गली के लफंगे से चुद गई माँ। माँ की चुदाई की कहानी।

plot : maa ki chudai : College student bete ne apni maa ko gali ke tapori se chudte dekha. Baap shift pe tha. Maa ki chut lafange ne bhar di. Full story.

कॉलेज के पहले महीने में ही मुझे महसूस हो गया था कि घर की हवा बदल चुकी है।

मेरा नाम आदित्य है। अठारह साल का। आर्ट्स के पहले साल में दाखिला लिया है। सुबह आठ बजकर सैंतालीस मिनट पर घर से निकलता हूँ और शाम चार के बाद ही लौटता हूँ। पिताजी एक प्राइवेट फर्म में अकाउंट्स की नौकरी करते हैं। उनकी ड्यूटी शिफ्ट में रहती है—कभी सुबह सात से शाम चार, कभी रात के दस से सुबह छह। घर में दिन का बड़ा हिस्सा सिर्फ माँ और खाली कमरों का होता है। पहले यह बात सामान्य लगती थी। अब नहीं लगती। ये antarvasana maa ki chudai आप pranaykatha पर पढ़ रहें है।

माँ का नाम सुमित्रा है। उम्र पैंतालीस के करीब। शरीर उनका अभी भी संभला हुआ है। गेहुँआ रंग, लंबा और घना काला बाल जिसमें सफेदी के कुछ धागे मंदिर के पास दिखाई देते हैं। चेहरा गोल नहीं, थोड़ा लंबा। आँखें बड़ी और थकी हुई, लेकिन जब वे किसी बात पर ध्यान देती हैं तो उन आँखों में एक तेज चमक आ जाती है। कद औसत है। कंधे गोल। स्तन भारी और थोड़े झुके हुए, जो ब्लाउज के अंदर अपनी मौजूदगी जरूर दर्ज कराते हैं। कमर अभी भी पतली है, लेकिन कूल्हे चौड़े और भारी हो गए हैं। साड़ी पहनने पर उनकी गांड की गोलाई साफ नजर आती है। सालों तक उन्होंने घर संभाला, पिताजी की शिफ्ट के हिसाब से अपनी नींद बदली, और मेरी पढ़ाई की चिंता की। लेकिन पिछले छह-सात महीनों में उनमें कुछ बदला है। साड़ियों के रंग चटकने लगे। बालों में तेल लगाकर खुला छोड़ने की आदत पड़ गई। गली के लोगों से बातें पहले से लंबी होने लगीं। और सबसे बड़ी बात—वे पहले जैसी चुप और थकी हुई नहीं रहती थीं। उनकी चाल में एक अलग तरह की बेचैनी आ गई थी।

गली में बंटी रहता था। उम्र पच्चीस-छब्बीस की। पढ़ाई अधूरी छोड़ दी थी। कभी किसी के यहां ड्राइविंग कर लेता, कभी पान की दुकान पर दिन काट देता। शरीर उसका मजबूत था—चौड़े कंधे, बाजू पर सस्ते टैटू, छाती पर घने बाल। चेहरे पर हमेशा एक ऐसा भाव रहता जैसे वह सब कुछ अपना हक समझता हो। बात करने का तरीका रूखा और सीधा। माँ उससे बात क्यों करती हैं, यह सवाल मेरे दिमाग में कई बार आया। लेकिन मैंने कभी पूछा नहीं। कॉलेज शुरू होने के बाद जब मेरा ध्यान घर की छोटी-छोटी चीजों पर जाने लगा, तब जाकर मैंने नोटिस किया कि बंटी अब पहले से ज्यादा बार हमारे घर के आसपास दिखाई देता है।

एक मंगलवार को सर दर्द के कारण मैं लेक्चर छोड़कर दोपहर दो बजे घर लौट आया। मुख्य दरवाजा खुला था। अंदर से आवाज आ रही थी—माँ की हल्की हँसी और एक मर्दाना आवाज। मैंने जूते बाहर ही उतार दिए और चुपके से अंदर घुसा। आवाज किचन की तरफ से आ रही थी। हॉल में खड़े होकर मैंने सुना।

बंटी कह रहा था, “आपकी कमर अभी भी ऐसी है जैसे कोई जवान औरत। सुमित्रा भाभी, आप तो खुद को बहुत संभाल के रखती हैं।”

माँ की आवाज में हल्की झुंझलाहट थी, लेकिन उसके नीचे कुछ और भी था। “बकवास मत करो। और आवाज कम रखो। पड़ोसी सुन लेंगे।”

फिर कुछ पल की चुप्पी। उसके बाद माँ की एक सिसकारी निकली—दबी हुई, लेकिन साफ। मैंने दीवार का सहारा लिया। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। मैंने धीरे-धीरे कदम बढ़ाए। किचन का दरवाजा आधा खुला था। अंदर की जो तस्वीर मेरे सामने आई, उसने मेरे पैर जड़ कर दिए। ये antarvasana maa beta sex story आप pranaykatha पर पढ़ रहें है।

