Hello दोस्तों, मेरा नाम आरव है, मैं 24 साल का हूँ, मुंबई का रहने वाला हूँ। मैं अकेला रहता हूँ, अपने पापा के छोड़े हुए 2 BHK फ्लैट में। मम्मी का देहांत हो गया जब मैं 18 साल का था, पापा दो साल पहले चल बसे। मैं एक IT कंपनी में काम करता हूँ, रोज़ सुबह निकलता हूँ, रात को आता हूँ, और अपना लंड हिलाकर सो जाता हूँ। कुंवारा हूँ, कभी किसी लड़की के साथ कुछ नहीं किया, बस पॉर्न देखकर हिलाता रहा हूँ।
फिर वो आई। लैला भाभी। मेरी नई पड़ोसन।
वो शिफ्ट हुई थी मेरे बगल के फ्लैट में। मैंने सुना था कोई नया किरायेदार आया है, पर मिला नहीं था। एक शाम, दरवाज़े की घंटी बजी। खोला तो… मेरी साँसें रुक गईं।
लंबे काले बाल, गोरा चेहरा, भूरी आँखें, और वो होंठ… मोटे, गुलाबी, किसी को चूसने के लिए बने। उसने साड़ी पहनी थी, हल्की सी, नीली, और वो चूचियाँ… 36D जैसी, इतनी बड़ी, इतनी कसी हुई, ब्लाउज से बाहर आने को तरस रही थीं। कमर इतनी पतली, और नीचे… वो गांड, साड़ी में से ऐसे मटक रही थी जैसे दो गोले कपड़े में बाँधे हों।
“हलो, मैं लैला, नई पड़ोसन।” उसने मुस्कुराते हुए कहा, आवाज़ इतनी मीठी, इतनी पतली।
“हाँ… हाँ… मैं आरव…” मैं हकलाया, आँखें उसकी चूचियों पर टिकी हुईं।
“अच्छा सुनो, थोड़ी चीनी मिलेगी? शिफ्टिंग में सब कुछ उल्टा पड़ा है, किचन का सामान नहीं मिल रहा।”
“हाँ… हाँ… एक मिनट…” मैं भागा, चीनी का डिब्बा लाया, और जब उसे देने झुका, उसकी साड़ी का पल्लू थोड़ा सरका, उसकी क्लीवेज… गहरी, गोरी, चूचियों का ऊपरी हिस्सा, मेरा लंड तुरंत खड़ा हो गया। वो ले गई, मुस्कुराई, और चली गई, पर पलटकर देखा, मेरी पैंट में उभार, और एक शरारती मुस्कान दी।
मैं उसी रात तीन बार हिलाया। उसकी चूचियों का ख्याल लेकर, उसकी गांड का ख्याल लेकर।
उसके बाद वो हर हफ्ते आती। कभी चीनी, कभी तेल, कभी नमक, कभी दूध। हर बाना, हर बहाना। और हर बार वो कुछ ऐसा करती जो मेरा लंड खड़ा कर दे।
एक दिन वो आई, सूखी मिर्च लेने। मैं किचन से निकला, देने गया। उसने ली, और जानबूझकर झुकी, मुझे अपनी चूचियों का पूरा नज़ारा दिया। ब्लाउज का गला चौड़ा, ब्रा का किनारा, और वो गोरा मांस… मैं रुक गया, देखता रहा।
“क्या देख रहे हो आरव?” उसने पूछा, शर्माते हुए भी मुस्कुरा रही थी।
“कुछ नहीं… वो… आपकी…” मैं हकलाया।
“मेरी क्या?” उसने आँखें बड़ी कीं, निर्दोष बनकर।
“कुछ नहीं… भाभी…” मैंने कहा।
“भाभी?” वो हँसी, “मैं तुमसे सिर्फ 8 साल बड़ी हूँ, और तुम मुझे भाभी बुला रहे हो?”
