अशोक अंकल ने मेरी वर्जिन चूत फाड़ दी | हिंदी वर्जिन सेक्स स्टोरी

मेरा नाम थी अनन्या। उम्र उन्नीस। कॉलेज के दूसरे साल में पढ़ती थी। घर मध्यमवर्गीय था। पापा प्राइवेट नौकरी करते थे, मम्मी घर सँभालतीं। हमारा एक रिश्तेदार परिवार था जो शहर के अच्छे इलाके में रहता था। उनमें से एक थे अशोक अंकल।

अशोक अंकल उम्र में पैंतालीस-छियालीस के होंगे। शरीर से मजबूत, कंधे चौड़े, बाजू मोटी। चेहरे पर हल्की दाढ़ी रखते थे जो उन्हें और परिपक्व बनाती। पैसे वाले थे। बिजनेस था उनका। घर बड़ा, गाड़ी अच्छी, और बात करने का अंदाज शांत लेकिन वजनदार। जब भी परिवार के फंक्शन में आते तो सब उनका सम्मान करते। मैं बचपन से उन्हें अंकल कहती आ रही थी। लेकिन पिछले एक-दो सालों में मेरी नजरें उन पर थोड़ा differently पड़ने लगी थीं।

शुरुआत हुई कॉलेज के दिनों से।

मैं और मेरी सहेलियाँ कभी-कभी कॉलेज से छुट्टियाँ मारकर मॉल या कैफे चली जातीं। एक दिन हम लोग शहर के बड़े मॉल में घूम रहे थे। मैं जीन्स और क्रॉप टॉप में थी। हँसी-मजाक चल रहा था। तभी अचानक नजर अशोक अंकल पर पड़ी। वे अपने किसी बिजनेस पार्टनर के साथ कॉफी शॉप से निकल रहे थे। हमारी नजरें मिलीं। मैं सहम गई। सहेलियाँ कुछ समझ नहीं पाईं। अशोक अंकल ने सिर्फ हल्के से सिर हिलाया और चले गए। उन्होंने न तो मुझे बुलाया, न बाद में घर पर कुछ कहा।

उस रात नींद नहीं आई। डर था कि वे पापा को बता देंगे। लेकिन उन्होंने कुछ नहीं कहा। अगले फंक्शन में जब मिले तो पहले जैसे ही सामान्य रहे। बस उनकी नजरों में कुछ अलग था। जैसे कोई बात उन्होंने अपने तक रख ली हो।

दूसरी घटना दो महीने बाद हुई।

मेरी सहेली का बर्थडे था। हम लोग देर शाम को एक रेस्टोरेंट से निकल रहे थे। मैंने थोड़ी जीन्स टाइट पहन रखी थी। अशोक अंकल की गाड़ी वहीं खड़ी निकली। वे अकेले थे। उन्होंने मुझे देखा। खिड़की नीचे की और बोले, “अनन्या, घर तक छोड़ दूँ?”

सहेलियाँ चिढ़ाने लगीं। मैंने मना किया, लेकिन वे रुके रहे। आखिर मैं बैठ गई। गाड़ी में अंधेरा था। उनके हाथ स्टीयरिंग पर थे। बातें सामान्य रहीं—पढ़ाई कैसी चल रही है, कॉलेज कैसा है। लेकिन हवा में एक अजीब तनाव था। जब उन्होंने मुझे घर के पास उतारा तो बोले, “अगली बार अकेली इतनी देर मत निकला कर। और हाँ… वह मॉल वाली बात मेरे तक ही रहेगी।”

मैंने सिर्फ धन्यवाद कहा। लेकिन उनके कहने का तरीका… जैसे कोई शर्त नहीं थी, सिर्फ एक नरम कोना था।

तीसरी घटना और करीब ले आई।

घर में कोई छोटा फंक्शन था। अशोक अंकल आ شب रुक गए। रात को सब सो गए तो मैं पानी पीने किचन गई। वे बालकनी में खड़े सिगरेट पी रहे थे। मैंने पीछे मुड़कर देखा। उन्होंने मुझे बुलाया।

“इधर आ।”

मैं गई। ठंडी हवा चल रही थी। वे मुझे ऊपर से नीचे तक देख रहे थे। “तू बड़ी हो गई है अनन्या। बहुत जल्दी।”

मैंने कुछ नहीं कहा। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। उन्होंने मेरी तरफ हाथ बढ़ाया और मेरे गाल को हल्के से छुआ। “कॉलेज की लड़कियाँ अब बहुत आगे सोचती हैं। तू भी?”

