मेरा नाम आदित्य है। उस वक्त उम्र उन्नीस साल की थी। जयपुर में रहते थे हम। पिताजी एक प्राइवेट कंपनी में मैनेजर थे और माँ स्कूल में टीचर। दोनों सख्त थे। घर का माहौल पढ़ाई और अनुशासन वाला। दीदी भवना उम्र में मुझसे तीन साल बड़ी थीं। बाइस साल की। सरकारी नौकरी की तैयारी कर रही थीं। दिन-रात किताबों में डूबी रहतीं, लेकिन उनका अंदाज घर में सबसे अलग था। (sister hindi sex story)
भवना दीदी को देखकर कोई भी एक बार जरूर रुक जाता। लंबा कद नहीं था, लेकिन जिस्म ऐसा था कि साड़ी या सूट में भी साफ नजर आता। गोरा रंग, भारी स्तन जो कपड़ों में भी अपना आकार दिखाते, पतली कमर और गोल-मटोल गांड जो चलते समय हिलती थी। बाल लंबे और घने। आँखों में एक ऐसी चमक थी जैसे वो किसी से डरती न हों। घर में वो सबसे ज्यादा बोल्ड थीं। माँ-बाप के सामने भी अपनी बात रख देतीं। कई लड़कों से बातें होती थीं, कुछ रिश्ते भी चले थे, लेकिन कोई लंबा नहीं टिका। वो खुद कहती थीं कि वो किसी के काबू में आने वाली नहीं।
मुझे नया मोबाइल चाहिए था। पुराना फोन बार-बार हैंग होने लगा था। पिताजी से कहा तो सीधा मना कर दिया। “पढ़ाई पर ध्यान दे, फोन बाद में।” माँ ने भी समर्थन किया। जेब में पैसे नहीं थे। कॉलेज में सीनियर प्रताप शेखावत की बातें सुन रखी थीं। लंबा, मजबूत शरीर, कॉलेज में उसका रौब था। छोटे लड़कों को पैसे उधार देता था और ब्याज समेत वसूलता था। मैंने हिम्मत करके उससे बात की। पाँच हजार माँगे। उसने बिना ज्यादा पूछे दे दिए। “दो हफ्ते में वापस कर देना। नहीं तो…” उसने अधूरी बात छोड़ी थी।
दो हफ्ते बीत गए। मेरे पास पैसे नहीं जुटे। प्रताप ने मैसेज करना शुरू कर दिया। पहले हल्के, फिर तीखे। एक दिन कॉलेज के पीछे वाले कोने में पकड़ लिया। उसके दो साथी भी थे। उसने मेरा कॉलर पकड़ा और कहा, “पैसे कहाँ हैं?” (didi ki chudai)
मैंने हकलाते हुए कहा कि अभी नहीं हैं।
प्रताप हँसा। “तो फिर तेरी बहन को चोद दूँगा। सुना है बड़ी गरम है। देखूँगा कितनी गरम है।”
उसके साथी हँस पड़े। मैं काँप गया। घर आकर रात भर नींद नहीं आई। सुबह दीदी किताबें लगा रही थीं। मैं उनके कमरे के दरवाजे पर खड़ा रहा। फिर सब बता दिया। उधार, धमकी, सब।
भवना दीदी ने किताब बंद की। उनकी भौंहें तन गईं। “उसने क्या कहा?”
मैंने दोहराया। “तेरी बहन को चोद दूँगा।”
दीदी की आँखों में गुस्सा था, लेकिन डर नहीं। उन्होंने कुर्सी से उठकर कहा, “कपड़े पहन। चल उसके घर।”
मैंने मना किया। “दीदी, झगड़ा हो जाएगा।”
“झगड़ा नहीं। बात होगी।” उनकी आवाज में फैसला सुनाई दिया।
प्रताप किराए के फ्लैट में रहता था, कॉलेज के पास वाली कॉलोनी में। दूसरी मंजिल। दीदी ने दरवाजा खटखटाया। प्रताप खुद खोला। जब उसने दीदी को देखा तो उसकी आँखें एक पल के लिए बड़ी हो गईं। फिर मुस्कुराया। “आदित्य की बहन? अंदर आओ।”
कमरा छोटा था। एक बेड, सोफा, और खिड़की से आने वाली धूल भरी रोशनी। दीदी अंदर घुसीं। मैं पीछे-पीछे। प्रताप ने दरवाजा बंद नहीं किया। अधखुला छोड़ दिया। शायद जानबूझकर।
दीदी ने सीधा पूछा, “तुमने मेरे भाई से कहा था कि उसकी बहन को चोदोगे?”
