मेरा नाम रेखा है। उम्र उनतीस साल की हो गई। शादी को छह साल हो चुके हैं। पति राजू ट्रक ड्राइवर है। महीने में बीस-बाईस दिन तो सड़क पर ही रहता है। घर में मैं और सास। सास ज्यादातर अपने मायके चली जाती हैं, इसलिए ज्यादातर समय घर में अकेली ही रहती हूँ। शरीर की जरूरतें हैं, लेकिन पूछने वाला कोई नहीं। राजू जब आता है तो थका होता है, दो-चार बार निभा देता है और फिर सो जाता है। मन में एक बेचैनी रहती रहती है जो दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही थी।
उस दिन मंगलवार था। हफ्ते का बाजार लगता था शहर के पुराने इलाके में। घर का राशन खत्म हो रहा था, सब्जी भी लेनी थी, कपड़े के दो-तीन पीस भी देखने थे। मैंने हल्की सी पीली साड़ी पहनी। ब्लाउज थोड़ा टाइट था, जानबूझकर नहीं, बस पुराना होने की वजह से शरीर से चिपक रहा था। पल्लू ठीक से नहीं संभाला था। बाल खुले छोड़ दिए। आईने में खुद को देखा तो लगा कि आज चेहरे पर एक अलग सी चमक है। शायद अकेलापन की।
बाजार में भीड़ काफी थी। सब्जी वाले, कपड़े वाले, मसाले वाले सब लगे हुए थे। मैं पहले सब्जी की तरफ गई। आलू, प्याज, टमाटर ले रही थी कि पीछे से किसी की आवाज आई।
“भाभी, ये वाला टमाटर ज्यादा अच्छा है। लाल-लाल। ले लो।”
मैंने मुड़कर देखा। सब्जी वाला लड़का था। उम्र पच्चीस-छब्बीस की। गोरा-चिट्टा, बदन मजबूत। नाम उसने पहले कभी बताया था—संजू। वो मुस्कुरा रहा था। उसकी निगाह मेरे चेहरे से हटकर ब्लाउज के गड्ढे पर चली गई थी। मैंने पल्लू खींचा।
“वही दे दो जो अच्छा हो।”
संजू ने टमाटर तोलते हुए कहा, “भाभी आज अकेली आई हो? देवर जी कहाँ हैं?”
“ट्रक पर हैं। कहाँ रहेंगे।”
वो हल्के से हँसा। “अकेलापन अच्छा नहीं होता भाभी। शरीर भी तो माँग करता है।”
मैंने उसकी तरफ देखा। वो मेरी आँखों में देख रहा था। बात में हल्की सी डबल मीनिंग थी। मैंने पैसे दिए और आगे बढ़ गई। लेकिन उसकी बात कानों में रह गई। शरीर भी तो माँग करता है। कितने दिनों से माँग रहा था।
आगे कपड़े की दुकान थी। पुरानी दुकान। मालिक का नाम रमेश। उम्र चालीस के करीब। पत्नी नहीं थी, अकेला ही दुकान चलाता था। मैंने अंदर कदम रखा तो उसने सिर उठाकर देखा। निगाह मेरे शरीर पर एक पल के लिए ठहर गई।
“आओ रेखा। क्या चाहिए आज?”
“ब्लाउज के दो पीस दिखाना। टाइट वाले।”
रमेश ने अलमारी से कपड़े निकाले। मुझे पास बुलाया। जब वो कपड़ा मेरे ऊपर माप रहा था तो उसके हाथ बार-बार मेरे स्तनों के पास से गुजर रहे थे। एक बार तो उसका हाथ साफ तौर पर मेरे ब्लाउज पर टिक गया। मैंने साँस रोकी।
“यह वाला ठीक रहेगा,” उसने धीमे से कहा। “तुम्हारे शरीर पर अच्छा बैठेगा।”
मैंने कीमत पूछी। वो थोड़ी ज्यादा थी।
“पैसे कम हैं रमेश भाई।”
वो करीब आया। आवाज और धीमी कर दी। “पैसे की बात छोड़ो। तुम चाहो तो… किसी और तरीके से भी बात बन सकती है। दुकान के पीछे कमरा है। कोई नहीं आता।”
मेरा दिल जोर से धक से हुआ। मैंने उसकी तरफ देखा। उसकी आँखों में साफ इच्छा थी। मैंने कपड़ा वापस रख दिया और बिना कुछ कहे दुकान से बाहर निकल गई। लेकिन शरीर में एक सनसनाहट फैल गई थी। दो मर्दों ने एक ही बाजार में मुझे इस तरह देखा था। पहले संजू, अब रमेश।
थोड़ी दूर पर समोसे वाली दुकान थी। वहाँ दो लड़के खड़े थे। एक का नाम था बिट्टू, दूसरा था कालू। दोनों मोहल्ले के आवारा किस्म के थे। उम्र तीस के करीब। मैं जब वहाँ से गुजरी तो बिट्टू ने जोर से कहा,
“अरे देखो तो रेखा भाभी आज कितनी फिट लग रही हैं। साड़ी में भी आग लगा रही हैं।”
कालू हँसा। “भाभी, इधर आओ। समोसा खिलाएँ?”
