सुहागन से रंडी सुहागन तक का मेरा सफर 3 | मीना और विक्रम

सुहागन से रंडी सुहागन तक का मेरा सफर 2

शेखर के साथ वो दोपहर गए लगभग दस दिन हो चुके थे। उसके बाद उसने दो बार मैसेज किया था। एक बार पूछा था कि सब ठीक है या नहीं, दूसरी बार बस इतना लिखा था कि जब मन हो तो बता देना। मैंने जवाब नहीं दिया था। आकाश का भी मैसेज आया था एक दिन, लेकिन मैंने उसे भी टाल दिया था। अंदर कुछ बदल रहा था। पहले जो गुनाह का बोझ होता था, वो अब उतना भारी नहीं लग रहा था। उसकी जगह एक अजीब सी भूख ले रही थी। अलग-अलग मर्दों को महसूस करने की, अपनी चूत को अलग-अलग तरीकों से इस्तेमाल होने देने की।

रिया का फोन आया उसी हफ्ते। “मीना, एक छोटी सी पार्टी है। घर पर ही। थोड़े लोग होंगे। शेखर भी आ रहा है… और उसका एक दोस्त भी। तू जरूर आना। अकेले मत बैठना।”

मैंने थोड़ी देर सोचा। फिर हाँ कह दिया। मन में एक उत्सुकता थी। शेखर के दोस्त के बारे में कुछ नहीं पता था, लेकिन रिया की आवाज में जो हल्की सी शरारत थी, वो समझ में आ रही थी।

पार्टी रिया के ही घर पर थी। इस बार भीड़ कम थी। करीब बारह-पंद्रह लोग। हल्की संगीत, ड्रिंक्स, और धीमी बातें। मैंने गहरा रंग की साड़ी पहनी थी। ब्लाउज थोड़ा लो नेक। बाल खुले। आईने में खुद को देखा तो लगा था कि अब मैं पहले वाली मीना नहीं लगती। आँखों में एक अलग चमक आ गई थी।

शेखर पहले से पहुँचा हुआ था। उसने मुझे देखकर सिर हिलाया। उसके पास एक और आदमी खड़ा था। लंबा, गेहुँआ रंग, उम्र करीब चालीस के आसपास। कद अच्छा, शरीर संभला हुआ, बालों में हल्के सफेद धागे। महंगे लेकिन साधारण कपड़े। जब मैं पास गई तो शेखर ने मुस्कुराते हुए कहा, “मीना, ये हैं विक्रम। मेरे पुराने दोस्त। और विक्रम, ये मीना… रिया की सहेली।”

विक्रम ने मेरी तरफ देखा। उसकी निगाह मेरे चेहरे पर कुछ देर टिकी रही, फिर धीरे से नीचे सरककर मेरी साड़ी के गड्ढे और कमर पर गई। उसने हाथ बढ़ाया। “नमस्ते। शेखर ने आपके बारे में कुछ नहीं बताया… लेकिन अब समझ में आ रहा है क्यों नहीं बताया।”

आवाज गहरी और शांत थी। मैंने हाथ मिलाया। उसका हाथ बड़ा और गर्म था। पकड़ में एक आत्मविश्वास था।

बातें शुरू हुईं। पहले सामान्य। मौसम, पार्टी, शहर। लेकिन विक्रम की निगाह बार-बार मुझ पर ठहर जाती। जब मैं हँसती तो वो देखता रहता। जब मैं गिलास उठाती तो उसकी नजर मेरे होठों पर चली जाती। शेखर बीच-बीच में हमें अकेला छोड़ देता। जानबूझकर।

थोड़ी देर बाद विक्रम ने धीमे से पूछा, “शेखर से आपकी जान-पहचान कैसे हुई?” मैंने उसकी तरफ देखा। “एक पार्टी में। फिर… बातें बढ़ गईं।” वो हल्के से मुस्कुराया। “बातें अक्सर आगे बढ़ जाती हैं। खासकर जब दोनों तरफ खाली जगह हो।”

