मेरा नाम मीना शर्मा है। उम्र बयालीस। शादी को बाईस साल हो चुके हैं। पति राजेश बिजनेस में रहते हैं, ज्यादातर बाहर। घर में अकेली रहने की आदत हो गई है। बोरियत और अधूरापन दोनों साथ चलते हैं।
विक्की को मैं बचपन से जानती हूँ। वो मेरे पति के सबसे पुराने दोस्त अनिल का बेटा है। पहले छोटा सा लड़का था, मुझे आंटी कहकर पुकारता था। अब वो चौबीस का हो गया है। लंबा, कंधे चौड़े, आवाज में वो वाली गरम घमास। जब भी घर आता है तो उसकी नजरें मुझ पर कुछ देर ज्यादा टिकती हैं। मैं जानती हूँ। और मुझे बुरा भी नहीं लगता।
पिछले महीने की बात है। राजेश के ऑफिस में कोई जरूरी मीटिंग थी। अनिल और विक्की हमारे घर आए हुए थे। खाना खाते समय विक्की मेरे सामने बैठा था। मैंने साड़ी पहन रखी थी। हल्की सी लो कट ब्लाउज। जब मैं पानी लेने झुकी तो उसकी नजरें मेरे क्लीवेज पर चली गईं। मैंने देख लिया। उसने नजरें नहीं हटाईं। बस धीरे से मुस्कुरा दिया। उस मुस्कान में इतनी हिम्मत थी कि मेरे पेट में कुछ हलचल हुई।
रात को सब सो गए तो मैं किचन में पानी पीने गई। विक्की भी वहीं खड़ा था। फ्रिज का दरवाजा खोले हुए।
“आंटी, नींद नहीं आ रही?” उसने पूछा। आवाज कम थी।
“तुम्हें भी नहीं आ रही लगती है,” मैंने जवाब दिया।
वो करीब आया। फ्रिज का दरवाजा बंद किया। अब हम दोनों अँधेरे किचन में थे। सिर्फ फ्रिज की रोशनी चेहरों पर पड़ रही थी।
“आप बहुत खूबसूरत लग रही हैं आज,” उसने सीधे कहा।
मैंने हँसने की कोशिश की। “अब क्या फ्लर्ट करने लगे हो विक्की?”
“फ्लर्ट नहीं। सच्चाई।” उसने मेरी साड़ी के पल्लू को हल्के से छुआ। “मैं कब से सोच रहा हूँ…”
मैंने उसका हाथ नहीं हटाया। बस इतना कहा, “तुम्हारे पापा और मेरे पति सो रहे हैं।”
“तो?” उसने पूछा। आँखों में साफ चुनौती थी।
उस रात कुछ नहीं हुआ। लेकिन वो छूना और वो नजरे मेरे दिमाग में घर कर गईं।
दूसरा मौका तीन हफ्ते बाद आया। राजेश बाहर गए हुए थे। विक्की अकेला घर आया। कहा पापा ने भेजा है कुछ कागजात देने। मैंने उसे अंदर बुलाया। चाय बनाई। वो सोफे पर बैठा था। मैं चाय लेकर गई तो उसके बिल्कुल करीब बैठ गई। जानबूझकर।
बातें होती रहीं। पुरानी यादें, कॉलेज, दोस्त। फिर अचानक उसने मेरा हाथ पकड़ लिया।
“आंटी… मैं आपसे कुछ कहना चाहता हूँ।”
“बोलो।”
“मैं आपको देखकर कंट्रोल नहीं कर पाता। हर बार जब आप साड़ी में होती हैं… मुझे लगता है कि मैं पागल हो जाऊँगा।”
मैं चुप रही। मेरा हाथ उसके हाथ में था। उसने अपनी उंगलियाँ मेरी उंगलियों में फंसा लीं।
“अगर मैं अभी आपको चूम लूँ तो?” उसने धीरे से पूछा।
