हॉस्टल की पहली रात | कुंवारी कॉलेज गर्ल सेक्स स्टोरी हिंदी

कबीर की उम्र बीस साल थी। शहर के एक अच्छे कॉलेज में बीटेक फाइनल ईयर में पढ़ता था। लम्बा, सांवला, कंधे चौड़े, शरीर पर हल्की सी मांसपेशियाँ। लड़कियों में उसका नाम था लेकिन उसने कभी किसी के साथ पूरा सम्बन्ध नहीं बनाया था। सिर्फ चुंबन और हल्की छेड़छाड़ तक सीमित रहा था। मायरा भी उसी कॉलेज में बीए फाइनल ईयर की छात्रा थी। उम्र बीस साल। गोरा साफ चेहरा, बड़ी आँखें, पतली कमर, छोटे लेकिन गोल स्तन और साड़ी या कुर्ती में भी जो अदा थी वो किसी को भी घुमा सकती थी। दोनों एक ही फ्रेंड सर्कल में थे लेकिन कभी अकेले में बात नहीं हुई थी।

कॉलेज ने शहर से बाहर तीन दिन के सेमिनार का आयोजन किया। सभी छात्रों को एक पुराने हॉस्टल में ठहराया गया। लड़के और लड़कियों के कमरे अलग-अलग ब्लॉक में थे। कबीर को तीसरी मंजिल का एक सिंगल कमरा मिला। मायरा को ठीक उसके नीचे दूसरी मंजिल पर। पहले दिन सेमिनार में दोनों की नजरें कई बार मिलीं। मायरा मुस्कुरा दी तो कबीर का दिल जोर से धड़का।

दूसरे दिन शाम को अचानक बहुत तेज बारिश शुरू हो गई। हवा के साथ पानी कमरों के अंदर तक आने लगा। मायरा के कमरे की खिड़की ठीक से बंद नहीं हो रही थी। पानी बेड और किताबों तक पहुँच गया। रात के लगभग साढ़े ग्यारह बजे मायरा किताबें और लैपटॉप लेकर कबीर के कमरे के बाहर खड़ी थी। बाल गीले, कुर्ती शरीर से चिपकी हुई, स्तनों की गोलाई साफ उभर रही थी।

कबीर ने दरवाजा खोला। “मायरा? इतनी रात को…”
“मेरे कमरे में पानी घुस रहा है। किताबें खराब हो जाएंगी। थोड़ी देर बैठने दे।”

कबीर ने उसे अंदर बुला लिया। कमरा छोटा था। एक बेड, एक टेबल, एक कुर्सी। मायरा फर्श पर बैठ गई। कुर्ती पूरी तरह गीली थी। सफेद कपड़ा शरीर से चिपक कर पारदर्शी हो गया था। उसके छोटे गोल स्तन और गहरे निप्पल साफ दिख रहे थे। कबीर ने तौलिया दिया। मायरा बाथरूम में गई, गीली कुर्ती और ब्रा उतारी, तौलिये में शरीर लपेट कर बाहर आई। तौलिया सिर्फ जाँघों तक था। ऊपर की छाती आधी खुली हुई थी।

दोनों फर्श पर बैठकर नोट्स देखने लगे। बातें होने लगीं। पढ़ाई, घर, भविष्य। धीरे-धीरे बातें व्यक्तिगत होती गईं। मायरा ने अचानक कहा, “कबीर… मैंने कभी किसी लड़के के साथ पूरा नहीं किया। डर लगता है।”
कबीर चुप रहा। उसकी लंड तौलिये के नीचे तन चुकी थी।
मायरा और करीब सरक आई। “आज… अगर तुम चाहो तो… हम कोशिश कर सकते हैं। अगर दर्द हो या मैं रोकूँ तो रोक देना।”

उसने कबीर का हाथ पकड़ा और तौलिये के अंदर रख दिया। कबीर की हथेली उसके छोटे नरम स्तन पर पड़ गई। निप्पल पहले से सख्त था। मायरा काँप उठी। “छूओ… जैसे चाहो।”

