Hello दोस्तों, मेरा नाम अर्जुन है, मैं 23 साल का हूँ, दिल्ली का रहने वाला हूँ। MCA कर रहा हूँ, final year में। घर में मम्मी-पापा, एक बहन, और मैं। मेरी बुआ अवंतिका, पापा की बहन, 36 साल की, हमेशा से “सेक्सी पर सख्त” बुआ के नाम से मशहूर रही हैं। उनकी शादी को 12 साल हो चुके हैं, बुआ जी का नाम राजेश है, एक MNC में काम करते हैं, बहुत busy, महीने में एक बार आते हैं।
बुआ का figure… 36-30-38, गोरा रंग, लंबे काले बाल, और वो आँखें… भूरी, गहरी, जिनमें एक अजीब सी चमक रहती है। वो हमेशा साड़ी में रहती हैं, और साड़ी ऐसी कि कमर से नीचे गांड ऐसे मटकती है जैसे किसी ने चोद चोद के बड़े कर दिए हो। चूचियाँ इतनी बड़ी, इतनी कसी हुई, कि ब्लाउज से बाहर आने को तरस रही थीं। पर वो सख्त थीं, कभी किसी को घास नहीं डालती थीं, खासकर मुझे। “अर्जुन, पढ़ाई करो,” “अर्जुन, गंदी नज़रें मत घुमाओ,” ये उनकी फेवरेट लाइन्स थीं।
पर मैं… मैं हमेशा उन्हें देखता था। जब वो झुकतीं, साड़ी का पल्लू सरकता, चूचियों का क्लीवेज, गोरा, गहरा। जब वो चलतीं, गांड मटकती, साड़ी में से जाँघें झाँकतीं। मैंने हमेशा सोचा, काश एक बार… एक बार तो…
फिर वो दिन आया।
बुआ के घर में एक फंक्शन था, उनके ससुराल वालों की तरफ से, किसी की सगाई। पूरा खानदान जमा था, मम्मी-पापा, चाचा-चाची, सब। मैं भी गया, अपनी मम्मी के साथ। शाम को पार्टी शुरू हुई, सब नाच रहे थे, पी रहे थे, मस्ती कर रहे थे।
मैं कोने में बैठा था, drink हाथ में, बुआ को देख रहा था। बुआ ने आज लाल रंग की साड़ी पहनी थी, ब्लाउज का गला इतना गहरा कि चूचियों का आधा हिस्सा बाहर, निप्पल का किनारा साफ दिख रहा था। साड़ी नीचे से इतनी tight कि गांड की दोनों गोलाइयाँ अलग-अलग नज़र आ रही थीं। और वो नाच रही थीं… अपने हसबैंड के साथ, फिर चाचाओं के साथ, फिर अकेली।
जब अकेली नाचीं, तो सबकी नज़रें उन पर टिक गईं। साड़ी का पल्लू हवा में उड़ा, कमर हिली, गांड मटकी, और वो मुस्कुरा रही थीं, शराब के नशे में, आँखें लाल, चेहरा गुलाबी। मुझे देखा, और एक अजीब सी मुस्कान दी, जो मैंने पहले कभी नहीं देखी थी।
“अर्जुन, क्या देख रहा है?” मम्मी ने पूछा, पास आकर।
“कुछ नहीं मम्मी, बुआ को…” मैंने कहा।
“बुआ को?” मम्मी ने मुस्कुराते हुए कहा, “बुआ बहुत सुंदर हैं, है ना?”
“हाँ मम्मी…” मैंने कहा, नज़रें नहीं हटाईं।
रात हो गई, सब नशे में थे, कुछ सो गए, कुछ बाहर बैठे थे। मैं terrace पर गया, थोड़ी हवा खाने। terrace पर अंधेरा था, सिर्फ एक bulb जल रहा था, पीली रोशनी। मैं रेलिंग से सटा खड़ा था, नीचे की सड़क देख रहा था, जब आवाज़ आई।
“अर्जुन…”
मैंने पीछे देखा, बुआ। लाल साड़ी में, पल्लू कंधे से सरका हुआ, चूचियों का गोरा हिस्सा बाहर, आँखें लाल, नशे में, और मुस्कान… वो मुस्कान जो कुछ कह रही थी।
“बुआ, आप?” मैंने कहा, हकलाते हुए।
“मैं क्या? तुझे लगा सिर्फ तू ही यहाँ आएगा?” वो पास आईं, रेलिंग के पास, मेरे बगल में, इतने पास कि उनकी साड़ी मेरी जींस से सटी।
“नहीं बुआ, वो…” मैंने कहा।
“चुप,” वो बोलीं, और हवा में हाथ उठाया, “थंडी हवा है ना? मज़ा आ रहा है?”
