टांग उठा कर चुदवा लिया | श्वेता मामी की चुदाई

मेरा नाम श्वेता है। उम्र लगभग इकतालीस साल हो गई है, लेकिन लोग अभी भी बत्तीस-तैंतीस की बताते हैं। शरीर संभला हुआ है—स्तन भारी और सघन, कमर अभी भी पतली, और गाँड ऐसी कि साड़ी में भी छुप नहीं पाती। मामा जी यानी मेरे पति रमेश की उम्र पैंतालीस के पार है। वो अच्छे आदमी हैं, लेकिन बेड पर अब वैसा जोश नहीं रहा। हफ्ते में एक बार भी मुश्किल से होता है, और वो भी जल्दी खत्म। मैंने कभी शिकायत नहीं की। घर का माहौल ठीक रहे, यही काफी था।

संकेत मेरे पति का भतीजा है। उम्र चौबीस साल। पिछले साल से दिल्ली में जॉब कर रहा है और हमारे ही इलाके में एक छोटी सी रेंटेड फ्लैट में रहता है। पहले साल में दो-चार बार ही आता था। लेकिन पिछले तीन महीनों से ज्यादा आने लगा है। कभी खाना खाने, कभी सामान छोड़ने, कभी बस ऐसे ही। रमेश उसे बहुत पसंद करता है। “अच्छा लड़का है, संभला हुआ है,” यही कहते रहते हैं।

मुझे भी संकेत पसंद आने लगा था। लेकिन पसंद का तरीका थोड़ा अलग था। जब वो आता तो टी-शर्ट में उसके कंधे और बाजू की नसें साफ दिखतीं। जिम जाता है साफ पता चलता है। बात करते समय मेरी तरफ देखता है तो नजरें थोड़ी देर ज्यादा ठहर जाती हैं। मैं अनदेखा कर देती थी। लेकिन अंदर अंदर नोटिस कर लेती थी।

एक शाम की बात है। रमेश लेट शिफ्ट में थे। संकेत अचानक आ गया। “मामी, आज ऑफिस जल्दी छूट गया। खाना खा लूँ?” मैंने हाँ कह दी। खाना लगाते समय मैं झुकी तो महसूस किया कि उसकी नजर मेरे ब्लाउज के गड्ढे पर है। मैंने पल्लू ठीक किया, लेकिन जानबूझकर थोड़ा धीरे। खाना खाते समय वो बीच-बीच में मेरी तरफ देख लेता। मैं भी कभी-कभी देख लेती। दोनों कुछ नहीं कहते।

खाना खत्म होने के बाद उसने बर्तन धोने की पेशकश की। मैंने मना कर दिया। “तुम बैठो। मेहमान हो।” वो हँस पड़ा। “मामी, अब मेहमान जैसी दूरी कब की खत्म हो गई।” उसकी बात में हल्की सी शरारत थी। मैंने मुस्कुराकर टाल दी।

रात को रमेश आने के बाद संकेत चला गया। लेकिन उसके जाने के बाद भी उसका ख्याल बना रहा। दिमाग में बार-बार वो वाली निगाह घूम रही थी जो मेरे गड्ढे पर ठहरी थी। मैंने खुद को डाँटा। मामी हूँ। वो भतीजा है। लेकिन शरीर नहीं मान रहा था। रात को जब रमेश सो गए तो मैं देर तक जागती रही। उँगली से खुद को शांत करना पड़ा। शर्म भी आई और गुस्सा भी।

अगले हफ्ते संकेत फिर आया। इस बार दोपहर में। रमेश घर पर नहीं थे। मैं बालकनी में कपड़े सुखा रही थी। उसने पीछे से आवाज लगाई। “मामी…” मैं मुड़ी तो वो दरवाजे पर खड़ा मुस्कुरा रहा था। हाथ में एक थैला था। “आपके लिए समोसे लाया हूँ। ऑफिस के पास वाली दुकान से।” मैंने थैला लिया। उँगलियाँ छू गईं। दोनों ने अनदेखा किया।

अंदर आकर उसने कहा, “मामी, आपकी कमर दर्द करती है ना कभी-कभी? पिछली बार आपने कहा था।” मैंने हाँ में जवाब दिया। वो बोला, “अगर बुरा न लगे तो थोड़ी देर दबा दूँ? माँ को भी दबाता हूँ कभी-कभी।” मैंने मना करना चाहा, लेकिन मुँह से निकला, “थोड़ी देर ही…”

मैं कुर्सी पर बैठ गई। उसने पीछे खड़े होकर दोनों हाथों से मेरी कमर दबानी शुरू की। हाथ मजबूत थे। दबाव सही जगह पड़ रहा था। धीरे-धीरे उसके हाथ थोड़े नीचे सरक आए। साड़ी के ऊपर से ही गाँड के ऊपरी हिस्से तक पहुँच गए। मैंने कुछ नहीं कहा। साँसें थोड़ी तेज हो गई थीं। उसने भी कुछ नहीं कहा। बस दबाता रहा। पाँच मिनट बाद मैंने धीमे से कहा, “बस… हो गया।” उसने हाथ हटा लिए। दोनों की साँसें सामान्य से तेज थीं।

