मेरा नाम अनु है। उम्र बत्तीस। शादी को पाँच साल हो चुके थे। पति अंकित एक छोटी सी इंपोर्ट-एक्सपोर्ट कंपनी चलाता था। हम लोग पुणे के एक शांत सोसाइटी में रहते थे। जिंदगी सामान्य थी। न कोई बड़ी ख़ुशी, न कोई बड़ा गम। सेक्स भी हफ्ते में एक-दो बार हो जाता था—साफ-सुथरा, जल्दी खत्म होने वाला, और दोनों के लिए बस एक आदत की तरह।
फिर वह आदमी वापस आया।
नाम था रणवीर। उम्र मेरे पति से तीन साल बड़ा। कभी हम दोनों एक ही कॉलेज में थे। अंतिम वर्ष की बात है। एक बार कॉलेज फेस्ट के बाद बारिश में फँस गए थे। उसके फ्लैट पर गए कपड़े बदलने। उसी रात पहली और आखिरी बार हमने एक-दूसरे को छुआ था। कोई वादा नहीं, कोई कल नहीं। सिर्फ एक रात। सुबह मैं चुपचाप निकल गई थी। उसके बाद हमने एक-दूसरे से बात तक नहीं की। वह शहर छोड़कर चला गया। मैंने साल भर बाद अंकित से शादी कर ली।
पाँच साल बाद एक दिन अंकित घर आया और बोला, “नया पार्टनर आने वाला है कंपनी में। पुराना दोस्त है। रणवीर।”
मेरा गिलास हाथ से छूटते-छूटते बचा।
रणवीर अगले ही हफ्ते डिनर पर आया। चेहरा पहले जैसा ही था, बस अब और परिपक्व। आँखों में वही घमंड और ठंडक। उसने मुझे देखा जैसे कोई पुरानी किताब देख रहा हो जिसे वह कभी पढ़ चुका हो। अंकित दोनों को परिचित करा रहा था, और मैं मुस्कुराए जा रही थी। अंदर सब कुछ उल्टा-पुल्टा हो रहा था।
उस रात बिस्तर पर अंकित सो गया तो मैं छत पर चली गई। सिगरेट नहीं पीती थी, लेकिन उस रात बहुत मन किया। तभी पीछे से आवाज आई।
“अभी भी बारिश वाली रात याद है?”
मैंने मुड़कर देखा। रणवीर छत की रेलिंग पर हाथ रखे खड़ा था।
“वह रात खत्म हो गई थी,” मैंने कहा।
“शरीर को याद रहता है,” उसने जवाब दिया। “खासकर कुछ हिस्सों को।”
मैंने उसकी तरफ देखा। “मेरे पति सो रहे हैं नीचे।”
“मैं जानता हूँ।” वह मेरे करीब आया। “मैं कुछ माँगने नहीं आया। बस पूछना था—क्या तुम्हारी चूत को अभी भी मेरा लंड याद है?”
मेरी साँस अटक गई। इतने सीधे शब्द किसी ने कभी नहीं कहे थे। अंकित तो सेक्स के समय भी ‘वहाँ’ और ‘यह’ कहकर काम चलाता था।
मैंने जवाब नहीं दिया। वह मुस्कुराया और चला गया।
अगले तीन हफ्ते कंपनी के काम से वह घर आता रहा। कभी डिनर, कभी ड्रिंक्स। अंकित उसे अपना नया दोस्त समझने लगा। मैं हर बार उसकी मौजूदगी में अपनी टाँगें भींचकर बैठती। क्योंकि जब भी वह कमरे में होता, मेरी चूत खुद-ब-खुद गीली होने लगती। जैसे शरीर ने पांच साल बाद भी उसका स्वाद नहीं भूला हो।
फिर एक दिन अंकित को मुंबई जाना पड़ा तीन दिन के लिए।
रणवीर उसी शाम बिना बताए घर आ गया। दरवाजा खोला तो वह दीवार के सहारे खड़ा था।
“अंकित गया?” उसने पूछा।
मैंने सिर हिलाया।