“हाँ बुआ…” मैंने कहा।
“मुझे भी आ रहा है,” वो मुस्कुराईं, मेरी तरफ देखते हुए, “पर एक बात बता, तू मुझे अजीब क्यों देखता है?”
“मैं… नहीं…” मैंने हिचकिचाया।
“झूठ मत बोल,” वो बोलीं, और अचानक, उन्होंने अपनी साड़ी का पल्लू खींचा, कंधे से, और मैंने देखा… उनका ब्लाउज, पूरा, गहरा गला, चूचियाँ आधी बाहर, और वो मुस्कुरा रही थीं, “देख रहा है? अच्छा लग रहा है?”
मैं काँप उठा, “बुआ, ये… गलत है…”
“गलत?” वो हँसीं, नशे में, “आज कोई गलत सही नहीं है आरव… आज सिर्फ मैं हूँ, और तू है… और ये थंडी हवा…”
और वो रेलिंग पर बैठ गईं, पैर ऊपर उठाए, साड़ी को ऊपर किया, और मेरी आँखें बड़ी हो गईं। उनकी जाँघें, गोरी, मोटी, ऊपर तक, और बीच में… उनकी पैंटी, सफेद, गीली, चूत का shape साफ दिख रहा था, उभरी हुई, प्यासी।
“क्या देख रहा है?” वो बोलीं, पैर और फैलाए, “आज मैं तुझे अपनी टांगें फैला के दिखा रही हूँ… पहले कभी किसी ने दिखाई?”
मैंने सिर हिलाया, ना में, आँखें उनकी चूत पर टिकी हुईं।
“आ जा फिर,” वो मुस्कुराईं, और अपनी पैंटी को एक तरफ सरकाया, “आज बुआ की चूत तेरी है…”
मैंने देखा, उनकी चूत, गोरी, गीली, चूत के होठ मोटे, फूले हुए, और बीच में वो गुलाबी दरार, मुझे बुला रही थी। मेरा लंड खड़ा हो गया, पैंट में दर्द कर रहा था, और मैं… मैं पागल हो गया।
“बुआ…” मैंने कहा, आवाज़ में वो प्यास जो मैंने कभी नहीं महसूस की थी।
“चुप,” वो बोलीं, और मुझे अपनी ओर खींच लियां, “आज तू मुझे चोदेगा… यहीं, इसी terrace पर… और मैं… मैं तेरी रांड बनूँगी…”
बुआ ने मुझे अपनी ओर खींचा, इतनी ज़ोर से कि मैं उनके बीच में आ गया, उनकी फैली हुई टांगों के बीच, उनकी चूत के ठीक सामने। उनकी साँसें मेरे चेहरे पर गरम-गरम महसूस हो रही थीं, शराब की महक, और कुछ और भी, एक अजीब सी खुशबू, जो मुझे और पागल कर रही थी।
“क्या कर रहा है अर्जुन?” बुआ ने फुसफुसाया, मेरे कान में, “देख रहा है? कितनी गीली है?”
मैंने नीचे देखा, उनकी चूत, गुलाबी, गीली, चूत के होठ फूले हुए, और बीच में वो दरार से पानी टपक रहा था, चमक रहा था terrace की पीली बत्ती में। मेरा लंड पैंट में फटने को हो रहा था, इतना मोटा, इतना खड़ा, कि zip तक रुक रही थी।
“बुआ…” मैंने कहा, आवाज़ में काँपाहट, “मैं… मैं क्या करूँ?”
