तुम्हारी रांड हूँ… तुम्हारी भाभी रांड | देवर भाभी की चुदाई की कहानी

Hello दोस्तों, मेरा नाम राहुल है, मैं 22 साल का हूँ, दिल्ली का रहने वाला हूँ। मेरी फैमिली में मैं, मेरे पापा, मम्मी, मेरा बड़ा भाई रोहित, और मेरी भाभी प्रिया रहती हैं। भाई की शादी को अभी सिर्फ 8 महीने हुए हैं। भाभी की उम्र 24 साल है, रंग गोरा, कद 5’4″, चूचियाँ 34D जैसी कसी हुई, गांड 36 की गोल, और चूत… वो तो मैंने बाद में देखी। भाई एक MNC में काम करता है, हफ्ते में 4-5 दिन ट्रैवल पर रहता है। घर में मम्मी-पापा अपने कमरे में रहते हैं, और मैं… मैं तो भाभी को देखने के लिए ही रहता हूँ।


ये पहले महीने की बात है, शादी के बाद जब भाभी घर में आई थीं। मैं सुबह उठा, किचन में गया चाय बनाने। भाभी पहले से वहाँ थीं, साड़ी में, पीठ मेरी तरफ। वो झुकीं, चाय की पत्ती निकालने के लिए, और उनकी साड़ी का पल्लू कंधे से गिरा। ब्लाउज की डोरी खुली थी, पीठ की तरफ से ब्रा का हुक दिख रहा था, और साइड से… चूची का गोरा हिस्सा, निप्पल का किनारा। मैं रुक गया। साँसें रुक गईं। लंड तुरंत खड़ा हो गया। वो पलटीं, मुझे देखा, मेरी आँखों की दिशा समझीं, शर्माईं, पर हड़बड़ाई नहीं। धीरे से पल्लू ठीक किया, पर ब्लाउज की डोरी जानबूझकर नहीं बाँधी।

“राहुल, चाय?” उन्होंने पूछा, आवाज़ में कुछ था जो पहले नहीं था।

“हाँ… हाँ भाभी…” मैंने हकलाते हुए कहा।

वो मुस्कुराईं, और मेरे पास से गुज़रीं, इतने पास कि उनकी चूची मेरे हाथ से रगड़ी। जानबूझकर या अनजाने, पता नहीं। पर मैंने महसूस किया, वो गर्म थीं, नरम थीं, और मेरा लंड और तेज़ खड़ा हो गया। मैं वहीं खड़ा रहा, उनकी गांड देखते हुए, जो साड़ी में से ऐसे मटक रही थी जैसे किसी ने दो गोले कपड़े में बाँध दिए हों।


फिर एक हफ्ते बाद की बात है, मैं अपने कमरे में था, दरवाज़ा बंद नहीं किया था। मैंने सोचा कोई नहीं है, मम्मी-पापा बाज़ार गए हैं। मैंने अपना लंड निकाला, एक मैगज़ीन देखते हुए हिलाने लगा। भाभी का ख्याल था, उनकी चूची, उनकी गांड, उनकी साड़ी में कसी हुई कमर। मैं तेज़ हिला रहा था, आँखें बंद, जब आवाज़ आई।

“राहुल, तुम्हारी चाय…”

मैंने आँखें खोलीं। भाभी दरवाज़े पर खड़ी थीं, ट्रे हाथ में, आँखें मेरे लंड पर टिकी हुईं। मैंने जल्दी से कुछ ढाँपने की कोशिश की, पर वो देख चुकी थीं। मेरा लंड, 7 इंच लम्बा, मोटा, लाल, और मैं हिलाते हुए पकड़ा हुआ। वो कुछ देर खड़ी रहीं, मुझे देखती रहीं, फिर… मुस्कुराईं।

“चाय ठंडी हो जाएगी,” बोलीं, ट्रे टेबल पर रखी, और चली गईं। पर पलटकर देखा, मेरी पैंट की ओर, फिर मेरी आँखों में, और एक इशारा किया जो मैंने समझा नहीं तब, पर बाद में समझा। मैंने उस दिन तीन बार हिलाया। और रात को, जब सब सोए, मैंने सुना। भाभी के कमरे से आवाज़ें, हल्की सी, सिसकी सी। मैं दरवाज़े के पास गया, कान लगाया।

“ऊह्ह… राहुल… तुम्हारा लंड…”

मेरी साँसें रुक गईं। वो मेरा नाम ले रही थीं, अपनी चूत सहलाते हुए। मैंने अपना लंड निकाला, दरवाज़े के पास खड़े होकर हिलाया, उनकी आवाज़ें सुनते हुए। जब वो झड़ीं, “आह्ह… राहुल… हाँ…” मैं भी झड़ गया, दीवार पर, और चुपचाप अपने कमरे में आ गया।