“आप शादीशुदा हैं…” मैंने कहा।
“हाँ, मेरे हसबैंड अमित हैं, बैंक में काम करते हैं, रोज़ सुबह निकलते हैं, रात को दस बजे आते हैं।” उसने बताया, फिर धीरे से कहा, “घर में अकेलापन बहुत है आरव।”
मैं कुछ नहीं बोला, पर मेरा लंड बोल रहा था, खड़ा होकर, पैंट में काँप रहा था।
एक दिन, दोपहर को, मेरे दरवाज़े पर ज़ोर-ज़ोर से खटखटाहट। खोला तो लैला, रो रही थी, चेहरा लाल, साँसें तेज़।
“आरव… प्लीज़… मुझे हॉस्पिटल ले चलो… मेरे पेट में बहुत दर्द हो रहा है… अमित का फोन नहीं लग रहा… वो मीटिंग में होंगे…”
“हाँ… हाँ… चलिए…” मैंने कहा, जल्दी से चाबी उठाई, और हम निकले।
गाड़ी में, वो बैठी मेरे बगल में, अपने हाथ मेरे हाथ पर रखे, “थैंक यू आरव… तुम नहीं होते तो पता नहीं क्या होता…”
“कोई बात नहीं… आप मेरी पड़ोसन हैं…” मैंने कहा, पर मेरी आँखें उसकी चूचियों पर थीं, जो हर साँस के साथ ऊपर-नीचे हो रही थीं।
हॉस्पिटल में, मैंने उसका सब काम किया। फॉर्म भरा, डॉक्टर से बात की, दवाई ली। वो देखती रही, मुझे, मेरी आँखों में, कुछ अलग तरीके से।
वापस आते वक्त, गाड़ी में, उसने कहा, “आरव, तुम बहुत अच्छे हो… अमित को भी तुमसे सीखना चाहिए… वो तो कभी मेरा ध्यान ही नहीं रखते…”
“भाभी…” मैंने कहा।
“लैला,” उसने मेरा हाथ पकड़ा, “मुझे लैला बुलाओ…”
“लैला…” मैंने धीरे कहा, और उसका हाथ मेरे हाथ में, गर्म, नरम, और कुछ कह रहा था जो शब्दों में नहीं था।
उसके बाद वो और भी बार आने लगी। और हर बार, कुछ अलग। कभी मेरी शर्ट ठीक करती, कभी मेरे बालों में हाथ फेरती, कभी मेरे कंधे पर सिर रखकर बैठती।
एक दिन वो आई, चाय पीने का बहाना। हम बैठे, सोफे पर, इतने पास कि उसकी जाँघ मेरी जाँघ से सटी। उसने साड़ी का पल्लू हटाया, उसकी चूचियाँ और उभरी, और वो मेरी तरफ झुकी, कुछ बोलने के लिए, उसके होंठ मेरे कान से टकराए।
“आरव…” उसने फुसफुसाया, “तुम मुझे अच्छे लगने लगे हो…”
मैं काँप उठा, “लैला… आप शादीशुदा हैं…”
“हाँ,” उसने कहा, “पर मेरी चूत कुंवारी है… अमित ने आज तक ठीक से चोदा नहीं… वो तो दो मिनट में झड़ जाते हैं…”
मैंने साँस रोके, ये सुनकर। उसकी चूत, गीली, भूखी, और मेरे लंड का इंतज़ार कर रही थी।
“मैं… मैं…” मैं कुछ कह नहीं पाया।
वो उठी, मेरे गाल पर किस किया, और चली गई, “सोचो आरव… मैं इंतज़ार करूँगी…”
दो दिन बाद। मैंने जाना, उसके घर में कोई नहीं है। अमित तो बैंक गए होंगे, लैला अकेली। मैंने दरवाज़ा खटखटाया, कोई आवाज़ नहीं। दरवाज़ा खुला था, मैं अंदर आया।
“लैला…” मैंने आवाज़ लगाई।
कोई जवाब नहीं। फिर किचन से आवाज़ आई, पानी गिरने की, बर्तनों की। मैं किचन की तरफ बढ़ा, और रुक गया।
