मेरा नाम अर्जुन है। उम्र छब्बीस। पुणे के एक पुराने सोसाइटी में रहता हूँ। तीसरी मंजिल। फ्लैट छोटा है, लेकिन किराया कम है। अकेला रहता हूँ। ऑफिस से थककर आता हूँ तो ज्यादातर नॉइज़ कैन्सलिंग हेडफोन लगाए बैठ जाता हूँ।
मेरे फ्लैट के बिल्कुल सटे हुए दीवार के दूसरी तरफ एक और फ्लैट है। वहाँ एक कपल रहता है। आदमी का नाम मुझे नहीं पता। लेकिन औरत का नाम मैंने कई बार सुना है—नैना। उम्र तीस के आसपास होगी। चेहरा साफ-सुथरा। बाल हमेशा बांधे हुए। कपड़े साधारण। कोई खास हसीन नहीं लगती पहली नजर में। लेकिन आवाज़ उसकी… आवाज़ बहुत साफ है। और दीवार पतली है।
पहले महीनों में मुझे उनकी जिंदगी की कोई खास जानकारी नहीं थी। बस कभी-कभी बर्तन की आवाज़, टीवी का धीमा शोर, और रात को हल्की बातें। फिर एक रात कुछ बदला।
रात के लगभग बारह बज रहे थे। मैं सोने की कोशिश कर रहा था। अचानक दीवार के उस पार से आवाज़ आई। कोई चीख नहीं थी। कोई जोर की कराह नहीं। बस एक लंबी, दबी हुई, और बहुत साफ साँस। फिर एक और। फिर धीमी सी आवाज़—“धीरे… और अंदर…”
मैं उठकर बैठ गया। हेडफोन निकाल दिए। कान दीवार से लगा दिए। आवाज़ें जारी थीं। पुरुष की साँसें भारी थीं। नैना की आवाज़ बीच-बीच में टूट रही थी। कोई गाली नहीं। कोई नाटकीयता नहीं। बस दो शरीर की असली आवाज़ें। और दीवार इतनी पतली थी कि हर धक्के की हल्की थप-थप भी सुनाई दे रही थी।
मैं वहीं फर्श पर बैठ गया। लंड तन चुका था। लेकिन मैंने कुछ नहीं किया। सिर्फ सुना। लगभग बीस मिनट तक। फिर सन्नाटा हो गया। पानी चलने की आवाज़ आई। फिर कुछ नहीं।
उस रात के बाद मैंने ध्यान देना शुरू कर दिया।
सुबह जब मैं दूध लेने नीचे जाता तो कभी-कभी नैना भी दूध की थैली लेकर खड़ी मिलतीं। वो नमस्ते करतीं। मैं भी। बात नहीं होती थी। लेकिन अब मैं उनकी आवाज़ पहचानता था। वो वाली आवाज़ जो रात को दीवार पार करके आती थी।
एक शाम की बात है। मैं सीढ़ियों पर चढ़ रहा था। नैना उतर रही थीं। हाथ में सब्जी का थैला। हमारी नजरें मिलीं। उन्होंने थैला संभालते हुए कहा, “अर्जुन जी… ना?” मैंने सिर हिलाया। “आपके फ्लैट से कभी-कभी संगीत बहुत तेज आता है। रात को।” मेरा दिल बैठ गया। “सॉरी… हेडफोन लगा लेता हूँ आगे से।” वो मुस्कुराईं। पहली बार। “नहीं… शिकायत नहीं थी। बस बता रही थी।”
इतना कहकर वो चल दीं। लेकिन उनकी मुस्कान में एक अजीब सा अंदाज था। जैसे वो जानती हों कि मैंने भी कुछ सुना है।
उस रात फिर आवाज़ें आईं। इस बार और साफ। नैना की कराहें पहले से थोड़ी तेज थीं। और एक बार तो उन्होंने साफ कहा, “आज रुक मत… पूरा…”
मैं दीवार से लगा रहा। इस बार हाथ पैंट के अंदर चला गया। लेकिन झड़ने से पहले ही आवाज़ें बंद हो गईं। सन्नाटा लौट आया। मैं वैसे ही बैठा रहा। साँसें तेज। मन में एक सवाल घूम रहा था—
क्या नैना जानती है कि दीवार के इस पार कोई सुन रहा है? और अगर जानती है… तो क्या वो जानबूझकर आवाज़ निकाल रही है?
अगले कुछ दिनों तक कुछ नहीं हुआ। फिर एक रात, लगभग दो बजे, दीवार के उस पार से सिर्फ एक आवाज़ आई। पुरुष की नहीं। सिर्फ नैना की। बहुत धीमी।
“सुना…?”
फिर सन्नाटा।
मैंने जवाब में कुछ नहीं कहा। लेकिन उस रात नींद बिल्कुल नहीं आई।
उस रात के बाद मैंने दीवार से कान लगाना बंद कर दिया। जानबूझकर। हेडफोन की आवाज़ बढ़ा दी। देर रात तक लैपटॉप चलाता रहा। लेकिन नींद के झोंके में भी कभी-कभी हल्की कराहें कानों में घुल जातीं। पता नहीं असली थीं या दिमाग बना रहा था।
तीन दिन बाद सुबह की बात है। मैं कचरा फेंकने नीचे जा रहा था। नैना सीढ़ियों पर खड़ी थीं। हाथ में दूध के थैले। हमारे बीच दो सीढ़ियाँ थीं। उन्होंने मुझे देखा और बोलीं,
“अर्जुन जी, एक काम कहूँ?” “बोलिए।” “हमारे फ्लैट की लाइट का स्विच खराब हो गया है। पतिदेव ऑफिस चले गए हैं। अगर आपको आता हो तो देख सकते हैं?”
साधारण सा अनुरोध था। लेकिन उनकी आँखों में वो वाली बात थी जो रात वाली आवाज़ में होती है। मैंने हाँ कह दी।
उनके फ्लैट में पहली बार गया। दीवार के उस पार वाला घर। अंदर साफ-सुथरा था। कोई अतिरिक्त सजावट नहीं। नैना ने मुझे बेडरूम का स्विच दिखाया। मैंने टूल किट निकाली। वो दरवाजे पर खड़ी रहीं। बातें कम हुईं। सिर्फ जरूरी निर्देश। स्विच ठीक करते समय मेरी नजर बिस्तर पर चली गई। चादर साफ थी। तकिए दो। सब सामान्य। लेकिन दिमाग में रात वाली आवाज़ें घूम रही थीं।
काम खत्म होने पर उन्होंने पानी का गिलास दिया। उँगलियाँ छू गईं। दोनों ने अनदेखा किया। “शुक्रिया,” उन्होंने कहा। “कोई बात नहीं।”
मैं निकल आया। लेकिन वापस अपने फ्लैट में आकर दीवार की तरफ देखा। अब वो दीवार सिर्फ दीवार नहीं लग रही थी। अब मैंने उनके कमरे को अपनी आँखों से देख लिया था। बिस्तर को देख लिया था। जहाँ से वो आवाज़ें आती थीं।
उस रात आवाज़ें फिर आईं। लेकिन इस बार कुछ अलग था। कराहें पहले से ज्यादा साफ थीं। और एक बार नैना ने साफ कहा,
“दीवार के उस पार… सुन रहा होगा…”
मेरा शरीर जड़ हो गया। पुरुष की आवाज़ आई, “कौन?” नैना हल्के से हँसीं। “कोई नहीं। ऐसे ही…”
फिर धक्कों की आवाज़ तेज हो गई। नैना की कराहें भी। जानबूझकर। जैसे कोई प्रदर्शन हो। मैं दीवार से लगा रहा। इस बार हाथ पैंट के अंदर नहीं गया। सिर्फ सुनता रहा। पूरा। आखिर तक। जब सन्नाटा हुआ तो मैं वैसे ही फर्श पर बैठा रह गया।
अगली सुबह नैना से सीढ़ियों पर मुलाकात हुई। उन्होंने सामान्य स्वर में कहा, “लाइट ठीक चल रही है। शुक्रिया।” मैंने सिर हिलाया। वो दो कदम चढ़कर रुकीं। बिना मुड़े बोलीं,
“रात को देर तक जागते हो आप।”
मेरा गला सूख गया। “कभी-कभी।” “हम भी,” उन्होंने कहा। और चल दीं।
उस दिन ऑफिस में काम नहीं हो पाया। दिमाग में सिर्फ एक लाइन घूम रही थी—‘दीवार के उस पार… सुन रहा होगा…’
शाम को घर लौटा तो मेरे दरवाजे के नीचे एक छोटा सा पेपर पड़ा था। कोई नाम नहीं। सिर्फ एक लाइन—
“आज रात। बारह बजे। दीवार के इस पार।”
ग्यारह बजकर पचास मिनट पर मैंने अपना दरवाजा खोला। गलियारा खाली था। नैना के फ्लैट का दरवाजा हल्का खुला हुआ था। मैं अंदर गया और पीछे से हुक लगा दिया।
वो बेडरूम में खड़ी थी। पतली साड़ी में। पल्लू एक तरफ फेंका हुआ। ब्लाउज के सारे हुक खुले थे। भारी स्तन बाहर निकले हुए, निप्पल कड़े। उसने मुझे देखा और धीमे से बोली,
“दो महीने से सुन रहे हो न मेरी चूत की आवाज़… आज खुद चुना।”
मैंने उसके पास जाकर साड़ी खींचकर फर्श पर गिरा दी। ब्लाउज भी। वो पूरी नंगी हो गई। मैंने उसके स्तन दोनों हाथों में लिए और जोर से मसले। निप्पल मुँह में लेकर दाँतों से काटा। नैना की कराह निकली।
“आह्ह… ऐसे ही काटो… दीवार के उस पार भी यही करती थी जब तुम सुन रहे होते थे…”
मैंने उसे बिस्तर पर धकेल दिया। टाँगें फैलाईं। चूत पहले से चमक रही थी। मैंने मुँह लगा दिया। जीभ से पंखुड़ियाँ चाटीं, फिर क्लिट को जोर से चूसा। दो उँगलियाँ अंदर डालकर तेजी से पेलने लगा। नैना के नाखून मेरी पीठ पर गड़ गए।
“आह्ह अर्जुन… चाटो… पूरा चाटो… दो महीने से यही सोचती थी कि कब तुम्हारी जीभ मेरी चूत में होगी…” “कितनी गीली है भाभी… सुनते समय भी ऐसी ही गीली होती थी क्या?” “ह्म्म… और भी गीली… क्योंकि पता था तुम सुन रहे हो… जानबूझकर जोर से कराहती थी…”
मैंने उँगलियाँ निकालकर उसके मुँह में डाल दीं। उसने चूस लीं। फिर मैंने अपनी पैंट खोली। लंड बाहर निकाला। नैना ने हाथ में लिया और आँखें बड़ी कर दीं।
“बाप रे… इतना मोटा… दीवार के उस पार से तो सिर्फ आवाज़ आती थी… अब ये लंड मेरी चूत में जाएगा…”
उसने खुद लंड को अपनी चूत पर रखा और धीरे-धीरे अंदर लेना शुरू किया। आधा जाने पर रुक गई। “धीरे… बहुत मोटा है…” मैंने एक जोर का धक्का मारा। पूरा लंड अंदर चला गया। नैना चीख निकली।
“आह्ह्ह… मादरचोद… पूरी चूत फस गई… मत निकाल… ऐसे ही रख…”
मैंने उसकी टाँगें कंधों पर रख लीं और पेलना शुरू किया। पहले धीरे, फिर तेज। हर धक्के के साथ उसकी गाँड बिस्तर पर पट-पट की आवाज कर रही थी। स्तन हिल रहे थे। मैंने दोनों निप्पल मरोड़ते हुए पूछा,
“बोल… दीवार के उस पार कैसी लगती थी मेरी साँसें?” “पागल कर देती थीं… हर रात… सोचती थी कब ये लंड चूत में होगा… अब जोर से पेल… फाड़ दे…”
मैंने गति बढ़ा दी। पूरा लंड निकलकर फिर जड़ तक जा रहा था। नैना गालियाँ निकालने लगीं।
“चोद… जोर से चोद… पड़ोस वाली भाभी की चूत चोद… साले… दो महीने से तड़पा तड़पा कर… अब हिसाब चुकता कर…” “ले भाभी… ले… जितनी आवाज़ निकालती थी उतनी ही चूत फेल…” “फेल रही है… पूरी फेल रही है… और तेज… कमर तोड़ दे…”
मैंने उसे पलट दिया। घुटनों के बल कर दिया। गाँड ऊपर उठाई। पीछे से एक झटके में लंड अंदर पेला। एक हाथ से उसके बाल पकड़े, दूसरे से कमर। जोर-जोर से ठोकने लगा।
“यही आवाज़ निकाल… जो तू दीवार के उस पार निकालती थी…” “आह्ह्ह… अर्जुन… मार… और मार… भोसड़ी की… मेरी चूत फाड़ दे…”
मैंने उसकी गाँड पर जोर का थप्पड़ मारा। फिर एक और। नैना की कराहें बेकाबू हो गईं। मैंने दोनों हाथों से उसकी कमर पकड़कर इतनी जोर से पेलना शुरू किया कि बिस्तर की आवाज़ पूरे फ्लैट में गूँज रही थी।
“भाभी… झड़ने वाली हूँ… अंदर छोड़ूँ?” “अंदर… अंदर ही छोड़… भर दे पूरी चूत… दो महीने का पानी उतार दे…”
कुछ तेज धक्कों के बाद मैंने गहराई तक लंड धँसाया और छोड़ दिया। गरम वीर्य की तेज धार उसकी चूत में छूटने लगी। नैना भी उसी समय काँप उठी। उसकी चूत ने लंड को जोर से जकड़ लिया। दोनों पसीने से तर थे।
मैं उसके ऊपर गिरा रहा। लंड अभी भी अंदर था। थोड़ी देर बाद निकाला तो वीर्य उसकी जाँघों से बहकर चादर पर गिरने लगा। नैना करवट लेकर लेटी रही। साँसें धीमी हो रही थीं।
फिर उसने आँखें खोलीं और धीमे से बोली,
“कल से फिर दीवार के उस पार सोना। जब पति चोदे… तो सुनना। और दीवार पर हाथ रखना। मैं समझ जाऊँगी कि तुम सुन रहे हो… और जानबूझकर वैसी ही आवाज़ निकालूँगी जैसी तुम्हें पसंद है।”
मैंने उसके बाल पीछे किए। “और जब वो नहीं होंगे?” “तब दरवाजा खुला रहेगा। जैसे आज था।”
मैंने कपड़े पहने। निकलने से पहले एक बार फिर उसकी नंगी बॉडी देखी—स्तनों पर मेरे दाँतों के निशान, जाँघों पर चमकता वीर्य, और आँखों में वो वाली तृप्ति।
अपने फ्लैट में आकर मैं दीवार के पास खड़ा हो गया। उस पार सन्नाटा था। लेकिन अब हर सन्नाटे का मतलब बदल चुका था।
अब दीवार सिर्फ दीवार नहीं रही थी।
