मेरा नाम रोहित शर्मा है। उम्र छत्तीस। एक मध्यम स्तर की कंपनी में अकाउंट्स का काम करता हूँ। तनख्वाह ठीक-ठाक है, फालतू नहीं। दो बीएचके किराए का फ्लैट है शहर के पुराने इलाके में। अकेला रहता हूँ। शादी की सोचता हूँ कभी-कभी, लेकिन अभी तक कोई बात बनी नहीं। घर की सफाई, कपड़े, बर्तन—इन सबके लिए एक कामवाली रखी हुई है। नाम है सखू।
सखू पहली बार जब आई थी तो मैंने सोचा था साधारण सी औरत होगी। लेकिन जैसी थी, वैसी साधारण नहीं थी। उम्र तीस के करीब। शरीर ऐसा कि साड़ी के नीचे भी छिप नहीं पाता था। कद औसत से थोड़ा कम, लेकिन अनुपात ठीक। कमर पतली, हिप्स चौड़े, और स्तन भारी। जब झुककर पूछा लगाती तो ब्लाउज के गले से उनकी गोलाई साफ नजर आ जाती। रंग साँवला, चमकदार। आँखें बड़ी और हमेशा थकी-थकी सी। बाल काले और घने, जिन्हें वह हमेशा पल्लू में बाँधे रखती। बातें बहुत कम। सिर झुकाए काम करती और चली जाती।
पहली बार उसने खुद अपनी जिंदगी के बारे में कुछ कहा था। एक दिन बर्तन धोते हुए हल्के से बोली, “साहब, मेरे वाले को दारू की बिमारी है। रात भर पीता है, फिर सो जाता है। महीने में दो-चार बार भी बात नहीं बनती।” तब मैंने सिर्फ हम्म कहकर टाल दिया था। लेकिन बात दिमाग में रह गई। तीस साल की औरत। शरीर भरा-पूरा। और पति शराब में डूबा रहता है। चूत की भूख तो होगी ही।
महीनों तक सब सामान्य चला। सखू सुबह नौ बजे आती। झाड़ू, पोछा, कपड़े, बर्तन। दोपहर एक बजे तक काम खत्म करके निकल जाती। मैं ज्यादातर ऑफिस चला जाता। कभी-कभी घर से वर्क फ्रॉम होम करता तो भी वह अपने काम में रही। न ज्यादा बात, न ज्यादा नजर। लेकिन मैं देखने लगा था। जब वह झुकती, जब पल्लू सरकता, जब पसीने से ब्लाउज पीठ से चिपक जाता—मेरी नजरें रुक जातीं। कभी-कभी वह भी मुझे देख लेती। फिर जल्दी से नजरें झुका लेती। उन छोटी-छोटी नजरों में कुछ था। थकान भी, और कुछ दबा हुआ भी।
फिर वह दिन आया।
बुधवार था। मुझे दोपहर में घर लौटना पड़ा क्योंकि ऑफिस का एक जरूरी फाइल घर पर ही रह गई थी। घड़ी में सवा बारह बज रहे थे। चाबी घुमाई। अंदर पूरा सन्नाटा। झाड़ू-पोछे की कोई आवाज नहीं। किचन खाली। लिविंग रूम खाली। मैंने जूते उतारे और बेडरूम की तरफ बढ़ा। दरवाजा आधा खुला था।
सखू मेरे बिस्तर पर सो रही थी।
साड़ी का पल्लू चेहरे पर पड़ा था। एक हाथ सिर के नीचे मोड़ा हुआ, दूसरा ढीला पेट पर। ब्लाउज थोड़ा ऊपर खिसक गया था। उसकी नाभि और पेट की नरम रेखा साफ दिख रही थी। साँसें गहरी और नियमित थीं। थकान के मारे पूरी तरह सोई हुई थी। झाड़ू दीवार के किनारे खड़ी थी। बाल्टी में पानी भरा था, पोछा आधा अधूरा पड़ा था। काम छोड़कर सो गई थी।
मैं दरवाजे पर खड़ा काफी देर तक उसे देखता रहा।
तीस साल की शादीशुदा औरत। पति शराबी। शरीर वैसा जैसा ज्यादातर मर्द सपने में देखते हैं। और मेरे बिस्तर पर गहरी नींद में।