“तो आज फैसला कर लो,” उसने कहा। “या तो मुझे अंदर आने दो और वह रिश्ता फिर से शुरू करो जो सिर्फ हमारी चूत और लंड के बीच था… या फिर हमेशा के लिए दरवाजा बंद कर दो।”
मैंने दरवाजा और खोला।
वह अंदर आया। दरवाजा बंद होते ही उसने मुझे दीवार से सटा दिया। चुंबन नहीं लिया। बस मेरी जीन्स का बटन खोला, जिपर नीचे किया और हाथ पैंटी के अंदर डाल दिया। उसकी उंगलियाँ मेरी चूत पर पहुँचीं तो वह हल्का मुस्कुराया।
“सोचा था गीली होगी। पाँच साल बाद भी यही हाल है।”
मैंने उसकी कलाई पकड़ी। “सिर्फ शरीर। कोई बात नहीं, कोई वादा नहीं, कोई कल नहीं। सिर्फ… चूत का रिश्ता।”
“बस यही तो चाहिए था,” उसने कहा।
उसने मुझे गोद में उठाया और बेडरूम में ले गया। कपड़े धीरे-धीरे नहीं उतारे। जैसे कोई भूखा आदमी उपहार खोल रहा हो। मेरी टी-शर्ट फाड़ दी। ब्रा ऊपर सरकाई। स्तनों को मुँह में भरकर जोर से चूसा। दांत लगाए। मैंने उसके बाल पकड़ लिए।
“आज दर्द भी देना,” मैंने कहा। “ताकि याद रहे।”
रणवीर मेरी जीन्स और पैंटी एक साथ खींचकर नीचे ले गया। फिर घुटनों के बल बैठ गया और बिना किसी प्रस्तावना के मेरी चूत पर मुँह लगा दिया। उसकी जीभ मोटी और गर्म थी। वह सिर्फ चाट नहीं रहा था। वह मेरी चूत को खा रहा था। क्लिट को दाँतों के बीच लेकर हल्का खींचता, फिर पूरी जीभ अंदर तक घुसा देता। दो उंगलियाँ और जोड़ दीं। मैं बिस्तर पर तड़पने लगी।
“आह्ह… वहाँ… जोर से…”
वह नहीं रुका। मेरी दोनों टाँगें उसके कंधों पर थीं। वह मेरी चूत से मुँह लगाए हुए उठकर खड़ा हो गया और मुझे आधे अधूरे शरीर के साथ बिस्तर पर खींचता रहा। मेरी कमर हवा में थी। उसकी जीभ और उंगलियाँ लगातार काम कर रही थीं। मैं पहली बार बहुत जल्दी झड़ गई। शरीर काँप रहा था। उसने मुँह नहीं हटाया। मेरा पानी चट करता रहा।
फिर वह खड़ा हुआ। पेंट नीचे की। उसका लंड पहले जैसा ही था—मोटा, नसों वाला, सिरे पर गुलाबी। मैंने खुद ही घुटनों के बल होकर उसे मुँह में ले लिया। इस बार कोई नखरे नहीं। मैंने पूरा अंदर तक लिया। गला भर गया। आँखों से आँसू आ गए। वह मेरे बालों में उंगलियाँ फँसाकर धीरे-धीरे मेरे मुँह में धक्के देने लगा।
“पाँच साल बाद भी यही गरम मुँह… चूसती रह।”
मैंने उसके अंडे भी मुँह में लिए, चाटे, फिर वापस लंड पर आ गई। लार से पूरा लंड चमक रहा था। वह मुझे उठाकर बिस्तर पर लिटाया। टाँगें फैलाईं। और एक ही धक्के में पूरा अंदर तक घुस गया।
दर्द हुआ। अच्छा दर्द। मेरी चूत उसके लंड को जैसे पहचान गई हो। वह रुका नहीं। लंबे, गहरे धक्के मारने लगा। हर धक्के पर मेरे स्तन हिल रहे थे। वह झुककर एक निप्पल मुँह में ले लेता, काटता, फिर वापस कमर झुकाकर चोदता।
“बोल,” उसने कहा। “किसका लंड है अंदर?”
“तेरा… सिर्फ तेरा… अह्ह…”
“और यह चूत?”
