नमस्ते दोस्तों, मेरा नाम रोहन है। मैं लखनऊ का रहने वाला हूँ। अभी मैं बाईस साल का हूँ, लेकिन यह कहानी दो साल पुरानी है। तब मैं बीस साल का था।
घर में हम चार लोग रहते थे—मम्मी, पापा, मेरी बड़ी बहन मीरा दीदी और मैं। मीरा दीदी मुझसे चार साल बड़ी थीं। बचपन में हम बहुत लड़ते थे, लेकिन जैसे-जैसे बड़े हुए, बीच में एक अजीब सी दूरी आ गई थी। वे कॉलेज जा रही थीं, मैं बारहवीं में था। ये भाई बहन सेक्स स्टोरी आप pranaykatha.com पर पढ़ रहे है। फिर वे ग्रेजुएशन खत्म करके घर पर ही रह गईं। शादी के रिश्ते आने शुरू हो गए थे, लेकिन कोई पक्का नहीं हुआ था।
उस साल गर्मी की छुट्टियों में मम्मी-पापा नानी के गाँव चले गए। नानी बीमार थीं, इसलिए दोनों करीब बारह दिन के लिए बाहर रहे। घर में सिर्फ मैं और दीदी रह गए।
पहले दो दिन बिल्कुल सामान्य बीते। सुबह मैं देर तक सोता, दीदी रसोई में काम करतीं। दोपहर को दोनों अपने-अपने कमरे में रहते। शाम को कभी-कभी टीवी देख लेते। बातें कम ही होती थीं। लेकिन तीसरे दिन से मुझे फर्क महसूस होने लगा।
दीदी अब पहले जैसी नहीं रहीं थीं। पहले वे हमेशा जल्दी में रहती थीं, बाल बाँधकर रखती थीं, ढीले कपड़े पहनती थीं। अब वे अक्सर बाल खोले रखतीं। सूती कुर्ती या नाइटी में घर में घूमतीं। उनकी चाल में एक थकान थी, लेकिन साथ में कुछ और भी था। ये भाई बहन सेक्स स्टोरी आप pranaykatha.com पर पढ़ रहे है।जब वे मेरे सामने से गुजरतीं तो मुझे उनकी खुशबू आने लगती—हल्का सा साबुन और उनके शरीर की अपनी गंध।
एक दोपहर मैं अपने कमरे में लेटा हुआ था। पंखा चल रहा था। अचानक दीदी का दरवाज़ा खोला। वे मेरे कमरे में आईं और बिस्तर के किनारे बैठ गईं।
“रोहन, तू सो रहा है?”
“नहीं दीदी। बस लेटा हूँ।”
वे कुछ देर चुप रही। फिर बोलीं, “घर बड़ा सूना लगता है न अब?”
मैंने हाँ में सिर हिलाया। वे मेरे बालों में उंगलियाँ फेरने लगीं। पहले तो सामान्य सा लगा, जैसे बहन करते हैं। लेकिन उनकी उंगलियाँ मेरे माथे पर, फिर कनपटी पर घूमने लगीं। बहुत हल्के से। मैंने आँखें बंद कर लीं। उनके हाथ की गर्माहट अच्छी लग रही थी।
थोड़ी देर बाद वे बोलीं, “तू कितना बड़ा हो गया है। पहले तो तेरा सर मेरे पेट तक आता था।”
मैं कुछ नहीं बोला। उनकी उंगलियाँ अब मेरे गाल तक आ गई थीं। अचानक उन्होंने हाथ रोक लिया और उठकर चली गईं। जैसे उन्हें खुद पर गुस्सा आ गया हो।
शाम को खाना खाते समय दोनों फिर से सामान्य बनने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन मेरी नज़र बार-बार उनके गले और कॉलरबोन पर चली जाती। नाइटी का गला थोड़ा खुला हुआ था। जब वे झुककर रोटी लेतीं तो उनकी छाती की हल्की रेखा दिख जाती। ये भाई बहन सेक्स स्टोरी आप pranaykatha.com पर पढ़ रहे है।मैं जल्दी से नज़रें हटा लेता, लेकिन मन नहीं मानता था।
रात को ग्यारह बजे मैं पानी पीने उठा। रसोई में लाइट जल रही थी। दीदी सिंक के पास खड़ी थीं। उन्होंने मुझे देखा और बोलीं, “तुझे भी नींद नहीं आ रही?”