ये तीसरे महीने की बात है, वो बारिश की रात थी, घर की बिजली गई हुई थी, घर में और बाहर घुप अँधेरा था। मैं कैंडल लेकर बाथरूम जा रहा था, भाभी सामने से आईं। गीले बाल, नाइटी गीली, बारिश में भीगी हुई। नाइटी चिपकी हुई थी, चूचियाँ साफ दिख रही थीं, निप्पल खड़े, ब्रा नहीं थी शायद। नीचे, नाइटी चिपकी हुई, चूत का उभार, बालों की लकीर। हम टकराए। कैंडल गिरी, बुझी। अँधेरा।

मैंने संभालने के लिए हाथ बढ़ाया, उनकी कमर पकड़ी। वो गिरने से बचीं, मेरे ऊपर गिरीं। मेरा हाथ उनकी कमर पर था, दूसरा… उनकी चूची पर। गीली, नरम, कसी हुई, और निप्पल… खड़ा, मेरी हथेली में। हम दोनों रुक गए। साँसें मिली हुईं, मेरा लंड उनकी जाँघ से सटा हुआ, खड़ा, मोटा। वो महसूस कर रही थीं, मैं जानता था।

“राहुल…” उन्होंने धीरे कहा, “तुम्हारा हाथ…”

“सॉरी भाभी…” मैंने हटाया।

“नहीं…” उन्होंने मेरा हाथ रोका, वहीं रखा, चूची पर। “रुको…”

हम अँधेरे में खड़े रहे, मेरा हाथ उनकी चूची पर, उनका हाथ मेरे हाथ पर। फिर उन्होंने धीरे से दबाया, मेरा हाथ, अपनी चूची पर। “ऐसे…” बोलीं, “दबाओ…”

मैंने दबाया, धीरे, फिर ज़ोर से। वो काँपीं, “ऊह्ह… हाँ…”

फिर अचानक, दरवाज़े की आवाज़। मम्मी-पापा आ गए। वो हटीं, मैं हटा, और दोनों अपने कमरे में भागे। पर वो रात, मैंने हिलाया, उनकी चूची का ख्याल लेकर, और मैंने सुना, उनके कमरे से भी आवाज़ें आईं, पच पच की, गीली, और फिर एक लंबी साँस, “राहुल…”


उसके बाद कुछ बदल गया। भाभी अब और भी खुली हो गईं। सुबह नहाने के बाद, दरवाज़ा थोड़ा खुला, वो झुकी, तौलिये से पैर पोंछती, उनकी गांड, गोरी, गोल, पूरी दिखती। रसोई में झुककर बर्तन मांजती, साड़ी ऊपर, जाँघें, कभी-कभी पैंटी का किनारा। और वो मुझे देखती, मुस्कुराती, कभी कुछ नहीं कहती।

एक दिन, मैं सोफे पर बैठा था, वो आईं, मेरे पास बैठीं, इतने पास कि उनकी जाँघ मेरी जाँघ से सटी। “राहुल,” बोलीं, “कल रात मैंने सपना देखा।”

“क्या भाभी?”

“तुम्हें… और मुझे… हम…”

मैंने मुड़कर देखा, वो मेरी आँखों में देख रही थीं, साँसें तेज़, होठ थोड़े खुले। मैंने कुछ नहीं कहा, वो भी नहीं। फिर वो उठीं, मेरे कान में फुसफुसाईं, “मैंने भी यही सपना देखा।” और चली गईं, पर पलटकर देखा, मेरी पैंट में उभार, और मुस्कुराईं।


आज आठवाँ महीना है, और भाई फिर बाहर है, 3 दिन के लिए। मम्मी-पापा कल सुबह गाँव जा रहे हैं, 2 दिन के लिए। घर में कल से सिर्फ मैं और भाभी। शाम को, मैं TV देख रहा था। भाभी आईं, लाल साड़ी में, इतनी पतली कि अंदर का ब्लाउज, ब्रा, सब कुछ साफ दिख रहा था। गीले बाल, ताज़ी नहाई हुई, खुशबू… इतनी मीठी कि मेरा लंड तुरंत खड़ा हो गया।

वो मेरे बगल में बैठीं, इतने पास कि उनकी साड़ी मेरी जींस पर आ गई। “राहुल,” बोलीं, मेरे कान में, “कल… कल घर में कोई नहीं होगा।”

“हाँ भाभी…”