लैला, पीठ मेरी तरफ, साड़ी कमर में बाँधी हुई, ब्लाउज हटाया हुआ, सिर्फ ब्रा में। उसकी पीठ, गीली, पसीने से चमकती हुई, उसकी कमर इतनी पतली, और नीचे… वो गांड, साड़ी में से ऐसे मटक रही थी जैसे मुझे बुला रही हो।
“लैला…” मैंने फिर से कहा, आवाज़ काँप रही थी।
वो पलटी, ब्रा में, चूचियाँ उभरी हुईं, पसीने से चमकती हुईं, “आरव… तुम… तुम यहाँ कैसे…”
“दरवाज़ा खुला था…” मैंने कहा, आँखें उसकी चूचियों पर, उसकी गांड पर, उसकी गीली पीठ पर।
“मैं… मैं किचन का काम कर रही थी… बहुत गर्मी लग रही थी…” उसने कहा, शर्माते हुए भी मेरी आँखों में देख रही थी।
“बहुत… बहुत खूबसूरत लग रही हो…” मैंने कहा, और मुझे पता नहीं क्या हुआ, मैं आगे बढ़ा, उसके पास गया, उसकी गीली पीठ पर हाथ रख दिया।
वो काँप उठी, “आरव… ये… ये सही नहीं है…”
“तुमने कहा था…” मैंने कहा, उसकी पीठ सहलाते हुए, “तुम्हारी चूत कुंवारी है… मैं उसे अपना बनाना चाहता हूँ…”
वो मुड़ी, मेरी तरफ, उसकी चूचियाँ मेरी chest से सटीं, “तुम… तुम सच में…”
“हाँ…” मैंने कहा, उसकी कमर पकड़ी, “मैं तुम्हें चोदना चाहता हूँ लैला… मेरे मोटे लंड से… तुम्हारी कुंवारी चूत फाड़ना चाहता हूँ…”
उसने मेरी आँखों में देखा, साँसें तेज़, होठ थोड़े खुले, फिर… मुस्कुराई, शरारती, प्यासी, “तो फिर… दो दिन बाद… अमित दो दिन के लिए बैंक के टूर पर जा रहे हैं… घर में सिर्फ मैं…”
“मैं आऊँगा…” मैंने कहा, उसके होंठों पर अपने होंठ रखे, एक हल्का किस, और वो काँप उठी, मेरे बालों में हाथ डाला, और और पास खींच लिया।
“आओ आरव…” उसने फुसफुसाया, “मेरी कुंवारी चूत तुम्हारा इंतज़ार कर रही है… मेरे मोटे लंड से उसे फाड़ दो…”
मैंने उसकी गांड पर थप्पड़ मारा, “रांड… दो दिन बाद तेरी चूत का भोसड़ा बना दूँगा…”
वो हँसी, “हाँ… बना दो… मैं तुम्हारी रांड बनने के लिए तरस रही हूँ…”
वो दो दिन मैंने कैसे गुज़ारे, पता नहीं। ऑफिस में बैठा रहता, लैला का ख्याल आता, मेरा लंड खड़ा हो जाता। बाथरूम में जाकर हिलाता, पर मन नहीं भरता था। उसकी गीली पीठ, उसकी गोरी गांड, उसकी भूरी आँखों में वो प्यास… सब याद आता रहता।
फिर वो दिन आया। शाम को छह बजे, मैंने फोन किया लैला को।
“अमित चले गए?” मैंने पूछा, आवाज़ काँप रही थी।
“हाँ… सुबह ही निकले… अब घर में सिर्फ मैं हूँ…” उसकी आवाज़ में वही प्यास थी, वही शरारत, “आ जाओ आरव… मेरी चूत तुम्हारा इंतज़ार कर रही है…”
मैंने फोन रखा, गाड़ी निकाली, और दस मिनट में उसके घर पहुँचा। दरवाज़ा खुला था, मैं अंदर आया, और रुक गया।
लैला… वो क्या लग रही थी। लाल रंग की नाइटी, इतनी पतली, इतनी छोटी कि उसकी जाँघें साफ दिख रही थीं, नीचे से उसकी पैंटी का किनारा, सफेद, गोरी जाँघों पर। नाइटी का गला इतना चौड़ा कि उसकी चूचियाँ, आधी बाहर, क्लीवेज गहरी, गोरी, चूसने को तरस रही थीं। बाल खुले, गीले, अभी नहाकर आई थी शायद, और खुशबू… इतनी मीठी, इतनी नशीली।
