मेरा नाम थी काव्या। उम्र उनतीस। शादी को छह साल हो चुके थे। पति राहुल एक प्राइवेट बैंक में मैनेजर था। हम लोग जयपुर के एक साधारण से सोसाइटी में रहते थे। घर में राहुल के बड़े भाई, यानी जेठ जी भी रहते थे। नाम था सुरेश। उम्र करीब अड़तीस। पत्नी नहीं थी। सालों पहले तलाक हो गया था। तब से वह अकेले ही हमारे साथ रहते थे।
सुरेश जी शरीर से मजबूत थे। कंधे चौड़े, बाजू मोटी, और आवाज में एक अलग तरह का वजन। वह कम बोलते थे। घर में ज्यादातर समय अपने कमरे में रहते या फिर छत पर सिगरेट पीते। लेकिन जब भी बोलते, पूरी बात अपनी जगह पर रख देते।
शुरुआत में मैं उनसे सामान्य व्यवहार रखती थी। भाभी वाला सम्मान। चाय दे देना, खाना गर्म कर देना, कभी कपड़े प्रेस करके रख देना। लेकिन धीरे-धीरे कुछ बदलने लगा।
एक दिन गर्मी बहुत थी। मैंने हल्की नाइटी पहन रखी थी। जेठ जी दोपहर को नहाकर निकले। तौलिया कमर में बाँधा हुआ था। पानी की बूँदें उनके सीने पर से सरक रही थीं। मैं किचन में खड़ी चाय बना रही थी। नजर उनकी छाती पर चली गई, फिर तौलिये के नीचे के उभार पर। मैंने जल्दी से नजर हटा ली, लेकिन दिल की धड़कन बढ़ गई थी।
रात को बिस्तर पर लेटे-लेटे मैंने खुद को डांटा। “काव्या, होश में आ। यह जेठ हैं। राहुल के बड़े भाई।” लेकिन दिमाग में तौलिये वाला सीन बार-बार घूम रहा था।
अगले कुछ हफ्तों में ऐसे छोटे-छोटे पल बढ़ते गए।
एक शाम राहुल लेट शिफ्ट पर था। मैं छत पर कपड़े सुखाने गई। जेठ जी वहीं कुर्सी पर बैठे सिगरेट पी रहे थे। अँधेरा हो रहा था। मैंने साड़ी का पल्लू सँभाला और कपड़े डालने लगी। अचानक हवा का एक झोंका आया और पल्लू सरक गया। मेरी ब्लाउज की हल्की गहराई खुल गई। मैंने जल्दी से ठीक किया, लेकिन जेठ जी की नजर वहीं ठहर गई थी। उन्होंने सिगरेट बुझाई और धीरे से बोले, “सावधानी रखना, भाभी। अकेली हो।”
उनकी आवाज में सामान्य छोटा सा फर्क था। जैसे कोई बात दबी हो। मैंने सिर झुकाया और नीचे चली गई। लेकिन उस रात नींद नहीं आई।
फिर एक दिन ऐसा आया जब राहुल दो दिन के लिए बाहर गया। ट्रेनिंग। घर में सिर्फ मैं और जेठ जी रह गए।
सुबह मैंने नाश्ता बनाया। जेठ जी टेबल पर बैठे अखबार देख रहे थे। मैंने चाय रखते समय अनजाने में उनका हाथ छू लिया। दोनों एक पल के लिए रुक गए। उन्होंने अखबार नीचे रखा और मेरी तरफ देखा। आँखों में कुछ ऐसा था जो पहले कभी नहीं देखा था।
“काव्या,” उन्होंने पहली बार मेरा नाम लिया बिना ‘भाभी’ कहे। “तुम इन दिनों उलझी-उलझी रहती हो।”
मैंने हँसने की कोशिश की। “कुछ नहीं। घर का काम।”
वे उठे और मेरे करीब आ गए। दूरी बहुत कम रह गई थी। उनकी देह की गंध आ रही थी – साबुन और हल्की सिगरेट की। “काम की बात नहीं लगती। कुछ और है।”