मैं अंदर गया। बिस्तर के किनारे धीरे से बैठ गया। गद्दे के दबने से वह थोड़ी हिली, लेकिन जागी नहीं। मैंने हल्के से उसका पल्लू हटाया। चेहरा शांत था। माथे पर हल्के पसीने की चमक। मैंने उसकी बाजू को छुआ। त्वचा गरम और चिकनी थी। हाथ धीरे-धीरे उसके ब्लाउज की तरफ गया। हुक बंद थे। मैंने पहला हुक खोला। फिर दूसरा। ब्रा के ऊपर से ही उसके भारी स्तन को हल्के से दबाया। सखू की साँस थोड़ी तेज हुई, लेकिन आँखें नहीं खुलीं। नींद इतनी गहरी थी कि हल्के स्पर्श से नहीं टूटी।
मैंने ब्रा ऊपर सरकाई। नंगे स्तन बाहर आ गए। बड़े, भारी, निप्पल गहरे रंग के। मैंने झुककर एक निप्पल मुँह में ले लिया। हल्के से चूसा। जीभ से घुमाया। सखू के मुँह से एक बहुत हल्की आवाज निकली—“उम्म…”। लेकिन आँखें बंद ही रहीं। मैंने दूसरा स्तन भी मुँह में लिया। अब थोड़ा जोर से चूसने लगा। एक हाथ से उसकी साड़ी नीचे सरकाई। पेटीकोट के अंदर हाथ डाला। पैंटी के ऊपर से उसकी चूत को सहलाया। गर्मी महसूस हुई। मैंने पैंटी साइड में की और मध्यमा उंगली से उसके छेद को छुआ। सूखा नहीं था, लेकिन गीला भी नहीं। मैंने धीरे से उंगली अंदर डाली। सखू की टाँगें हल्की सिमट गईं।
आँखें खुल गईं।
पहले क्षण में वह समझ नहीं पाई। फिर जैसे ही महसूस किया कि मेरा मुँह उसके स्तन पर है और उंगली नीचे, वह चौंककर उठने की कोशिश करने लगी।
“साहब… आप… यह क्या कर रहे हो… छोड़ो…”
मैंने उसे धीरे से लेकिन मजबूती से दबाए रखा। “काम के समय सो रही थी। थक गई हो इतनी?”
उसके चेहरे पर शर्म, डर और अफसोस एक साथ थे। “माफ करना साहब… नींद आ गई थी… रात भर मेरे वाले ने पीकर शोर मचाया… नींद नहीं लेने दी…”
मैंने उसकी चूत में उंगली थोड़ा और अंदर सरकाई। “तो फिर यहीं आराम करो। लेकिन ऐसे नहीं।”
उसने मेरा हाथ पकड़ने की कोशिश की, लेकिन उसमें जोर नहीं था। मैंने उसकी पैंटी नीचे खींच ली। घने काले बाल। मैंने उंगली पूरी अंदर तक डाली और धीरे-धीरे हिलाने लगा। सखू की आँखें बंद होती गईं। होंठ काँप रहे थे। मना करने वाली आवाजें अब हल्की कराह में बदलने लगी थीं।
“साहब… गलत है… मैं परायी औरत हूँ…”
“तुम्हारा पति दारू में धुत्त रहता है। तुम्हें छूता तक नहीं। और तुम मेरे बिस्तर पर सोई हुई हो।” मैंने दूसरी उंगली भी जोड़ दी। “अब चुपचाप लेटे रहो।”
मैंने उसके दोनों स्तनों को बारी-बारी से चूसना जारी रखा। कभी निप्पल को दाँतों से हल्का काटता, कभी जोर से चूसता। नीचे उंगलियाँ उसकी चूत में धीरे-धीरे तेज होती गईं। सखू की कमर अब खुद हिलने लगी थी। उसकी साँसें बदल चुकी थीं। दर्द और शर्म की आवाजें अब मजे की कराहें बनने लगी थीं।
जब वह काफी गीली हो गई तो मैंने उंगलियाँ निकालीं और उसकी चूत पर मुँह रख दिया। जीभ अंदर तक ले गया। क्लिट को चूसा। सखू की टाँगें अब खुद फैल गई थीं। उसके हाथ मेरी बालों में थे—जोर से नहीं, बस रखे हुए। जैसे रोकने और बढ़ाने के बीच में हो।
“साहब… वहाँ… उम्म… क्या कर रहे हो…”
मैंने जवाब नहीं दिया। उसकी चूत को धीरे-धीरे लेकिन लगातार चाटता रहा। जब वह काँपने लगी और उसकी जाँघें मेरे सिर को दबाने लगीं, तो मैंने मुँह हटाया। अपने कपड़े उतारे। लंड पूरी तरह तन चुका था। मोटा और सख्त। सखू ने आँखें खोलीं और उसे देखा। आँखों में डर साफ था।
“इतना मोटा… साहब… अंदर नहीं जाएगा… दर्द होगा…”