मैं सहम गई। “अंकल…”

“सो जा,” उन्होंने हाथ वापस ले लिया। “कल बात करते हैं।”

उस रात मैं बिस्तर पर लेटी-लेटी उनके स्पर्श को महसूस करती रही। गाल पर उंगलियों का अहसास कई देर तक रहा।

फिर वह वीकेंड आया।

मेरी मम्मी-पापा को बाहर जाना था। दो दिन की शादी में। मैं अकेली घर रहती तो वे चिंतित रहते। अशोक अंकल ने खुद कहा, “अनन्या हमारे घर रह ले। घर बड़ा है, आंटी भी हैं। कोई दिक्कत नहीं।”

मम्मी-पापा राजी हो गए। मैं उनके घर पहुँच गई। आंटी उस वीकेंड अपनी मायके गई हुई थीं। घर में सिर्फ अशोक अंकल और मैं था।

पहले दिन सब सामान्य रहा। खाना, टीवी, बातें। लेकिन रात को जब मैं अपने कमरे में गई तो नींद नहीं आई। बारह बजे के आसपास प्यास लगी। पानी लेने नीचे गई। लिविंग रूम में हल्की रोशनी थी। अशोक अंकल सोफे पर बैठे व्हिस्की पी रहे थे। उन्होंने मुझे देखा।

“नहीं सोई?”

“नींद नहीं आ रही अंकल।”

उन्होंने गिलास रखा। “इधर आ। बैठ।”

मैं उनके पास सोफे पर बैठ गई। दूरी कम थी। उनकी टी-शर्ट में बाजू की मांसपेशियाँ साफ दिख रही थीं। उन्होंने मेरी तरफ देखा। “तू जानती है मैंने वह मॉल वाली बात क्यों नहीं बताई?”

मैंने सिर झुकाया। “नहीं।”

“क्योंकि तू मुझे पसंद है। गलत तरीके से।”

मेरा दिल बैठ गया। मैं कुछ बोल नहीं पाई। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया। उनकी हथेली गरम और बड़ी थी। “अगर तू अभी उठकर चली जाए, तो मैं कुछ नहीं कहूँगा। लेकिन अगर तू बैठी रही… तो फिर आज रात मैं तुझे नहीं छोड़ूँगा।”

मैं नहीं उठी।

अशोक अंकल ने मुझे अपनी तरफ खींचा और चूम लिया। उनका चुंबन भूखा था। जीभ ने मेरे मुँह में घुसकर जगह बनाई। मैंने उनकी छाती पर हाथ रखा। वे मुझे और पास खींचते गए। उनका हाथ मेरी टी-शर्ट के नीचे चला गया। ब्रा के ऊपर से उन्होंने मेरे स्तन को दबाया। मैं सहम गई, लेकिन मना नहीं किया।

उन्होंने मेरी टी-शर्ट ऊपर कर दी। ब्रा खोली। मेरे स्तन बाहर आ गए। उन्होंने झुककर एक निप्पल मुँह में ले लिया और जोर से चूसा। मैंने उनके बाल पकड़ लिए। आवाज निकल गई। वे दोनों स्तनों को बारी-बारी से चूसते रहे, काटते रहे, मसलते रहे। मेरी कमर लचकने लगी।

“अंकल… धीरे…”

“आज धीरे नहीं चलेगा,” उन्होंने कहा। “तू वर्जिन है ना?”

मैंने शर्म से सिर हिलाया। उन्होंने मेरी जीन्स का बटन खोला। जिपर नीचे किया। पैंटी के ऊपर से ही मेरी चूत को सहलाया। गीली हो चुकी थी। उन्होंने पैंटी साइड में की और उंगली अंदर डालने की कोशिश की। बहुत टाइट था। सिर्फ एक उंगली मुश्किल से अंदर गई। मैंने दर्द से कराह दी।

“इतनी टाइट… आज फट जाएगी तेरी।”

वे मुझे गोद में उठाकर बेडरूम में ले गए। बिस्तर पर लिटाया। मेरी जीन्स और पैंटी पूरी तरह उतार दी। मैं नंगी लेटी थी। वे भी कपड़े उतारने लगे। जब उनका लंड बाहर आया तो मेरी आँखें फटी की फटी रह गईं। मोटा, लंबा, नसों से भरा हुआ। सिरे पर चमक। मैंने डरते हुए कहा, “अंकल… इतना… अंदर नहीं जाएगा…”