वो चला गया। लेकिन कमरे में उसकी उँगलियों की गर्माहट रह गई। मैं आईने के सामने खड़ी रही। गाल गुलाबी हो चुके थे। मन में एक बात साफ घूम रही थी—संकेत अब सिर्फ भतीजा नहीं रह गया है। और मैं… मैं अब सिर्फ मामी नहीं रहना चाहती थी।

संकेत के जाने के बाद के दो-तीन दिन घर का माहौल सामान्य रहा, लेकिन मेरे अंदर नहीं। हर बार जब रमेश बात करते तो मुझे लगता कि वो कुछ भाँप तो नहीं गए। लेकिन वो हमेशा की तरह व्यस्त रहते। संकेत ने फोन पर एक बार मैसेज किया था—“मामी, कमर का दर्द कैसा है?” मैंने सिर्फ “ठीक है” लिखकर छोड़ दिया। जवाब देने का मन था, लेकिन खुद को रोक लिया।

अगली मुलाकात अप्रत्याशित थी। रमेश को अचानक दो दिनों के लिए बाहर जाना पड़ा। ऑफिस का काम। उन्होंने जाते-जाते कहा, “संकेत को कह देना अगर कुछ चाहिए हो तो। अकेली मत रहना ज्यादा।” मैंने हाँ कह दी। अंदर ही अंदर दिल की धड़कन तेज हो गई।

पहले दिन संकेत शाम को आया। हाथ में फल और कुछ पैकेट थे। “मामा ने कहा था आप अकेली हैं, इसलिए देख आता हूँ।” मैंने उसे अंदर बिठाया। चाय बनाई। बातें सामान्य रहीं—ऑफिस की, मौसम की, रमेश के लौटने की। लेकिन जब मैं चाय का कप दे रही थी तो हमारी उँगलियाँ फिर छू गईं। इस बार दोनों ने थोड़ी देर तक हाथ नहीं हटाया। फिर मैंने धीमे से खींच लिया।

खाना खाते समय संकेत ने अचानक पूछा, “मामी, आप हमेशा इतनी संभली रहती हैं। कभी अपने लिए कुछ सोचती हैं?” मैंने उसकी तरफ देखा। “क्या मतलब?” “ऐसे ही। मामा ज्यादा रहते नहीं घर पर। आप… अकेली कैसे रह लेती हैं?”

सवाल सीधा था। मैंने हँसकर टालने की कोशिश की। “आदत हो गई है।” वो चुप रहा। फिर बोला, “आदत अच्छी नहीं होती कभी-कभी।”

रात का खाना खत्म होने के बाद वो जाने वाला था। दरवाजे तक गया तो रुका। “मामी, अगर बुरा न लगे तो… कल भी आ जाऊँ? अकेले घर में…” मैंने सिर हिलाया। “आ जाना।”

अगले दिन वो दोपहर में ही आ गया। घर में सन्नाटा था। मैंने दरवाजा खोला तो वो साधारण टी-शर्ट और जींस में खड़ा था। शरीर की कसावट साफ झलक रही थी। अंदर आकर उसने सीधा कहा, “मामी, कल वाली बात… मैंने ज्यादा बोल दी क्या?” “नहीं,” मैंने जवाब दिया।

हम हॉल में बैठे। टीवी चल रहा था लेकिन कोई देख नहीं रहा था। संकेत धीरे-धीरे मेरे करीब खिसक आया। उसके कंधे से मेरा कंधा छू रहा था। मैं हट सकती थी। हटी नहीं। थोड़ी देर बाद उसके हाथ ने मेरा हाथ पकड़ लिया। उँगलियाँ फँस गईं। दोनों चुप थे। सिर्फ साँसें चल रही थीं।

“मामी…” उसने बहुत धीमे से कहा। “हम्म।” “मैं आपकी उम्र देखकर नहीं देखता। मैं आपको देखता हूँ।”

मैंने मुड़कर उसकी आँखों में देखा। उसमें कोई झूठ नहीं था। सिर्फ भूख थी। और थोड़ी सी हिचकिचाहट भी। मैंने उसका हाथ नहीं छुड़ाया। उल्टे अपनी उँगलियों को और कस लिया।

उसने मेरा चेहरा अपनी तरफ किया। होठ बहुत करीब थे। मैंने आँखें बंद कर लीं। चुंबन हल्का था पहले। फिर गहरा होता गया। उसकी जीभ मेरे मुँह में घुस आई। मेरे हाथ उसके बालों में चले गए। शरीर अपने आप उसके करीब सरक गया। संकेत का हाथ मेरी कमर पर था, फिर धीरे-धीरे ऊपर सरककर ब्लाउज के किनारे तक पहुँच गया।