प्रताप हँसा। “पैसे नहीं लौटाए तो क्या करता? धमकी तो देनी पड़ती है।”
“धमकी नहीं। तुमने कहा था।” दीदी ने एक कदम आगे बढ़ाया। “अब बताओ, तुम्हारे लंड में कितना दम है जो मेरी बात करते हो?”
प्रताप की मुस्कान थोड़ी तिरछी हो गई। उसने दीदी को ऊपर से नीचे तक देखा। “बहुत बोल्ड हो। आदित्य ने सही कहा था।”
दीदी ने अपना दुपट्टा सोफे पर फेंका। “देखते हैं कितना बोल्ड हूँ। या सिर्फ बातें बनाता है।”
मैं दरवाजे के पास खड़ा था। अंदर की बातें साफ सुनाई दे रही थीं। मेरा दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। मैं हटने की सोच रहा था, लेकिन पैर नहीं हिल रहे थे।
प्रताप ने दीदी का हाथ पकड़ने की कोशिश की। दीदी ने झटका दिया। “पहले अपनी औकात दिखा। बातें मत बना।”
प्रताप ने उन्हें दीवार की तरफ धकेला। दीदी की पीठ दीवार से लगी। प्रताप उनके बहुत करीब आ गया। “औकात दिखाता हूँ।”
उसने दीदी के होंठों पर किस किया। दीदी ने पहले प्रतिरोध किया, फिर जवाब दिया। उनकी साँसें तेज हो गईं। प्रताप के हाथ उनकी कमर पर थे। फिर ऊपर बढ़कर उनके स्तनों को कपड़ों के ऊपर से दबाया। दीदी की आवाज निकली, “जोर से… अगर करना है तो ठीक से कर।”
मैंने दरवाजे की दरार से देखा। प्रताप दीदी की कुर्ती ऊपर कर रहा था। उनके स्तन ब्रा में कैद थे। प्रताप ने ब्रा के हुक खोले। स्तन बाहर आ गए। भारी, गोल, और निपल्स पहले से सख्त। प्रताप ने एक को मुँह में लिया और जोर से चूसा। दीदी ने उसका सिर पकड़ लिया। “काट… हल्का काट।”
मेरे पेट में अजीब सा घुटन हो रहा था। मैं देखना नहीं चाहता था, लेकिन आँखें हट नहीं रही थीं। प्रताप ने दीदी की सलवार का नाड़ा खोला। सलवार नीचे सरक गई। पैंटी दिखी। काली, पतली। प्रताप ने पैंटी के ऊपर से हाथ रखा और दबाने लगा। दीदी की कमर हिली। “अंदर… उंगली डाल।”
प्रताप ने पैंटी साइड की और दो उंगलियाँ अंदर कर दीं। दीदी की आवाज बदल गई। “आह… और जोर से…”
प्रताप उंगलियाँ अंदर-बाहर करने लगा। गीली आवाज आने लगी। दीदी की एक टांग उसके कूल्हे पर चढ़ गई। “अब लंड निकाल। बातें बहुत हो गईं।”
प्रताप ने अपनी जींस खोली। लंड बाहर आया। मोटा और कड़ा। दीदी ने देखा और मुस्कुराई। “इतना ही? चल फिर भी देखती हूँ।”
उन्होंने खुद घुटनों के बल बैठकर लंड अपने मुँह में ले लिया। जोर-जोर से चूसने लगीं। गले तक ले जा रही थीं। प्रताप का हाथ उनके बालों में था। “साली… कितनी गंदी है।”
दीदी ने लंड निकाला और थूक लगाकर फिर से मुँह में लिया। “गंदी हूँ तो चोद। सिर्फ मुँह क्यों चूसवा रहा है?”