“पहले चूम,” वो बोलीं, और अपना हाथ मेरे सिर पर रखा, मुझे नीचे धकेलने लगीं, “चूम मेरी चूत को… 3 साल से कोई नहीं चूमा… राजेश तो आता ही नहीं… और जब आता है, तो 2 मिनट में सो जाता है…”
मैंने नीचे झुका, उनकी जाँघों के बीच, उनकी चूत के पास। खुशबू… इतनी तेज़, इतनी नशीली, मैं पागल हो गया। मैंने जीभ निकाली, पहले उनकी जाँघ पर चाटा, फिर ऊपर, उनके चूत के होठों पर, और वो काँप उठीं, “आह्ह… वहीं… वहीं…”
मैंने चूत को चाटना शुरू किया, धीरे-धीरे, जीभ से ऊपर-नीचे, कभी अंदर, कभी बाहर। वो पागल होती जा रही थीं, सिर पीछे, आँखें बंद, “ऊउउह्ह… अर्जुन… मेरे बेटे… इतना मज़ा… पहले कभी नहीं…”
मैंने उनकी चूत में उँगली डाली, एक, फिर दो, और अंदर-बाहर करने लगा। वो और तेज़ काँपने लगीं, “और… और तेज़… मेरी चूत फाड़ दे… आज मैं तेरी हूँ…”
मैंने चूमना जारी रखा, चूत को, clit को, कभी काटा, कभी चूमा, और वो झड़ने लगीं, पहली बार, मेरे मुँह में ही, पानी निकला, गरम, गाढ़ा, और मैंने पी लिया, सब कुछ।
“अब… अब तू…” बुआ ने कहा, साँसें तेज़, “अब तू अपना निकाल… मैं देखना चाहती हूँ… कितना बड़ा है…”
मैंने खड़ा हुआ, अपनी जींस की zip खोली, और मेरा लंड बाहर निकला, 7 इंच लम्बा, मोटा, लाल, खड़ा, टिप से पानी टपक रहा था। बुआ की आँखें बड़ी हो गईं, “ये… ये तो बहुत बड़ा है… राजेश का तो आधा है…”
“चाहिए बुआ?” मैंने पूछा, पहली बार इतना confident महसूस कर रहा था।
“हाँ…” वो बोलीं, और रेलिंग से उतरीं, घुटनों के बल बैठीं, और मेरा लंड अपने हाथ में पकड़ा, “बहुत मोटा है… मेरी चूत में जाएगा ये?”
“जाएगा…” मैंने कहा।
वो मुस्कुराईं, और मेरा लंड अपने मुँह में ले लिया, पूरा, एक ही बार में। मैं काँप उठा, “ऊह्ह… बुआ…”
वो चूसने लगीं, धीरे-धीरे, फिर तेज़, कभी ऊपर, कभी नीचे, और मेरा लंड उनके गले तक जा रहा था। मैंने उनके बाल पकड़े, और चोदने लगा उनका मुँह, धक्के मारने लगा।
“आह्ह… अर्जुन… और ज़ोर से…” वो मुँह से हटकर बोलीं, “मुझे… मुझे तू चोद… यहीं… इसी terrace पर…”
वो उठीं, रेलिंग के पास गईं, साड़ी को ऊपर किया, पैंटी नीचे की, और घुटनों के बल झुक गईं, गांड मेरी तरफ, उभरी हुई, गोरी, और बीच में वो चूत, गीली, खुली, मुझे बुला रही थी।
“आ जा…” वो पीछे मुड़कर बोलीं, “चोद मुझे… जितना ज़ोर से चाहे… आज मैं तेरी रांड हूँ…”
मैंने अपना लंड उनकी चूत पर रखा, गीली, गर्म, और एक धक्के में अंदर डाल दिया, पूरा, एक ही बार में।
“आह्ह्ह… मेरी माँ…” बुआ चीखीं, “इतना गहरा… इतना मोटा… मेरी चूत फट गई…”
मैंने रुका, “दर्द हो रहा है बुआ?”