मैं चुप रही। अंदर हल्की सी हलचल हो रही थी। विक्रम ने गिलास घुमाते हुए कहा, “शेखर ने तुम्हारा नाम लिया था एक दिन। बस इतना कहा था कि एक औरत है जो बहुत शांत लगती है, लेकिन अंदर कुछ और है। अब देखकर लग रहा है कि वो सही कह रहा था।”

मैंने पल्लू संभाला। “आप बहुत सीधे बोलते हो।” “समय कम होने पर सीधे बोलना बेहतर रहता है,” उसने जवाब दिया। “आप शादीशुदा हो?” “हाँ।” “पति को पता है आप यहाँ हो?” “पता है। लेकिन सब नहीं पता।” विक्रम ने मेरी आँखों में देखा। “अच्छा है। कुछ बातें छुपकर ही अच्छी लगती हैं।”

रिया ने हमें डिनर की तरफ बुलाया। खाने के दौरान विक्रम मेरे बगल में आ बैठा। उसकी बाजू बार-बार मेरी बाजू से छू रही थी। एक बार जब उसने पानी का गिलास पकड़ा तो उसकी उँगली मेरे हाथ से जा टकराई। वो तुरंत नहीं हटा। कुछ पल बाद धीरे से हटा।

खाना खत्म होने के बाद लोग बालकनी और लाउंज में फैल गए। विक्रम ने मुझे इशारे से एक तरफ बुलाया। हम घर के पिछवाड़े वाली छोटी सी बालकनी में आ गए। वहाँ हल्की अँधेरा था।

“मीना,” उसने धीमे से कहा, “मैं घुमावदार बातें नहीं करना चाहता। शेखर ने तुम्हारे बारे में जितना कहा, उससे ज्यादा मैं खुद देख रहा हूँ। तुम भूखी हो। और मैं भी खाली हूँ। अगर तुम्हें मंजूर हो तो… हम मिल सकते हैं। अकेले।”

मेरा दिल तेज धड़क रहा था। शेखर के बाद तीसरा मर्द। अंदर एक आवाज कह रही थी कि अब बहुत हो गया। दूसरी आवाज कह रही थी कि अभी तो भूख और बढ़ी है। मैंने गिलास में बची शराब को घुमाया।

“आप बहुत तेज चल रहे हो।” “तेज नहीं। साफ चल रहा हूँ,” विक्रम ने कहा। “अगर मना करना है तो अभी कर दो। मैं बुरा नहीं मानूँगा। लेकिन अगर मन है तो… समय बर्बाद मत करो।”

मैंने उसकी तरफ देखा। उसकी आँखों में न कोई दबाव था, न कोई मिठास। बस एक साफ इच्छा थी। मैंने धीरे से कहा, “लोकेशन भेजना। सोचकर बताऊँगी।”

विक्रम मुस्कुराया। “लोकेशन भेज दूँगा। और मीना… सोचते हुए ज्यादा देर मत लगाना। भूख बढ़ती रहती है।”

मैं वहाँ से हट गई। बाकी पार्टी मैंने जैसे-तैसे काटी। शेखर ने एक बार दूर से देखा और हल्का सिर हिलाया। जैसे वो सब समझ रहा हो। घर लौटते समय गाड़ी में मैं खिड़की से बाहर देखती रही। मन में आकाश था, शेखर था, और अब विक्रम भी था।

रात को बिस्तर पर लेटे हुए मैंने मोबाइल चेक किया। विक्रम ने लोकेशन भेज दी थी। एक सर्विस्ड अपार्टमेंट का अड्रेस। नीचे लिखा था—

“कल दोपहर। इंतजार रहेगा। आना या न आना, दोनों तुम्हारे हाथ में है।”

मैंने फोन को सीने से लगा लिया। अंदर की औरत अब पहले से ज्यादा जाग चुकी थी। सुहागन वाली मीना अभी भी कहीं थी, लेकिन रंडी सुहागन वाली मीना अब साफ तौर पर फैसले लेने लगी थी।

और इस बार का फैसला भी उसी का था।

अगली सुबह उठते ही मन उलझा रहा। विक्रम का मैसेज बार-बार पढ़ती रही। लोकेशन साफ थी, समय दोपहर का। राजेश ऑफिस जा चुका था। घर में अकेली थी। कई बार सोचा कि मना कर दूँ, लेकिन हर बार मन उसी तरफ चला जाता। आखिरकार नहाया, साफ कपड़े पहने और निकल पड़ी। रास्ते में आकाश और शेखर दोनों याद आते रहे। दोनों के बाद अब तीसरा। डर था, लेकिन शरीर की बेचैनी उससे कहीं ज्यादा थी।

