नमस्ते दोस्तों, मेरा नाम अभय है। मैं लुधियाना का रहने वाला हूँ। अभी मैं चौबीस साल का हूँ, पर यह कहानी जो मैं आज आपको सुनाने जा रहा हूँ, तीन साल पुरानी है। उस समय मैं इक्कीस साल का था। आज मैं आपको मैंने भाभी को ब्लैकमेल करके चोदा था उसकी कहानी सुनाने जा रहा हूँ।
पढ़ाई के लिए मुझे दिल्ली आना पड़ा। लुधियाना की कोचिंग से बेहतर विकल्प दिल्ली में थे, इसलिए मेरे भाई बलराज ने कहा कि मैं उनके घर आ जाऊँ। बलराज भैया दिल्ली में ही रहते थे। उनकी शादी को पाँच साल हो चुके थे, लेकिन अभी तक कोई बच्चा नहीं था। उनकी पत्नी, मेरी भाभी सिमरन, घर का सारा काम संभालती थीं।
जब मैं पहली बार उनके घर पहुँचा, तो सिमरन भाभी ने मुझे अपने घर का सदस्य ही मान लिया। वे मुझे स्नेह से बुलाने लगीं। उनकी उम्र लगभग अट्ठाईस-उनतीस की रही होगी। शरीर उनकी बहुत ही आकर्षक था। लंबा और सुडौल कद, लगभग पाँच फुट सात इंच। सीना भारी और गोल था, जो ब्लाउज के अंदर कसकर भरा रहता था। कमर पतली और कसी हुई थी, जबकि नितंब भरे और गोल थे, जो साड़ी या जींस में साफ झलकते थे। उनकी चाल में एक अलग ही लचक थी, जो किसी भी मर्द की नजर खींच लेती थी।
मेरा अपना शरीर सामान्य था। लंबाई सही-सही, शरीर में हल्की मजबूती। और हाँ, मेरा लंड करीब छह इंच लंबा और ढाई इंच मोटा था। उस उम्र में यही सोचता रहता था कि कोई लड़की मिले तो सही, लेकिन दिल्ली आने के बाद भी कोई गर्लफ्रेंड नहीं बनी।
कॉलेज सुबह आठ बजे से दोपहर दो बजे तक ही रहता था। बाकी समय घर पर या लाइब्रेरी में बीतता। दिल्ली आए हुए लगभग एक महीना बीत चुका था। धीरे-धीरे मैंने घर की दिनचर्या समझनी शुरू कर दी। भैया शाम को छह बजे ऑफिस से लौटते थे। लेकिन उससे पहले भाभी अक्सर घर से बाहर जाती थीं। हर तीन-चार दिन में एक बार, करीब बारह बजे वे घर से निकलतीं और चार बजे के आसपास वापस आ जातीं। पहले मुझे लगा शायद कोई काम या सब्जी-मंडी का चक्कर होगा, लेकिन बार-बार का यही सिलसिला देखकर मन में शक पैदा होने लगा।
एक दिन मैंने तय किया कि आज पीछा करके देखूँगा। कॉलेज से जल्दी लौटकर मैंने स्कूटी निकाल ली और थोड़ी दूर छिपकर खड़ा हो गया। ठीक बारह बजे भाभी निकलीं। साड़ी पहने, चेहरे पर हल्की मुस्कान। वे घर से थोड़ी दूर जाकर एक काली थार के पास रुकीं। दरवाजा खुला और वे अंदर बैठ गईं। गाड़ी स्टार्ट हुई।
मैंने स्कूटी स्टार्ट की और थोड़ी दूरी बनाए रखते हुए पीछा किया। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। मन में कई सवाल घूम रहे थे—कहाँ जा रही हैं? किसके साथ? गाड़ी शहर के एक व्यस्त इलाके से होती हुई एक साधारण से लॉज के सामने रुकी। भाभी गाड़ी से उतरीं। साथ में एक अधेड़ उम्र का आदमी भी था। दोनों एक-दूसरे की ओर देखकर मुस्कुराए और लॉज के अंदर चले गए।
