सुहागन से रंडी सुहागन तक का मेरा सफर 1
आकाश के साथ वो रात गए लगभग दो हफ्ते हो चुके थे। उसके बाद हम मिले भी थे, दो-तीन बार और। लेकिन हर बार एक अजीब सा डर भी साथ रहता था। राजेश के शक का, सोसाइटी वालों की नजरों का, और सबसे ज्यादा खुद अपने आप से। आकाश अच्छा था, समझदार था, लेकिन मैं महसूस कर रही थी कि मैं सिर्फ उसी तक सीमित नहीं रहना चाहती। अंदर कुछ और भूख जाग रही थी। अलग-अलग मर्दों को महसूस करने की, अपनी चूत को अलग-अलग तरीकों से इस्तेमाल होने देने की। शर्म की बात थी, लेकिन सच था।
उसी दौरान मेरी एक पुरानी सहेली neatू का फोन आया। नाम था रिया। कॉलेज के समय की दोस्त। सालों बाद संपर्क हुआ था। उसने बताया कि वो अपना एक छोटा सा हाउस पार्टी रख रही है। हस्बैंड के कुछ बिजनेस वाले दोस्त और परिवार के लोग आ रहे हैं। “मीना, तू जरूर आना। बहुत दिन बाद मिलेंगे। राजेश को भी ले आना अगर फ्री हो तो।”
राजेश उस वीकेंड व्यस्त था। मैंने अकेले जाने का फैसला किया। मन में एक अजीब उत्सुकता थी। नई जगह, नए चेहरे, और शायद… कुछ नया।
रिया का घर गुरुग्राम में था। बड़ा सा बंगला। जब मैं पहुँची तो पार्टी पहले से शुरू हो चुकी थी। हल्की संगीत, शराब के गिलास, और लोगों की हँसी। मैंने हल्की सी वाइन कलर की साड़ी पहनी थी, ब्लाउज थोड़ा लो नेक था। बाल खुले थे। आईने में खुद को देखा था तो लगा था—आज मैं सिर्फ राजेश की बीवी नहीं लग रही। कुछ और लग रही हूँ।
रिया ने गले लगाया। “अरे मीना! कितनी देर बाद मिली। तू तो और भी गदरा गई है।” मैं मुस्कुराई। “तू भी कम नहीं। बता, यहाँ कौन-कौन है?”
रिया मुझे घुमाते हुए लोगों से मिलाने लगी। तभी एक आदमी ने दूर से मेरी तरफ देखा। लंबा, गेहुँआ रंग, उम्र पैंतालीस के करीब, बालों में हल्के सफेद धागे, लेकिन शरीर संभला हुआ। महंगे कपड़े। उसकी निगाह मुझ पर कुछ देर टिकी रही। फिर उसने नजरें हटा लीं। लेकिन वो एक पल काफी था। मेरे पेट में हल्की सी हलचल हो गई।
थोड़ी देर बाद रिया ने मुझे उसके पास ले गई। “मीना, ये हैं शेखर अंकल… मतलब शेखर जी। बहुत पुराने बिजनेस फ्रेंड हैं मेरे हस्बैंड के। और शेखर जी, ये मेरी कॉलेज फ्रेंड मीना।”
शेखर ने हाथ बढ़ाया। उसका हाथ बड़ा और गरम था। जब उसने मेरा हाथ पकड़ा तो थोड़ी देर तक छोड़ा नहीं। “मीना जी… आप बहुत शांत लगती हैं। पार्टी में आकर भी थोड़ा अलग से खड़ी हो।” मैंने हल्का मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “शायद भीड़ में अजीब लगता है कभी-कभी।” “अकेलापन भीड़ में भी हो सकता है,” उसने धीमे से कहा। उसकी आवाज गहरी और धीमी थी। “खासकर जब घर में भी वही अकेलापन हो।”
मैंने उसकी तरफ देखा। उसकी आँखों में एक थकान थी, और उसके नीचे एक अनुभव। रिया ने बताया था कि शेखर की बीवी दो साल पहले कैंसर से गुजर गई थीं। कोई बच्चा नहीं था। अकेला रहने वाला अमीर आदमी।
हम बात करते रहे। शराब के गिलास खाली होते गए। शेखर ने मुझे ज्यादा सवाल नहीं पूछे। बस धीरे-धीरे मेरी बातें सुनता रहा। कब मेरी शादी हुई, कैसे दिन कटते हैं, राजेश की नौकरी कैसी है। मैं बोलती गई। जितना बोलती गई, उतना हल्का महसूस होता गया। किसी ने इतने ध्यान से मेरी बातें कब सुनी थीं?