“आ गए मेरे शेर…” उसने मुस्कुराते हुए कहा, “आज मैं तुम्हारी हूँ… पूरी तरह…”
मैंने कुछ नहीं कहा, बस उसकी तरफ बढ़ा। उसने मेरा हाथ पकड़ा, अपने बेडरूम में ले गई। वहाँ… वहाँ मैंने देखा, बेड पर लाल चादर बिछी थी, कैंडल जल रही थीं, और एक बोतल वाइन।
“आज मेरी सुहागरात होगी आरव…” उसने कहा, मेरे कान में फुसफुसाते हुए, “असली सुहागरात… अमित ने तो कभी ये नहीं दी…”
मैंने उसे पकड़ा, कसकर, उसकी कमर में हाथ डाला, और उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए। पहले धीरे, फिर गहरा, जीभ अंदर, उसकी जीभ से मिली, और वो काँप उठी, मेरे बालों में हाथ डाला, मुझे और पास खींच लिया।
“ऊह्ह… आरव… और… और गहरा…” उसने कराहा।
मैंने उसकी नाइटी उतारी, एक ही झटके में। वो सामने खड़ी थी, सिर्फ सफेद पैंटी और ब्रा में। उसकी चूचियाँ, 36D, गोरी, कसी हुई, ब्रा से बाहर आने को तरस रही थीं। उसकी कमर, इतनी पतली, उसकी नाभि, गहरी, और नीचे… वो पैंटी, गीली, उसकी चूत का आकार साफ दिख रहा था, उभरी हुई, भूखी।
“तुम… तुम बहुत खूबसूरत हो…” मैंने कहा, उसकी ब्रा के ऊपर से चूची दबाई।
“आह्ह… और ज़ोर से…” उसने कहा, “अमित कभी ऐसे नहीं दबाते…”
“आज से अमित भूल जाओ…” मैंने कहा, उसकी ब्रा खोली, और उसकी चूचियाँ बाहर आईं, गोरी, गोल, निप्पल गुलाबी, खड़े। मैंने एक चूची मुँह में ली, चूसा, काटा, नोचा।
“ऊउउह्ह… आरव… मेरी माँ… इतना मज़ा… पहले कभी नहीं…” वो चीखी, मेरे सिर को अपनी चूची पर दबाया।
मैंने दूसरी चूची हाथ में ली, कसकर दबाया, नोचा, और चूसता रहा। उसका हाथ मेरी पैंट पर गया, मेरे लंड को पकड़ा, बाहर से ही सहलाया।
“इतना मोटा…” उसने कहा, आँखें बड़ी करके, “मैंने कभी नहीं देखा… अमित का तो आधा है…”
“आज इसी से चुदोगी…” मैंने कहा, उसकी पैंटी नीचे की।
उसकी चूत सामने आई, पहली बार। बिल्कुल साफ, गोरी, गीली, चूत के होठ फूले हुए, गुलाबी, और बीच में वो दरार, जो मेरे लंड को बुला रही थी। मैंने उँगली फेराई, वो काँप उठी, “आह्ह… वहीं…”
“कितनी गीली है रांड…” मैंने कहा, “कितने दिनों से भूखी है?”
“सालों से…” उसने कहा, “आज भर दो… मेरी चूत को…”
मैंने उसे बेड पर धक्का दिया, वो लेट गई, पैर फैलाए, चूत सामने, गीली, चमकती हुई। मैंने अपने कपड़े उतारे, एक-एक करके। शर्ट, पैंट, अंडरवियर। और मेरा लंड बाहर निकला, 8 इंच लम्बा, मोटा, लाल, नसों से भरा हुआ, टिप से पानी टपकता हुआ।
लैला ने देखा, आँखें बड़ी, होठ खुले, “ये… ये तो बहुत बड़ा है… मेरी चूत में जाएगा?”