मैंने पकड़ लिया उसका हाथ। “संकेत… रुक।” वो रुक गया। साँसें तेज चल रही थीं दोनों की। “ये गलत है,” मैंने कहा। “पता है,” उसने जवाब दिया। “फिर भी रोक नहीं पा रहा।”

मैंने उसका हाथ अपने ब्लाउज पर रख दिया। “तो फिर मत रोक।”

उसने ब्लाउज के हुक खोले। एक-एक करके। ब्रा के ऊपर से मेरे स्तनों को मसलने लगा। मैं कराह उठी। इतने दिनों बाद किसी और के हाथ का स्पर्श… शरीर झटके खा गया। संकेत ने ब्रा ऊपर की और एक निप्पल मुँह में ले लिया। जोर से चूसा। मैंने उसके सिर को और अपने सीने से सटा लिया।

“आह्ह… हल्के… नहीं… जोर से ही…”

वो दोनों स्तनों को बारी-बारी चूस रहा था। मेरी नाइटी ऊपर हो चुकी थी। उसके हाथ मेरी जाँघों पर फिर रहे थे। पैंटी के ऊपर से चूत को सहला रहा था। मैं पहले से गीली थी। उसने पैंटी साइड में सरकाई और एक उँगली अंदर डाल दी।

“मामी… कितनी गरम हो…” “चुप रह… और अंदर तक ले जा…”

उँगली की गति तेज हो गई। मैं बिस्तर के किनारे पर लगभग लेटी हुई थी। संकेत मेरे ऊपर झुका हुआ था। चुंबन और उँगली दोनों साथ-साथ चल रहे थे। मैं अपनी कमर हिला-हिलाकर उसकी उँगली को और गहराई तक ले जा रही थी। अचानक शरीर अकड़ गया। मैं उसके कंधे में मुँह छुपाकर झड़ गई।

थोड़ी देर दोनों ऐसे ही रहे। साँसें सामान्य होने में समय लगा। संकेत ने उँगली निकाली और अपनी उँगली चाट ली। मेरी आँखों में देखकर।

“मामी… अब आगे?” मैंने उसके पैंट के ऊपर से लंड को दबाया। सख्त और गर्म। “आज नहीं। रमेश कल आ रहे हैं। जल्दबाजी मत कर।”

वो थोड़ा निराश दिखा लेकिन समझ गया। कपड़े ठीक किए। जाने से पहले दरवाजे पर खड़े होकर बोला,

“अगली बार जब मामा नहीं होंगे… तो टांग उठाकर रखना मामी। मैं आऊँगा।”

मैंने कुछ नहीं कहा। बस सिर हिलाया। दरवाजा बंद होते ही दीवार से लगकर खड़ी रही। शरीर अभी भी काँप रहा था। जाँघों के बीच नमी थी। और मन में एक बात साफ थी—अब वापस नहीं जा सकती।

रमेश के लौटने के बाद दो हफ्ते सामान्य बीते। संकेत का कोई मैसेज नहीं आया, न ही वो घर आया। मैंने खुद को समझा लिया कि शायद वो भी पीछे हट गया है। लेकिन शरीर नहीं मान रहा था। रात को नींद कम आती, और जब आती तो सपने अजीब से आते।

फिर एक दिन सुबह रमेश के ऑफिस से फोन आया। उनका कोई पुराना कॉलेज दोस्त दिल्ली आया हुआ था। शाम को तीनों मिलकर डिनर पर जाने का प्लान बन गया। रमेश ने मुझे भी चलने को कहा, लेकिन मेरा सिर दर्द करने लगा। सच में नहीं, लेकिन बहाना अच्छा लग रहा था। मैंने कहा, “तुम जाओ। मैं घर पर रहती हूँ। आराम कर लूँगी।”

रमेश थोड़ी देर मना करते रहे, फिर मान गए। शाम छह बजे वो निकल गए। घर में सन्नाटा पसर गया। मैं बालकनी में खड़ी थी कि अचानक गली में संकेत की बाइक दिखी। वो रूका। ऊपर देखा। हमारी निगाहें मिलीं। उसने कुछ नहीं कहा। बाइक बंद की और बिल्डिंग की तरफ बढ़ गया।

दो मिनट बाद दरवाजे की घंटी बजी। दिल जोर से धधक रहा था। दरवाजा खोला तो वो खड़ा था। टी-शर्ट में, बाल थोड़े बिखरे हुए।

“मामा को जाते देखा,” उसने सीधा कहा। “सोचा… आज घर पर हो।”