विक्रम का अपार्टमेंट शांत इलाके में था। दरवाजा खुलते ही उसने मुझे अंदर खींच लिया। दरवाजा बंद होते ही वो मेरे बहुत करीब आ गया।

“आ गईं,” उसने धीमे से कहा। “हाँ…”

उसने कोई और बात नहीं की। सीधा मेरे होठों पर अपना मुँह रख दिया। चुंबन गहरा और भूखा था। उसकी जीभ ने मेरे मुँह को खोल दिया। मेरे हाथ खुद उसके बालों में चले गए। उसने मेरी साड़ी का पल्लू एक झटके में हटाया और कमर से पकड़कर दीवार से लगा दिया। उसका हाथ मेरे ब्लाउज के अंदर घुस गया। सीधा छाती पर। निप्पल को उँगलियों के बीच लेकर मरोड़ने लगा।

“आह्ह… विक्रम…” “शरीर तो तैयार है। अंदर तक गीली हो चुकी होगी,” उसने मेरे कान में कहा।

उसने ब्लाउज के हुक खोले। छातियाँ बाहर आते ही उसने दोनों को जोर से मसला और एक निप्पल मुँह में ले लिया। दाँतों से हल्का काटा, फिर जोर से चूसा। मेरी कमर में बल पड़ गया। मैंने उसका सिर अपने सीने से दबा लिया। दूसरी छाती को भी उसने उसी तरह चूसा। मेरी साँसें तेज हो गईं।

वो मुझे बेडरूम में ले गया। बिस्तर के पास खड़े-खड़े मेरी साड़ी और पेटीकोट दोनों नीचे गिरा दिए। अब मैं सिर्फ पैंटी में थी। उसने पैंटी के ऊपर से मेरी चूत को सहलाया। “इतनी गीली… सिर्फ चुंबन और चूसने से इतना पानी।”

पैंटी भी उतर गई। मैं पूरी नंगी हो गई। विक्रम ने मुझे बिस्तर पर धकेला। खुद भी कपड़े उतारने लगा। जब उसका लंड बाहर आया तो मैंने निगाहें नहीं हटाईं। मोटा, तना हुआ, नसों से भरा। मैंने हाथ बढ़ाकर उसे पकड़ा। गरम और सख्त। ऊपर-नीचे किया। विक्रम की साँसें बदल गईं।

“मुँह में लो,” उसने कहा।

मैंने झुककर टोपा को होठों से छुआ। फिर जीभ निकाली और चाटा। धीरे-धीरे मुँह में ले लिया। विक्रम ने मेरे बाल पकड़कर हल्के धक्के देने शुरू कर दिए। लंड गले तक जा रहा था। आँखों में आँसू आ गए लेकिन मैंने रोका नहीं। थूक बह रहा था। कुछ देर तक मैंने उसे चूसा। फिर उसने लंड निकाला और मुझे उलटा कर दिया।

“गाँड ऊँची कर। चूत दिखा।”

मैंने शर्म के मारे चेहरा तकिये में छुपा लिया। विक्रम ने मेरे दोनों लोथड़े फैलाए और अपना लंड मेरी चूत के मुँह पर रखा। एक जोर का धक्का दिया। आधा अंदर घुस गया। दर्द और मजे का मिश्रण था। उसने बिना रुके दूसरा धक्का मारा। पूरा लंड मेरी चूत में धँस गया।

“आह्ह्ह… पूरा… अंदर है…” “अब सह। आज धीरे नहीं चोदने वाला,” उसने कहा और कमर चलाने लगा।

पहले मध्यम गति थी। फिर तेज होती गई। हर धक्के के साथ मेरी चूत की आवाज निकलने लगी। चप-चप-चप। विक्रम ने मेरी कमर कसकर पकड़ रखी थी और जोर-जोर से ठोक रहा था। मेरी छातियाँ बिस्तर से रगड़ खा रही थीं। निप्पल जल रहे थे।