“जाएगा…” मैंने कहा, उसके पास गया, “और तेरी चूत का भोसड़ा बना देगा…”
मैंने उसके पैर कंधे पर रखे, लंड हाथ में लिया, और उसकी चूत के मुँह पर रखा। गीली थी, गर्म थी, और इतनी टाइट कि मुँह में जाने को तरस रहा था। मैंने धक्का दिया, आधा अंदर गया, और वो चीखी, “आह्ह्ह… फट गई… मेरी चूत फट गई…”
“सहन करो रांड…” मैंने कहा, और और धक्का दिया, पूरा अंदर। उसकी आँखों से आँसू निकले, दर्द से, और मैं रुका, उसके होंठ चूसे, उसकी चूची सहलाई।
“ठीक है?” मैंने पूछा।
“हाँ…” उसने कहा, साँसें तेज़, “अब… अब चोदो… ज़ोर से…”
मैंने चोदना शुरू किया, धीरे, फिर तेज़, फिर ज़ोर से। वो चिल्लाती रही, “आह्ह… आह्ह… और तेज़… और ज़ोर से… मेरी चूत फाड़ दो…”
मैंने पकड़ी उसकी चूचियाँ, कसकर, नोचा, और चोदता रहा। चप चप की आवाज़, उसकी चूत से पानी निकल रहा था, गीली होती जा रही थी। “ये चूत किसकी है?” मैंने पूछा, ज़ोर से धक्का मारते हुए।
“तुम्हारी…” उसने चिल्लाया, “सिर्फ तुम्हारी… आरव की रांड हूँ मैं… चोदो मुझे… रोज़ चोदो…”
मैंने उसे घुमाया, कुत्ते की तरह घुटनों पर लाया। उसकी गांड सामने, गोरी, गोल, और चूत पीछे से दिख रही थी, गीली, लाल, फैली हुई। मैंने पीछे से डाला, एक ही धक्के में पूरा अंदर।
“आह्ह्ह… मेरी माँ…” वो चीखी, “इतना गहरा… पहले कभी नहीं गया…”
“यही तुम्हें चाहिए था ना…” मैंने कहा, उसकी कमर पकड़ी, और पीछे से चोदने लगा। चप चप, पच पच, उसकी चूत से पानी बह रहा था, मेरे लंड पर, मेरी जाँघों पर।
“हाँ… यही… यही चाहिए था…” वो चिल्लाई, “अमित कभी ऐसे नहीं चोदते… तुम… तुम मर्द हो… असली मर्द…”
मैंने उसकी गांड पर थप्पड़ मारा, लाल निशान छोड़ दिया। “ये गांड किसकी है?”
“तुम्हारी… सिर्फ तुम्हारी…”
“ये चूत किसकी है?”
“तुम्हारी… चोदो… और चोदो… मेरी चूत का भोसड़ा बना दो…”
मैंने और तेज़ चोदा, उसकी चूचियाँ हिल रही थीं, मैंने आगे झुककर पकड़ी, कसकर, और अंत में, जब वो झड़ी, “आह्ह्ह… आरव… मैं झड़ गई… पहली बार… पहली बार किसी से झड़ी हूँ…”
मैंने भी अपना लंड बाहर निकाला, उसकी गांड पर, उसकी पीठ पर, और उसके बालों में झड़ दिया। गरम, गाढ़ा, बहुत सारा।
हम दोनों लेटे, साँसें तेज़, पसीने में भीगे हुए। उसकी चूत से पानी बह रहा था, मेरा वीर्य उसकी पीठ पर बह रहा था। मैंने उसे पकड़ा, उसके होंठ चूसे।
“कैसा लगा?” मैंने पूछा।
“पहली बार…” उसने कहा, आँखों में आँसू, “पहली बार मैं औरत बनी हूँ…”
“अब रोज़ बनूँगी…” मैंने कहा, उसकी चूची सहलाते हुए।
“हाँ…” उसने मुस्कुराया, “रोज़… अमित के जाने के बाद… तुम आना… और मेरी चूत चोदना…”
मैंने उसके होंठों पर किस किया, और उस रात, हमने दो बार और किया। एक बार बाथरूम में, और एक बार सुबह, जब वो नहा रही थी, मैंने पीछे से आकर उसकी गीली चूत फिर से चोदी।
अब हर हफ्ते, जब अमित बैंक के टूर पर जाते हैं, मैं जाता हूँ, और लैला… मेरी रांड… मेरी भाभी… मुझे अपनी चूत देती है। और मैं… मैं उसकी चूत का भोसड़ा बनाता हूँ, हर बार, हर रात।
