Hello दोस्तों, मेरा नाम नेहा है, मैं 21 साल की हूँ, लखनऊ की रहने वाली हूँ। मेरी फैमिली में मम्मी-पापा और मेरी एक बहन हैं। मैंने अभी तक किसी के साथ कुछ नहीं किया, मेरी चूत बिल्कुल कुंवारी है, टाइट, और किसी लंड ने आज तक उसे नहीं छुआ। पर एक लड़के ने मुझे ऐसा पागल किया कि मैंने अपनी कुंवारी चूत उसी को देने का फैसला किया।
उसका नाम अर्जुन है, 26 साल का, मेरे पापा के दोस्त का बेटा। वो दिल्ली में job करता है, हर महीने कभी-कभी लखनऊ आता है। मैंने उसे पहली बार देखा था पापा के birthday पे, 8 महीने पहले। वो काली shirt में आया था, दाढ़ी, ऊँचा, मोटा, और जब उसने मुझे देखा, मेरी साँसें रुक गईं।
“ये नेहा?” उसने पूछा, मेरी तरफ देखते हुए, आँखों में कुछ था जो मैंने पहले किसी की आँखों में नहीं देखा।
“हाँ, मेरी छोटी बेटी,” पापा ने कहा।
अर्जुन ने मुस्कुराया, “बड़ी हो गई है।”
मैं शर्मा गई, पर मेरी आँखें उसकी body पर थीं। उसकी chest, उसकी arms, और नीचे… उसकी pants में कुछ उभरा हुआ था, जब वो मुड़ा तो मैंने देखा, इतना बड़ा, इतना मोटा। मेरी चूत में पहली बार कुछ हुआ, एक तड़प, एक खिंचाव, जैसे कुछ चाहती हो।
उसके बाद वो हर महीने आने लगा। पापा से मिलने, और शायद… मुझसे भी। हम बातें करने लगे, पहले कम, फिर ज़्यादा। वो मुझे jokes सुनाता, मैं हँसती, और जब हँसती, वो मेरी चूचियों को देखता, मैंने notice किया। मेरी चूचियाँ 32B की, कसी हुई, और जब मैं हँसती, वो हिलती हैं, उसकी आँखें वहीं टिकी रहती हैं।
एक दिन, मम्मी-पापा बाज़ार गए थे, घर में सिर्फ मैं और अर्जुन। हम बैठे TV देख रहे थे, sofa पर, इतने पास कि उसकी जाँघ मेरी जाँघ से सटी हुई थी। मेरी साँसें तेज़ हो रही थीं, मेरी चूत गीली होने लगी, पहली बार इतनी गीली।
“नेहा,” उसने कहा, मेरे कान में, “तुम बहुत खूबसूरत हो।”
“अर्जुन भैया…” मैंने कहा, शर्माते हुए।
“भैया नहीं,” उसने मेरा हाथ पकड़ा, “बस अर्जुन।”
मैंने कुछ नहीं कहा, हाथ नहीं हटाया। उसने मेरा हाथ अपने हाथ में लिया, सहलाया, फिर अपनी जाँघ पर रखा। मैं काँप उठी, पर हटाया नहीं। उसकी जाँघ गर्म थी, मोटी, और नीचे… कुछ उभरा हुआ था, जो मेरी हथेली से सटा हुआ था।
“डरो मत,” उसने कहा, “मैं कुछ नहीं करूँगा जब तक तुम ना कहो।”
मैंने सिर हिलाया, शायद हाँ में, शायद ना में। फिर मम्मी-पापा की आवाज़ आई, वो हटा, मैं हटी, पर वो रात मैंने सोचा, उसके बारे में, उसके लंड के बारे में, और मेरी चूत और गीली हो गई।