“हाँ।”
वे मुस्कुराईं। मुस्कान में थकान थी। “चल, छतों पर चलते हैं। हवा अच्छी लग रही होगी।”
हम दोनों छतों पर चले गए। लखनऊ की गर्म रात थी, लेकिन छत पर हल्की हवा चल रही थी। दोनों किनारे पर बैठ गए। कुछ देर तक सिर्फ सड़क के नीचे से आने वाली आवाज़ें सुनाई दे रही थीं।
दीदी ने अचानक कहा, “मुझे डर लगता है रोहन।”
“किस बात का?”
“शादी का। घर छोड़ने का। यहाँ सब परिचित है। वहाँ… कुछ नहीं पता।” उनकी आवाज़ कमज़ोर थी।
मैंने उनका हाथ पकड़ लिया। सिर्फ दिलासा देने के लिए। लेकिन हाथ पकड़ते ही दोनों कुछ पल के लिए रुक गए। उनके हाथ की त्वचा चिकनी और गर्म थी। मैंने छोड़ने की कोशिश नहीं की। दीदी ने भी नहीं छुड़ाया।
थोड़ी देर बाद उन्होंने अपना सिर मेरे कंधे पर रख दिया। बिल्कुल हल्के से। मैं साँस रोककर बैठा रहा। उनकी खुशबू और भी करीब आ गई थी। उनके बाल मेरे गाल को छू रहे थे।
हम दोनों बहुत देर तक ऐसे ही बैठे रहे। कोई बात नहीं हुई। सिर्फ अंधेरा, हवा, और एक-दूसरे की साँसें।
जब हम नीचे आए तो दोनों ने एक-दूसरे को शुभ रात्रि कहा। लेकिन आवाज़ में वह पुरानी सहजता नहीं थी।
अपने कमरे में आकर मैंने दरवाज़ा बंद किया। दिल अभी भी तेज़ धधक रहा था। समझ नहीं आ रहा था कि अभी क्या हो रहा है। सिर्फ इतना पता था कि घर में अब पहले जैसी हवा नहीं रही।
अगली सुबह मैं देर से उठा। सिर भारी था। रातभर नींद अधूरी-अधूरी आई थी। ये भाई बहन सेक्स स्टोरी आप pranaykatha.com पर पढ़ रहे है। छत वाला पल बार-बार याद आ रहा था—दीदी का सिर मेरे कंधे पर, उनका हाथ मेरे हाथ में, और वह खामोशी जो सामान्य नहीं थी।
रसोई में गया तो दीदी पहले से नाश्ता बना रही थीं। उन्होंने मेरी तरफ देखा और सामान्य स्वर में बोलीं, “उपमा बना रही हूँ। बैठ जा।”
मैं मेज पर बैठ गया। दोनों के बीच बातचीत बहुत कम हुई। सिर्फ “नमक कम है” या “चाय चाहिए?” जैसी जरूरी बातें। लेकिन जब दीदी मेरे पास से गुजरतीं तो उनकी नाइटी का किनारा कभी-कभी मेरे हाथ से छू जाता। दोनों जानबूझकर अनदेखा कर देते।
दोपहर तक घर में एक अजीब सी बेचैनी फैल चुकी थी। मैं अपने कमरे में लेटा रहा, लेकिन ध्यान कहीं और था। दीदी का कमरा मेरे कमरे के ठीक बगल में था। उनकी हर छोटी आवाज़ सुनाई दे रही थी—पंखे की आवाज़, बिस्तर की हल्की सी कर्कश, कभी-कभी उनका लंबा साँस छोड़ना।
शाम को चार बजे के आसपास दीदी मेरे कमरे में आईं। दरवाज़ा खुला छोड़कर अंदर आ गईं और मेरे बिस्तर के किनारे बैठ गईं। उनके चेहरे पर थकान साफ थी।
“रोहन, मेरा सर बहुत दुख रहा है,” उन्होंने कहा। आवाज़ में शिकायत से ज्यादा थकावट थी। “तू थोड़ी देर मालिश कर देगा?”
