मौसी की बड़ी गांड मैं मेरा लंड। मौसी की चुदाई की कहानी

हेलो दोस्तों मेरा नाम जयेश है। मैं २५ साल का हूँ और एक बोहोत बड़ी आईटी करता हूँ। मेरा पूरा परिवार मुंबई मैं रहता है। यहाँ पुणे में मैं एक PG मैं रहता हूँ, इसलिए टेंशन नहीं होती जब चाहे दारू पियो जब चाहे लड़कियों को रूम पर बुला कर चोदो। ज़िन्दगी आराम से काट रही थी। वैसे तो मैं बोहोत सारी लड़कियों को चोद चूका हूँ पर मेरे मन मैं किसी घरलू भाभी या फिर किसी आंटी को छोड़ने की बोहोत इच्छा थी जो आज तक पूरी नहीं हुई थी। यहाँ पुणे मैं मेरे कोई रिश्तेदार नहीं रहते थे सिर्फ मेरी मौसी रहती थी।


मेरी मौसी सुनीता ,, उनके फिगर के बारे मैं मई बाद मैं बताऊंगा पर मुझे ऐसे भी कर के छोड़ना था क्यों की वो थी ही उल्टी हॉट। मेरे मौसी के हस्बैंड एक बड़े कंपनी मैं जॉब करते थे और अक्सर काम के सिलसिले मैं बहार ही रहते थे। तो मुझे पता था की मौसी को किसी न किसी की जरुरत तो होगी ही। मौसी जी का एक ही और वो 12th की तैयारी एक अकादमी मैं कर रहा था तो वो वही रहता था।


एक दिन मुझे मामा का कॉल आया की जयेश मैं कुछ काम के सिलसिले मैं कुवैत जा रहा हूँ तो तुम्हारी मौसी घर पर अकेले हे होगी तो क्या तुम 3 4 दिन के लिए घर आ जाओगे ताकि तुम्हारी मौसी को कुछ काम की जरुरत होगी तो तुम उनका हाथ बटा पाओगे। मुझे भी 3 दिन की छुट्टी थी तो मैं भी तैयार हो गया।

मामा के फोन के बाद ही मन तय हो गया था। तीन दिन की छुट्टी पड़ी थी और घर में अकेला रहना अच्छा नहीं लग रहा था। मौसी ने खुद कहा था कि चला आ, खाना-पानी तो बनेगा। मैंने सोचा भी नहीं था कि यह तीन दिन ऐसे कटेंगे।

शाम के साढ़े छह बजे उनके घर पहुंचा। छोटा-सा मकान, पुरानी कॉलोनी में, जहां गलियां संकरी हैं और घर एक-दूसरे से सटे हुए। मौसी दरवाजे पर खड़ी थीं। हल्के रंग का कुर्ता, बाल खुले, चेहरे पर थकान लेकिन आंखों में राहत। उम्र बयालीस के आसपास। शरीर भरा-भरा। कमर अभी भी पतली, लेकिन कूल्हे और गांड इतनी चौड़ी और भारी कि कपड़ों के अंदर भी दो गोलियां साफ उभर आतीं। सालों से देखता आ रहा था मैं। शादी के बाद भी वैसा ही रहा उनका बदन।

“आ गया?” उन्होंने पूछा।

“हां मौसी।”

सामान रखकर अंदर बैठा। घर वैसा ही था—थोड़ा अंधेरा, थोड़ा पुराना। किचन से चाय की खुशबू आ रही थी। रात का खाना साथ खाया। बातें साधारण रहीं। मेरी नौकरी की, उनके घर के खर्च की, मौहल्ले की छोटी-मोटी बातें। लेकिन मेरे मन में कुछ और चल रहा था। मौसी जब भी उठतीं या झुकतीं, गांड हिलती। कुर्ते के अंदर वह भारीपन साफ दिखता। मैं नजर फेर लेता, फिर वापस चली जाती।