मैं पीछे हटी। “जेठ जी… आप… यह क्या बात कर रहे हैं।”
“जो बात तुम्हारी आँखें कई दिनों से कह रही हैं,” उन्होंने धीमे से कहा। “मैं अंधा नहीं हूँ।”
मेरा गला सूख गया। मैंने सिर झुका लिया। “यह गलत है। आप मेरे जेठ हैं।”
“गलत है,” उन्होंने माना। “लेकिन तुम्हारा शरीर जब मैं तौलिया बाँधकर निकलता हूँ तो कैसे काँप जाता है, यह भी सच है। और मेरा शरीर भी…”
वह वाक्य अधूरा छोड़कर वे अपने कमरे की तरफ चले गए। मैं वहीं खड़ी रह गई। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। डर था, शर्म थी, और नीचे एक हल्की सी गीलापन भी।
शाम को राहुल का फोन आया। वह अगले दिन ही लौटने वाला था। मैंने सामान्य बात की, लेकिन आवाज काँप रही थी। रात का खाना मैंने चुपचाप बनाया। जेठ जी ने भी कम ही बात की। खाने के बाद वे छत पर चले गए। मैं बर्तन धोती रही। मन में उथल-पुथल मची थी।
आध घंटे बाद मैं भी छत पर गई। वह कुर्सी पर बैठे अँधेरे में सिगरेट पी रहे थे। शहर की रोशनियाँ दूर तक बिखरी थीं। मैं उनके पास जाकर खड़ी हो गई।
“नीचे सो जाओ,” उन्होंने कहा। “रात हो गई।”
“नींद नहीं आ रही,” मैंने जवाब दिया।
वे खड़े हो गए। अब हमारी ऊँचाई लगभग बराबर थी क्योंकि मैं सीढ़ी की आखिरी डंडे पर थी। उनकी आँखों में शहर की रोशनी चमक रही थी। “तुम यहाँ क्यों आई हो, काव्या?”
मेरी आवाज बहुत कमजोर निकली। “मुझे… नहीं पता।”
उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया। हथेली गरम और खुरदरी थी। “अगर तुमने अभी कदम पीछे नहीं हटाया, तो मैं फिर नहीं रुकूँगा।”
मैं नहीं हटी।
जेठ जी ने मुझे अपनी तरफ खींचा और चूम लिया। उनका चुंबन राहुल जैसा नरम नहीं था। वह भूखा था। जीभ ने मेरे मुँह में घुसकर जगह बनाई। मैंने उनकी छाती पर हाथ रखा तो महसूस हुआ कि उनका दिल भी उतना ही तेज धड़क रहा था।
चुंबन टूटा तो उन्होंने मेरी साड़ी का पल्लू खींच दिया। ब्लाउज के हुक उनके मोटे अंगूठे ने एक-एक करके खोले। ब्रा के ऊपर से ही उन्होंने मेरे स्तनों को दबाया। “कई रातों से सोच रहा था इन्हें छूने की।”
मैंने उनकी कलाई पकड़ी। “जेठ जी… अब भी समय है रुकने का।”
“समय निकल चुका,” उन्होंने कहा और ब्रा खोल दी।
मेरे स्तन बाहर आ गए। रात की हवा ने निप्पलों को कड़ा कर दिया। जेठ जी ने झुककर एक को मुँह में ले लिया और जोर से चूसा। उनकी जीभ गोल-गोल घूम रही थी। दूसरे को हाथ से मसल रहे थे। मैंने उनकी गर्दन पकड़ ली। आवाज निकल गई।
“आह… धीरे…”
“धीरे नहीं चलेगा आज,” उन्होंने मम्मे से मुँह हटाकर कहा। “तुमने जितनी बार मेरा तौलिया देखा है, उतनी बार मैंने तुम्हें इस हाल में सोचा है।”