मैं उठकर बैठ गया। पहले तो मन में हिचकिचाहट हुई। लेकिन मना करना और भी अजीब लगता। मैं उनके पीछे खड़ा हो गया। उन्होंने बाल एक तरफ कर दिए। मेरी उंगलियाँ जब उनके सिर पर पड़ीं तो उनकी त्वचा गर्म थी। मैंने धीरे-धीरे मालिश शुरू की। पहले सिर्फ कनपटी और माथे पर। दीदी की आँखें बंद थीं। उनकी साँसें धीमी और लंबी हो रही थीं।
थोड़ी देर बाद मेरी उंगलियाँ उनके गर्दन के पिछले हिस्से तक चली गईं। वहाँ मांसपेशियाँ कसी हुई थीं। मैंने हल्के दबाव के साथ दबाया। दीदी के मुँह से एक हल्की सी आवाज़ निकली—जैसे राहत की साँस हो। उस आवाज़ ने मेरे अंदर कुछ और जगा दिया।
मालिश करते-करते मेरा ध्यान उनकी नाइटी के खुले गले पर चला गया। ऊपर से उनकी कॉलरबोन और हल्की सी छाती की रेखा दिख रही थी। मैंने जबरन नज़रें हटा लीं, लेकिन उंगलियाँ अब उनके कंधों पर थीं। दीदी ने कोई विरोध नहीं किया। उल्टे वे थोड़ा और पीछे की तरफ झुक गईं, जिससे उनका सर मेरे पेट से छूने लगा।
अचानक उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया और रोका।
“काफी है,” उन्होंने धीमी आवाज़ में कहा। लेकिन हाथ नहीं छोड़ा। दोनों के हाथ कुछ पल तक जुड़े रहे। फिर उन्होंने मेरा हाथ छोड़ दिया और उठकर खड़ी हो गईं।
“धन्यवाद रोहन,” कहकर वे अपने कमरे में चली गईं। दरवाज़ा बंद करते समय उन्होंने एक बार पीछे मुड़कर देखा। हमारी नज़रें मिलीं। दोनों ने जल्दी से नज़रें झुका लीं।
रात का खाना फिर से खामोशी में हुआ। खाना खाने के बाद दीदी टीवी के सामने बैठ गईं। मैं भी जाकर पास बैठ गया। दोनों एक ही सोफे पर थे, लेकिन बीच में थोड़ी दूरी रखी हुई थी। टीवी चल रहा था, लेकिन कोई ध्यान से नहीं देख रहा था।
अचानक बिजली चली गई। पंखा रुक गया। कमरे में अंधेरा और उमस फैल गई। दीदी ने धीरे से कहा, “ऊपर से मोमबत्ती ला। मेरे कमरे में होगी।”
मैं मोमबत्ती लेकर आया। जब मैंने जलाई तो रोशनी में दीदी का चेहरा और साफ दिखा। उनकी आँखें थोड़ी लाल थीं। शायद रोई थीं या फिर नींद की कमी से।
मैं उनके पास सोफे पर बैठ गया। इस बार दूरी पहले से कम थी। दोनों कुछ देर अंधेरे और मोमबत्ती की लौ को देखते रहे। फिर दीदी ने बहुत धीमी आवाज़ में कहा, “रोहन… कल रात छत पर जो हुआ… तू कुछ गलत तो नहीं सोच रहा?”