“बोल मीना… कैसा लग रहा है?” “बहुत… जोर से लग रहा है… और तेज करो…” “आकाश और शेखर के बाद… अब मेरा लंड ले रही हो। कितनी आसानी से खोल दी चूत।” “मत पूछो… बस चोदो… आज तुम्हारी रंडी हूँ…”

विक्रम ने मेरा बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा और और तेज कर दिया। उसकी गालियाँ और मेरे कराहे एक साथ गूँज रहे थे। थोड़ी देर बाद उसने लंड निकाला, मुझे पलटा और फिर से ऊपर से घुसा दिया। इस बार मेरी जाँघें उसके कंधों पर थीं। वो बहुत गहराई तक जा रहा था।

“आह्ह… वहाँ… और मारो… फाड़ दो…” “फाड़ रहा हूँ… सालों से दबी चूत को खोल रहा हूँ…”

मैं जोर से काँप उठी। पहला झड़ना इतना तेज था कि आँखों के आगे अँधेरा छा गया। मेरी चूत बार-बार सिकुड़कर उसके लंड को निचोड़ रही थी। विक्रम रुका नहीं। वो पेलता रहा। मेरी संवेदनशीलता और बढ़ गई। मैं दूसरी बार भी झड़ने के करीब थी।

“मैं फिर से… जाने वाली हूँ…” “जा… मेरे लंड पर ही जा…”

दूसरी बार झड़ते हुए मैंने उसकी पीठ में नाखून गड़ा दिए। विक्रम ने भी गति बढ़ाई और गहरी साँस लेकर अपना पूरा वीर्य मेरे अंदर छोड़ दिया। एक के बाद एक धार। मैं महसूस कर सकती थी कि वो मेरे अंदर भर रहा है।

दोनों पसीने से लथपथ गिरे पड़े रहे। विक्रम का लंड अभी भी अंदर था। धीरे-धीरे ढीला पड़ रहा था। उसने मेरे माथे पर से बाल हटाए और कहा, “अब तुम सुहागन नहीं रहीं मीना। शरीर बोल रहा है।”

मैंने आँखें खोलीं। “अब नहीं रही। और पीछे मुड़ने का मन भी नहीं है।”

थोड़ी देर आराम के बाद विक्रम का लंड फिर से उठने लगा। मैंने खुद उसे ऊपर खींच लिया। इस बार मैं ऊपर बैठी। लंड पकड़कर अपनी चूत में डाल लिया और खुद हिलने लगी। उसके भारी धक्कों के बिना भी मजा आ रहा था। विक्रम मेरे दोनों स्तनों को मुँह में लेकर चूस रहा था। मैं कमर पटक-पटककर खुद को चोद रही थी।

“ले… ले रंडी… अपनी तीसरी चुदाई का मजा ले…” “ले रही हूँ… और लूँगी… रुको मत…”

हमने उस दोपहर तीन राउंड किए। आखिरी राउंड में विक्रम ने फिर से मेरे अंदर ही झड़ा। जब वो बाहर निकला तो मेरी चूत से उसका पानी बह निकला। जाँघों तक फैल गया। मैं लेटी रही। पैर फैले हुए। शरीर में कोई ताकत नहीं बची थी।

विक्रम मेरे बगल में लेट गया। “अगली बार जब बुलाऊँ तो आना। और मीना… अब तुम सिर्फ एक-दो तक सीमित नहीं रहोगी। यह मैं देख सकता हूँ।”

मैंने उसकी तरफ देखा। जवाब नहीं दिया। क्योंकि वो सच कह रहा था। आकाश पहला था, शेखर दूसरा, विक्रम तीसरा। और अंदर की भूख अब और साफ हो चुकी थी।

घर लौटते समय गाड़ी में मैं खिड़की से बाहर देखती रही। जाँघों के बीच नमी अभी भी थी। रात को राजेश के सामने सामान्य मुस्कान रखना मुश्किल नहीं लगा। अंदर एक लंबी लिस्ट बनने लगी थी। और मुझे पता था कि ये लिस्ट यहीं खत्म नहीं होने वाली।

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