फिर एक दिन, वो मुझे market ले गया। bike पर, मैं पीछे बैठी, हाथ उसकी कमर पर। जब bike चलती, हम टकराते, मेरी चूचियाँ उसकी पीठ से रगड़ती, मेरी चूत seat से, और मैं… मैं पागल हो रही थी। वो रुका, एक जगह, जहाँ कोई नहीं था। हम उतरे, वो मेरे पास आया, इतने पास कि मेरी चूचियाँ उसकी chest से सटीं।
“नेहा,” उसने कहा, “मैं तुम्हें पसंद करने लगा हूँ।”
“मैं भी…” मैंने धीरे कहा, आँखें नीचे।
उसने मेरा चेहरा उठाया, मेरी आँखों में देखा, और… kiss किया। पहले धीरे, फिर गहरा, जीभ अंदर, मेरी जीभ से मिली, और मैं… मैं पिघल गई। उसका हाथ मेरी कमर पर, फिर ऊपर, मेरी चूची के पास, रुका, मुझे देखा, पूछा बिना पूछे।
मैंने कुछ नहीं कहा, पर साँसें तेज़ कर दीं। उसने धीरे से चूची पर हाथ रखा, बाहर से, कपड़ों के ऊपर से। मैं काँप उठी, “ऊह्ह… अर्जुन…”
“चाहती हो?” उसने पूछा, होठ मेरे कान पर।
“हाँ…” मैंने फुसफुसाया, “पर… मैंने कभी…”
“जानता हूँ,” उसने कहा, “तुम कुंवारी हो। मैं धीरे करूँगा।”
उसने मेरी चूची दबाई, धीरे, फिर ज़ोर से। मैंने आँखें बंद कर लीं, सिर पीछे किया, और वो चूमता रहा, मेरी गर्दन, मेरी क्लीवेज, और फिर… मेरी चूची, कपड़ों के ऊपर से ही, मुँह में ली, चूसा। मैं ऊपर उठी, “आह्ह… अर्जुन…”
“मज़ा आ रहा है?” उसने पूछा।
“हाँ… बहुत…”
उसका हाथ नीचे बढ़ा, मेरी नाभि, फिर मेरी जाँघ, और फिर… मेरी चूत के ऊपर, jeans के ऊपर से। मैं काँप उठी, “नहीं… अर्जुन… नीचे…”
“क्या हुआ?”
“मैं… मैं कुंवारी हूँ… और… मेरी चूत…”
“क्या?”
“बहुत टाइट है… और… मुझे डर लगता है…”
उसने हाथ हटाया, मुझे गले लगाया। “जब तुम तैयार हो, तब। मैं जल्दी नहीं करूँगा।”
वो मुझे घर छोड़ने आया, और उस रात, मैंने सोचा, उसके बारे में, उसके लंड के बारे में, और मेरी चूत जो तड़प रही थी, पहली बार किसी के लिए, किसी लंड के लिए।
फिर वो महीना आया जब वो दिल्ली जाने वाला था, 3 महीने के लिए। उससे पहले, वो मुझे मिलने आया, हमारे घर के पास एक पार्क में। शाम थी, अँधेरा हो रहा था, कोई नहीं था। हम बैठे, एक bench पर, हाथ में हाथ।
“नेहा,” उसने कहा, “मैं 3 महीने बाद आऊँगा।”
“मैं रुक नहीं पाऊँगी,” मैंने कहा, आँखों में आँसू।
“तो आज…” उसने रुका, मेरी आँखों में देखा, “क्या तुम तैयार हो?”