मैंने अनसुना कर आगे बढ़ने की कोशिश की। लेकिन बिट्टू ने रास्ता रोक लिया।
“इतना रुखापन ठीक नहीं भाभी। शरीर इतना गरम लेकर घूम रही हो तो नज़र तो लगेगी ही।”
मैंने गुस्से में कहा, “हटो सामने से।”
बिट्टू हँसा। “गुस्सा मत करो। बात तो सही है। राजू भैया तो रहते नहीं घर पर। तुम्हारी जरूरत कौन पूरी करता होगा?”
कालू ने भी हल्के से कहा, “हम लोग मदद को तैयार हैं भाभी। बस इबादत करो।”
मैंने जोर से पल्लू खींचा और वहाँ से तेज कदमों से चली गई। लेकिन दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। चार मर्द। संजू, रमेश, बिट्टू और कालू। सबकी निगाहें आज मेरे शरीर पर थीं। सबके लंड शायद खड़े थे। बाजार में घूमते हुए मुझे पहली बार महसूस हुआ कि मेरा शरीर कितनी भूख जगा रहा है।
राशन का सामान लेते समय भारी बैग हो गया। उठाने में दिक्कत हो रही थी। तभी पीछे से संजू आ गया।
“भाभी, इतना भारी ले कर कहाँ जाओगी। मैं छोड़ दूँगा।”
मैंने मना किया लेकिन उसने बैग छीन लिया। “चलो, मेरी साइकिल पर रख लेते हैं। घर तक छोड़ दूँगा।”
मैं मजबूरन उसके साथ हो ली। साइकिल पर सामान रखकर वो चलने लगा। मैं बगल में पैदल। रास्ते में वो बार-बार मेरी तरफ देखता।
“भाभी, तुम सच में बहुत अकेली लगती हो। शरीर भी तुम्हारा… जैसे माँग कर रहा हो।”
मैंने जवाब नहीं दिया। गला सूख रहा था।
“अगर कभी मन करे तो बता देना। मैं और मेरे दो-तीन यार… तुम्हारी सेवा में हाजिर हैं। कोई बात बाहर नहीं जाएगी।”
मैंने उसकी तरफ देखा। वो मुस्कुरा रहा था। लेकिन आँखों में गंदी भूख साफ थी। मैंने धीमे से कहा, “तुम लोग बहुत बोल्ड हो गए हो।”
संजू हँसा। “बोल्ड नहीं भाभी। जरूरत है। तुम्हें भी है, हमें भी।”
घर के पास पहुँचकर उसने सामान उतारा। जाते-जाते बोला, “शाम को बाजार के पीछे वाली पुरानी गोडाउन में मिल। सिर्फ बात करने। अगर हिम्मत हो तो।”
मैं चुपचाप घर के अंदर चली गई। दरवाजा बंद करके दीवार के सहारे खड़ी हो गई। साँसें तेज थीं। शरीर में एक अजीब गर्मी फैल रही थी। चार मर्द। संजू, रमेश, बिट्टू, कालू। सबके लंड आज मेरे लिए खड़े थे। और सबसे खतरनाक बात यह थी कि मेरे अंदर भी कुछ खड़ा हो रहा था।
शाम तक मन नहीं माना। बार-बार संजू की बात याद आती। आखिरकार सूरज ढलने से पहले मैंने फैसला किया। साड़ी बदली, पल्लू कसकर बाँधा और निकल पड़ी। बाजार के पीछे वाली पुरानी गोडाउन की तरफ। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। डर था, शर्म थी, लेकिन भूख सबसे ऊपर थी।
गोडाउन का दरवाजा आधा खुला था। अंदर अँधेरा और हल्की रोशनी। मैंने अंदर कदम रखा तो चारों तरफ निगाहें मुझे घेर रही थीं। संजू, रमेश, बिट्टू और कालू। चारों खड़े थे।
संजू ने मुस्कुराते हुए कहा, “आ गई भाभी। हम जानते थे तुम आओगी।”
मेरी साँस अटक गई। रेखा चली थी बाजार, और अब चार लंड उसके सामने खड़े थे।