खाना खाकर वे बर्तन धोने चली गईं। मैं हॉल में बैठा रहा। टीवी चल रहा था लेकिन ध्यान कहीं नहीं लग रहा था। दिमाग में बार-बार वही तस्वीर। उनका झुकना, गांड का उभरना, गर्दन पर पसीने की चमक। लंड हल्का सख्त हो आया था। मैंने खुद से कहा—यह मौसी हैं। मामा की बीवी। गलत है। लेकिन शरीर नहीं मान रहा था। अंदर एक बेचैनी घूम रही थी जो शब्दों में नहीं आ रही थी।

दस बज गए होंगे जब मौसी हॉल में आईं। हाथ में पानी का गिलास। “तू अभी तक जाग रहा है?”

“नींद नहीं आ रही।”

वे मेरे पास सोफे पर बैठ गईं। दूरी कम थी। बालों से तेल की हल्की खुशबू आ रही थी। मैंने धीरे से पूछा, “आप अकेले कैसे रह लेती हैं इतने दिन?”

“आदत पड़ गई है।” उन्होंने गिलास रखा। “तुम आ गए हो तो अच्छा लगा।”

बातचीत रुक-रुककर चल रही थी। एक बार उनकी उंगली मेरी उंगली से छू गई। दोनों चुप रहे। कोई हंसा नहीं, कोई हटा भी नहीं। मैंने फिर कहा, “मौसी… आप कभी अकेलापन महसूस करती हैं?”

वे मेरी तरफ देखीं। आंखों में कुछ था जो मैं ठीक से पढ़ नहीं पाया। “रात को ऐसी बातें मत कर। सो जा।”

वे उठीं। जाते-जाते उनकी गांड एक बार फिर हिली। कुर्ते के अंदर साफ। मैं वहीं बैठा रहा। अंदर कुछ घुट रहा था। बार-बार मन में आ रहा था कि उठकर उनके कमरे में चला जाऊं। लेकिन हिम्मत नहीं हो रही थी। गलत लग रहा था। फिर भी लंड पूरी तरह खड़ा हो चुका था।

बारह बज चुके थे जब प्यास लगी। किचन गया। रोशनी जल रही थी। मौसी फ्रिज के पास खड़ी थीं। पानी निकाल रही थीं। उन्होंने मुझे देखकर कहा, “तुम भी जाग रहे हो?”

मैं उनके पास जाकर खड़ा हो गया। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। “मौसी…”

“हां?”

मैंने उनका हाथ पकड़ लिया। उंगलियां थोड़ी ठंडी थीं। “मैं… कुछ कहना चाहता हूं।”

वे सख्त हो गईं। “क्या?”

“आपकी… गांड बहुत बड़ी है। सालों से देख रहा हूं। मन करता है छू लूं।” बात निकलते ही पछतावा हुआ, लेकिन रोक नहीं सका। आवाज कांप रही थी।

मौसी ने मेरा हाथ झटका। “पागल हो गया है तू? मैं तेरी मौसी हूं। मामा की बीवी।”

“पता है,” मैंने कहा। “लेकिन मन नहीं मानता। रात भर सो नहीं पाया। आप अकेली, मैं अकेला… और यह चाह अंदर घुट रही है।”

वे चुप रहीं। किचन का सन्नाटा भारी लग रहा था। बाहर कुत्ते की आवाज आ रही थी। मैंने फिर से उनका हाथ पकड़ा। इस बार उन्होंने नहीं छुड़ाया। बस आंखें झुका लीं। मैंने धीरे से उनकी कमर पकड़ ली। दोनों हाथ। गांड की गोलियां मुट्ठी में आ गईं। नरम, भारी, गर्म। मौसी का शरीर हल्का कांप गया।

“मत कर…” उन्होंने फुसफुसाया। “गलत है यह।”

“तो रोक दो मुझे।”