“जाएगा,” उन्होंने कहा। “दर्द होगा। लेकिन जाएगा।”

उन्होंने मेरे पैर फैलाए। खुद नीचे झुककर मेरी चूत पर मुँह रखा। जीभ से चाटा। क्लिट को चूसा। उंगली धीरे-धीरे अंदर-बाहर की। मैं तड़पने लगी। फिर वे ऊपर आए। लंड की नोक मेरी चूत पर रखी। हल्का दबाव। सिरा अंदर गया। दर्द हुआ। और दबाव। आधा। मैंने उनके कंधे में नाखून गाड़ दिए। आँखों से आँसू आ गए।

“आह्ह… अंकल… दर्द… हो रहा है…”

उन्होंने एक जोर का धक्का मारा। पूरा लंड अंदर तक चला गया। मुझे लगा जैसे कुछ फट गया हो। तेज दर्द। मैं चीख पड़ी। आँसू बहने लगे। अशोक अंकल रुके रहे। मेरी चूत उनके मोटे लंड को जोर से कस रही थी। खून की हल्की गर्मी महसूस हुई।

“अब साँस ले,” उन्होंने कहा। “आदत पड़ जाएगी।”

धीरे-धीरे उन्होंने हिलना शुरू किया। छोटे धक्के। हर धक्के पर दर्द होता, लेकिन बीच-बीच में कुछ और भी महसूस होने लगा। वे मेरे स्तन चूसते रहे। मेरे होंठ चूमते रहे। धीरे-धीरे दर्द कम होने लगा। मैंने उनकी कमर पर पैर लपेट लिए।

“अब… थोड़ा तेज…”

अशोक अंकल ने रफ्तार बढ़ाई। अब धक्के गहरे और जोर के होने लगे। बिस्तर चरमरा रहा था। मेरी वर्जिन चूत उनके लंड से फैल रही थी। खून और पानी मिलाजुला था। वे जोर-जोर से पेल रहे थे। कभी मेरे बाल पकड़ते, कभी स्तन मसलते।

“तेरी चूत फट गई अनन्या… अंकल का लंड ले रही है तू…”

“हाँ… ले रही हूँ… अह्ह… और जोर से…”

वे मुझे पलटा कर घोड़ी बना दिया। पीछे से और गहराई तक घुसे। इस बार दर्द के साथ मजा भी साफ था। वे मेरी कमर पकड़कर जोर-जोर से पेलने लगे। थप-थप की आवाज पूरे कमरे में गूँज रही थी। मैं कराह रही थी। आँसू अभी भी थे, लेकिन अब रोक नहीं रही थी।

काफी देर तक वे मेरी चूत चोदते रहे। फिर लंड निकाला। खून से सना हुआ था। उन्होंने मुझे फिर से पीठ के बल लिटाया और फिर से घुसा दिया। अब और बेकाबू होकर। मेरे पैर उनके कंधों पर थे। वे पूरा वजन डालकर पेल रहे थे। मैं एक बार झड़ गई। शरीर काँप उठा। वे भी उसी समय जोर से धकेलकर अंदर ही झड़ गए। गर्म वीर्य की धार मेरी फटी हुई चूत में छूटती रही।

वे मेरे ऊपर गिरे रहे। दोनों पसीने से लथपथ। मेरी जाँघों के बीच खून और वीर्य मिला हुआ बह रहा था। चूत जल रही थी, सूजी हुई थी।

अशोक अंकल ने मेरा चेहरा सहलाया। “अब तू मेरी हो गई। वर्जिन नहीं रही।”

मैं बोल नहीं पाई। सिर्फ उनकी छाती से चिपक गई।

उस वीकेंड वे मुझे बार-बार लेते रहे। सुबह, दोपहर, रात। हर बार मेरी चूत में दर्द होता, लेकिन मैं मना नहीं करती। वे मेरा मुँह भी इस्तेमाल करते, मेरी गाँड भी आजमाते। जब मैं घर लौटी तो चलने में दर्द हो रहा था। लेकिन अंदर एक अजीब सुकून था।

अब जब भी परिवार के फंक्शन में अशोक अंकल मिलते हैं, तो हमारी नजरें एक सेकंड ज्यादा रुकती हैं। और मुझे याद आ जाता है कि उनकी मोटी लंड ने मेरी वर्जिन चूत कैसे फाड़ी थी।

अशोक अंकल ने मेरी वर्जिन चूत फाड़ दी।
और मैंने उन्हें रोकने की कोई कोशिश नहीं की।

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