कबीर ने दोनों स्तनों को धीरे-धीरे मसलना शुरू किया। निप्पल को अंगूठे और उँगली से दबाया, ऐंठा। मायरा की साँस तेज हो गई। तौलिया खुद-ब-खुद खुल गया। मायरा पूरी नंगी फर्श पर बैठी थी। छोटे गोल स्तन, पतली कमर, हल्के बालों वाली चूत। कबीर ने टी-शर्ट उतारी, पैंट और अंडरवियर नीचे सरका दिए। उसकी मोटी, नसों वाली लंड बाहर निकल आई। सिरे से पहले ही पानी टपक रहा था। मायरा की आँखें लंड पर जम गईं। “इतनी… मोटी है…”

कबीर ने मायरा को बेड पर लिटा दिया। पहले उसके होंठ चूमे। जीभ अंदर तक घुसाई। फिर गर्दन, फिर स्तन। एक-एक निप्पल को मुँह में लेकर जोर से चूसा, दाँतों से हल्का काटा। मायरा के हाथ कबीर के बालों में थे। “आह्ह… और चूसो…” कबीर नीचे गया। मायरा की दोनों टाँगें फैला दीं। उसकी चूत पहले से चमक रही थी। कबीर ने जीभ निकालकर पहले बाहर की फाँक चाटी, फिर क्लिटोरिस को मुँह में लेकर जोर से चूसा। मायरा की कमर उछल गई। “आह्ह्ह… कबीर… वहाँ… और…” कबीर ने जीभ अंदर तक घुसा दी। अंदर-बाहर, क्लिट चूसना, उँगलियाँ डालना। दो उँगलियाँ धीरे-धीरे अंदर गईं। मायरा की चूत बहुत तंग थी। कुंवारी। उँगलियाँ मुश्किल से घुस रही थीं। कबीर ने बीस मिनट तक सिर्फ जीभ और उँगलियों से उसकी चूत चखा। मायरा दो बार जोर-जोर से काँपते हुए झड़ गई। पानी कबीर के मुँह और ठुड्डी पर लग गया।

अब कबीर ने लंड पर थूक लगाकर सिरे को मायरा की चूत के मुँह पर रखा। “दर्द होगा… बोलियो।” मायरा ने सिर हिलाया। कबीर ने धीरे-धीरे धक्का दिया। सिरा अंदर गया। मायरा की आँखों में आँसू आ गए। “आह्ह… दर्द हो रहा है… रुक…” कबीर रुक गया। मायरा ने उसकी कमर पकड़ ली। “धीरे… और अंदर डाल… मैं सह लूँगी।” कबीर ने फिर धीरे धक्का दिया। आधी लंड अंदर गई। मायरा के नाखून कबीर की पीठ में चुभ गए। पूरा शरीर तन गया। कबीर पूरी तरह रुक गया। दोनों की साँसें तेज चल रही थीं। पाँच मिनट बाद मायरा बोली, “अब… और।” कबीर ने धीरे-धीरे पूरी लंड अंदर तक घुसा दी। कुंवारी चूत पूरी तरह फैल गई। खून की एक हल्की रेखा लंड पर लग गई। मायरा जोर से कराह उठी लेकिन रोकने को नहीं बोली।

कबीर ने बहुत धीरे-धीरे अंदर-बाहर करना शुरू किया। पहले सिर्फ एक-एक इंच। मायरा की आँखों से आँसू बह रहे थे लेकिन उसने टाँगें कबीर की कमर पर लपेट लीं। “जारी रख… धीरे-धीरे…” दस मिनट बाद दर्द कम होने लगा। मायरा की कराहें दर्द से बदलकर मजे में बदलने लगीं। कबीर ने गति थोड़ी तेज की। लंड पूरी अंदर-बाहर हो रही थी। चूत से पानी और खून मिला हुआ चिकना हो गया था। “आह्ह… अब अच्छा लग रहा है… और जोर से…” कबीर ने धक्के तेज कर दिए। बेड चरमरा रहा था। मायरा के स्तन उछल रहे थे। कबीर ने उसके निप्पल मुँह में ले लिए। बीस मिनट तक लगातार चोदने के बाद मायरा का शरीर अचानक जोर से काँप उठा। वह पहली बार लंड से झड़ गई। चूत में पानी की धार छूट गई। कबीर ने भी तीन-चार तेज धक्के मारकर बाहर निकाला और मायरा के पेट पर पूरा वीर्य छोड़ दिया। सफेद गाढ़ा वीर्य उसके पेट और नाभि पर फैल गया। मायरा ने उँगली से वीर्य उठाकर सूँघा और हल्के से चाटा।