मैंने कुछ नहीं कहा, पर मैं जानती थी, मेरी चूत जानती थी, मेरी साँसें जानती थीं। मैंने सिर हिलाया, हाँ में।
“पक्का?” उसने पूछा।
“हाँ,” मैंने कहा, “मैं चाहती हूँ… तुम्हारा लंड… मेरी चूत में…”
उसने मुझे घर छोड़ा, और कहा, “कल। मम्मी-पापा के जाने के बाद। मैं आऊँगा। तुम्हारी कुंवारी चूत… मैं उसे अपना बनाऊँगा।”
मैं रात भर नहीं सोई। मेरी चूत तड़प रही थी, गीली हो रही थी, और मैंने सोचा, कल… कल मेरा कुंवारापन जाएगा, और मैं… मैं एक औरत बन जाऊँगी।
वो दिन आ गया। मम्मी-पापा सुबह ही अपने किसी रिश्तेदार के यहाँ चले गए थे, शाम तक नहीं आने वाले थे। घर में सिर्फ मैं, और मेरी तड़पती हुई चूत। मैंने नहाया, सुबह से तैयारी शुरू की। कौन सी पैंटी पहनूँ, कौन सी ब्रा, क्या पहनूँ। आखिर में मैंने एक सफेद नाइटी पहनी, बिना ब्रा के, बिना पैंटी के। मैंने सोचा, आज जो होगा, आसानी से होगा, बिना रुकावट के।
शाम को पाँच बजे, doorbell बजी। मैं दौड़ी, दरवाज़ा खोला। अर्जुन, काली टी-शर्ट में, जींस में, और उसकी पैंट में… वो उभार जो मैंने पहले भी देखा था, आज और बड़ा लग रहा था। मेरी साँसें रुक गईं, मेरी चूत में एक झनझनाहट हुई, गीली होने लगी।
“आ गए?” मैंने पूछा, आवाज़ काँप रही थी।
“तुम्हारे लिए,” उसने मुस्कुराते हुए कहा, अंदर आया, और दरवाज़ा बंद कर दिया।
हम बैठे, sofa पर, इतने पास कि उसकी जाँघ मेरी जाँघ से सटी हुई थी। मेरी नाइटी में से मेरी चूचियाँ साफ झाँक रही थीं, निप्पल खड़े, और नीचे… नाइटी इतनी छोटी थी कि मेरी जाँघें, और कभी-कभी मेरी चूत का एक झलक दिख जाता। वो देख रहा था, मैं जानती थी।
“नेहा,” उसने कहा, मेरे कान में, “तुम आज अलग लग रही हो।”
“कैसे?” मैंने पूछा, शर्माते हुए भी मुस्कुरा रही थी।
“बहुत खूबसूरत। और…” उसने मेरी नाइटी के नीचे देखा, “बहुत सेक्सी।”
मैंने कुछ नहीं कहा, पर मेरी साँसें तेज़ हो गईं। उसने मेरा हाथ पकड़ा, अपनी जाँघ पर रखा, और धीरे से ऊपर ले गया। उसकी जींस के ऊपर, वो उभार, जो अब और बड़ा हो गया था, मोटा, लंबा, और गर्म। मैं काँप उठी, “ऊह्ह… अर्जुन…”
“डरो मत,” उसने कहा, “आज मैं धीरे करूँगा। तुम्हारी कुंवारी चूत… मैं उसे प्यार से चोदूँगा।”
मैंने सिर हिलाया, हाँ में। उसने मुझे उठाया, अपनी गोद में बिठाया। मेरी नाइटी ऊपर चढ़ गई, मेरी चूत उसकी जींस से सटी, गीली, गर्म। उसने मेरी चूची पकड़ी, नाइटी के ऊपर से, दबाई, नोची। मैंने आँखें बंद कर लीं, “आह्ह… अर्जुन…”
“चूची बड़ी हो गई है तुम्हारी,” उसने कहा, “पहले से भी ज़्यादा।”
उसने नाइटी के बटन खोले, एक-एक करके। मेरी चूचियाँ बाहर आईं, गोरी, कसी हुई, निप्पल गुलाबी, खड़े। उसने एक चूची मुँह में ली, चूसा, काटा। मैं ऊपर उठी, “ऊउउह्ह… हाँ… और…”
उसका हाथ नीचे बढ़ा, मेरी नाइटी ऊपर की, मेरी जाँघ, और फिर… मेरी चूत। पहली बार किसी ने छुआ, मेरी कुंवारी चूत, मेरी टाइट चूत। उसने उँगली फेराई, धीरे, और मैं काँप उठी, “आह्ह… वहाँ…”
“कितनी गीली है,” उसने कहा, “कितनी टाइट।”
“मेरी… मेरी कुंवारी चूत है…” मैंने फुसफुसाया।