प्रताप ने उन्हें उठाया और बेड पर धकेल दिया। दीदी चित लेट गईं। टांगें फैला दीं। प्रताप उनके ऊपर चढ़ गया। लंड को चूत पर रखा और एक धक्के में अंदर कर दिया।
दीदी चीखी। “आह्ह… मोटा है… और अंदर तक…”
प्रताप ने धक्के शुरू कर दिए। जोर-जोर से। बेड की आवाज आने लगी। दीदी गालियाँ देने लगीं। “चोद… जोर से चोद… अपनी औकात दिखा… रांड बना के चोद मुझे…”
मैं दरवाजे के पीछे खड़ा काँप रहा था। अंदर की हर आवाज साफ आ रही थी। दीदी की चीखें, प्रताप की साँसें, शरीर की टकराहट। मैं भागना चाहता था, लेकिन पैर जैसे जड़ हो गए थे।
प्रताप ने दीदी की टांगें अपने कंधों पर रख लीं और और गहराई तक पेलने लगा। दीदी के नाखून उसकी पीठ पर रगड़ रहे थे। “और तेज… फाड़ दे… आज तू मेरी चूत का मालिक बन…”
मैंने आँखें बंद कर लीं, लेकिन आवाजें बंद नहीं हुईं।
प्रताप दीदी को जोर-जोर से पेल रहा था। बेड की चरमराहट और शरीर की टकराहट की आवाज कमरे में गूँज रही थी। दीदी की टांगें उसके कंधों पर थीं। हर धक्के के साथ उनकी आवाज निकल रही थी।
“आह्ह… और गहरा… फाड़ दे साले… मेरी चूत फाड़ दे…”
मैं दरवाजे की दरार से देख रहा था। आँखें फटी की फटी रह गई थीं। दीदी, जो घर में मुझे डाँटती थीं, किताबें पढ़ने बैठती थीं, आज बिल्कुल अलग लग रही थीं। उनके बाल बिखरे हुए थे, मुँह से गालियाँ निकल रही थीं, और शरीर प्रताप के नीचे कराह रहा था।
प्रताप ने अचानक दीदी को पलट दिया। अब वो घोड़ी बन गई थीं। घुटनों और हथेलियों के बल। प्रताप ने पीछे से लंड फिर से अंदर कर दिया। इस बार और जोर से। उसकी हथेलियाँ दीदी की गांड पर थीं। वह उन्हें फैलाकर देख रहा था और धक्के मार रहा था।
“साली रांड… कितनी गीली है तू… भाई के सामने चोदवा रही है…”
दीदी ने पीछे मुड़कर देखा। उनकी आँखें मुझ तक नहीं पहुँचीं, लेकिन आवाज साफ थी। “चुप रह के चोद… बातें मत बना… जोर से पेल…”
प्रताप ने उनकी चोटी पकड़ ली और खींचते हुए पेलने लगा। दीदी का सर ऊपर उठ गया। उनके स्तन हवा में हिल रहे थे। मैंने देखा कि उनके निपल्स कितने सख्त हो चुके थे। पसीना उनकी पीठ पर चमक रहा था।
मैंने अपना मुँह दबा रखा था। अंदर कुछ घुट रहा था। गुस्सा था, शर्म थी, और उसके नीचे एक अजीब सी बेचैनी जो मैं समझ नहीं पा रहा था। मैं वहाँ से हटना चाहता था, लेकिन शरीर जैसे जड़ हो गया हो।
प्रताप ने दीदी को फिर चित कर दिया। इस बार उसने उनकी दोनों टांगें फैला दीं और खुद उनके बीच बैठ गया। लंड को चूत के मुँह पर रखकर रगड़ने लगा, फिर एक झटके में पूरा अंदर कर दिया। दीदी ने तकिया दबा लिया।
“आह्ह… मोटा लंड… मेरी चूत को चीर रहा है… और तेज… बिल्कुल अंदर तक…”
प्रताप झुककर उनके स्तनों को मुँह में लेने लगा। एक को चूसता, दूसरे को मसलता। दीदी के हाथ उसके बालों में उलझ गए। “काट… हल्का काट… अच्छा लग रहा है…”
मैंने देखा कि दीदी खुद कमर उठा-उठाकर उसके धक्कों का जवाब दे रही थीं। उनकी चूत से गीली आवाज आ रही थी। प्रताप के लंड पर उनकी चमक दिख रही थी।
थोड़ी देर बाद प्रताप ने लंड निकाला। दीदी की चूत खुली हुई थी, लाल और गीली। उसने दीदी के मुँह के पास लंड लाया। “चूस… अपने भाई के कर्ज का स्वाद चख…”