वे नहीं रोकीं। बस आंखें बंद कर लीं। मैंने कुर्ता ऊपर उठाया। नीचे सिर्फ पतली पैंटी। काली। गांड की दोनों गोलियां बाहर निकल आईं। गोल, भारी, एक-दूसरे से सटी हुई। मैंने पैंटी साइड में खिसकाई और दोनों हाथों से गांड फैला दी। बीच का गहरा छेद दिख रहा था। थोड़ा सिकुड़ा हुआ, गुलाबी रंग का। मैंने अंगुली से छुआ। मौसी ने दांत भींच लिए।

“आह… छेड़ मत…”

मैंने घुटनों के बल बैठकर जीभ से चाटना शुरू कर दिया। गांड के छेद पर जीभ घुमाई, अंदर धकेलने की कोशिश की। कड़वा-सा स्वाद। लंड पैंट के अंदर से बाहर निकाल लिया। पूरा खड़ा, नसों वाला। मौसी टेबल पकड़कर खड़ी रहीं। टांगें कांप रही थीं। “ऊं… यह क्या कर रहा है तू… शर्म नहीं आती…”

मैंने एक अंगुली अंदर डाली। टाइट। बहुत टाइट। पहले पोर तक भी मुश्किल से गई। मौसी की सांस तेज हो गई। “दर्द हो रहा है… निकाल…”

“थोड़ा सह ले मौसी,” मैंने कहा। दूसरी अंगुली भी अंदर धकेल दी। दोनों अंगुलियां गांड के अंदर घुमाईं। दीवारें गर्म और सिकुड़ रही थीं। मैंने अंगुलियां बाहर निकालीं तो छेद थोड़ा खुला लग रहा था। लंड के सिरे पर थूक लगाया और गांड के छेद पर रख दिया।

“अब लंड डाल रहा हूं।”

उन्होंने सिर घुमाकर देखा। आंखें आधी बंद। “धीरे… बहुत मोटा है तेरा…”

मैंने धीरे-धीरे धक्का दिया। पहले सिर्फ टिप अंदर गई। मौसी की गांड ने कसकर पकड़ लिया। दर्द से उनकी सांस रुक गई। मैंने और जोर लगाया। आधा लंड घुस गया। गर्मी अंदर से महसूस हो रही थी। एक जोरदार धक्का और पूरा लंड उनकी गांड में समा गया। गांड की दोनों गोलियां मेरे पेट से चिपक गईं। लंड की जड़ तक अंदर।

मौसी चिल्लाईं, “आह्ह… हरामजादा… पूरा मत डाल… फट जाएगी…”

मैंने कमर पकड़ी और धीरे-धीरे बाहर खींचा, फिर अंदर धकेला। पेलना शुरू कर दिया। पहले धीरे। लंड गांड से बाहर निकलता, फिर पूरा अंदर जाता। हर धक्के पर मौसी की गांड हिलती। गोलियां थरथरातीं। मैंने दोनों हाथों से गांड की गोलियां फैलाईं ताकि छेद और खुले। लंड अब आसानी से अंदर-बाहर हो रहा था। गांड का छेद लंड की मोटाई के हिसाब से फैल चुका था। हर बार जब लंड पूरा अंदर जाता, मौसी की आवाज निकल जाती।

“ऊं… आह… चुद रही है गांड… धीरे कर साले…”

मैंने रफ्तार बढ़ा दी। जोर-जोर से पेलने लगा। थप-थप की आवाज आने लगी। गांड की गोलियां मेरे जांघों से टकरा रही थीं। मौसी टेबल पर झुक गईं। स्तन कुर्ते के अंदर से लटक रहे थे। मैंने एक हाथ आगे बढ़ाकर स्तन पकड़ लिया। बड़ा, नरम। निप्पल को चुटकी में लेकर मसला।

“मौसी की गांड कितनी चूस रही है लंड को,” मैंने कहा। “बिल्कुल वेश्या जैसी गांड है तेरी।”