“मैं… मैं अकेली रहूँगी…” उन्होंने कहा, मेरा हाथ पकड़ा, अपनी जाँघ पर रखा। साड़ी के नीचे, नंगी जाँघ, गोरी, गर्म, नरम। मेरा हाथ काँप रहा था, पर वो उसे वहीं रखा, और धीरे से ऊपर ले गईं, पेटीकोट के नीचे, चूत के पास। गीली, गर्म, नरम बाल, और वो दरार जो मेरे लंड को बुला रही थी।

“भाभी…” मैंने कहा, साँसें रुकी हुईं।

“रात को आना,” उन्होंने कहा, मेरे कान में काटा, “मेरे कमरे में। दरवाज़ा खुला रहेगा। और मैं…” वो उठीं, मेरी तरफ पीठ करके साड़ी का पल्लू गिराया, पीठ, गोरी, नंगी, ब्रा की डोरी। फिर… ब्रा की डोरी खोली, ब्लाउज का हुक खोला, और साड़ी का पल्लू फर्श पर गिरा। वो ऊपर से नंगी थीं, सिर्फ पेटीकोट में, चूचियाँ बाहर, गोरी, कसी हुई, निप्पल खड़े, मेरे सामने।

“कल रात,” वो बोलीं, मुड़कर, चूचियाँ मेरे सामने, “मैं यूँ ही इंतज़ार करूँगी।”

वो नंगी खड़ी थीं, चूत साफ, गोरी, गीली, चमकती हुई, पेटीकोट में। मैं देखता रहा, लंड फटने को, और वो मुस्कुराईं, मेरे कमरे से निकलीं, नंगी, चूचियाँ हिलती हुईं, गांड मटकाती हुई, पेटीकोट का नाड़ा हाथ में, जैसे कह रही हों – आओ, खोलो, चोदो।

मैं बैठा रहा, लंड खड़ा, हाथ में उनकी गीली चूत का एहसास, और कल रात का इंतज़ार। 8 महीने की तड़प, 8 महीने की भूख, कल रात पूरी होगी।

वो रात आ गई। मम्मी-पापा सुबह ही गाँव चले गए थे, और अब घर में सिर्फ मैं और भाभी। मैं अपने कमरे में था, लंड खड़ा, काँप रहा था। बारह बजे, घर में सन्नाटा, मैं उठा, चुपचाप भाभी के कमरे की तरफ बढ़ा।

दरवाज़ा… खुला था। अंदर अँधेरा, पर moonlight से उसे देखा। बिस्तर पर लेटी, नंगी, चूचियाँ ऊपर की ओर, पैर मोड़े, एक हाथ अपनी चूची पर, दूसरा… नीचे। वो अपनी चूत सहला रही थी, आँखें बंद, होठ कटे हुए।

“राहुल…” वो फुसफुसाई, शायद सपने में, शायद जानती थी मैं आऊँगा।

मैं अंदर आया, दरवाज़ा बंद किया। वो खुली, मेरी तरफ देखा, हाथ नहीं हटाया। “आ गए?” वो बोली, आवाज़ में वो प्यास जो 8 महीने से जल रही थी।

“हाँ भाभी…”

“आज कोई भाभी नहीं,” वो उठी, मेरे पास आई, नंगी, चूचियाँ हिलती हुईं, चूत से पानी टपकता हुआ। “आज मैं तुम्हारी हूँ। बस तुम्हारी।”

मैंने कुछ नहीं कहा। वो मेरा हाथ पकड़ा, अपनी चूत पर रखा। गीली, गर्म, नरम बाल, और वो दरार जो मेरे लंड को बुला रही थी। “महसूस करो,” वो बोली, “कितनी भूखी है। 8 महीने से कोई नहीं आया इसमें। तुम्हारे भाई ने… कभी पूरा नहीं किया। वो तो आता है, सोता है, और चला जाता है। मेरी चूत रोज़ रोती है।”

मैंने उँगली फेराई, वो काँप उठी, “ऊह्ह… हाँ… वहीं…”

“आज रोएगी नहीं,” मैंने कहा, “आज चीखेगी।”

वो मुस्कुराई, शरारती, प्यासी। “तो फिर खोलो अपने कपड़े। मैं देखना चाहती हूँ वो लंड जिसे मैंने उस दिन देखा था।”

मैंने कपड़े उतारे, एक-एक करके। शर्ट, पैंट, अंडरवियर। मेरा लंड बाहर निकला, 7 इंच, मोटा, लाल, टाइट, और पूरी तरह खड़ा। वो देखती रही, आँखें बड़ी, होठ खुले।