थोड़ी देर बाद रिया किसी और मेहमान के पास चली गई। हम दोनों बालकनी में आ गए। बाहर हल्की ठंड थी। शेखर ने अपना कोट मेरे कंधों पर डाल दिया। “ठंड लग रही होगी।” “धन्यवाद।” उसका कोट भारी था और उसमें उसकी खुशबू थी। महंगी अत्तर की। मैंने गहरी साँस ली।
“आप अकेली आई हैं?” उसने पूछा। “हाँ। पति व्यस्त थे।” “अच्छा हुआ। नहीं तो शायद हम इतनी देर बात नहीं कर पाते।”
मैंने उसकी तरफ देखा। वो मुस्कुरा नहीं रहा था। बस देख रहा था। उसकी निगाह मेरे चेहरे से हटकर मेरे होठों पर गई, फिर मेरे गले पर, फिर साड़ी के गड्ढे पर। मैंने पल्लू संभाला, लेकिन जानबूझकर पूरी तरह नहीं ढका। अंदर एक छोटी सी आवाज कह रही थी—मीना, ये क्या कर रही हो। दूसरी आवाज कह रही थी—देखने दे। सालों बाद किसी ने ऐसे देखा है।
“आपकी बीवी…?” मैंने पूछ लिया, फिर पछताई। शेखर ने धीरे से जवाब दिया, “दो साल हो गए। घर बहुत बड़ा लगने लगा है। रातें और भी बड़ी।” मैं चुप रही। उसकी अकेलापन मेरी अकेलापन से मिल रही थी।
थोड़ी देर बाद उसने गिलास नीचे रखा और बोला, “मीना जी, अगर आपको बुरा न लगे तो… क्या मैं आपसे फिर मिल सकता हूँ? पार्टी के बाहर। कहीं शांत जगह पर।”
मेरा दिल तेज धड़कने लगा। आकाश के बाद दूसरा मर्द। इतनी जल्दी। अंदर गुनाह का बोझ और इच्छा एक साथ उठे। मैंने गिलास घुमाया। “मैं… सोचकर बताऊँगी।” “सोचने में जल्दबाजी मत करना,” उसने कहा। “मैं इंतजार कर सकता हूँ। लेकिन आपसे मिलने का मन कर रहा है। सिर्फ बात के लिए नहीं।”
उसकी आखिरी लाइन ने मेरे पेट को और सिमटा दिया। मैंने सिर हिलाया और अंदर चली गई। बाकी पार्टी मैंने जैसे-तैसे काटी। शेखर की निगाह बार-बार मुझ पर पड़ती रही। कभी-कभी हमारे नजरें मिल जातीं तो वो हल्का सा सिर हिला देता। मैं नजरें झुका लेती।
घर लौटते समय गाड़ी में मैं खिड़की से बाहर देख रही थी। मन में आकाश था, राजेश था, और अब शेखर भी था। अंदर एक सवाल घूम रहा था—मैं सच में कितनी दूर तक जाना चाहती हूँ इस रास्ते पर? सुहागन से रंडी सुहागन तक का सफर… क्या मैं वाकई अलग-अलग मर्दों को अपनी चूत देने वाली हूँ?