“हाँ…” वो बोलीं, “पर अच्छा दर्द है… और… और तेज़…”
मैंने धक्के शुरू किए, धीरे-धीरे, फिर तेज़, पूरा अंदर, पूरा बाहर। बुआ की गांड मेरे धक्कों से हिल रही थी, साड़ी का पल्लू हवा में उड़ रहा था, और वो चीख रही थीं, “आह्ह… आह्ह… और तेज़… मेरी चूत फाड़ दे… आज मैं तेरी हूँ… सिर्फ तेरी…”
मैंने उनकी कमर पकड़ी, और और तेज़ चोदने लगा, चप चप की आवाज़, उनकी चूत से पानी बह रहा था, मेरे लंड पर, मेरी जाँघों पर। “बुआ…” मैंने कहा, “मैं… मैं झड़ने वाला हूँ…”
“अंदर…” वो बोलीं, “अंदर निकाल… मैं गोली खाती हूँ… कोई दिक्कत नहीं… आज मैं तेरे बच्चे की माँ बनना चाहती हूँ…”
मैंने एक आखिरी धक्का मारा, गहरा, पूरा अंदर, और झड़ गया, उनकी चूत में ही, गरम, गाढ़ा, बहुत सारा, और वो भी झड़ीं, मेरे साथ, काँपती हुई, चीखती हुई।
हम दोनों रेलिंग से सटे खड़े थे, साँसें तेज़, पसीने से तर, और बुआ… बुआ मुस्कुरा रही थीं, पीछे मुड़कर, मेरी आँखों में देखते हुए।
“कैसा लगा मेरे बेटे?” वो बोलीं, “पहली बार चोदा है किसी को?”
“हाँ बुआ…” मैंने कहा, “आप… आप पहली हो…”
“अच्छा…” वो मुस्कुराईं, “तो आज तू मर्द बन गया… मेरी चूत से…”
हम terrace पर ही लेटे हुए थे, एक-दूसरे से सटे, साँसें अभी भी तेज़ थीं। बुआ का सिर मेरे सीने पर था, उनकी उँगलियाँ मेरे लंड पर चल रही थीं, जो अभी भी गीला था उनकी चूत के पानी से।
“अर्जुन…” बुआ ने फुसफुसाया, “तू तो बहुत मर्द निकला… पहली बार था तेरा?”
“हाँ बुआ…” मैंने कहा, उनके बालों में हाथ फेरते हुए, “पर आपने मुझे सिखा दिया…”
“अभी तो बहुत कुछ सीखना बाकी है…” वो मुस्कुराईं, और मेरे लंड को कसकर पकड़ लिया, “ये फिर से खड़ा हो रहा है… तेरा बच्चा बहुत जल्दी तैयार हो जाता है…”
मैंने मुस्कुराया, “बुआ की चूत देखकर… कैसे नहीं खड़ा होगा…”
“चालाक हो गया है तू…” वो बोलीं, और मेरे ऊपर चढ़ गईं, उनकी चूचियाँ मेरे मुँह के सामने झूल रही थीं, “अब मैं तुझे एक और मज़ा देती हूँ… जो राजेश को कभी नहीं दिया…”
वो उठीं, अपनी साड़ी पूरी उतारी, और नंगी खड़ी थीं terrace पर, चाँद की रोशनी में। उनकी body… 36-30-38, गोरी, चूचियाँ गोल, निप्पल खड़े, कमर पतली, गांड मोटी, और चूत… वो चूत जो अभी मेरे लंड से भरी हुई थी, पानी से तर, खुली, प्यासी।
“खड़ा हो…” वो आदेश दिया, “और कुर्सी ला…”
मैंने पास रखी प्लास्टिक की कुर्सी उठाई, बीच में रखी। बुआ मुस्कुराईं, कुर्सी पर बैठीं, पैर फैलाए, और मुझे इशारा किया।
“आ जा…” वो बोलीं, “इस बार तू बैठेगा, और मैं तेरे ऊपर… तुझे मेरी चूत का असली मज़ा दूँगी…”
मैंने कुर्सी पर बैठा, लंड खड़ा, बुआ की तरफ। वो उठीं, मेरे ऊपर आईं, और धीरे से बैठ गईं, मेरे लंड पर, अपनी चूत में।
“ऊउउह्ह…” हम दोनों एक साथ कराहे, “इतना गहरा…”
