं कर रही।”

“और मेरी?” उसने अपनी साड़ी थोड़ी ऊपर की।

“तुम्हारी?” मैंने उसकी जाँघ पर हाथ रखा।

“मेरी चूत… तीन महीने से गीली है सर… आपके लिए…”

मैंने उसे पकड़ा, उसके होंठों पर अपने होंठ रखे…

मैंने मधु को पकड़ा, उसके होंठों पर अपने होंठ रखे। पहले धीरे, फिर प्यास से, गुस्से से, तीन महीने की भूख से। उसने भी जवाब दिया, उसके हाथ मेरे बालों में घुस गए, मुझे और पास खींच लिया।

“सर… आज… आज मुझे चोदो…” उसने मेरे कान में फुसफुसाया, “मेरी चूत तीन महीने से तड़प रही है…”

“तुम्हारी चूत मेरी है आज।” मैंने कहा, उसके गाल पर काटा।

“ऊह्ह… हाँ सर… आपकी ही है…”

मैंने उसे उठाया, अपनी डेस्क पर पटक दिया। कागज़, फाइलें, पेन, लैपटॉप सब एक तरफ धकेल दिए। वो लेट गई, उसके बाल मेज पर फैल गए, आँखें बंद, साँसें तेज़।

“खोलो अपने कपड़े।” मैंने आदेश दिया।

“सर… आप खोलो ना…” उसने शरमाते हुए कहा।

“रांड, मैंने कहा खोलो।” मैंने उसके बाल पकड़े।

“हाँ सर… खोल रही हूँ…”

उसने अपने ब्लाउज के बटन खोले। एक-एक करके, धीरे-धीरे। काली ब्रा, उसकी चूचियाँ ऐसे उभरी हुईं जैसे कोई फल तोड़ने को तरस रहे हों। मैंने ब्रा के ऊपर से ही चूची दबाई, ज़ोर से, कसकर।

“आह्ह… सर… दर्द हो रहा है…”

“सहन करो रांड, आज तुम्हें मैं चोदूँगा।” मैंने कहा, उसकी चूची नोची।

“ऊउउह्ह… हाँ सर… चोदो मुझे…”

मैंने उसकी ब्रा खोली। उसकी चूचियाँ बाहर निकलीं। गोरी, कसी हुई, गुलाबी निप्पल। मैंने एक चूची मुँह में ली, चूसा, काटा, नोचा। उसकी आवाज़ निकलने लगी।

“आह्ह… सर… और… और काटो…”

मैंने दूसरी चूची पकड़ी, उसे भी काटा, चूसा। मेरा लंड पैंट में से फटने को तरस रहा था।

“साड़ी ऊपर करो।” मैंने कहा।

उसने अपनी साड़ी ऊपर की। गोरी-गोरी जाँघें, पेटीकोट। मैंने पेटीकोट के ऊपर से उसकी चूत पर हाथ फेरा। गीली, बहुत गीली, गर्म।

“कितनी गीली है तुम्हारी चूत रांड।” मैंने कहा।

“आपकी वजह से सर… तीन महीने से… हर रात मैं अपनी चूत सहलाती हूँ… आपका सोचकर…”

“आज सहलाने की ज़रूरत नहीं।” मैंने उसकी पेटीकोट ऊपर की। काली पैंटी, बड़ा गीला धब्बा। मैंने पैंटी के ऊपर से चूत सहलाई। उसकी कमर हवा में उठने लगी।

“आह्ह… सर… पैंटी नीचे करो…”

“खुद नीचे करो रांड।”

उसने अपनी पैंटी नीचे की। उसकी चूत सामने आई। बिल्कुल साफ, गोरी, गीली, टाइट। चूत के होठ फूले हुए, गुलाबी, चमक रहे थे। मैंने उँगली फेराई।

“ऊउउह्ह… सर…”

“कितनी टाइट है तुम्हारी चूत।” मैंने एक उँगली अंदर डाली।

“आह्ह… सर… धीरे…”

“धीरे नहीं।” मैंने दो उँगलियाँ डाल दीं। उसकी चूत इतनी टाइट थी कि उँगलियाँ मुश्किल से अंदर जा रही थीं।

“ऊउउउह्ह्ह… सर… मेरी चूत फट जाएगी…”

“फटने दो।” मैंने उँगलियाँ अंदर-बाहर कीं, तेज़, ज़ोर से।

“आह्ह… आह्ह… और… और तेज़…”

मैंने उँगलियाँ और तेज़ कीं। उसकी चूत से पानी निकलने लगा, गीली होती जा रही थी।

“सर… अब… अब वो डालो… आपका लंड…”

“क्या? बोलो।”

“आपका लंड सर… मेरी चूत में… प्लीज़…”

“पहले मेरा लंड चूसो।” मैंने अपनी पैंट खोली।

मेरा लंड बाहर निकला। आठ इंच लम्बा, मोटा, लाल, टाइट, नसें फूली हुईं। उसने देखा, आँखें बड़ी-बड़ी कर लीं।

“इतना बड़ा…” उसने कहा।

“चूसो।” मैंने उसके बाल पकड़े, अपना लंड उसके मुँह पर रखा।

उसने जीभ निकाली, लंड के सिरे पर चाटा। फिर धीरे से मुँह में लिया। गर्म, गीला मुँह। मैंने धक्का दिया, लंड आधा अंदर चला गया।

“ऊउउह्ह… सर… बहुत बड़ा है…” उसने मुँह से कहा, लंड अंदर ही था।

“चूसो रांड, चूसो।” मैंने उसके सिर पकड़े, धक्के लगाने शुरू किए।

मैं उसके मुँह को चोदने लगा। आधा लंड अंदर, बाहर, आधा अंदर, बाहर। उसकी आँखों से आँसू निकलने लगे, पर वो चूसती रही।

“कैसा लग रहा है रांड? मेरा लंड चूसने में?”