मैंने जवाब नहीं दिया। बस उसकी आँखों में देखती रही। उसने मेरा चेहरा दोनों हाथों में लिया और धीरे से होंठों पर अपने होंठ रख दिए। पहला किस हल्का था। दूसरा गहरा। उसकी जीभ ने मेरे होंठों को खोला। मैंने भी जवाब दिया। साड़ी का पल्लू खिसक गया। उसके हाथ मेरी कमर पर थे।
जब हम अलग हुए तो दोनों की साँसें तेज थीं।
“ये गलत है,” मैंने फुसफुसाया।
“लेकिन अच्छा लग रहा है ना?” उसने पूछा।
मैंने सिर हिलाया। “बहुत।”
उस दिन हमने सिर्फ किस किए। उसके हाथ मेरे स्तनों तक पहुँचे, ब्लाउज के ऊपर से दबाए, लेकिन आगे नहीं बढ़े। मैंने खुद रोक लिया। डर था। और इच्छा भी।
तीसरा मौका वो था जब सब कुछ टूटने वाला था।
राजेश दो दिन के लिए बाहर गए। विक्की ने मैसेज किया।
“आंटी, आज शाम को मिल सकते हैं? कहीं बाहर।”
मैंने बहुत देर सोचा। फिर जवाब दिया। “होटल में।”
उसने लोकेशन भेज दी। एक छोटा सा अच्छा होटल। शहर के दूसरे छोर पर।
मैंने लाल रंग की साड़ी पहनी। बाल खुले रखे। माँग में सिंदूर भरा। जब मैं होटल रूम में दाखिल हुई तो विक्की पहले से मौजूद था। दरवाजा बंद करते ही उसने मुझे दीवार से लगा लिया।
“इतने दिन से इंतजार कर रहा था,” उसने मेरे गले में मुँह रखकर कहा।
उसके हाथ साड़ी के नीचे घुस आए। मेरी कमर, फिर नितंब। उसने मुझे कसकर पकड़ा और जोर से चूमा। इस बार कोई रोक नहीं थी। मेरी साड़ी का पल्लू फर्श पर गिरा। ब्लाउज के हुक उसने एक-एक करके खोले। मेरे स्तन बाहर आ गए। उसने झुककर एक निप्पल मुँह में ले लिया और जोर से चूसने लगा।
“आह्ह… विक्की…” मेरी आवाज निकल गई।
वो मुझे उठाकर बिस्तर पर ले गया। साड़ी पूरी तरह खोल दी। अब मैं सिर्फ पेटिकोट और पैंटी में थी। उसने पेटिकोट भी खींच लिया। मेरी नंगी बॉडी पर उसकी नजरें भूखी थीं।
“आंटी… आपकी ये चूत कितनी पकी हुई लग रही है,” उसने उंगली से मेरी पैंटी के ऊपर से दबाते हुए कहा। “गीली हो रखी है।”
मैं शर्म से लाल हो गई, लेकिन टाँगें खुद ही थोड़ी खुल गईं। उसने पैंटी साइड करके एक उंगली अंदर डाल दी।
“इतनी टाइट… और इतनी गरम।”
वो उंगली अंदर-बाहर करने लगा। दूसरी उंगली भी जोड़ दी। मैं कराहने लगी। उसने अपना मुँह मेरी चूत पर रख दिया। जीभ से चाटने लगा। क्लिट पर घुमावदार हरकतें। मेरे हाथ उसके बालों में उलझ गए।
“विक्की… अभी मत… मैं झड़ जाऊँगी…”
उसने सिर उठाया। मुँह चमक रहा था मेरे रस से।
“झड़ जाओ आंटी। आज रात मैं आपको थकाने वाला हूँ।”
उसने जल्दी से अपने कपड़े उतारे। जब उसका लंड बाहर आया तो मेरी आँखें फटी रह गईं। मोटा, लंबा, नसों से भरा हुआ। पूरी तरह खड़ा।
वो बिस्तर पर चढ़ आया। मेरे ऊपर। लंड को मेरी चूत पर रगड़ने लगा।
“बोलो आंटी… कहाँ चाहिए ये?”