बुआ ने अपने पैर कुर्सी के दोनों तरफ रखे, और उछलने लगीं, धीरे-धीरे, फिर तेज़। उनकी चूचियाँ मेरे सामने हिल रही थीं, मैंने एक पकड़ी, कसकर दबाई, और वो और तेज़ उछलने लगीं।
“आह्ह… अर्जुन… मेरी चूत… फाड़ दे…” वो चीखीं, “और तेज़… और…”
मैंने उनकी कमर पकड़ी, और नीचे से धक्के मारने लगा, ऊपर-नीचे, पूरा अंदर, पूरा बाहर। बुआ पागल हो गईं, सिर पीछे, बाल हवा में, चीख रही थीं, “मेरी माँ… इतना मज़ा… पहले कभी नहीं… राजेश ने कभी ऐसे नहीं चोदा…”
“मैं… मैं राजेश से बेहतर हूँ बुआ?” मैंने पूछा, धक्के मारते हुए।
“हाँ… हाँ… बहुत बेहतर…” वो बोलीं, “तू मेरा शेर है… मेरा राजा… आज से मेरी चूत सिर्फ तेरी…”
मैंने और ज़ोर से धक्के मारे, बुआ की चूत से पानी बह रहा था, मेरे लंड पर, मेरी जाँघों पर, कुर्सी पर। “बुआ…” मैंने कहा, “मैं फिर से झड़ने वाला हूँ…”
“रुक…” वो बोलीं, और उठ गईं, मेरे लंड से, “इस बार… इस बार तू मेरी गांड मार…”
मैं चौंक गया, “बुआ, वो… वो तो…”
“मैंने कई बार कोशिश की है…” वो बोलीं, “पर राजेश का छोटा था… गया ही नहीं… तेरा मोटा है… जाएगा…”
वो घुटनों के बल झुक गईं, कुर्सी पर, गांड मेरी तरफ, उभरी हुई, गोरी, और बीच में वो काली दरार, जो मैंने पहली बार देखी थी जब वो गिरी थीं।
“धीरे से…” वो बोलीं, “पहली बार है…”
मैंने अपना लंड उनकी गांड पर रखा, धीरे से दबाया, और एक धक्के में अंदर। बुआ चीखीं, “आह्ह… मेरी माँ… इतना मोटा… फट गई…”
मैंने रुका, “निकालूँ बुआ?”
“नहीं…” वो बोलीं, साँसें तेज़, “रुक… थोड़ी देर… फिर… फिर धीरे-धीरे…”
मैंने रुका, फिर धीरे-धीरे अंदर-बाहर किया। बुआ की आवाज़ें बदल गईं, “आह्ह… अब… अब अच्छा लग रहा है… और तेज़…”
मैंने धक्के तेज़ किए, पूरा अंदर, पूरा बाहर, और बुआ पागल हो गईं, “ऊउउह्ह… मेरी गांड… फाड़ दे… आज मैं पूरी तेरी हूँ… चूत भी… गांड भी… सब तेरी…”
मैंने और ज़ोर से मारा, और बुआ झड़ गईं, बिना चूत छुए, सिर्फ गांड से, और मैं भी झड़ गया, उनकी गांड में ही, गरम, गाढ़ा, बहुत सारा।
हम दोनों कुर्सी पर गिर गए, एक-दूसरे से सटे, साँसें तेज़, पसीने से तर, और बुआ… बुआ मुस्कुरा रही थीं, आँखें बंद, संतुष्टि से भरी।
“आज…” वो फुसफुसाईं, “आज मैं जी गई…”
सुबह की पहली किरण terrace पर पड़ी, तो मेरी आँख खुली। मैं कुर्सी पर ही लेटा हुआ था, नंगा, और बुआ… बुआ मेरे ऊपर सटी हुई थीं, उनकी चूचियाँ मेरे सीने पर दबी हुई, उनकी चूत मेरी जाँघ पर गीली। हम दोनों ठंड में काँप रहे थे, पर शरीर गर्म, एक-दूसरे से सटे।
“बुआ…” मैंने धीरे से कहा, उनके बालों को हटाते हुए, “सुबह हो गई…”
वो उठीं, आँखें मलते हुए, और मुझे देखा। एक पल के लिए शर्मा गईं, फिर मुस्कुराईं, वो ही मुस्कान जो रात को थी, पर अब थोड़ी शरारती, थोड़ी शैतान।