“बड़ा है तुम्हारा,” वो बोली, “तुम्हारे भाई से बड़ा।”

“चुसो,” मैंने कहा, “देखो कितना बड़ा है।”

वो झुकी, मेरे लंड के सामने, चूचियाँ लटकती हुईं। पहले जीभ निकाली, टिप पर लगाई, चाटा। मैं काँप उठा। फिर मुँह में लिया, धीरे, गहरा, और चूसने लगी। आह्ह… क्या चूस रही थी, जैसे कोई पच्ची दूध पी रही हो, चप चप की आवाज़, और मेरा लंड पूरा गीला।

“ऊह्ह… भाभी… और गहरा…”

वो और गहरा लिया, गला तक, फिर बाहर निकाला, जीभ से चाटा, फिर अंदर। मेरा लंड फटने को था, मैंने उसके बाल पकड़े, और चोदने लगा उसका मुँह। वो चिल्लाई नहीं, और लेती रही, आँखें ऊपर करके मुझे देखती, मुस्कुराती।

“बस,” मैंने रोका, “नहीं तो झड़ जाऊँगा। आज तुम्हारी चूत में झड़ना है।”

वो लेट गई, पैर फैलाए, चूत सामने, गोरी, गीली, चमकती हुई। “तो आओ,” वो बोली, “आज इसे अपना बनाओ।”

मैं ऊपर गया, लंड हाथ में, चूत के मुँह पर रखा। गीली थी, गर्म थी, और इतनी टाइट कि मुँह में जाने को तरस रहा था। मैंने धक्का दिया, आधा अंदर गया, वो चीखी।

“आह्ह… राहुल… धीरे… बहुत बड़ा है…”

“सहन करो,” मैंने कहा, और और धक्का दिया, पूरा अंदर। वो चिल्लाई, “ऊउउह्ह्ह… फट गई… मेरी चूत फट गई…”

“फटने दो,” मैंने कहा, और चोदना शुरू किया। धीरे, फिर तेज़, फिर ज़ोर से। वो चिल्लाती रही, “आह्ह… आह्ह… और तेज़… और ज़ोर से…”

मैंने पकड़ी उसकी चूचियाँ, कसकर, नोचा, और चोदता रहा। वो नीचे से कमर उठा रही थी, मेरा साथ दे रही थी। “हाँ… हाँ… वहीं… और अंदर…”

“चुदती रही,” मैंने कहा, “रांड की तरह चुदती रही।”

“हाँ… मैं तुम्हारी रांड हूँ… तुम्हारी भाभी रांड… चोदो मुझे… रोज़ चोदो…”

मैंने उसके पैर कंधे पर रखे, और और गहरा चोदा। वो चीखी, रोई, और हँसी, “ऊउउह्ह्ह… मैं झड़ने वाली हूँ…”

“रुको,” मैंने कहा, “अभी नहीं।”

मैंने बाहर निकाला, उसे घुमाया, कुत्ते की तरह घुटनों पर लाया। उसकी गांड सामने, गोरी, गोल, और चूत पीछे से दिख रही थी, गीली, लाल, फैली हुई। मैंने पीछे से डाला, एक ही धक्के में पूरा अंदर।

“आह्ह्ह… मेरी माँ… इतना गहरा…”

“यही तुम्हें चाहिए था ना,” मैंने कहा, उसकी कमर पकड़ी, और पीछे से चोदने लगा। चप चप की आवाज़, उसकी चूत से पानी निकल रहा था, मेरे लंड पर, मेरी जाँघों पर।

“हाँ… यही… यही चाहिए था… 8 महीने से… ऊह्ह…”

मैंने उसकी गांड पर थप्पड़ मारा, लाल निशान छोड़ दिया। “ये गांड किसकी है?”

“तुम्हारी… सिर्फ तुम्हारी…”

“ये चूत किसकी है?”

“तुम्हारी… चोदो… और चोदो…”

मैंने और तेज़ चोदा, उसकी चूचियाँ हाथ में ली, कसकर, और अंत में, जब वो झड़ी, “आह्ह्ह… राहुल… मैं झड़ गई… झड़ गई…” मैंने भी अपना लंड बाहर निकाला, उसकी गांड पर, उसकी पीठ पर, और उसके बालों में झड़ दिया।

वो लेट गई, साँसें तेज़, चूत से पानी बह रहा था, गीली, लाल, और मेरी। मैं उसके पास लेटा, उसकी चूची सहलाई।

“कल फिर?” मैंने पूछा।

“कल नहीं,” वो बोली, मुस्कुराते हुए, “रोज़।”

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