मैंने जवाब देने से पहले कुछ पल सोचा। “मुझे नहीं पता दीदी। बस… अच्छा लगा।”
वे चुप रहीं। फिर उनका हाथ धीरे से मेरे हाथ तक आया और रुक गया। उंगलियाँ मेरे उंगलियों को छू रही थीं। कोई जोर नहीं था। बस स्पर्श था।
मैंने उनका हाथ पलट दिया और अपनी हथेली उनकी हथेली पर रख दी। दोनों के हाथ अब पूरी तरह जुड़े हुए थे। कमरे में सिर्फ मोमबत्ती की लौ काँप रही थी और दोनों की साँसें।
दीदी ने मेरी तरफ देखा। उनकी आँखों में डर और कुछ और दोनों थे। मैंने धीरे से अपना चेहरा उनके करीब किया। उन्होंने मना नहीं किया। हमारे होंठ बहुत हल्के से छुए। बस एक क्षण के लिए। फिर दोनों पीछे हट गए।
लेकिन इस बार दूरी पहले जैसी नहीं रही।
दीदी ने फुसफुसाकर कहा, “ये बहुत गलत है… हमें रुकना चाहिए।”
मैंने कुछ नहीं कहा। सिर्फ उनका हाथ और कसकर पकड़ लिया।
उस रात सोफे पर बैठे-बैठे दोनों की उंगलियाँ एक-दूसरे में उलझी रहीं। मोमबत्ती की लौ छोटी होती जा रही थी। मेरे लंड में पहले से ही जोरों की सख्ती थी। पैंट के अंदर वह तनकर दुख रहा था। दीदी ने अचानक मेरा हाथ छोड़ा और धीमी आवाज़ में बोलीं, “चल… मेरे कमरे में। यहाँ उमस ज्यादा है।”
मैं उनके पीछे-पीछे गया। दिल जोर-जोर से धधक रहा था। उनके कमरे में खिड़की से हल्की हवा आ रही थी। दीदी बिस्तर पर बैठ गईं। नाइटी में उनके स्तनों का भारी आकार साफ दिख रहा था। निप्पल नाइटी के कपड़े में चुभ रहे थे। मैं दरवाज़े के पास खड़ा रहा। मन में गुनाह और हवस दोनों एक साथ चल रहे थे।
दीदी ने मेरी तरफ देखा और बहुत धीरे से कहा, “इधर आ रोहन।”
मैं पास गया। वे मेरे सामने खड़ी हो गईं। दोनों की साँसें तेज़ थीं। मैंने अपना हाथ उठाकर उनके गाल को छुआ। उन्होंने आँखें बंद कर लीं। इस बार जब होंठ मिले तो पहले जैसा हल्का स्पर्श नहीं था। दोनों ने एक-दूसरे को कसकर पकड़ लिया। मेरी जीभ उनके मुँह में घुस गई। दीदी ने मेरी जीभ चूस ली। चुंबन गहरा और गीला था। उनका थूक मेरे मुँह में मिल रहा था।
मेरा हाथ उनकी कमर पर गया, फिर नाइटी के नीचे सरककर सीधे उनके नितंबों पर। उनकी गांड गोल और नरम थी। मैंने दोनों हाथों से उनकी गांड को जोर से मसलना शुरू कर दिया। दीदी के मुँह से कराह निकल गई। ये भाई बहन सेक्स स्टोरी आप pranaykatha.com पर पढ़ रहे है।उन्होंने मेरा कुर्ता ऊपर खींचकर फेंक दिया। उनके हाथ मेरे सीने पर फिरने लगे, फिर नीचे जाकर मेरे पैंट के ऊपर से मेरे तने हुए लंड को पकड़ लिया।
“कितना सख्त हो गया है तेरा लंड…” वे फुसफुसाईं।
मैंने उनकी नाइटी एक झटके में ऊपर खींच ली। उनके भारी स्तन बाहर आ गए। बड़े-बड़े, गोल, और निप्पल काले और तने हुए। मैंने एक स्तन को मुँह में ले लिया और जोर से चूसने लगा। दाँतों से निप्पल को हल्का काटा। दीदी की कमर लचक गई। दूसरा स्तन मैं हाथ से मसल रहा था।
मैंने उन्हें बिस्तर पर धक्का देकर लिटा दिया। उनकी पैंटी पहले से गीली थी। मैंने पैंटी नीचे खींचकर फेंक दी। उनकी चूत के ऊपर घने काले बाल थे। चूत के होंठ सूजे हुए और चमक रहे थे। मैंने दोनों जाँघें फैला दीं और मुँह उनकी चूत पर लगा दिया। जीभ से उनकी चूत चाटने लगा। क्लिट को चूसा, फिर जीभ अंदर तक घुसा दी। दीदी के मुँह से जोर की कराह निकली। उन्होंने मेरे बाल पकड़कर अपना मुँह और जोर से मेरी चूत में दबाना शुरू कर दिया।