माँ रसोई के स्लैब पर आधी लेटी हुई थीं। उनकी साड़ी कमर तक ऊपर उठी हुई थी। एक पैर स्लैब पर टिका था और दूसरा नीचे लटक रहा था। बंटी उनके पैरों के बीच खड़ा था। उसका एक हाथ माँ की मोटी जांघ पर था और दूसरा हाथ उनकी चूत में। उंगलियाँ अंदर-बाहर हो रही थीं। गीली, चिपचिपी आवाज साफ सुनाई दे रही थी। माँ की आँखें बंद थीं। होंठ दबे हुए। कभी-कभी उनकी कमर हल्के से ऊपर उठ जाती और फिर शर्म या मजे में वे उसे दबा लेतीं। बंटी की उंगलियों पर उनकी चूत का पानी चमक रहा था।

मैं वहीं खड़ा रहा। हिल नहीं सका। गुस्सा आना चाहिए था। पिताजी का चेहरा याद आना चाहिए था। लेकिन जो भावना सबसे पहले उभरी वह गुस्से से बिल्कुल अलग थी। मेरी साँसें तेज हो गईं। पैंट के अंदर लंड खुद-ब-खुद सख्त होने लगा और अपनी जांघ से चिपक गया। मैंने आँखें बंद करने की कोशिश की, लेकिन पलकें नहीं झुकीं। मेरी निगाह माँ के चेहरे पर टिकी रही—उनके फैले हुए होंठ, उनकी काँपती साँसें, और वह तरीका जिससे वे बंटी की उंगलियों को अपनी चूत के अंदर लेने के लिए कमर हिला रही थीं।

बंटी ने अचानक उंगलियाँ निकालीं। उसकी दो उंगलियाँ पूरी तरह चमक रही थीं। उसने पेंट का जिपर नीचे किया और अपना लंड बाहर निकाला। मोटा, काला, नसों से भरा हुआ। सिर का भाग चमकदार और पहले से गीला। माँ ने आँखें खोलीं और उसे देखा। उन्होंने कोई विरोध नहीं किया। बल्कि अपनी जांघें थोड़ी और फैला दीं। बंटी ने आगे बढ़कर अपने लंड का मोटा सिर उनकी चूत के मुंह पर टिकाया। धीरे से दबाव दिया। माँ की लंबी, काँपती हुई साँस निकली। लंड अंदर सरकने लगा—धीरे-धीरे, उनकी चूत की दीवारों को फैलाते हुए। जब आधा अंदर गया तो माँ ने उसके कंधे पर हाथ रख दिया। जब पूरा लंड जड़ तक धँस गया तो दोनों कुछ पल रुके रहे। माँ की चूत उसके मोटे लंड को पूरी तरह निगल चुकी थी।

फिर बंटी हिलने लगा। छोटे-छोटे धक्के। माँ की पीठ स्लैब पर रगड़ खा रही थी। उनकी साड़ी और ऊपर खिसक चुकी थी। ब्लाउज के अंदर उनके भारी स्तन उछल रहे थे। बंटी ने दोनों हाथों से उनकी कमर पकड़ी और गति तेज कर दी। अब हर धक्के के साथ गीली, शर्मनाक आवाज पूरे किचन में गूँज रही थी। माँ मुंह पर एक हाथ रखे हुए थीं लेकिन उनकी आँखों के कोने में पानी था। दर्द का था या मजे का—मैं तय नहीं कर पा रहा था। बंटी की गांड हर धक्के के साथ तन रही थी और उसकी मजबूत जांघें माँ की जांघों से टकरा रही थीं। ये antarvasana mother sex story आप pranaykatha पर पढ़ रहें है।

मैंने अपना हाथ पैंट पर रखा। लंड पूरी तरह तन चुका था और दर्द करने लगा था। मैंने जोर से दबाया। वह दर्द मुझे वापस वर्तमान में ले आया, लेकिन मेरी निगाह हटी नहीं। बंटी अब पूरे जोर से पेल रहा था। माँ की टाँगें उसकी कमर पर लिपटने लगीं। एक बार माँ की आवाज निकल गई—“आह… अंदर तक…” लेकिन बंटी ने गति नहीं बदली। बल्कि और गहराई तक जाने लगा। उसकी कमर की हर हरकत माँ की चूत से पानी की आवाज निकाल रही थी।

अचानक माँ की नजर दरवाजे की तरफ गई।

हमारी आँखें मिल गईं।

समय जैसे ठहर गया।

माँ की आँखें फैली हुई थीं। उनके मुंह से कोई आवाज नहीं निकली। बंटी को अभी भी पता नहीं चला था। वह पेलता रहा—जोरदार, गहरे धक्के। माँ ने उसकी छाती पर हाथ रखा जैसे रोकना चाहती हों, लेकिन बल नहीं था। उनकी निगाह मुझसे हटी नहीं। मैं भी नहीं हटा। उस पल हम दोनों ने एक-दूसरे को ऐसा देखा जैसे पहली बार देख रहे हों। माँ के चेहरे पर शर्म थी, डर था, और उसके ठीक नीचे कुछ ऐसा था जिसे मैं नाम नहीं दे सकता था—एक अजीब सी स्वीकारोक्ति।