मैंने दरवाजा और खोला। वो अंदर आ गया। जूते उतारते समय बोला, “सिर दर्द है सच में?” “नहीं,” मैंने जवाब दिया।

दोनों हॉल में खड़े रहे। न कोई बहाना, न कोई लम्बी बात।

उसने दरवाजा बंद किया और सीधे मेरे करीब आ गया। चुंबन इस बार भूखा था। हाथ जल्दी-जल्दी कपड़े खोलने लगे। मैंने भी उसकी टी-शर्ट ऊपर खींच दी। जिम वाला कसा शरीर हाथों में आ गया।

“मामी… आज रोकना मत,” उसने हाँफते हुए कहा। “रोकूँगी नहीं,” मैंने जवाब दिया।

हमारे कपड़े हॉल में ही बिखर गए। मैंने उसे बेडरूम में खींच लिया। बिस्तर पर गिरते ही उसने मेरे स्तन मुँह में ले लिए और जोर से चूसने लगा। मैं उसके बाल पकड़कर अपनी तरफ खींच रही थी। उसका हाथ नीचे गया। उँगली सीधे अंदर घुस गई।

“कितनी गीली हो पहले से… सोच-सोचकर गीली हुई हो ना?” “हम्म… अब उँगली मत चला… डाल अंदर…”

संकेत ने अपनी पैंट पूरी तरह उतार दी। लंड बाहर आया—मोटा, तना हुआ, नसें फूली हुईं। मैंने हाथ से पकड़ा और मुँह के करीब ले गई। पहले टोपा चाटा, फिर गहराई तक ले लिया। गला भर गया फिर भी रुकी नहीं। संकेत ने मेरे बाल पकड़कर हल्के धक्के दिए।

“चूसो मामी… ऐसे ही… गला तक ले लो…”

थोड़ी देर बाद उसने मुझे उलटा कर दिया। टाँगें फैलाईं। लंड मेरे चूत के मुँह पर रखा और एक झटके में अंदर पेल दिया।

“आह्ह्ह… मादरचोद… कितना मोटा…”

वो रुका नहीं। पूरे लंड के साथ पेलने लगा। हर धक्के के साथ मेरी टाँगें उसके कंधों पर चढ़ती जा रही थीं। मैंने खुद अपनी टाँगें और ऊपर उठा लीं।

“टांग उठाकर रख… आज पूरा लेना है,” उसने कहा। “ले रही हूँ… जोर से पेल… फाड़ दे…”

संकेत ने मेरी दोनों टाँगें पकड़कर फैला दीं और कमरतोड़ गति से चोदने लगा। बिस्तर चरमरा रहा था। मेरे स्तन इधर-उधर हिल रहे थे। मैं गालियाँ निकालने लगी।

“चोद… मामी की चूत चोद… साले… और तेज…” “रंडी बन गई हो आज… भतीजे से चुदवा रही हो…” “बन गई हूँ… अब बना दे पूरी… अंदर तक छोड़…”

वो मुझे घोड़ी बनाकर पीछे से पेलने लगा। एक हाथ से मेरे बाल पकड़े हुए था, दूसरे से गाँड मसल रहा था। हर धक्का इतना गहरा था कि साँस फूल रही थी। मैं तकिया दबाकर चीख रही थी।

“मामी… झड़ने वाला हूँ…” “अंदर… अंदर ही छोड़… भर दे…”

कुछ तेज ठोकरों के बाद उसका शरीर अकड़ गया। गरम वीर्य की धार मेरे अंदर छूटने लगी। मैं भी उसी समय काँप उठी। चूत ने उसके लंड को जकड़ लिया। दोनों पसीने से तर थे।

थोड़ी देर वो मेरे ऊपर गिरा रहा। फिर लंड बाहर निकाला। वीर्य मेरी जाँघों से बहने लगा। मैं करवट लेकर लेटी रही। संकेत मेरे बगल में आ गया। उसका हाथ मेरे स्तन पर था।

“अब हर बार जब मामा नहीं होंगे… मैं आऊँगा,” उसने धीमे से कहा। मैंने आँखें बंद करके जवाब दिया, “आना। टांग उठाकर इंतजार रहेगा।”

उस रात हमने दो बार और किया। सुबह होते-होते शरीर में दर्द था, लेकिन मन हल्का था। संकेत जाने से पहले मुझे चूमकर बोला, “मामी… अब तुम मेरी हो।”

मैंने कुछ नहीं कहा। बस उसके बाल सहलाए।

रमेश जब लौटे तो घर पहले जैसा ही था। खाना, बातें, टीवी। लेकिन मेरी जाँघों के बीच की हल्की जलन और संकेत के छोड़े निशान याद दिलाते रहते कि कुछ हमेशा के लिए बदल चुका है।

अब जब भी रमेश बाहर जाते… संकेत का मैसेज आ जाता। और मैं दरवाजा खोल देती।

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