“धीरे-धीरे जाएगा,” मैंने कहा। “तुम्हारी चूत सालों से भूखी है। ले लेगी।”
मैं उसके ऊपर चढ़ गया। नोक उसकी गीली चूत पर रखी। हल्का दबाव दिया। सिरा अंदर गया। सखू ने मेरे कंधे में नाखून गाड़ दिए। और दबाव। आधा लंड समाया। वह बहुत टाइट थी। सालों की कमी वाली टाइटनेस। मैंने एक लंबा धक्का मारा और पूरा लंड अंदर तक धकेल दिया।
“आह्ह्ह… साहब… फट गई… दर्द हो रहा है… निकालो थोड़ा…”
मैं रुका रहा। उसकी चूत मेरे लंड को जैसे निचोड़ रही थी। इतनी कसकर कि हर धड़कन महसूस हो रही थी। मैंने उसका चेहरा अपने दोनों हाथों में लिया। “साँस लो। आदत पड़ जाएगी।”
धीरे-धीरे मैंने हिलना शुरू किया। छोटे-छोटे धक्के। सखू की आँखों से आँसू बह रहे थे। लेकिन उसने मुझे धक्का नहीं दिया। कुछ देर बाद उसके चेहरे के भाव बदलने लगे। दर्द कम हो रहा था, और कुछ और जगह बना रहा था।
“अब… थोड़ा और तेज… अह्ह…”
मैंने रफ्तार बढ़ाई। हर धक्के पर उसकी टाइट चूत मुझे जोर से पकड़ती। गीली आवाजें आने लगीं। मैंने उसके स्तनों को मसलते हुए और गहराई तक पेलना शुरू किया। सखू की कराहें अब खुल गई थीं। शर्म अभी भी थी, लेकिन शरीर ने हार मान ली थी।
मैंने उसे पलटा। घोड़ी की स्थिति में कर दिया। पीछे से फिर से घुसा। इस बार और गहरा। उसकी गाँड मेरे पेट से लग रही थी। मैंने दोनों हाथों से उसकी कमर पकड़ी और तेजी से पेलने लगा। सखू के मुँह से अब साफ आवाजें निकल रही थीं—कभी “साहब धीरे”, कभी “और जोर से”।
मैंने काफी देर तक उसकी टाइट चूत चोदी। फिर लंड निकाला और उसके मुँह के पास ले गया। सखू ने खुद आँखें बंद करके मुँह खोल दिया। मैंने लंड अंदर ठूंस दिया। वह अनुभवहीन तरीके से चूसने लगी। लार बह रही थी। मैंने थोड़ी देर उसके मुँह का मजा लिया, फिर वापस उसकी चूत में डाल दिया।
आखिरी धक्के बहुत तेज और गहरे थे। सखू की आवाज टूट-टूटकर निकल रही थी। मैंने पूरा लंड अंदर तक दबाया और जोर से झड़ गया। गर्म वीर्य की धार उसकी टाइट चूत में छूटती रही। सखू की देह काँप रही थी। उसकी चूत मेरे लंड को आखिरी बूंद तक निचोड़ रही थी।
मैं उसके ऊपर गिरा रहा। दोनों पसीने से तरबतर। काफी देर तक सिर्फ साँसें चलती रहीं। फिर मैंने धीरे से लंड बाहर निकाला। उसकी चूत से सफेद वीर्य धीरे-धीरे बाहर आने लगा। छेद लाल और थोड़ा खुला हुआ था।
सखू आँखें बंद किए पड़ी रही। मैंने उसका पसीना साफ किया और पल्लू उसके शरीर पर डाल दिया।
“अब से जब भी थकान लगे, यहीं सोना। लेकिन कपड़े नहीं पहनना।”
उसने धीमे से आँखें खोलीं। शर्म अभी भी थी। लेकिन इनकार नहीं था।
“हाँ साहब… अब… जब भी नींद आएगी…”
उस दिन के बाद सखू का रोज़ का कार्यक्रम बदल गया। झाड़ू-पोछा जल्दी निपटाती। बर्तन तेजी से धोती। फिर मेरे बेडरूम में आ जाती। कभी खुद साड़ी खोलकर बिस्तर पर लेट जाती। कभी मैं काम करते-करते उसके पास जाकर उसकी टाइट चूत में लंड डाल देता। कभी किचन की प्लेटफॉर्म पर, कभी बालकनी के दरवाजे के पीछे खड़े-खड़े।
पति शराब पीता रहता था।
और सखू की सालों से प्यासी टाइट चूत अब रोज मेरे लंड की आदी होती जा रही थी।
वह अब सिर्फ कामवाली नहीं रह गई थी।
वह मेरी रोज की जरूरत बन गई थी।