बंटी ने आखिरी कुछ जोरदार धक्के मारे और फिर गहराई तक जाकर रुक गया। उसका शरीर काँप रहा था। माँ की आँखें अभी भी मुझ पर थीं जब वह उनके अंदर आने लगा। गर्म तरल की धार उनके अंदर छूट रही थी—यह मैं उनके चेहरे के भाव से समझ सकता था। कुछ सेकंड बाद बंटी पीछे हटा। उसका लंड चमक रहा था और माँ की चूत से सफेद गाढ़ा तरल बाहर आने लगा। उन्होंने जल्दी से साड़ी नीचे की और खड़ी हो गईं। पैर अभी भी काँप रहे थे। बंटी ने भी पेंट ठीक की। तभी उसकी नजर मुझ पर पड़ी।

“तू कब आया रे?” उसकी आवाज में घबराहट साफ थी।

मैंने कुछ नहीं कहा। सिर्फ माँ की तरफ देखा। माँ की निगाह अब फर्श पर थी। उनके बाल बिखरे हुए थे, गाल लाल थे, होंठ सूजे हुए थे और साँसें अभी भी तेज थीं। उनकी जांघों के अंदरूनी हिस्से पर हल्का चमकदार तरल लगा था। ये antarvasana hindi maa sex story आप pranaykatha पर पढ़ रहें है।

बंटी जल्दी-जल्दी बाहर निकल गया। दरवाजा बंद होते ही घर में गहरा सन्नाटा छा गया। मैं अभी भी हॉल में खड़ा था। माँ किचन से निकलीं। उन्होंने मेरी तरफ देखा। इस बार उनकी आँखों में कुछ कहने का साहस था।

“आदित्य…” उनकी आवाज काँप रही थी। “तुमने…”

मैंने सिर हिलाया। “हाँ। सब देख लिया।”

वे दीवार से लगकर खड़ी हो गईं। उनके पैर काँप रहे थे। मैंने आगे बढ़कर पानी का गिलास उठाया और उनके हाथ में दिया। उन्होंने पिया। गिलास नीचे रखते हुए बहुत हल्के से बोलीं, “पिताजी को मत बताना।”

यह वाक्य इतना सीधा और इतना भारी था कि मैं कोई जवाब नहीं दे पाया। मैं अपने कमरे में चला गया। दरवाजा बंद किया। बिस्तर पर लेट गया। पैंट के अंदर लंड अभी भी सख्त था और दर्द कर रहा था। मैंने उसे छुआ नहीं। बस छत की तरफ देखता रहा। माँ की फैली हुई जांघें याद आ रही थीं। बंटी का मोटा लंड उनकी चूत में जाते हुए याद आ रहा था। और सबसे ज्यादा वह पल याद आ रहा था जब हमारी आँखें मिली थीं—जब वह लंड अभी भी उनके अंदर था।

रात को पिताजी की शिफ्ट खत्म होकर घर आए। खाने के समय सब कुछ सामान्य था। माँ ने गरम-गरम रूटी बनाई, पिताजी ने ऑफिस की शिकायतें कीं, मैंने कॉलेज के बारे में दो-एक वाक्य कहे। लेकिन मेरी और माँ की निगाहें बार-बार मिल जातीं और फिर जल्दी से हट जातीं। खाने के बाद माँ किचन में बर्तन धोने चली गईं। मैंने उनके पीछे देखा। साड़ी के नीचे उनकी गांड की हलकी हरकत पहले जैसी नहीं लग रही थी। अब वह हरकत मेरे दिमाग में बंटी के धक्कों से जुड़ गई थी।

रात को जब सब सो गए तो मैंने खिड़की से गली की तरफ देखा। बंटी की पान की दुकान पर अभी भी रोशनी जल रही थी। मैंने समझ लिया था कि घर अब पहले जैसा नहीं रहेगा। ये antarvasana mom son sex story आप pranaykatha पर पढ़ रहें है।

और सबसे अजीब बात यह थी कि मुझे इस बात पर उतना गुस्सा नहीं था जितना किसी बेटे को होना चाहिए था। गुस्से की जगह एक अजीब सी भारी उत्तेजना थी, जो छाती में बैठकर साँस लेना मुश्किल कर रही थी।

मैंने आँखें बंद कर लीं। लेकिन अंधेरे में भी माँ की वह तस्वीर नहीं गई—स्लैब पर लेटी हुई, जांघें फैली हुई, और गली का लफंगा उनके शरीर के अंदर अपनी जगह बनाता हुआ।

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