मैंने स्कूटी दूर खड़ी की और मोबाइल निकाला। जितनी दूर से हो सका, मैंने उनकी तस्वीरें खींच लीं। साफ दिख रहा था कि भाभी उस आदमी के साथ अंदर जा रही हैं। पेट में एक अजीब सा गुबार सा उठ रहा था। गुस्सा भी था, और साथ में एक अजीब उत्सुकता भी।
मैं वहीं खड़ा रहा, जब तक वे अंदर गायब नहीं हो गए। फिर धीरे से लौट आया। घर पहुँचकर कमरे में लेट गया। दिमाग में सिर्फ वही तस्वीरें घूम रही थीं। भाभी… और कोई और मर्द।
घर पहुँचकर मैंने कमरे में जाकर दरवाज़ा बंद कर लिया। मोबाइल में सेव की हुई तस्वीरें बार-बार देखता रहा। भाभी का चेहरा साफ़ दिख रहा था, और उस आदमी का भी। गुस्सा तो था ही, लेकिन साथ में एक अजीब सी गर्मी भी शरीर में दौड़ रही थी। मेरा लंड पहले से ही आधा सख्त हो चुका था। छह इंच लंबा और ढाई इंच मोटा लंड पैंट के अंदर तनकर खड़ा हो गया था।
शाम को भैया घर आए। खाना खाया, टीवी देखा, सब सामान्य रहा। भाभी भी बिल्कुल सामान्य व्यवहार कर रही थीं, जैसे कुछ हुआ ही न हो। रात को सब सो गए। मैं बिस्तर पर लेटा हुआ सोचता रहा कि कल क्या करूँ।
अगले दिन कॉलेज से लौटकर मैंने देखा कि भैया ऑफिस चले गए हैं और भाभी अकेली घर में हैं। मौका देखकर मैंने उनका कमरा खटखटाया।
“भाभी, एक मिनट…”
उन्होंने दरवाज़ा खोला। साड़ी पहने हुई थीं, बाल खुले थे। “क्या बात है अभय?”
मैंने सीधे मोबाइल निकाला और तस्वीरें दिखा दीं। “ये क्या है भाभी? आप कल दोपहर को किसके साथ लॉज में घुसी थीं?”
उनका चेहरा एकदम पीला पड़ गया। आँखें फटी की फटी रह गईं। तस्वीरें देखते ही उनके हाथ काँपने लगे। “अभय… ये… ये क्या…”
“मैंने खुद देखा है भाभी। आप किसी और मर्द के साथ लॉज में गई थीं। पाँच साल की शादी, भैया इतनी मेहनत करते हैं, और आप…”
सिमरन भाभी की आँखों से आँसू निकल आए। वे बैठ गईं और रोने लगीं। “अभय… प्लीज़… ये फोटो भैया को मत दिखाना… मेरी ज़िंदगी बर्बाद हो जाएगी… प्लीज़…”
मैं उनके सामने खड़ा रहा। “रोने से कुछ नहीं होगा भाभी। मैंने सब देख लिया है। अब बताओ, क्या करूँ इन फोटो का?”
वे हाथ जोड़कर मेरी तरफ देखने लगीं। “जो कहोगे करूँगी… लेकिन भैया को मत बताना… प्लीज़ अभय…”
मैंने एक कदम आगे बढ़ाया। “जो मैं चाहता हूँ, वो दे सकती हो? तो मैं ये फोटो किसी को नहीं दिखाऊँगा।”
उनकी साँसें तेज़ हो गईं। “क्या चाहते हो तुम?”
मैंने उनकी आँखों में देखते हुए कहा, “तुम्हारा शरीर। आज से तुम मेरी भी हो। जब भी मैं कहूँ, जो मैं कहूँ, वो करना पड़ेगा।”
सिमरन भाभी एकदम सहम गईं। “नहीं… अभय… ये गलत है… तुम मेरे देवर हो… ऐसा नहीं हो सकता…”
मैंने आवाज़ थोड़ी तेज़ कर दी। “तो फिर ये फोटो भैया को भेज दूँ? पूरे रिश्तेदारों में फैलवा दूँ? तुम्हारी इज्ज़त का क्या होगा?”
वे काँप रही थीं। रोते-रोते बोलीं, “मत करो… प्लीज़… मैं… मैं मान जाती हूँ…”
“सच में?”