गोडाउन के अंदर की हवा भारी और गरम लग रही थी। चारों मर्द मेरी तरफ देख रहे थे। संजू सबसे आगे था। रमेश उसके बगल में। बिट्टू और कालू पीछे खड़े मुस्कुरा रहे थे। दरवाजा पीछे से बंद हो गया। मैं पीछे हटने की सोच रही थी लेकिन पैर नहीं उठ रहे थे। शरीर काँप रहा था, लेकिन अंदर की गर्मी और तेज हो गई थी।
संजू पास आया। “डर मत भाभी। हम कुछ जबरदस्ती नहीं करेंगे। तुम चाहो तो अभी वापस चली जाओ। लेकिन अगर रुक गई… तो आज रात तुम्हारी सारी प्यास बुझा देंगे।”
मैंने कुछ नहीं कहा। गला सूखा हुआ था। रमेश ने धीमे से कहा, “साड़ी खोल रेखा। दिखा हमें वो शरीर जिसकी वजह से आज चारों के लंड खड़े हैं।”
मेरे हाथ काँप रहे थे। मैंने पल्लू हटाया। फिर ब्लाउज के हुक खोले। ब्लाउज फर्श पर गिरा। चारों की साँसें तेज हो गईं। संजू ने आगे बढ़कर मेरी साड़ी और पेटीकोट एक साथ खींच लिए। अब मैं सिर्फ पैंटी में खड़ी थी। बिट्टू ने सीटी बजाई।
“क्या बॉडी है भाभी की… स्तन देखो कितने भारी। गाँड तो जैसे आम की तरह।”
कालू ने पैंटी पकड़कर नीचे खींच दी। मैं पूरी नंगी हो गई। चारों तरफ निगाहें मेरे नंगे शरीर पर घूम रही थीं। शर्म से मेरा चेहरा जल रहा था, लेकिन चूत पहले से गीली हो चुकी थी। संजू ने अपना लंड बाहर निकाला। मोटा और सख्त। रमेश, बिट्टू और कालू ने भी पैंट खोली। चारों के लंड खड़े थे। अलग-अलग साइज के, लेकिन सब तने हुए।
संजू ने मुझे दीवार के सहारे खड़ा किया और दोनों स्तनों को जोर से मसलने लगा। निप्पल को मुँह में लेकर चूसने लगा। रमेश पीछे से आ गया। उसके हाथ मेरी गाँड पर थे। वो मेरे कान में बोला, “आज तेरी चूत चार लंड लेगी रेखा। तैयार रह।”
मैंने आँखें बंद कर लीं। संजू का मुँह मेरी छाती पर था। रमेश की उँगली मेरी चूत में घुस गई। “देखो कितनी गीली हो चुकी है साली। पति के बिना इतनी तरस रही थी।”
बिट्टू और कालू पास आकर अपने लंड मेरे हाथों में पकड़ा दिए। मैंने दोनों हाथों से उनके लंड दबाने शुरू कर दिए। संजू ने मुझे धीरे से फर्श पर बिछा दी। पुरानी बोरी बिछी हुई थी। उसने मेरे जाँघें फैलाईं और अपना लंड मेरी चूत पर रखा।
“ले भाभी… पहला लंड।”
एक जोर का धक्का दिया। पूरा लंड अंदर तक धँस गया। मैंने जोर से कराह भरी। “आह्ह्ह… धीरे… बहुत दिन बाद…”
संजू ने नहीं माना। वो जोर-जोर से पेलने लगा। हर धक्के के साथ मेरी छातियाँ उछल रही थीं। रमेश मेरे मुँह के पास आ गया। “मुँह खोल। दूसरा लंड ले।”
मैंने मुँह खोला। रमेश का लंड अंदर घुस गया। गला भर गया। आँखों में आँसू आ गए। बिट्टू और कालू दोनों तरफ खड़े अपने लंड मेरे हाथों में करवा रहे थे। चारों तरफ सिर्फ लंड थे। एक चूत में, एक मुँह में, दो हाथों में।
संजू तेज चोद रहा था। “क्या टाइट चूत है तेरी भाभी… आज खोल देंगे इसे पूरी।” मैं कुछ बोल नहीं पा रही थी क्योंकि मुँह में रमेश का लंड था। बस गले से आवाजें निकल रही थीं। थोड़ी देर बाद संजू ने जोर से धक्का मारा और अपना पानी मेरे अंदर छोड़ दिया। गर्म धार महसूस हुई। उसने लंड निकाला तो वीर्य मेरी जाँघों पर बहने लगा।