रात को बिस्तर पर लेटे हुए मैंने मोबाइल खोला। रिया ने शेखर का नंबर भेज दिया था “बिज़नेस के सिलसिले में” के नाम पर। मैंने काफी देर तक नंबर देखा। फिर टाइप किया—
“कल दोपहर को मिल सकते हैं? किसी शांत जगह पर।”
भेजा। दिल जोर से धड़क रहा था। कुछ मिनट बाद जवाब आया—
“जरूर। लोकेशन भेज रहा हूँ। इंतजार रहेगा।”
मैंने फोन रखा। छत की तरफ देखा। अंदर एक डर था, एक उत्तेजना थी, और एक अजीब सी भूख थी जो अब सिर्फ एक मर्द से नहीं भरने वाली थी। आकाश पहला था। शेखर शायद दूसरा। और मुझे लग रहा था कि यह सिलसिला यहीं रुकने वाला नहीं है।
अगले दिन दोपहर का समय था। शेखर ने जो लोकेशन भेजी थी वो गुरुग्राम का एक शांत सा सर्विस्ड अपार्टमेंट था। ऊँची बिल्डिंग, कम लोग। लिफ्ट में जाते समय मेरे हाथ काँप रहे थे। मन में आकाश की याद आ रही थी, राजेश की थकी हुई शक्ल आ रही थी, और अपने आप पर गुस्सा भी आ रहा था। फिर भी मैं रुक नहीं पाई। दरवाजा खुलते ही शेखर ने मुझे अंदर लिया। उसने दरवाजा बंद किया और मेरी तरफ देखा।
“आ गईं,” उसने धीमे से कहा। आवाज में खुशी थी, लेकिन कोई जल्दबाजी नहीं। “हाँ… आई हूँ।”
कमरा बड़ा और साफ था। खिड़की से बाहर शहर दिख रहा था। शेखर ने मुझे पानी दिया। मैंने गिलास पकड़ा तो हाथ काँप रहा था। उसने गिलास मेरे हाथ से लिया और टेबल पर रख दिया। फिर मेरे बहुत करीब आ गया।
“डर लग रहा है?” “हाँ।” “मुझे भी थोड़ा लग रहा है,” उसने कहा। “दो साल बाद पहली बार किसी औरत को इतने करीब से देख रहा हूँ। और वो भी शादीशुदा।”
उसकी बात ने मुझे अजीब सा सुकून दिया। मैं अकेली नहीं थी इस गुनाह में। उसने अपना हाथ बढ़ाकर मेरे गाल को छुआ। फिर धीरे से मेरे होठों पर अपना होंठ रख दिया। चुंबन धीमा था। कोई भूख नहीं, बस एक गहरी जरूरत। मैंने आँखें बंद कर लीं और जवाब दिया। उसकी जीभ जब मेरे मुँह में घुसी तो मेरे शरीर में एक लहर दौड़ गई। उसके हाथ मेरी कमर पर आ गए। साड़ी का पल्लू सरक गया।
“मीना… तुम्हारा शरीर बहुत देर से छूआ नहीं गया लगता है,” उसने मेरे कान में कहा। “बहुत देर से,” मैंने सिसकते हुए जवाब दिया।
उसने मुझे बेडरूम की तरफ ले गया। कपड़े धीरे-धीरे उतरते गए। जब मैं नंगी हुई तो शेखर ने मुझे दूर से देखा। उसकी निगाहें मेरी छातियों पर, पेट पर, जाँघों पर घूम रही थीं।
“कितनी सुंदर हो तुम… और कितनी प्यासी।”
वो भी नंगा हो गया। उसका शरीर उम्र के हिसाब से मजबूत था। लंड मोटा और तना हुआ। मैंने हाथ बढ़ाकर उसे छुआ। गरम। शेखर ने मुझे बिस्तर पर लिटा दिया और मेरे पूरे शरीर को चूमने लगा। गर्दन, कंधे, फिर भारी छातियाँ। एक निप्पल मुँह में लेकर जोर से चूसा। मैंने उसकी गर्दन पकड़ ली।
“आह्ह… जोर से चूसो…”