“ऊउउह्ह… अच्छा… बहुत अच्छा…”

मैंने लंड बाहर निकाला। उसके मुँह से लार टपक रही थी। मैंने उसे डेस्क पर लेटाया, पैर फैलाए।

“अब चूत दो।” मैंने कहा।

“हाँ सर… चोदो मुझे… मेरी चूत आपकी है…”

मैंने उसकी जाँघें पकड़ीं, लंड उसकी चूत के मुँह पर रखा। धीरे से एक धक्का दिया।

“आआआह्ह्ह… सर… बहुत बड़ा है… मेरी चूत फट रही है…”

“सहन करो रांड।” मैंने एक और ज़ोर का धक्का दिया।

मेरा आधा लंड अंदर चला गया। उसकी चूत इतनी टाइट थी कि लंड कसकर घिरा हुआ था। मैंने एक और धक्का दिया, पूरा लंड अंदर।

“ऊउउउह्ह्ह… सर… मैं मर जाऊँगी… इतना बड़ा…”

“नहीं मरोगी, चुदोगी।” मैंने कहा, धक्के लगाने शुरू किए।

धीरे-धीरे, फिर तेज़। मैं पूरे ज़ोर से उसे चोदने लगा। मेज हिल रही थी, कागज़ नीचे गिर रहे थे, कंप्यूटर हिल रहा था।

“आह्ह… आह्ह… और तेज़ सर… और तेज़…”

“चुदती रहो रांड, चुदती रहो।”

मैं और तेज़ हो गया। उसकी चूत से पच पच की आवाज़ें आ रही थीं। गीली चूत, मोटा लंड, ज़ोर के धक्के।

“सर… मैं झड़ने वाली हूँ…”

“रुको रांड, अभी नहीं।”

मैंने उसे उठाया, घुमाया, डेस्क पर घोड़ी बनाया। उसकी गांड मेरे सामने, गोरी, गोल, कसी हुई। मैंने एक थप्पड़ मारा।

“आह्ह… सर…”

“चुप रांड।” मैंने एक और थप्पड़ मारा, उसकी गांड लाल हो गई।

फिर मैंने लंड उसकी चूत में डाला, पीछे से। और ज़ोर से धक्के लगाने लगा। उसकी चूचियाँ हिल रही थीं, मैंने एक हाथ आगे बढ़ाया, चूची पकड़ी, कसकर दबाया।

“आह्ह… सर… मेरी चूची… दर्द…”

“सहन करो।” मैंने और ज़ोर से धक्के लगाए।

पच पच पच पच… आवाज़ें गूँज रही थीं। ऑफिस की खाली दीवारों पर हमारी आवाज़ें टकरा रही थीं।

“चोदो मुझे सर… चोदो… मेरी चूत फाड़ दो…”

“फाड़ूँगा रांड, आज तुम्हारी चूत फाड़कर रहूँगा।”

मैं और तेज़ हो गया। बीस मिनट, तीस मिनट। मैं थक नहीं रहा था। तीन साल की भूख थी, आज बुझानी थी।

“सर… मैं… मैं झड़ गई… ऊउउह्ह्ह…”

उसकी चूत ने पानी छोड़ दिया, गीली हो गई, और गर्म। मैंने लंड बाहर निकाला, उसके पानी से लंड भीग गया।

“अभी खत्म नहीं हुआ रांड।” मैंने कहा।

“सर… मैं थक गई हूँ…”

“मैंने कहा खत्म नहीं हुआ।”

मैंने उसे फिर लेटाया, पैर फैलाए, लंड फिर से अंदर डाला। इस बार और ज़ोर से, और गहरा। उसकी चीख निकल गई।

“आआआह्ह्ह… सर… मर गई मैं…”

“नहीं मरी।” मैंने उसके गाल पर थप्पड़ मारा, “चुदती रहो।”

मैं फिर से धक्के लगाने लगा। अब मेरी गति और तेज़, और ज़ोरदार। मेज टूटने को तरस रही थी।

“आने वाला हूँ मैं…” मैंने कहा।

“मेरे अंदर ही सर… प्लीज़… मेरी चूत में ही झड़ो…”

“क्यों?”

“क्योंकि… क्योंकि मैं आपकी हूँ सर… मेरी चूत आपकी है…”

मैंने आखिरी ज़ोर के धक्के लगाए। दस, बीस, तीस धक्के। फिर मैं उसके अंदर ही झड़ गया। गर्म, गाढ़ा, बहुत सारा माल। उसकी चूत भर गई, बाहर टपकने लगा।

वो भी काँपती हुई झड़ी। दोनों एक-दूसरे में सिमटे हुए थे। मेरा लंड अभी भी अंदर था, धीरे-धीरे ढीला हो रहा था।

कुछ देर बाद, जब साँसें सामान्य हुईं, उसने मेरी छाती पर सिर रखा।

“सर… ये गलत है…”

“जानता हूँ।” मैंने कहा।

“पर… बहुत मज़ा आया…” उसने मुस्कुराते हुए कहा।

“मुझे भी।” मैंने उसके बालों में हाथ फेरा।

“प्रिया?”

“सो रही है। उसकी सूखी चूत को पता भी नहीं चलेगा।”

“तो… फिर से?” उसने पूछा, शरारती मुस्कान में।

“जब मन करेगा रांड, तुम्हें चोदूँगा।” मैंने कहा।

“मैं तैयार हूँ सर… हमेशा…”

बाहर शहर की रोशनियाँ चमक रही थीं। और उस खाली ऑफिस में, मेरा लंड फिर से जिंदा हो गया था।

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