वे कोई जवाब नहीं दे रहीं थीं। बस कराह रही थीं। मैंने और जोर लगाया। अब पूरा जोर लगाकर चोद रहा था। लंड की पूरी लंबाई गांड में गायब हो जाती। हर धक्के पर मौसी का शरीर आगे झुक जाता। गांड का छेद लाल हो चुका था। लंड पर गांड का रस और मेरा थूक लग चुका था। फिसलन बढ़ गई थी।

मैंने पोजीशन बदली। मौसी को घुटनों के बल बिठा दिया। गांड और ऊंची हो गई। लंड फिर से गांड में घुसेड़ दिया। इस बार और गहरा। लंड की नोक अंदर तक जा रही थी। मौसी ने तकिया मुंह में दबा लिया। आवाजें दबाने की कोशिश कर रही थीं, लेकिन निकल ही रही थीं।

“आह्ह… गांड फट जाएगी… इतना जोर से मत पेल…”

मैंने दोनों हाथ उनकी कमर पर रखे और बिना रुके चोदना शुरू कर दिया। तेज। तेज। तेज। लंड गांड में बार-बार धंस रहा था। हर बार जब लंड बाहर निकलता, छेद थोड़ा खुलता दिखता। फिर अंदर। गांड की दीवारें लंड को निचोड़ रही थीं। मुझे लग रहा था कि जल्दी झड़ जाऊंगा।

लंड बाहर निकाला। गांड का छेद खुला रह गया था। गोल और गहरा। मैंने मौसी को पलटा। पीठ के बल लिटाया। पैर ऊपर उठाए और कंधों तक दबा दिए। गांड फिर से सामने आ गई। लंड दोबारा छेद में घुसा दिया। इस पोजीशन में और गहरा जा रहा था।

मौसी की आंखें बंद थीं। मुंह खुला। मैंने उनका मुंह पकड़कर चूमा। जीभ अंदर डाल दी। वे भी जवाब देने लगीं। मैं पेलता रहा। गांड की चूदाई अब पूरी रफ्तार पर थी। लंड अंदर-बाहर, अंदर-बाहर। थप-थप-थप। गांड की गोलियां हिल रही थीं। मैंने एक हाथ से गांड की गोली दबाई और दूसरे से उनकी चूत पर अंगुली घुमाई। चूत भी गीली हो चुकी थी।

“मौसी, गांड में ही झाड़ूं क्या?” मैंने पूछा।

उन्होंने कराहते हुए सिर हिलाया। मैंने रफ्तार और बढ़ा दी। अंतिम दौर था। लंड गांड में धंसता और बाहर आता। गर्मी बढ़ रही थी। अचानक लंड का सिर फड़कने लगा। मैंने पूरा लंड गांड के अंदर धकेल दिया और वहीं झड़ गया। गर्म वीर्य की धार गांड के अंदर छूट गई। एक के बाद एक। मौसी की गांड ने लंड को कसकर पकड़ रखा था। वीर्य अंदर भरता जा रहा था।

मैंने कुछ देर वैसा ही दबाए रखा। लंड अभी भी गांड में था। धीरे-धीरे नरम होने लगा। बाहर निकाला। गांड के छेद से सफेद वीर्य निकलने लगा। टपक रहा था। छेद खुला हुआ था। लाल और सूजा हुआ।

मौसी सांस ले रही थीं। आंखें अभी भी बंद। मैं उनके बगल में लेट गया। कुछ देर तक कोई नहीं बोला। फिर मौसी ने धीरे से कहा, “पागल है तू… इतनी जोर से चोदा… गांड दर्द कर रही है।”

मैंने उनका गाल सहलाया। “अगली बार और जोर से चोदूंगा मौसी।”

वे हल्के से मुस्कुराईं। फिर करवट बदलकर मेरी तरफ मुंह कर लिया। बाहर रात अभी बाकी थी। और घर में सिर्फ हम दोनों ही थे।

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