“आह्ह… रोहन… जीभ और अंदर… मेरी चूत चाट…”
मैंने दो उंगलियाँ उनकी चूत में डाल दीं और अंदर-बाहर करने लगा। उनकी चूत गर्म और बहुत तंग थी। पानी की तरह गीली हो चुकी थी। मेरे चेहरे पर उनका रस लग रहा था।
फिर मैं उठा। अपनी पैंट और अंडरवियर एक साथ नीचे गिरा दिए। मेरा लंड साढ़े छह इंच लंबा और मोटा, नसों से भरा हुआ, सीधा खड़ा था। दीदी ने उसे देखा और आँखें फैला लीं। मैंने उनके पैर और चौड़े किए। लंड का सुपाड़ा उनकी चूत के मुहाने पर रखा और धीरे से धक्का मारा।
पहले तो सिर्फ टोपा अंदर गया। दीदी दर्द से चीखने को हुईं लेकिन आवाज़ दबा ली। मैंने और धक्का मारा। आधा लंड उनकी चूत में घुस गया। वे नाखून मेरे पीठ में चुभा रही थीं।
“आह्ह्ह… धीरे… बहुत मोटा है तेरा लंड… फट जाएगी मेरी चूत…”
मैंने रुके बिना और अंदर धकेला। पूरा लंड उनकी चूत में समा गया। दोनों की साँसें अटक गईं। मैं कुछ पल रुका रहा, फिर धीरे-धीरे चोदना शुरू किया। हर धक्के के साथ उनकी चूत मेरे लंड को चूस रही थी। थप-थप की आवाज़ निकलने लगी।
मैंने गति तेज कर दी। दीदी के स्तन जोर-जोर से हिल रहे थे। मैंने दोनों स्तनों को पकड़कर मसलते हुए और जोर से चुदाई की। दीदी अब दर्द भूल चुकी थीं। वे अपनी गांड उठा-उठाकर मेरे धक्कों का जवाब दे रही थीं।
“चोद… जोर से चोद अपनी दीदी को… मेरी चूत फाड़ दे… आह्ह्ह…”
मैंने उनकी टाँगें अपने कंधों पर रख लीं। इस पोजीशन में लंड और गहरा जा रहा था। हर धक्के के साथ उनके अंदर तक पहुँच रहा था। दीदी की चूत से पानी निकलकर मेरे लंड और अंडों तक बह रहा था। मैंने उनकी गांड के छेद पर उंगली फेरी। वे सहम गईं लेकिन मना नहीं किया। मैंने धीरे से एक उंगली उनकी गांड में डाल दी और साथ-साथ चूत में लंड चलाता रहा।
दीदी पागलों की तरह कराह रही थीं। “दोनों छेद… हरामी… अपनी दीदी की गांड और चूत दोनों फाड़ रहा है…”
मैं और बेकाबू हो गया। तेज-तेज धक्के मारने लगा। बिस्तर जोर-जोर से खटखटा रहा था। दीदी के शरीर में अचानक तेज कंपन दौड़ गया। वे मेरे नीचे छटपटाते हुए झड़ गईं। उनकी चूत मेरे लंड को जोर से जकड़ रही थी। ये भाई बहन सेक्स स्टोरी आप pranaykatha.com पर पढ़ रहे है। उनकी हालत देखकर मैं भी अपने आप को रोक नहीं पाया। अंतिम जोरदार धक्कों के साथ मैंने अपना पूरा गरम पानी उनकी चूत के अंदर उड़ेल दिया। धारें छोड़ता रहा जब तक लंड एकदम खाली नहीं हो गया।
दोनों पसीने और रस से लथपथ एक-दूसरे से चिपके रहे। दीदी की चूत से मेरा पानी बाहर निकलकर बिस्तर पर फैल रहा था। उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे, लेकिन उन्होंने मुझे और कसकर पकड़ लिया।
बहुत देर बाद वे बोलीं, “ये सिर्फ आज की बात है… कल से हम फिर भाई-बहन रहेंगे।”
मैंने कुछ नहीं कहा। बस अपना लंड उनकी चूत से निकाला। वह अभी भी आधा सख्त था।
लेकिन अगली रात फिर वही हुआ। मैंने दीदी को कुत्ते की पोजीशन में चोदा। उनकी गांड के छेद में भी लंड डालने की कोशिश की। वे गालियाँ देती रहीं और साथ-साथ और जोर से चुदवाती रहीं।
जब तक मम्मी-पापा नहीं लौटे, तब तक मैं अपनी दीदी की चूत और गांड हर रात चोदता रहा। कभी उनके मुँह में लंड ठूसता, कभी उनकी चूत में पानी भरता।
अब भी जब घर में मौका मिलता है, तो मैं दीदी की चूत में अपना लंड डालकर पुरानी भूख बुझाता हूँ।