दीदी ने बिना हिचकिचाहट मुँह खोला। लंड अंदर चला गया। वे जोर-जोर से चूसने लगीं। गले तक ले जा रही थीं। लार उनकी ठुड्डी से टपक रही थी। प्रताप उनके बाल पकड़े हुए धक्के मार रहा था। “गला खोल… पूरी तरह ले…”
मैंने नजरें हटा लीं। दीवार की तरफ देख रहा था, लेकिन आवाजें बंद नहीं हो रही थीं। चूसने की आवाज, प्रताप की साँसें, दीदी की गले से निकलती हुई आवाजें।
फिर प्रताप ने दीदी को फिर से बेड पर लिटाया। इस बार उसने उनकी टांगें अपने कंधों पर रखीं और बहुत तेज गति से पेलने लगा। बेड दीवार से टकराने लगा। दीदी चीख रही थीं।
“चोद… रांड बना के चोद… आज तू मेरी चूत का मालिक… आह्ह… झड़ने वाली हूँ…”
प्रताप के धक्के और तेज हो गए। दीदी का शरीर अकड़ गया। उनकी जाँघें काँपने लगीं। एक लंबी सिसकी निकली और वे ढीली पड़ गईं। प्रताप ने कुछ और जोरदार धक्के मारे और फिर उनके अंदर ही रुक गया। उसकी कमर काँप रही थी। उसने लंबी साँस छोड़ते हुए कहा, “ले… तेरे भाई का कर्ज…”
दोनों कुछ देर तक वैसे ही पड़े रहे। पसीने से भीगे हुए। प्रताप का लंड अभी भी अंदर था। धीरे-धीरे उसने निकाला। सफेद तरल दीदी की जाँघों पर बहने लगा।
प्रताप बैठ गया। साँसें सामान्य करने की कोशिश कर रहा था। दीदी भी उठीं। उनके बाल चेहरे पर चिपक रहे थे। उन्होंने प्रताप की तरफ देखा और कहा, “पैसे… अब?”
प्रताप हँसा। “पैसे नहीं लेने। आदित्य का कर्ज माफ। लेकिन…” उसने दीदी की जाँघ पर हाथ रखा। “तू मुझे अपनी चूत से चुकाएगी। जब मैं कहूँगा, तू आएगी। समझी?”
दीदी चुप रहीं। फिर धीरे से सिर हिलाया। “ठीक है। लेकिन मेरे भाई को मत छूना। एक भी उंगली लगाई तो…”
प्रताप मुस्कुराया। “नहीं लगाऊँगा। तेरी चूत काफी है।”
मैंने इतना सुन लिया। मेरी छाती जोर-जोर से उठ-गिर रही थी। मैं वहाँ से खिसका और सीढ़ियों की तरफ चल दिया। पैर काँप रहे थे। नीचे आकर दीवार से लगकर खड़ा हो गया। आँखें बंद थीं।
थोड़ी देर बाद दीदी बाहर निकलीं। कपड़े पहन रखे थे, लेकिन बाल अभी भी बिखरे हुए थे। उन्होंने मुझे देखा। कुछ पल दोनों चुप रहे। फिर उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा।
“चल घर।”
रास्ते में कोई बात नहीं हुई। ऑटो में भी चुप्पी रही। घर पहुँचकर दीदी अपने कमरे में चली गईं। मैं अपने कमरे में जाकर बिस्तर पर गिर गया। कानों में अभी भी उनकी आवाजें घूम रही थीं। गालियाँ, सिसकियाँ, प्रताप की साँसें।
रात को खाने पर दीदी सामान्य लग रही थीं। माँ-बाप के सामने वही पुरानी भवना। लेकिन जब उनकी निगाह मुझ पर पड़ी तो एक पल के लिए रुक गईं। कुछ नहीं कहा।
बाद में मेरे कमरे में आईं। दरवाजा बंद करके बोलीं, “जो देखा, वो यहीं रहना चाहिए। किसी को नहीं बताना। और प्रताप के बारे में… तू अब उससे कोई बात मत करना। पैसे की जरूरत हो तो मुझसे माँगना।”
मैंने सिर हिलाया। आवाज नहीं निकली।
दीदी जाने से पहले दरवाजे पर रुकीं। बिना मुड़े बोलीं, “मैंने जो किया, अपने हिसाब से किया। तू छोटा है। समझ।”
दरवाजा बंद हो गया।
मैं अँधेरे में लेटा रहा। छत की तरफ देखते हुए। कानों में अभी भी वही आवाजें थीं। दीदी की गालियाँ, उनकी चीखें, और वो वाक्य जो प्रताप ने कहा था।
कर्ज माफ हो गया था।