वे मुझे दीवार की तरफ ले गए। साड़ी और पेटीकोट नीचे सरक चुके थे। सिर्फ पैंटी बची थी। जेठ जी ने घुटनों के बल बैठकर पैंटी को दांतों से खींच लिया। मेरी चूत उनके चेहरे के सामने थी। उन्होंने नाक रगड़कर सूँघा और फिर जीभ निकालकर लंबा चाटा।
“मिठास है इसमें भी… लेकिन मैं जानता हूँ तुम्हें और कुछ मीठा लगता है।”
मैंने उनके बाल पकड़ लिए। जेठ जी मेरी चूत चाटने लगे। जीभ अंदर तक जाती, निकलती, क्लिट पर घूमती। दो उंगलियाँ अंदर घुसकर तेजी से हिलने लगीं। मेरी कमर काँप रही थी। पैर गोल हो रहे थे।
“जेठ जी… मैं… खड़ी नहीं रह पाऊँगी…”
उन्होंने मुझे उठाया और अपनी कुर्सी पर बैठा दिया। खुद सामने खड़े होकर पजामा नीचे किया। उनका लंड निकलकर बाहर आया। मोटा, लंबा, नसों से भरा हुआ। सिरे पर पहले से चमक थी।
मैंने उसकी तरफ देखा। गला सूख गया। “इतना…”
“अब मुँह खोलो,” उन्होंने धीमे लेकिन साफ लहजे में कहा। “और बताओ कैसा लगता है।”
मैंने हाथ बढ़ाकर लंड को पकड़ा। वजन भारी था। फिर जिह्वा निकालकर सिरे पर फेरी। नमकीन-मीठा स्वाद। मैंने आँखें बंद करके पूरे मोटे सिरे को मुँह में ले लिया। जेठ जी ने हल्के से साँस छोड़ी।
“हाँ… ऐसे… और गहरा…”
मैंने और अंदर तक लिया। लंड मेरे गले तक छू रहा था। आँखों में पानी आ गया, लेकिन मैंने नहीं छोड़ा। जेठ जी के हाथ मेरे बालों में थे। वे धीरे-धीरे मेरे मुँह में धक्के देने लगे। लंड निकलता, फिर गहराई तक जाता। मेरी लार उनके अंडों तक बह रही थी।
“काव्या… तुम्हारा मुँह… बहुत गरम और गीला है… चूसती रहो…”
मैंने दोनों हाथों से उनकी गाँड पकड़ ली और खुद ही और गहराई तक लंड लेने लगी। कभी सिर्फ सिरा चूसती, कभी पूरा अंदर तक ले जाती। जेठ जी के मोटे लंड का स्वाद पूरे मुँह में फैल रहा था। मीठा नहीं था सही मायने में, लेकिन दिमाग को ऐसा ही लग रहा था। जैसे कोई नशा हो।
थोड़ी देर बाद उन्होंने लंड निकाला। लार का लंबा धागा मेरे होंठों से जुड़ा था। वे मुझे कुर्सी से उठाकर छत की दीवार के सहारे खड़ा कर दिया। एक टाँग उठाई और अपना लंड मेरी चूत पर टिकाया।
“अब बताओ… सिर्फ मुँह में मीठा लगता है या अंदर भी?”
मैंने जवाब देने के बजाय उनकी गर्दन में मुँह छुपा लिया। जेठ जी ने एक ही धक्के में आधा लंड अंदर तक धकेल दिया। दर्द और मजे का मिश्रण था। मेरी चूत उनके मोटे लंड से फैल रही थी। उन्होंने रुके बिना बाकी हिस्सा भी अंदर ले लिया।
“आह्ह… जेठ जी… बहुत मोटा… धीरे…”
“अब धीरे नहीं,” उन्होंने कहा और धक्के लगाने शुरू कर दिए।
हर धक्का गहरा और जोरदार था। मेरी पीठ दीवार से रगड़ खा रही थी। स्तन उनके सीने से दबकर फैल रहे थे। जेठ जी ने मेरी दोनों टाँगें अपनी कमर के चारों तरफ लपेट लीं और पूरे वजन के साथ चोदने लगे। छत पर सिर्फ हमारी साँसों और शरीर के टकराने की आवाज थी।
“बोलो… कैसा लग रहा है जेठ जी का लंड?”
