जब से राहुल दुबई गया था, घर में एक अजीब सी खामोशी पसरी रहती थी।
मैं सना, चौंतीस साल की। शादी को नौ साल हो चुके थे। एक बेटा भी था जो हॉस्टल में रहता था। सास माँ जी बहुत बुजुर्ग हो चुकी थीं। रात को नौ बजे के बाद उनकी आँखें बंद हो जातीं। उसके बाद पूरा फ्लैट सिर्फ मेरा रह जाता।
राहुल महीने में एक बार वीडियो कॉल पर आता। बातें सामान्य होतीं—तुम कैसी हो, माँ जी कैसी हैं, पैसे पहुँचे कि नहीं। सेक्स वाली बातें हम दोनों लंबे समय से बंद कर चुके थे। जब वह आता था तो भी जल्दी निपट जाता था। मुझे याद भी नहीं कि आखिरी बार कब मैंने वाकई में मजा लिया था।
नीचे वाले फ्लैट में एक लड़का रहता था। नाम था कबीर। उम्र कोई पच्चीस। कॉलेज जाता था और शाम को पार्ट-टाइम डिलीवरी का काम करता। कद लंबा, दुबला-पतला नहीं, शरीर पर मेहनत का असर साफ दिखता। जब भी मैं बाजार से भारी थैले लेकर आती, वह सीढ़ियों पर मिल जाता और बिना पूछे थैले पकड़ लेता।
पहले-पहले मैं नाराज होती। “नहीं चाहिए मदद।”
फिर धीरे-धीरे आदत हो गई।
एक दिन भारी पानी के जार के साथ सीढ़ियाँ चढ़ते हुए मेरी साँस फूलने लगी। कबीर पीछे से आया और जार थाम लिया। उसकी उंगलियाँ मेरे हाथ से रगड़ गईं। दोनों रुक गए। उसने कुछ नहीं कहा। मैंने भी नहीं। लेकिन उस रात बिस्तर पर लेटे-लेटे मुझे अपनी हथेली पर उसका स्पर्श बार-बार महसूस होता रहा।
फिर से उसी तरह के छोटे-छोटे पल आने लगे।
कभी लिफ्ट में अकेले। कभी सोसाइटी के पार्क में। कभी जब मैं कचरा फेंगने नीचे जाती। वह मुस्कुरा देता। मैं भी। बातें कम, लेकिन नज़रें ज्यादा। एक शाम वह मेरे फ्लैट के सामने खड़ा था।
“माँ जी अस्पताल में भर्ती हैं ना?” उसने पूछा।
“हाँ। साँस की तकलीफ हो गई थी।”
“आप अकेली हो फिर?”
मैंने सिर हिलाया।
“कुछ चाहिए हो तो बताइएगा।”
रात भर उसकी बात मेरे दिमाग में घूमती रही।
अगली शाम माँ जी के अस्पताल से फोन आया कि वह रात भर वहीं रहेंगी। मॉनिटरिंग के लिए। मैं अकेली थी। पूरा फ्लैट खाली।
आठ बजे दरवाजे पर हल्की सी दस्तक हुई। कबीर खड़ा था। हाथ में एक पॉलीथीन। “कुछ फल ले आया। माँ जी के लिए… और आपके लिए भी।”
मैंने उसे अंदर बुला लिया। वह जूते उतारकर बैठ गया। मैं रसोई से पानी लेकर आई तो वह खड़ा हो चुका था। कमरे में सिर्फ एक ट्यूबलाइट जल रही थी।
“आप हमेशा अकेली रहती हो?” उसने अचानक पूछा।
“आदत हो गई है।”
“अच्छी आदत नहीं है।”
वह मेरी तरफ बढ़ा। मैं पीछे हटी नहीं। जब उसने मेरा हाथ पकड़ा तो उसकी हथेली में पसीना था। मेरी भी।
“सना दी…” उसने मेरा नाम पहली बार इस तरह लिया। “मैं कई दिनों से सोच रहा हूँ…”
मैंने उसका वाक्य अधूरा छोड़ दिया और खुद उसके करीब हो गई। दोनों की साँसें मिल रही थीं। उसने मुझे चूमा। पहले बहुत संभलकर, जैसे कोई गलती कर रहा हो। फिर जब मैंने जवाब दिया तो उसका चुंबन बदल गया। गहरा, गीला, और थोड़ा बेकाबू।