उन्होंने सिर झुका लिया। “हाँ… जो कहोगे करूँगी… बस ये फोटो किसी को मत दिखाना…”
मैंने उनका हाथ पकड़कर ऊपर खींचा। वे मेरे बिल्कुल करीब आ गईं। उनके भारी स्तन मेरे सीने से छू रहे थे। मैंने उनका चेहरा दोनों हाथों में पकड़ा और ज़ोर से उनके होंठों पर अपना मुँह रख दिया।
पहले तो वे सख्त पड़ गईं, लेकिन फिर धीरे-धीरे उनके होंठ नरम होने लगे। मैंने अपनी जीभ उनके मुँह के अंदर धकेल दी। उनका स्वाद मीठा और गर्म था। मैंने उनकी जीभ चूसनी शुरू कर दी। एक हाथ से उनके बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा और गहरे से चूमने लगा। दूसरा हाथ उनकी कमर पर रखकर नितंबों की तरफ सरका दिया। उनके गोल और नरम नितंबों को जोर से मसलने लगा।
सिमरन भाभी की साँसें फूल रही थीं। वे हल्के-हल्के कराहने लगीं। मैंने उनके निचले होंठ को दाँतों से दबाया और चूसा। उनका ब्लाउज के अंदर भरा हुआ सीना मेरे सीने से रगड़ खा रहा था। मेरा लंड पूरी तरह तन चुका था और उनकी जाँघ से छू रहा था।
मैंने चुंबन तोड़ा और उनके कान के पास फुसफुसाया, “आज से तुम मेरी रंडी हो भाभी। जब चाहूँगा, जहाँ चाहूँगा, जैसे चाहूँगा… समझी?”
वे आँखें बंद किए खड़ी थीं, साँसें उखड़ी हुई। सिर्फ इतना बोलीं, “हाँ… अभय…”
मैंने फिर से उनके होंठ पकड़ लिए। इस बार और ज़ोर से, और गहरे। उनकी जीभ को चूसते हुए हाथ उनके स्तनों पर रख दिया। ब्लाउज के ऊपर से ही उनके भारी और नरम स्तनों को मसलने लगा। निप्पल तनकर मेरे हाथ में चुभ रहे थे।
भाभी की शरीर में कंपन दौड़ रहा था। वे अब विरोध नहीं कर रही थीं। बल्कि धीरे-धीरे मेरे शरीर से चिपकती जा रही थीं।
इतने में बाहर गेट की आहट हुई। भैया के आने का समय हो रहा था।
मैंने चुंबन तोड़ा और उनकी आँखों में देखा। “आज रात को… मेरे कमरे में आना। वरना…”
वे सिर हिलाती हुई बोलीं, “आऊँगी…”
मैं उनके कमरे से निकल आया। दिल जोर-जोर से धधक रहा था। लंड अभी भी सख्त था। आगे क्या होने वाला था, ये सोचकर ही शरीर में बिजली सी दौड़ गई।
रात के करीब साढ़े ग्यारह बज रहे थे। भैया सो चुके थे। मैं अपने कमरे में लेटा हुआ इंतज़ार कर रहा था। थोड़ी देर बाद दरवाज़े पर हल्की सी खटखटाहट हुई। सिमरन भाभी अंदर आईं। उन्होंने दरवाज़ा बंद किया और मेरे बिस्तर के पास आ खड़ी हुईं। चेहरे पर अभी भी डर और शर्मिंदगी के भाव थे, लेकिन आँखों में एक अजीब सी चमक भी थी।
मैंने उन्हें पास खींच लिया। “कपड़े उतारो भाभी।”
वे काँपते हाथों से साड़ी खोलने लगीं। पहले पल्लू, फिर ब्लाउज के हुक। जब ब्लाउज और ब्रा उतरे, तो उनके भारी, गोल और लटकते स्तन बाहर आ गए। निप्पल बड़े और काले थे, पहले से ही तने हुए। फिर पेटीकोट और पैंटी उतारी। उनके घने काले जघन बाल और गुलाबी-भूरे रंग की चूत साफ दिखने लगी। चूत के होंठ थोड़े सूजे हुए थे।
मैंने भी कपड़े फेंक दिए। मेरा छह इंच लंबा और ढाई इंच मोटा लंड पूरी तरह खड़ा हो चुका था। नसों से भरा, चोटी पर चमकता हुआ।
मैंने उन्हें बिस्तर पर लिटा दिया और उनके स्तनों पर टूट पड़ा। मुँह से एक निप्पल पकड़कर जोर से चूसने लगा, दाँतों से हल्का काटते हुए। दूसरा हाथ उनके दूसरे स्तन को मसल रहा था। भाभी कराह उठीं। “आह्ह… अभय… हल्के…”