“मी… मीठा… लग रहा है… अंदर तक… आह्ह…”
वे मुस्कुराए। फिर मुझे नीचे उतारा, घुटनों के बल कर दिया और पीछे से फिर से घुस गए। इस बार और गहरा। उनके अंडे मेरी चूत से टकरा रहे थे। एक हाथ से मेरे बाल पकड़े हुए थे और दूसरे से मेरी छाती मसल रहे थे।
“गाँड भी दूँगा आज,” उन्होंने कहा। “तैयार हो?”
मैंने सिर्फ कराहकर जवाब दिया। जेठ जी ने लंड निकाला, थूक लगाकर मेरे गाँड के छेद पर रखा और धीरे से दबाव दिया। पहले सिर्फ सिरा अंदर गया। मैंने दाँत भींच लिए। फिर धीरे-धीरे पूरा लंड मेरी गाँड में समा गया।
“आह्ह्ह… दर्द… हो रहा है…”
“सह लो… अब मजा आएगा…”
वे मेरी गाँड चोदने लगे। पहले धीमे, फिर रफ्तार बढ़ाते गए। मेरी गाँड उनके मोटे लंड को कसकर पकड़े हुए थी। हर धक्के पर मेरी आवाज निकल रही थी। जेठ जी ने आगे झुककर मेरे मम्मों को मसला और कान में बोले, “राहुल को कभी यह हालत नहीं दिखाती होगी तू…”
“नहीं… कभी नहीं… सिर्फ आप… आह्ह…”
वे काफी देर तक गाँड में पेलते रहे। फिर लंड निकालकर फिर से चूत में डाल दिया। इस बार दोनों हाथों से मेरी कमर पकड़कर इतनी जोर से चोदा कि मेरी आँखों के आगे अँधेरा छा गया। मैं एक के बाद एक झड़ती रही। शरीर काँप रहा था।
आखिर में जेठ जी ने लंड निकाला, मुझे घुमाया और फिर से मेरे मुँह में ठूंस दिया। दो-तीन गहरे धक्कों के बाद उनके लंड से गाढ़ा गर्म वीर्य मेरे मुँह में छूटने लगा। मैंने पूरा निगलने की कोशिश की, लेकिन कुछ कोने से बह निकला। जेठ जी ने लंड बाहर निकाला और बाकी का वीर्य मेरे स्तनों पर छोड़ दिया।
हम दोनों साँसें लेते हुए छत की दीवार के सहारे बैठ गए। रात की हवा अब ठंडी लग रही थी। जेठ जी ने अपना पजामा ऊपर किया और मेरी साड़ी मेरे कंधे पर डाल दी।
“नीचे जाकर नहा लो,” उन्होंने कहा। “और यह बात यहीं की यहीं रहेगी।”
मैंने उनकी तरफ देखा। मुँह में अभी भी उनका स्वाद था। “जेठ जी… आपका लंड… सच में…”
उन्होंने मेरा मुँह बंद कर दिया अंगुली रखकर। “सो जाओ। कल राहुल आ जाएगा।”
मैं नीचे आई। नहाया। बिस्तर पर लेटी तो भी मुँह में वह स्वाद घूम रहा था। मीठा नहीं था। लेकिन दिमाग ने उसे मीठा बना दिया था।
अगली सुबह राहुल लौट आया। घर फिर से सामान्य हो गया। लेकिन जब भी जेठ जी तौलिया बाँधकर नहाकर निकलते, या जब भी उनकी नजर मुझ पर ठहरती, तो मुझे याद आ जाता था कि उनका लंड मेरे मुँह में कितना भारी और गर्म था। और वह स्वाद… जो अब भी कभी-कभी जीभ पर लौट आता था।
मैं जानती थी कि यह बात यहीं नहीं रुकेगी। क्योंकि जेठ जी का लंड मुझे सच में मीठा लगने लगा था। और मीठी चीज एक बार चखने के बाद इंसान बार-बार तरसता है।