उसके हाथ मेरी कमर पर थे। मैंने खुद उसका हाथ पकड़कर अपनी छाती पर रख दिया। ब्लाउज के ऊपर से ही उसने दबाया। फिर हुक खोले। जब उसके हाथ मेरे नंगे स्तनों पर लगे तो उसने साँस रोकी।
“इतने…” वह कुछ कह नहीं पाया।
मैंने उसकी टी-शर्ट ऊपर कर दी। उसका सीना साफ और सख्त था। मैंने अपनी जीभ उसकी छाती पर फेरी। वह काँप गया। फिर उसने मुझे गोद में उठाया और बेडरूम में ले गया।
बिस्तर पर लिटाते समय उसके हाथ काँप रहे थे। मैंने खुद अपनी साड़ी खोली। पेटीकोट और पैंटी भी। वह मुझे देखता रहा। मैंने उसके पेंट के बटन खोले। लंड निकलकर बाहर आया। अपेक्षा से मोटा। मैंने उसे हाथ में लिया और हल्के से सहलाया। फिर मुँह के करीब ले जाकर जीभ फेरी।
कबीर ने कराहते हुए कहा, “दी… धीरे…”
मैंने नहीं माना। पूरा मुँह में ले लिया। ऊपर-नीचे किया। लार बहने दी। वह मेरे बाल पकड़े हुए था, लेकिन जोर से नहीं धकेल रहा था। जैसे खुद को रोक रहा हो। मैंने उसका हाथ पकड़कर अपने सिर पर और जोर से रखा। उसने समझ लिया। अब वह मेरे मुँह में धीरे-धीरे धक्के देने लगा।
कुछ देर बाद वह मुझे लिटाकर खुद नीचे चला गया। उसकी जीभ मेरी जाँघों के अंदर से होती हुई ऊपर गई। जब उसने मेरी चूत पर मुँह रखा तो मेरी कमर अपने आप उठ गई। वह चाट रहा था जैसे कोई भूखा हो। कभी क्लिट चूसता, कभी जीभ अंदर तक ले जाता। मैंने उसके बालों में उंगलियाँ फँसा लीं। आवाजें निकल रही थीं जो मैंने सालों से नहीं निकाली थीं।
जब वह ऊपर चढ़ा और अपने लंड को मेरी चूत पर टिकाया, तो दोनों की नजरें मिलीं।
“डालूँ?” उसने पूछा।
मैंने सिर्फ टाँगें और फैला दीं।
वह धीरे-धीरे अंदर आया। पूरा। मैंने आँखें बंद कर लीं। बहुत दिनों बाद कोई इतना गहरा था। उसने हिलना शुरू किया। पहले बहुत संभलकर। फिर जब मैंने उसकी कमर पर पैर लपेट लिए तो वह तेज हो गया। बिस्तर की आवाज आने लगी। मेरे नाखून उसकी पीठ पर लग रहे थे।
वह अचानक रुक गया।
“मैं… निकलने वाला हूँ…”
“अंदर,” मैंने साफ कह दिया।
वह और जोर से पेलने लगा। कुछ ही देर में उसके शरीर ने एक लंबी सिहरन ली और वह मेरे अंदर झड़ गया। गर्म। बहुत गर्म। मैंने उसे जकड़ रखा था।
वह मेरे ऊपर गिरा रहा। दोनों पसीने से भीगे। काफी देर तक कोई नहीं बोला। फिर उसने धीरे से कहा, “मैं जाऊँ?”
“नहीं।”
रात भर वह रुका।
दूसरी बार उसने मुझे घोड़ी बनाकर पीछे से चोदा। इस बार और तेज। तीसरी बार बाथरूम में, जब मैं नहाने गई तो वह भी आ गया। पानी गिर रहा था और वह मुझे दीवार से सटाकर अंदर तक था।
सुबह चार बजे वह कपड़े पहनने लगा। मैंने बिस्तर से कहा, “कब आओगे फिर?”
वह मुस्कुराया। “जब आप बुलाओगी।”
माँ जी दो दिन बाद घर लौटीं। घर फिर से सामान्य हो गया। लेकिन अब जब भी कबीर सीढ़ियों पर मिलता, हमारी नजरें एक सेकंड ज्यादा रुकतीं। और जब भी माँ जी जल्दी सो जातीं या रात को अस्पताल चेकअप के लिए रुकतीं, तो दरवाजे पर उसी तरह की हल्की दस्तक हो जाती।
अब मैं राहुल की वीडियो कॉल पर मुस्कुराती हूँ।
और कबीर के जाने के बाद बिस्तर पर लेटे-लेटे अपनी जाँघों के अंदर उसके छोड़े हुए निशान सहलाती हूँ।