मैंने आँखें बंद करके कहा, “अंदर… पूरी तरह अंदर।”
उसने एक जोर का धक्का मारा।
उसका मोटा लंड मेरी चूत के मुँह को चीरता हुआ अंदर घुस गया। मैंने तकिया दबा लिया। दर्द और मजे का मिश्रण था। इतने दिनों बाद किसी ने इतनी गहराई तक भरा था।
“आह्ह… धीरे… बहुत मोटा है,” मैंने सिसकते हुए कहा।
“सह लो आंटी… पूरा जाएगा,” उसने दांतों के बीच से कहा और और अंदर धकेल दिया। उसकी बालें मेरी गांड से टकराईं। पूरा लंड मुझमें समा चुका था। मैं भरी हुई महसूस कर रही थी।
फिर उसने धक्के शुरू किए। पहले धीमे, लंबे। हर बार पूरा बाहर निकालता और फिर जड़ तक पेल देता। मेरी चूत की आवाज आने लगी – गीली, चिपचिपी आवाज। कमरा उस आवाज और मेरी सिसकियों से भर गया।
थोड़ी देर बाद उसने मुझे पलट दिया। “घोड़ी बन जाओ आंटी।”
मैं हाथों और घुटनों के बल हो गई। साड़ी और ब्लाउज पहले ही फर्श पर पड़े थे। विक्की ने पीछे से दोनों हाथों से मेरी गांड फैलाई और फिर से लंड अंदर धकेल दिया। इस पोजीशन में वो और गहरा जा रहा था। हर धक्के के साथ मेरी छाती बिस्तर पर रगड़ खा रही थी।
“आह्ह… विक्की… जोर से… और जोर से चोदो,” मैंने खुद कहा।
वो पागलों की तरह पेलने लगा। उसकी जाँघों की थपथपाहट मेरी गांड पर पड़ रही थी। एक हाथ से उसने मेरे बाल पकड़कर खींचे। मेरा सर पीछे उठ गया। दूसरे हाथ से वो मेरी चूचियों को मसल रहा था।
“कितनी रांड हो गई हो आंटी आज… अपने पति के दोस्त के बेटे से इतनी मजे ले रही हो,” उसने गंदी बातें कहते हुए और तेज धक्के मारे।
मैं जवाब नहीं दे पा रही थी। सिर्फ कराह रही थी। मेरी चूत से पानी बह रहा था। उसकी बालें और लंड पूरी तरह गीले हो चुके थे। उसने घंटे भर से ज्यादा इस तरह चोदा। कभी धीमे करके मुझे तड़पाता, कभी इतनी जोर से पेलता कि मेरी आवाज रुक जाती। मैं दो बार झड़ चुकी थी। पैर काँप रहे थे। फिर भी वो रुकने वाला नहीं था।
आखिर में उसने लंड बाहर निकाला। मैं थककर बिस्तर पर गिर गई। साँसें फूल रही थीं। मेरी चूत खुली हुई थी और रस टपक रहा था।
विक्की मेरे पास आया। उसका लंड अभी भी कठोर था, नसों से भरा हुआ, मेरे रस से चमक रहा था।
“अब घुटनों पर बैठो,” उसने कहा।
मैंने आज्ञा का पालन किया। बिस्तर के किनारे घुटनों के बल बैठ गई। उसने मेरे खुले बालों को और बिखेरा। माँग साफ दिखाई दे रही थी। सिंदूर की हल्की रेखा बाकी थी।
वो खड़ा हो गया। लंड मेरे चेहरे के सामने। उसने उसे हाथ में लिया और तेजी से हिलाने लगा। मेरी तरफ देखते हुए।
“मुँह खोलो… जीभ बाहर,” उसने आदेश दिया।
मैंने मुँह खोल दिया। लेकिन उसने मुँह में नहीं डाला। बल्कि लंड को मेरे माथे के पास लाया। माँग के ठीक ऊपर। उसकी साँसें तेज हो रही थीं। हाथ की गति और तेज हो गई।
“ले आंटी… आज तुम्हारी माँग भरता हूँ…”
और तब वो झड़ गया। गरम-गरम गाढ़ा वीर्य की धार मेरी माँग पर गिरी। पहली धार सीधे सिंदूर वाली रेखा पर। फिर दूसरी, तीसरी। उसने लंड को हिला-हिलाकर पूरा वीर्य मेरी माँग में ही उड़ेल दिया। गर्म तरल मेरे बालों में, माथे पर, और माँग की गहराई में भर गया। कुछ बूंदें नाक पर भी टपक गईं।
मैं वैसे ही घुटनों पर बैठी रही। आँखें बंद किए हुए। उसके वीर्य की गर्माहट महसूस कर रही थी।
विक्की पीछे हटा। साँसें लेते हुए मुझे देख रहा था।
मैंने धीरे से उंगली उठाई। अपनी माँग पर लगाई। उंगली पर उसका गाढ़ा सफेद वीर्य लग गया। मैंने उंगली अपने होठों के पास लाई और जीभ निकालकर चाट लिया। नमकीन, गर्म स्वाद।
फिर आँखें खोलकर विक्की की तरफ देखा और धीरे से बोली…
“आज… पहली बार मेरी माँग सच में भरी हुई है।”
मैंने फिर उंगली माँग में घुमाई, और बाकी बचे वीर्य को भी चाट लिया।
कमरे में सिर्फ हमारी साँसों की आवाज थी।