रमेश ने मुझे उठाया और खुद नीचे लेट गया। “ऊपर बैठ। खुद चोद।”
मैं उसके लंड पर बैठ गई। पूरा अंदर जाते ही कराह निकल गई। मैंने कमर हिलानी शुरू की। बिट्टू मेरे मुँह में अपना लंड ठेल दिया। कालू पीछे से आकर मेरे स्तन मसलने लगा।
“बोल रेखा… कैसा लग रहा है चार लंड एक साथ?” कालू ने पूछा। मैंने मुँह से लंड निकालकर हाँफते हुए कहा, “बहुत… बहुत गंदा लग रहा है… लेकिन मत रोको…”
रमेश नीचे से धक्के मार रहा था। मैं ऊपर से पटक रही थी। बिट्टू मेरे मुँह को चोद रहा था। कालू मेरे स्तनों को मरोड़ रहा था। शरीर पूरी तरह इस्तेमाल हो रहा था। थोड़ी देर बाद रमेश भी मेरे अंदर झड़ गया। मैं उसके ऊपर गिर गई।
अब बिट्टू ने मुझे पकड़ा। उसने मुझे कुत्ते की पोजीशन में कर दिया और पीछे से लंड डाल दिया। जोर के धक्के शुरू कर दिए। “ले साली… तीसरा लंड… चूत कितनी ढीली हो गई है पहले दो के बाद।”
कालू मेरे मुँह के सामने आ गया। “चूस मेरा भी।”
मैंने उसका लंड मुँह में ले लिया। बिट्टू पीछे से जोर-जोर से पेल रहा था। गाँड पर थप्पड़ भी मार रहा था। दर्द और मजे का मिश्रण था। मैं दूसरी बार झड़ गई। शरीर काँपने लगा। बिट्टू ने भी कुछ देर बाद अपना पानी मेरे अंदर छोड़ दिया।
आखिर में कालू बचा। उसने मुझे सीधा लिटाया। जाँघें फैलाकर अपना लंड अंदर डाला और बहुत तेज गति से चोदने लगा। “आखिरी लंड ले रही है भाभी… आज चारों का पानी तेरी चूत में जाएगा।”
मैं बस कराह रही थी। शरीर में कोई ताकत नहीं बची थी। कालू ने भी जोर लगाकर अपना वीर्य मेरे अंदर छोड़ दिया। चारों का पानी अब मेरी चूत में मिला हुआ था। बाहर बह रहा था।
चारों थककर आसपास बैठ गए। मैं बोरी पर लेटी रही। पैर फैले हुए। चूत जल रही थी। पूरे शरीर पर पसीना और वीर्य लगा हुआ था। संजू ने पास आकर मेरे बाल सहलाए।
“कैसा लगा भाभी?” मैंने आँखें खोलीं। आवाज कमजोर थी। “गंदा… बहुत गंदा लगा। लेकिन… बुरा नहीं लगा।”
रमेश हँसा। “अब जब भी बाजार आना, हमें बता देना। चारों लंड तैयार रहेंगे।”
बिट्टू ने कहा, “घर पर अकेली हो तो भी बुला लेना। रात भर चोदेंगे।”
मैंने कुछ नहीं कहा। बस लेटी रही। शरीर में दर्द था, लेकिन अंदर एक अजीब सुकून भी था। सालों की प्यास आज चार लंड ने मिलकर बुझाई थी।
थोड़ी देर बाद मैंने कपड़े पहने। चलते समय पैर काँप रहे थे। गोडाउन से बाहर निकलते समय संजू ने कहा, “रेखा, आज के बाद तू सिर्फ राजू की बीवी नहीं रही। तू हमारी भी हो गई।”
मैंने जवाब नहीं दिया। अँधेरे में घर की तरफ चल दी। जाँघों के बीच चार मर्दों का पानी अभी भी चिपचिपा लगा हुआ था। मन में एक बात साफ थी—आज रेखा बाजार गई थी, और चार लंड खड़े पाकर वापस लौटी थी।
और यह शुरुआत मात्र थी।