“क्या देख रहा है?” वो बोलीं, कुर्सी से उतरते हुए, अपनी साड़ी उठाई, “रात को जो हुआ, वो… वो भूल जा…”
“बुआ…” मैंने कहा, “मैं… मैं कैसे भूलूँ…”
“चुप,” वो मेरी तरफ मुड़ीं, और अपनी उँगली मेरे होठों पर रखी, “मैंने कहा भूल जा… और हाँ, किसी को मत बताना… नहीं तो…”
“नहीं तो क्या?” मैंने पूछा।
“नहीं तो मैं तुझे कभी नहीं चोदूँगी…” वो मुस्कुराईं, और अपने कमरे की तरफ चल दीं, साड़ी ओढ़ते हुए, गांड मटकाते हुए, जैसे कुछ हुआ ही न हो।
मैं वहीं खड़ा रहा, terrace पर, नंगा, उनकी बातें सोचते हुए। क्या ये सच था? क्या रात को जो हुआ, वो सिर्फ एक सपना था? पर मेरी जाँघ पर उनकी चूत का पानी अभी भी गीला था, मेरे लंड पर उनकी गांड की गंध अभी भी थी। नहीं, ये सपना नहीं था, ये सच था, और बुआ… बुआ अब मेरी थीं।
मैं नीचे आया, नहाकर, कपड़े पहनकर। घर में सब जगे हुए थे, मम्मी-पापा, चाचा-चाची, सब। बुआ रसोई में थीं, चाय बना रही थीं, साड़ी में, पल्लू कंधे पर, वो ही सख्त बुआ, जो “अर्जुन, पढ़ाई करो” कहती थीं।
“अर्जुन, उठ गया?” मम्मी ने पूछा, “आज लेट कैसे हो गया?”
“वो… रात को नींद नहीं आई…” मैंने कहा, और बुआ की तरफ देखा।
बुआ ने मेरी तरफ देखा, एक सेकंड के लिए, फिर नज़रें हटा लीं, जैसे कुछ हुआ ही न हो। पर… पर उनके होठों पर एक मुस्कान थी, छोटी सी, गुप्त, जो सिर्फ मैं देख पा रहा था।
“अर्जुन, चाय ले…” बुआ ने कहा, आवाज़ में वो ही सख्ती, पर आँखों में कुछ और।
“धन्यवाद बुआ…” मैंने कहा, चाय ली, और उनकी उँगलियाँ मेरी उँगलियों से छू गईं, एक पल के लिए, गर्म, नरम।
मैंने चाय पी, और बुआ को देखता रहा, रसोई में घूमती हुई, साड़ी में, गांड मटकाते हुए, जैसे कल रात terrace पर नहीं थीं, जैसे मेरी चूत में नहीं बैठी थीं, जैसे मैंने उनकी गांड नहीं मारी थी।
पर वो मुस्कान… वो मुस्कान बार-बार आ रही थी, जब कोई नहीं देख रहा था, जब मम्मी पीछे मुड़ती, जब पापा अखबार पढ़ते। और मैं… मैं मुस्कुरा रहा था, अपने आप में, अपनी चाय में, अपनी यादों में।
रात को, मैं अपने कमरे में लेटा था, फोन चला रहा था, Instagram scroll कर रहा था, जब WhatsApp पर notification आया। एक नया मैसेज, अनजान नंबर से, पर… पर मुझे पता था किसका है।
“कल रात वाली बुआ याद आ रही है?”
मैंने मुस्कुराते हुए reply किया, “हाँ बुआ, हर पल…”
“तो कब आ रहा है फिर से मेरी चूत मारने?”
“जब बुलाएं…”
“तो आ जा… कल… मम्मी-पापा बाज़ार जाएंगे… घर में सिर्फ मैं… और मेरी फैली हुई टांगें…”
मैंने मुस्कुराया, लंड खड़ा हो गया, “आऊँगा बुआ… इस बार और ज़ोर से…”
“इंतज़ार रहेगा… मेरी चूत का… और मेरी गांड का…”
मैंने फोन बंद किया, आँखें बंद कीं, और सोचा… कल… कल फिर से बुआ की चूत… बुआ की गांड… बुआ की फैली हुई टांगें…