दोनों पसीने से भीगे हुए लेटे रहे। आधे घंटे बाद मायरा ने खुद कबीर की लंड हाथ में ली और हिलानी शुरू की। फिर मुँह में ले लिया। पहली बार। दाँत लग गए लेकिन धीरे-धीरे सीख गई। जीभ घुमाकर चूसने लगी। कबीर के हाथ उसके बालों में थे। “और गहरा ले…” मायरा ने जितना हो सका उतना अंदर लिया। गला भर गया। थूक टपकने लगा। दस मिनट बाद कबीर ने फिर से मायरा को लिटाया और इस बार मिशनरी में जोर से चोदने लगा। दर्द अब बहुत कम था। मायरा खुद कमर उठाने लगी। “और जोर से चोदो… मेरी चूत फाड़ दो…” कबीर ने टाँगें कंधों पर रखीं और गहराई तक ठोकने लगा। मायरा दो बार और झड़ गई। कबीर ने आखिर में उसकी चूत में ही वीर्य छोड़ दिया।

सुबह चार बजे दोनों तीसरी बार करने लगे। इस बार मायरा ऊपर बैठी। खुद लंड को चूत में बैठाया और धीरे-धीरे बैठ गई। ऊपर-नीचे होने लगी। स्तन कबीर के मुँह में। कबीर ने उसके कूल्हे पकड़कर और जोर से पटकने लगा। मायरा चिल्लाते हुए झड़ गई। कबीर ने भी अंदर ही छोड़ दिया।

सुबह उठकर दोनों साथ नहाए। शॉवर में कबीर ने मायरा को दीवार से लगाकर फिर से चोदा। खड़े-खड़े। मायरा की टाँगें उसकी कमर पर थीं। पानी गिर रहा था। मायरा की कराहें बाथरूम में गूंज रही थीं।

दूसरे दिन शाम को सेमिनार खत्म होते ही दोनों फिर उसी कमरे में थे। इस बार मायरा ने खुद कबीर को लिटाया और पहले मुँह से लंड चूसी। फिर ऊपर बैठकर इतनी जोर से कूल्हे पटाए कि कबीर की लंड बार-बार बाहर निकल जाती। फिर कबीर ने उसे कुत्ते की पोजीशन में किया। बाल पकड़कर खींचे। थप्पड़ मारे। “रंडी की तरह चोदो मुझे…” मायरा खुद बोल रही थी। कबीर ने उसकी गांड में उँगली डाली और चूत में लंड। मायरा पागलों की तरह झड़ गई।

तीसरी रात दोनों ने लगभग हर पोजीशन ट्राई कर ली। मायरा अब दर्द भूल चुकी थी। वह खुद कबीर की लंड चूसती, चूत में बैठती, गांड में उँगली डालने देती। आखिरी बार कबीर ने उसकी टाँगें पूरी फैलाकर इतनी जोर से चोदा कि मायरा की आवाज पूरे कॉरिडोर में गूंज गई। दोनों एक साथ झड़े।

सेमिनार खत्म होने के बाद वापसी में मायरा ने कबीर का हाथ पकड़ा और कहा, “अगली बार जब भी मौका मिले… मेरी चूत तैयार रहेगी।” कबीर मुस्कुराया और उसके कान में बोला, “अगली बार तुम्हारी गांड भी लूँगा।” मायरा की आँखों में शरारत चमक उठी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *