मेरा नाम निशा है। उम्र उन्नीस साल की थी जब ये सब हुआ। दिल्ली के एक गर्ल्स हॉस्टल में रहती थी और कॉलेज में फर्स्ट ईयर में थी। घर से पहली बार इतनी दूर आई थी। कमरा छोटा था, लेकिन अपनी तरह से साफ-सुथरा। ज्यादातर लड़कियाँ वीकेंड पर घर चली जाती थीं। दीवाली के लंबे वीकेंड पर हॉस्टल लगभग खाली हो गया। मेरी रूममेट भी घर चली गई। मैं अकेली रह गई।
राहुल को मैंने कॉलेज के दूसरे हफ्ते में देखा था। वो सेकंड ईयर में था। लंबा, थोड़ा परिपक्व चेहरा, और बात करने का अंदाज ऐसा कि लगता था जैसे वो जल्दबाजी में नहीं है। हम एक ही ग्रुप प्रोजेक्ट में आ गए थे। पहले सिर्फ पढ़ाई की बातें होती थीं। फिर धीरे-धीरे कॉफी, लाइब्रेरी के बाहर की छोटी मुलाकातें। वो मुझसे पूछता था कि हॉस्टल कैसा लग रहा है, घर की याद आती है या नहीं। मैं कुछ ज्यादा खुलकर नहीं बोलती थी, लेकिन उसकी बातें सुनना अच्छा लगता था।
दीवाली से दो दिन पहले उसने मैसेज किया। “नोट्स पूरे हो गए हैं। अगर चाहिए तो दे दूँ?”
मैंने सोचा सिर्फ नोट्स की बात है। हॉस्टल के गेट पर मिलने को कहा। लेकिन शाम को बारिश शुरू हो गई। उसने कहा, “ऊपर आ जाऊँ? दो मिनट में देकर चला जाऊँगा।”
मैंने मना करना चाहा, लेकिन बारिश तेज थी। मैंने हाँ कर दी।
जब वो कमरे में आया तो मेरे हाथ थोड़े ठंडे हो गए थे। उसने नोट्स टेबल पर रखे और खिड़की की तरफ देखा। “अकेली हो पूरी?”
“हाँ। सब चले गए।”
उसने मुस्कुराते हुए पूछा, “डरी तो नहीं?”
मैंने सिर हिलाया। वो कुर्सी पर बैठ गया। बातें होने लगीं। कॉलेज की, प्रोफेसर्स की, फिर घर की। उसने अपनी जेब से एक छोटी सी फ्लास्क निकाली। “सिर्फ ठंड के लिए। जबरदस्ती नहीं।”
मैंने एक घूंट लिया। गला जल गया, लेकिन शरीर में हल्की सी गर्माहट फैल गई। उसने अपना फोन चलाया। धीमी सी म्यूजिक बजने लगी।
कमरे में सिर्फ एक ट्यूबलाइट जल रही थी। बारिश की आवाज खिड़की के बाहर थी। राहुल ने धीरे से मेरी तरफ देखा। “तुम जब बात करती हो ना, तो आँखें झुका लेती हो। क्यों?”
मैंने जवाब नहीं दिया। वो मेरे पास आया। कुर्सी से उठकर बिस्तर के किनारे बैठ गया। उसका हाथ मेरी हथेली पर रखा। गर्माहट महसूस हुई। फिर उसने मेरा चेहरा अपने हाथों में लिया।
पहला किस बहुत हल्का था। सिर्फ होंठों का स्पर्श। मैंने पीछे हटने की कोशिश की, लेकिन दीवार थी। दूसरा किस थोड़ा गहरा था। उसकी जीभ ने मेरे होंठों को छुआ। मैंने मुँह थोड़ा खोला। कमरे में सिर्फ साँसों की आवाज थी।
जब उसका हाथ मेरी कमर पर गया तो मैंने उसके सीने पर हाथ रखकर धक्का दिया।
“राहुल… मत करो। मैं… मैं कुँवारी हूँ। दर्द होगा।”
वो रुका। मेरे चेहरे को देखा। “दर्द होगा। लेकिन अगर तुम चाहो तो रुक जाऊँगा। अभी भी।”
मैं कुछ नहीं बोली। मेरी साँसें तेज थीं। शरीर के अंदर एक अजीब सी बेचैनी घूम रही थी। उसने फिर किस किया। इस बार मैंने खुद उसके होंठ पकड़ लिए।
उसकी उंगलियाँ मेरी सलवार के नाड़े पर थीं। मैंने पकड़ लिया उसका हाथ।
“धीरे… प्लीज।”
वो रुका नहीं, लेकिन जल्दबाजी भी नहीं की। नाड़ा खोला। सलवार ढीली हो गई। उसके हाथ ने मेरी नंगी कमर को छुआ। फिर धीरे-धीरे ऊपर बढ़कर मेरे स्तनों के नीचे से थामा। ब्लाउज के ऊपर से। मैंने आँखें बंद कर लीं।
जब उसने ब्लाउज के हुक खोले तो मेरे हाथ काँप रहे थे। ब्रा के ऊपर से उसके अंगूठे ने निपल को छुआ। वो सख्त हो चुका था। उसने ब्रा भी खोल दी। पहली बार किसी ने मेरे स्तनों को नंगा देखा था। राहुल ने देखा, फिर झुककर एक निपल अपने मुँह में ले लिया। गर्माहट और गीलापन दोनों एक साथ महसूस हुए। मेरे मुँह से एक अजीब सी आवाज निकली।
“ये… ये क्या हो रहा है…” मैंने फुसफुसाया।
वो मेरे दूसरे स्तन पर चला गया। चूसते हुए हल्के दाँत भी लगाए। मेरी कमर अपने आप उसकी तरफ उठने लगी। मैंने उसके बालों में उंगलियाँ डाल दीं।
उसने मुझे बिस्तर पर लिटा दिया। सलवार पूरी तरह खींच ली। अब मैं सिर्फ पैंटी में थी। उसकी निगाहें मेरी जाँघों के बीच रुकीं। उसने पैंटी के ऊपर से ही हाथ रखा। गर्माहट महसूस करके वो थोड़ा मुस्कुराया। फिर पैंटी के अंदर उंगली सरकाई।
जब उसकी उंगली ने मुझे छुआ तो मैंने अपने आप को सिकोड़ लिया।
“राहुल… मैं डर रही हूँ।”
“बस महसूस करो,” उसने कहा। उसकी उंगली धीरे-धीरे घूम रही थी। गीलापन बढ़ रहा था। जब उसने हल्के से अंदर की तरफ दबाव डाला तो मेरे नाखून उसकी बाँह में गड़ गए।
वो मेरे पास लेट गया। एक हाथ से मेरे स्तन सहला रहा था और दूसरा हाथ नीचे व्यस्त था। मैं उसकी गर्दन में मुँह छुपाए हुए काँप रही थी। शरीर के अंदर कुछ बन रहा था। एक अजीब सी लहर। मैंने उसके कंधे को जोर से पकड़ लिया। साँसें रुक-रुककर निकल रही थीं। फिर अचानक सब कुछ छोड़कर एक सिहरन पूरे शरीर में दौड़ गई। मेरी जाँघें काँपने लगीं। पैंटी पूरी तरह भीग चुकी थी।
राहुल ने अपना हाथ निकाला। उंगलियाँ चमक रही थीं। उसने मुझे देखा। मेरी आँखों में आँसू थे, लेकिन रोने के नहीं।
उसने मेरी पैंटी भी उतार दी। अब मैं पूरी तरह नंगी थी उसके सामने। पहली बार। कमरे की रोशनी में मेरा शरीर उसके सामने खुला था। वो खुद भी अपने कपड़े उतारने लगा। जब उसका लंड बाहर आया तो मैंने निगाहें फेर लीं। फिर वापस देख लिया। लंबा और मोटा। मैंने कभी इतने करीब से नहीं देखा था।
वो मेरे ऊपर आ गया। अपना लंड मेरी जाँघ के अंदर रख दिया। अभी अंदर नहीं किया था। बस रगड़ रहा था। गीलापन दोनों तरफ था। उसने मेरे माथे पर किस किया।
“अब भी रुक सकते हैं,” उसने फिर कहा।
मैंने सिर हिलाया। आवाज नहीं निकली। फिर धीरे से बोली, “डर लग रहा है… लेकिन रुकना भी नहीं चाहती।”
उसने अपना लंड मेरी चूत के मुँह पर रखा। सिर्फ टिप। धीरे से दबाव दिया। कुछ अंदर गया। दर्द हुआ। तेज। मैंने उसके पीठ पर नाखून गड़ा दिए।
“आह… दर्द… राहुल…”
वो रुक गया। अंदर ही अंदर। मेरे होठों को चूमने लगा। “साँस लो। मैं रुका हूँ।”
मेरी आँखों से आँसू बह रहे थे। लेकिन शरीर ने उसे धक्का नहीं दिया। वो वहीं रुका रहा। इंतजार कर रहा था।
बाहर बारिश अभी भी हो रही थी। कमरे में सिर्फ हमारी साँसें थीं। और वो दर्द, जो धीरे-धीरे एक अजीब सी गर्माहट में बदल रहा था।
राहुल अभी भी रुका हुआ था। सिर्फ थोड़ा सा अंदर। दर्द तेज था, जैसे कोई चीज मुझे चीर रही हो। मेरी आँखों से आँसू बह रहे थे। मैंने उसके कंधे दबाए।
“निकाल… दर्द हो रहा है बहुत।”
वो नहीं निकाला। बस झुककर मेरे होंठ चूमने लगा। एक हाथ से मेरे बाल पीछे किए और बोला, “साँस ले निशा। मैं हिल नहीं रहा। जब तुम बोलोगी तब आगे बढ़ूँगा।”
मैंने कई साँसें लीं। दर्द कुछ फीका पड़ा, लेकिन दबाव वैसा ही था। फिर मैंने धीरे से सिर हिलाया। उसने थोड़ा और धकेला। इस बार कुछ अंदर फटा। एक तेज, तीखा दर्द। मैं चीखने वाली थी लेकिन उसने मेरा मुँह अपने होंठों से बंद कर लिया। गर्म नमी मेरे बीच से बह निकली। खून था।
“आह्ह… राहुल… तोड़ दिया तुमने…” मेरी आवाज़ टूटी हुई थी।
वो पूरी तरह अंदर तक नहीं गया था। रुका रहा। मेरे चेहरे को चूमता रहा। माथे को, आँखों को, गालों को। “अब धीरे… बस महसूस करो।”
कुछ पल बाद उसने बहुत धीमे गति से हिलना शुरू किया। छोटे-छोटे धक्के। हर बार थोड़ा बाहर और फिर अंदर। खून और मेरे गीलेपन ने रास्ता आसान कर दिया था। दर्द अब भी था, लेकिन उसके नीचे एक अजीब सी गर्माहट फैल रही थी। मैंने अपनी टाँगें उसके कूल्हों के आसपास लपेट लीं बिना सोचे।
पाँच-सात मिनट तक वो सिर्फ धीरे-धीरे ही गया। मेरी साँसें बदलने लगीं। दर्द पीछे छूट रहा था। उसकी मोटाई मुझे पूरा खोल रही थी। जब उसने थोड़ा गहरा धक्का मारा तो मेरे मुँह से अलग तरह की आवाज़ निकली।
“ये… ये अच्छा लग रहा है,” मैंने फुसफुसाया।
वो मुस्कुराया। गति थोड़ी बढ़ाई। अब उसके धक्के लंबे हो गए थे। पूरा अंदर तक जाता और फिर धीरे बाहर खिंचता। मेरी चूत उसकी हर हरकत को महसूस कर रही थी। खून अभी भी लगा हुआ था, लेकिन अब वो फिसलन पैदा कर रहा था। मैंने उसकी पीठ पर हाथ फेरते हुए कमर उठाई।
“और अंदर… तक,” मेरी अपनी आवाज़ मुझे अजीब लग रही थी।
राहुल ने मेरी दोनों टाँगें अपने कंधों पर रख लीं। कोण बदल गया। अब हर धक्का बहुत गहरा जा रहा था। मैंने तकिया दबा लिया। आवाजें निकल रही थीं जो मैं रोक नहीं पा रही थी। कमरे में सिर्फ हमारी त्वचा की आवाज़ और बारिश की रिमझिम बची थी।
जब उसने पहली बार जोर से पेलना शुरू किया तो मैंने उसके बाल पकड़ लिए। दर्द पूरी तरह गायब नहीं हुआ था, लेकिन उसके ऊपर सवार होकर एक भूख जाग रही थी। मैं खुद उसके नीचे कमर हिला रही थी।
“निशा… मैं ज्यादा देर नहीं रोक पाऊँगा,” उसने कटी हुई आवाज़ में कहा।
“अंदर… छोड़ दो,” मैंने खुद कहा। सोचा नहीं था। मुँह से निकल गया।
वो कुछ तेज धक्के मारकर मेरे अंदर ही रुक गया। गर्म तरल मेरे अंदर फैलता महसूस हुआ। उसकी कमर काँप रही थी। वो मेरे ऊपर गिर पड़ा। दोनों की साँसें तेज थीं। उसका लंड अभी भी अंदर था, धीरे-धीरे नरम पड़ रहा था।
हम काफी देर तक वैसे ही पड़े रहे। फिर वो एक तरफ हटा। मेरे घुटनों के बीच हल्के लाल निशान और खून के धब्बे दिख रहे थे। उसने अपना हाथ वहाँ रखा और धीरे से सहलाया। मैंने आँखें बंद कर लीं।
थोड़ी देर बाद उसने फिर किस करना शुरू किया। इस बार जल्दबाजी नहीं थी। उसके हाथ फिर से मेरे स्तनों पर थे, फिर नीचे। जब उसकी उंगलियाँ अंदर गईं तो इस बार दर्द कम था। मैं गीली थी उसके पानी और अपने पन से। उसने मुझे घुमाया। घोड़ी बना दिया।
पीछे से प्रवेश करते समय मैंने तकिया कस लिया। इस पोजीशन में वो और गहरा लग रहा था। उसके हाथ मेरी कमर पर थे। धक्के पहले धीमे थे, फिर तेज होते गए। मेरी आवाज़ बिस्तर में दब रही थी। जब उसने मेरी चोटी पकड़कर खींची तो मेरे मुँह से एक लंबी सिसकी निकल गई।
“अब दर्द नहीं हो रहा?” उसने पीछे से पूछा।
“नहीं… बस… मत रुकना।”
दूसरी बार जब वो पास आया तो उसने निकाला और मुझे उल्टा कर चित कर दिया। खुद मेरे ऊपर आकर फिर से अंदर घुस गया। इस बार मैंने उसकी पीठ पर नाखून रगड़ दिए। मेरी टाँगें काँप रही थीं। एक बार फिर वही लहर आई। इस बार और जोर से। मैंने उसे और कस लिया। वो भी साथ में झड़ गया। फिर से अंदर।
रात में हमने एक बार और किया। उस बार मैं ऊपर थी। उसके लंड पर बैठते समय पहले थोड़ा सावधानी से उतरी, फिर खुद हिलने लगी। मेरे घुटने बिस्तर में धँस रहे थे। उसके हाथ मेरे स्तनों को मसल रहे थे। जब मैं झड़ी तो उसके सीने पर गिर पड़ी। उसने मेरे पसीने से भीगे बाल पीछे किए और माथे पर किस किया।
सुबह जब मेरी आँख खुली तो कमरे में हल्की रोशनी थी। राहुल मेरे बगल में सोया था। उसका एक हाथ मेरी कमर पर था। मेरे बीच में हल्की सी दर्द और चिपचिपाहट दोनों थी। चादर पर हल्के लाल निशान सूख चुके थे।
मैं उठकर नहाई। पानी गिरते समय शरीर के कई जगहों पर उसके छोड़े हुए निशान महसूस हुए। गले पर, स्तनों पर, जाँघों के अंदर। जब मैं तौलिया लपेटकर बाहर आई तो वो जाग चुका था। बिस्तर पर बैठकर मुझे देख रहा था।
मैं उसके पास गई। उसके बगल में बैठ गई। कुछ देर दोनों चुप रहे। फिर मैंने उसकी उंगलियाँ पकड़ीं।
“कल रात… तुमने मेरी सील तोड़ दी,” मैंने धीरे से कहा।
वो कुछ बोलने वाला था लेकिन मैंने आगे कहा, “अब रोज़ आना। नोट्स का बहाना मत बनाना। सीधे आ जाना।”
राहुल ने मेरी तरफ देखा। उसकी आँखों में हैरानी थी, फिर कुछ और। उसने मेरा हाथ अपने गाल से लगाया।
“तुम्हें यकीन है?”
मैंने सिर हिलाया। “हॉस्टल खाली रहे या भरा… तुम आना। मैं दरवाजा खोलूँगी।”
उसने मुझे अपनी तरफ खींच लिया। इस बार किस में कोई हिचकिचाहट नहीं थी। मेरे गीले बाल उसके सीने से चिपक गए। खिड़की के बाहर दिल्ली की सुबह की आवाजें आने लगी थीं। लेकिन कमरे के अंदर सिर्फ हम दोनों थे।
और वो दर्द, जो कल रात था, अब एक अजीब सी भूख में बदल चुका था।
मैं जानती थी कि आज के बाद कुछ भी पहले जैसा नहीं रहेगा।
और मैंने खुद ये रास्ता चुना था।