मैंने उनकी जाँघें फैला दीं और मुँह उनकी चूत पर लगा दिया। जीभ से उनके चूत के होंठ चाटने लगा, बीच की दरार में घुसाकर क्लिट को चूसा। वे कमर उठा-उठाकर मेरे मुँह में अपनी चूत रगड़ने लगीं। “उम्म्म… चुस… जोर से चुस देवर…”
मैंने दो उंगलियाँ उनकी गीली चूत में डाल दीं और अंदर-बाहर करने लगा। उनकी चूत गर्म और तंग थी। पानी की तरह गीली हो चुकी थी। मैंने उंगलियाँ निकालकर अपना लंड उनके मुँह के पास ले गया। “चूस इसे भाभी।”
उन्होंने पहले हिचकते हुए, फिर भूखे की तरह मेरे लंड को मुँह में ले लिया। गाल पिचकते हुए चूसने लगीं। मैंने उनके बाल पकड़कर सर आगे-पीछे किया। “और गहरा… पूरा निगल…”
थोड़ी देर बाद मैंने उन्हें चारपाई पर पेट के बल लिटाया। उनके नितंबों को दोनों हाथों से फैलाया और अपना मोटा लंड उनकी चूत के मुहाने पर लगा दिया। एक झटके में पूरा अंदर धंस गया।
“आाह्ह्ह… हरामी… कितना मोटा है तेरा…” भाभी चिल्ला उठीं।
मैं जोर-जोर से धक्के मारने लगा। हर धक्के के साथ उनके नितंब थर्रा रहे थे। चूत की दीवारें मेरे लंड को कसकर जकड़ रही थीं।
तभी सिमरन भाभी मुँह नीचे किए हुए गालियाँ देने लगीं—
“तेरा भैया का तो इतना छोटा लंड है… दो-ढाई इंच का भी नहीं… उस चूहे जैसे लंड से मेरी चूत कभी नहीं भरती… हमेशा अधूरी रह जाती हूँ… तूने तो आज मेरी चूत फाड़ दी हरामी… और जोर से चोद… अपनी भाभी की चूत फाड़ दे… भैया का लंड तो मेरे अंदर जाता भी नहीं ठीक से… तूने तो पूरा पेट में ठूंस दिया…”
उनकी गालियाँ सुनकर मेरा उत्साह और बढ़ गया। मैंने उनके बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा और और तेज चुदाई करने लगा। थप-थप-थप की आवाज़ पूरे कमरे में गूँज रही थी। उनकी चूत से पानी की आवाज़ आ रही थी।
मैंने पोजीशन बदली। उन्हें ऊपर बिठा लिया। भाभी खुद कमर नाचाने लगीं। उनके भारी स्तन मेरे चेहरे के सामने उछल रहे थे। मैंने दोनों स्तनों को मुँह में ले लेकर काटा। वे जोर-जोर से कराह रही थीं—
“आह्ह… चुद रही हूँ… अपने देवर से चुद रही हूँ… भैया का छोटा लंड याद आ रहा है… वो तो सिर्फ रगड़ता था… तू तो चोद रहा है साली की तरह… और अंदर… और गहरा…”
मैंने उन्हें फिर से लिटाया और उनकी टाँगें कंधों पर रख दीं। इस पोजीशन में लंड और गहरा जा रहा था। मैंने उनकी गांड के छेद पर भी उंगली फेरी। वे सहम गईं लेकिन मना नहीं किया। मैंने धीरे से एक उंगली उनकी गांड में डाल दी और साथ-साथ चूत में लंड चलाता रहा।
“आाह्ह्ह… दोनों छेद… हरामी… तू मुझे रंडी बना रहा है…”
तेज धक्कों के बाद मैंने कहा, “अंदर छोड़ूँ या बाहर?”
वे पागलों की तरह बोलीं, “अंदर… अपनी भाभी की चूत में भर दे… भैया का पानी तो कभी पहुँचता ही नहीं… तू भर दे…”
मैंने अंतिम जोरदार धक्के मारे और अपना पूरा माल उनकी चूत के अंदर उड़ेल दिया। गरम-गरम वीर्य की धारें उनकी कोख में समाती गईं। भाभी भी काँपते हुए झड़ गईं। उनकी चूत मेरे लंड को और कसकर चूस रही थी।
हम दोनों पसीने से लथपथ लेटे रहे। थोड़ी देर बाद मैंने फिर से उनका मुँह चूमा और कहा, “अब रोज़ होगा। समझी?”
वे थकी हुई आवाज़ में बोलीं, “हाँ… अब रोज़…”
जब तक मैं भैया के यहाँ रहा, तब तक सिमरन भाभी को हर रोज़ चोदता रहा… अभी भी जब मौका मिलता है मैं भाभी की चुदाई करता हूँ।

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