“आज इसे कुंवारी नहीं रहने दूँगा,” उसने कहा, और उँगली अंदर डाली। धीरे, बहुत धीरे। मैं चीखी, “आह्ह… दर्द…”
“सहन करो,” उसने कहा, “थोड़ा दर्द होगा, फिर मज़ा आएगा।”
उसने उँगली अंदर-बाहर की, धीरे-धीरे। मेरी चूत गीली होती जा रही थी, पच पच की आवाज़ आ रही थी। मैंने सिर पीछे किया, आँखें बंद, और मज़े लेने लगी। “ऊह्ह… अर्जुन… अच्छा लग रहा है…”
“अभी तो शुरुआत है,” उसने कहा, और उँगली बाहर निकाली।
वो खड़ा हुआ, अपनी टी-शर्ट उतारी, फिर जींस। उसका अंडरवियर, और उसके अंदर… वो लंड। मैंने पहली बार लंड देखा, असली लंड। 8 इंच लम्बा, इतना मोटा कि मेरी उँगलियाँ नहीं घेर सकतीं, लाल, नसों से भरा हुआ, और टिप से कुछ चमकता हुआ। मेरी चूत फटने को तरस रही थी, और डर भी लग रहा था।
“डरो मत,” उसने कहा, मेरे पास आया, “मैं धीरे करूँगा।”
मैंने लेट गई, sofa पर, पैर फैलाए। उसने मेरे पैर कंधे पर रखे, और लंड हाथ में लिया। मेरी चूत के मुँह पर रखा, गीली, गर्म, और इतनी टाइट। उसने धक्का दिया, आधा अंदर गया, और मैं चीखी, “आह्ह्ह… फट गई… मेरी चूत फट गई…”
“रुको,” उसने कहा, रुका, मेरी चूची सहलाई, “थोड़ा सहन करो।”
मैंने साँस ली, और उसने फिर धक्का दिया, पूरा अंदर। मेरी आँखों से आँसू निकले, दर्द, बहुत दर्द, और फिर… एक अजीब सा मज़ा। वो रुका, मुझे देखा, और फिर धीरे-धीरे चोदने लगा।
“कैसा लग रहा है?” उसने पूछा।
“दर्द… और… मज़ा भी…” मैंने कहा।
“मज़ा बढ़ेगा,” उसने कहा, और तेज़ कर दिया।
वो चोदता रहा, और मैं… मैं चिल्लाती रही, “आह्ह… आह्ह… और तेज़… और ज़ोर से…”
मेरी चूत से खून निकला, मेरी कुंवारी चूत का खून, sofa पर, उसके लंड पर। वो देखता रहा, और और तेज़ चोदने लगा। “ये खून… तुम्हारी कुंवारी का… अब तुम मेरी हो।”
“हाँ… मैं तुम्हारी हूँ… चोदो मुझे… रोज़ चोदो…”
मैंने उसकी कमर पकड़ी, नीचे से कमर उठाई, उसका साथ दिया। वो और गहरा चोदने लगा, मेरी चूचियाँ हिल रही थीं, उसने पकड़ी, कसकर, नोचा। “ये चूची मेरी है,” उसने कहा।
“हाँ… तुम्हारी… सब कुछ तुम्हारा…”
फिर वो झुका, मुझे चूमा, गहरा, जीभ अंदर, और मैं… मैं झड़ने लगी। पहली बार, किसी के लंड से, मेरी चूत ने पानी छोड़ा, गरम, गीला, और वो भी झड़ गया, मेरी चूत के अंदर, अपना गरम पानी, अपना वीर्य, मेरी कुंवारी चूत में।
हम दोनों लेटे, साँसें तेज़, पसीने में भीगे हुए। उसका लंड अभी भी मेरी चूत में था, मोटा, गर्म, और मेरी चूत… अब कुंवारी नहीं, अब उसकी थी।
“कैसा लगा?” उसने पूछा, मेरी चूची सहलाते हुए।
“पहले दर्द हुआ,” मैंने कहा, “फिर… फिर मज़ा आया।”
“अब रोज़ मज़ा आएगा,” उसने कहा, “जब तक मैं यहाँ हूँ, रोज़ तुम्हारी चूत चोदूँगा।”
मैंने मुस्कुराया, उसे गले लगाया, और उस रात, हमने तीन बार किया। एक बार sofa पर, एक बार bathroom में, और एक बार मेरे बिस्तर पर। हर बार, वो धीरे शुरू करता, फिर तेज़, और मैं… मैं चिल्लाती, “और… और… मेरी चूत फाड़ दो…”
अब वो दिल्ली गया है, 3 महीने बाद आएगा। पर मेरी चूत… अब कुंवारी नहीं, अब उसकी है, और हर रात मैं उसी के लंड का ख्याल करके अपनी चूत सहलाती हूँ, 3 महीने तक, जब तक वो वापस ना आए, और फिर से मेरी चूत को अपना बनाए।