उसकी उँगली नीचे चली गई। मेरी चूत पहले से गीली थी। उसने दो उँगलियाँ अंदर डालीं और धीरे-धीरे घुमाने लगा। मैं कमर उठा-उठाकर उसकी उँगलियों को और अंदर लेने लगी।
“इतनी गीली… सिर्फ चुंबन से इतनी तरस गई?” “हाँ… बहुत दिन से…”
शेखर मेरे ऊपर आ गया। उसने अपना लंड मेरी चूत पर रखा और धीरे से धकेला। टोपा अंदर गया। फिर और अंदर। पूरा लंड जब धँसा तो मैंने लंबी कराह भरी। इतना मोटा। आकाश से अलग अहसास। शेखर ने कुछ पल रुका, फिर धीरे-धीरे हिलने लगा। हर धक्के के साथ मेरी चूत खुलती जा रही थी।
“देखो मुझे,” उसने कहा। मैंने आँखें खोलीं। उसकी निगाह में इच्छा थी, और एक अजीब सी नमी भी। मैंने उसके होठों को चूम लिया। उसकी गति बढ़ने लगी। अब वो जोर से ठोक रहा था। मेरी छातियाँ उछल रही थीं। मैंने अपने पैर उसकी कमर के पीछे लपेट लिए।
“और तेज… शेखर… और तेज चोदो…” “बोल… किसकी रंडी बनना चाहती है आज?” “तुम्हारी… आज तुम्हारी…”
मैं झड़ गई। शरीर जोर से काँपा। चूत ने उसके लंड को जकड़ लिया। शेखर ने भी कुछ देर बाद गहरी साँस ली और अपना वीर्य मेरे अंदर छोड़ दिया। गर्म धार। मैं महसूस कर सकती थी। दोनों पसीने से लथपथ लेटे रहे।
थोड़ी देर बाद उसने मुझे अपनी बाँहों में ले लिया। “मीना… तुम फिर आओगी?” मैंने उसकी छाती पर सिर रखकर जवाब दिया, “आऊँगी। लेकिन मैं सिर्फ तुम्हारी नहीं रह सकती। मुझे और भी… चाहिए।”
शेखर चुप रहा। फिर बोला, “मैं समझता हूँ। तुम भूखी हो। और भूख एक मर्द से नहीं भरती।”
मैंने उसकी तरफ देखा। उसकी आँखों में कोई जलन नहीं थी। बस समझ थी। उस पल मुझे लगा कि शेखर आकाश से अलग है। वो मुझे बाँधना नहीं चाहता। बस लेना चाहता है, और देने भी देना चाहता है।
घर लौटते समय गाड़ी में मैं खिड़की से बाहर देख रही थी। जाँघों के बीच अभी भी उसकी नमी थी। मन में एक अजीब शांति थी। आकाश पहला था। शेखर दूसरा। और मुझे साफ लग रहा था कि यह सिलसिला यहीं नहीं रुकेगा। सुहागन वाली मीना अब धीरे-धीरे पीछे छूट रही थी। उसकी जगह एक और औरत आ रही थी—जो मर्दों को चुनती है, अपनी चूत को अलग-अलग लंड से भरवाती है, और बिना पछतावे के मजा लेती है।
रात को राजेश जब आया तो मैंने मुस्कुराकर खाना लगाया। उसने मेरी थकी हुई आँखों को देखा लेकिन कुछ नहीं पूछा। मैंने उसके माथे पर चुंबन छोड़ दिया। अंदर एक रहस्य था जो अब सिर्फ मेरा था।
और यह रहस्य अभी और बड़ा होने वाला था।
कुछ दिन बाद रिया का फिर फोन आया। “मीना, एक और पार्टी है। इस बार थोड़ी अलग। शेखर भी आएगा… और उसका एक दोस्त भी। बहुत दिलचस्प आदमी है। तुझे जरूर आना चाहिए।”
मैंने फोन रखते हुए मुस्कुराई। अंदर की औरत अब और आगे बढ़ने को तैयार थी।

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