“तेरी… आज रात की… चूत का रिश्ता…”
वह मुस्कुराया। फिर उसने मुझे पलटा। घोड़ी बना दिया। पीछे से इतनी जोर से घुसा कि मैं आगे खिसक गई। उसने कमर पकड़कर खींचा और फिर से पूरी ताकत से पेलने लगा। थप-थप की आवाज पूरे कमरे में गूँज रही थी। उसकी उंगलियाँ मेरे बालों में थीं। कभी वह मेरी गाँड पर जोर से थप्पड़ मारता, कभी झुककर मेरे कान में गंदे शब्द बोलता।
“इतनी गीली चूत… अंकित को कभी मिलती होगी क्या?”
“नहीं… कभी नहीं… सिर्फ तू… और जोर से…”
उसने लंड निकाला। थूक लगाकर मेरी गाँड के छेद पर रखा। मैंने तकिया दबा लिया। वह धीरे-धीरे अंदर घुसने लगा। गाँड फैल रही थी। दर्द हो रहा था। लेकिन मैंने मना नहीं किया। जब पूरा अंदर तक चला गया तो वह रुक गया।
“साँस ले,” उसने कहा। “अब लेता हूँ।”
फिर उसने मेरी गाँड चोदनी शुरू कर दी। पहले धीमे, फिर तेज। एक हाथ मेरी चूत पर रखकर क्लिट सहला रहा था। दर्द और मजे का ऐसा मिश्रण पहले कभी नहीं हुआ था। मैं दूसरी बार झड़ गई। शरीर काबू में नहीं था। वह भी उसी समय गाँड में जोर से धकेलकर झड़ गया। गर्म वीर्य अंदर छूटता महसूस हुआ।
वह मेरे ऊपर गिर पड़ा। दोनों पसीने से लथपथ थे। काफी देर तक सिर्फ साँसें चलती रहीं। फिर वह बोला, “यह रिश्ता सिर्फ इसी का रहेगा। चूत का। न कोई इमोशन, न कोई डिमांड। जब जी चाहे, जब मौका मिले।”
मैंने आँखें बंद रखकर कहा, “हां। सिर्फ चूत का रिश्ता।”
रणवीर रात भर रहा। उसने मुझे और दो बार चोदा। एक बार सुबह नहाते समय बाथरूम में, जब वह पीछे से आया और पानी गिरते हुए ही मेरे अंदर घुस गया। दूसरी बार नाश्ता बनाते समय किचन की प्लेटफॉर्म पर।
अंकित जब तीन दिन बाद लौटा, घर बिल्कुल सामान्य था। मैंने उसी की चाय बनाई, उसी के साथ टीवी देखा। लेकिन रात को जब अंकित सो गया, तो मेरी चूत फिर गीली हो रही थी। क्योंकि अब वह जानती थी कि उसका एक अलग रिश्ता है। एक ऐसा रिश्ता जो सिर्फ शरीर का है। जो सिर्फ मजे का है। जो सिर्फ लंड और चूत के बीच का है।
अगले महीने रणवीर ने मुझे ऑफिस के पास एक छोटी सी फ्लैट की चाबी दी। “जब जी चाहे आ जाना। मैं या तो पहले से रहूँगा, या फिर दस मिनट में पहुँच जाऊँगा।”
मैंने चाबी ले ली।
अब जब भी अंकित बिजनेस ट्रिप पर जाता, या लेट मीटिंग होती, मैं उस फ्लैट पहुँच जाती। कभी रणवीर पहले से नंगा बिस्तर पर पड़ा होता। कभी मैं पहले जाकर कपड़े उतारकर उसका इंतजार करती। हम कम बोलते। ज्यादा चोदते। कभी वह मुझे घंटों चाटता। कभी मैं उसके लंड को गले तक ले जाकर रखती जब तक वह झड़ न जाए। कभी वह मेरी गाँड में ही सो जाता।
एक दिन मैंने पूछ लिया, “तुझे कभी कुछ और नहीं चाहिए मुझसे?”
वह मेरी चूत में उंगलियाँ घुमाते हुए बोला, “नहीं। मुझे बस यही चाहिए। तेरी चूत का यह रिश्ता। बाकी सब झूठ है।”
मैंने उसकी उंगलियाँ और अंदर दबा लीं।
अब यह रिश्ता मेरी जिंदगी का हिस्सा बन चुका है। अंकित को घर देता हूँ। हँसी देती हूँ। बीवी वाला प्यार देती हूँ। और रणवीर को… सिर्फ अपनी चूत।
