माँ की अधूरी प्यास | मदर सन सेक्स स्टोरी हिंदी

मेरा नाम अंकित शर्मा है। उम्र बाईस साल। दिल्ली विश्वविद्यालय में एम.ए. अंतिम वर्ष में पढ़ रहा हूँ। पापा दो साल पहले अचानक हार्ट अटैक से चल बसे। उनकी मृत्यु के बाद घर का सारा बोझ माँ पर आ गया। माँ का नाम सुनीता है। उम्र बयालीस साल। गोरी साफ त्वचा, बड़ी आँखें, अभी भी सुडौल शरीर। भारी लेकिन सख्त चूचियाँ, पतली कमर और गोल मांसल गांड। साड़ी पहनने पर उनका बदन किसी जवान औरत जैसा लगता है। पापा के जाने के बाद माँ ने कभी किसी पुरुष से बात तक नहीं की। रिश्तेदारों में से किसी ने रिश्ता की बात चलाई तो उन्होंने साफ मना कर दिया। “मेरा बेटा ही मेरा संसार है,” वे हमेशा यही कहतीं।

घर में हम सिर्फ दो रह गए थे। माँ सुबह जल्दी उठकर मेरे लिए नाश्ता बनातीं, मैं कॉलेज जाता, शाम को लौटता तो वे चाय लेकर बैठतीं। रात को खाना खाने के बाद थोड़ी देर टीवी देखकर अपने-अपने कमरे में चले जाते। लेकिन पिछले छह-सात महीनों से मेरे अंदर कुछ बदलने लगा था।

माँ जब नहाकर निकलतीं तो बाल खुले होते, गले तक पानी के छींटे, साड़ी में भीगा बदन। उनकी चूचियों की गोलाई और निप्पलों का उभार साफ दिखता। मैं नजरें चुरा लेता लेकिन लंड तन जाती। रात को बिस्तर पर लेटे-लेटे मैं माँ को सोचने लगता। उनकी चूचियाँ, उनकी कमर, उनकी जाँघें… फिर शर्म के मारे खुद को कोसता। “ये माँ है अंकित… माँ!” लेकिन दिमाग नहीं मानता था। कई रातें मैंने बाथरूम में जाकर मुठ मारते हुए बिताईं। माँ का चेहरा आँखों के सामने रहता और मैं पानी निकाल देता।

माँ भी अकेली थीं। कई रातों को उनके कमरे से हल्की कराहें आतीं। एक रात मैं उठकर गया तो दरवाजे की दरार से देखा – माँ ने साया ऊपर किया हुआ था, एक हाथ से चूची मसल रही थीं और दूसरे हाथ की उँगलियाँ उनकी चूत में अंदर-बाहर हो रही थीं। उन्होंने मुँह दबा रखा था ताकि आवाज न निकले। मैं वहीं खड़ा काँपता रहा। उस रात मैंने दो बार पानी निकाला।

फिर धीरे-धीरे नजरों का खेल शुरू हुआ। माँ जब घर में काम करतीं तो मेरी निगाहें उनकी गांड पर ठहर जातीं। वे कभी-कभी पकड़ लेतीं। पहले तो नजरें फेर लेतीं, बाद में बस मुस्कुरा देतीं। एक दिन मैंने उन्हें रसोई में पीछे से देखा। साड़ी का पल्लू सरक गया था। उनकी कमर और गांड की दरार आधी नंगी थी। मैं उधर से गुजरा तो जानबूझकर उनका हाथ छू गया। माँ थोड़ा काँपीं लेकिन कुछ नहीं बोलीं।

एक हफ्ते बाद गर्मी बहुत बढ़ गई। बिजली बार-बार गुल होने लगी। एक शाम बिजली चली गई। घर में उमस थी। माँ ने हल्का सा सफेद साया पहन रखा था। पतला कपड़ा। उनके निप्पल साफ उभर रहे थे। जाँघों की गोलाई दिख रही थी। हम दोनों छत पर बैठे थे। बातें हो रही थीं पापा के बारे में, पुरानी यादों के बारे में। माँ की आँखें भर आईं।

“अंकित… अकेलापन बहुत सताता है बेटा। रात को शरीर जैसे किसी को माँगता है… लेकिन मैं कैसे किसी और को छूने दूँ?”
मैं चुप रहा। मेरा दिल जोर-जोर से धड़क रहा था।
माँ ने मेरी तरफ देखा। “तू भी जवान हो गया है। तेरी निगाहें… मैं समझती हूँ।”

मैंने नजरें झुका लीं। “माँ… माफ करना। मैं… गलत सोचने लगता हूँ कभी-कभी।”
माँ ने मेरा हाथ पकड़ लिया। उनका हाथ गरम था। “गलत नहीं बेटा। माँ भी औरत है। पापा के जाने के बाद कोई नहीं छूता… उँगलियों से भी थक गई हूँ।”

उस रात हम दोनों अपने-अपने कमरे में चले गए। लेकिन नींद नहीं आई। मैं बार-बार माँ के कमरे की तरफ देख रहा था। आधी रात को पसीने से नहाया हुआ उठा और पानी पीने के बहाने बाहर आया। माँ का कमरा आधा खुला था। अंदर अंधेरा था। मैं धीरे से दरवाजे के पास गया। अंदर से हल्की कराह आ रही थी। माँ फिर से खुद को छू रही थीं। मैं वहीं खड़ा रह गया। लंड पूरी तरह तन चुकी थी। तभी माँ की आवाज आई…

“अंकित… तू बाहर खड़ा है न?”

मेरा दिल बैठ गया। मैं भागने वाला था कि माँ बोलीं, “अंदर आ जा… दरवाजा बंद कर दे।”

मैं काँपते हुए अंदर गया। माँ बिस्तर पर बैठी थीं। साया उनकी कमर तक उठा हुआ था। एक हाथ उनकी चूत पर था। उन्होंने मुझे देखा और धीरे से बोलीं…

“आजा पास बैठ। माँ से कुछ मत छुपा।”

मैं बिस्तर के किनारे बैठ गया। माँ ने मेरा हाथ पकड़ा और अपनी जाँघ पर रखा। फिर धीरे-धीरे ऊपर सरका दिया। मेरी उँगलियाँ उनकी जाँघ की नरम त्वचा पर फिसलती गईं। माँ ने साया और ऊपर किया। कोई पैंटी नहीं थी। उनकी चूत के हल्के बाल और गीली फाँक मेरे हाथ के बिल्कुल करीब थी।

“छू के देख बेटा… माँ की चूत कितनी प्यासी है।”

मेरा हाथ काँप रहा था। मैंने धीरे से उँगली बढ़ाई। उनकी चूत गरम और गीली थी। जैसे ही मेरी उँगली छुई, माँ ने लंबी साँस छोड़ी। “हाँ… ऐसे ही…” मैंने एक उँगली अंदर डाली। माँ की चूत तंग और चिकनी थी। दो साल बाद किसी मर्द की उँगली अंदर गई थी। मैंने धीरे-धीरे अंदर-बाहर करना शुरू किया। माँ की कराहें बढ़ने लगीं। उन्होंने मेरा दूसरा हाथ पकड़कर अपनी चूची पर रख दिया। साया पूरी तरह ऊपर था। उनकी भारी चूचियाँ बाहर थीं। निप्पल सख्त। मैंने चूची मसलनी शुरू की और उँगली उनकी चूत में तेज की।

माँ ने अचानक मेरा हाथ रोक दिया। “रुक… अभी नहीं। पहले बता… तू सच में माँ को चाहता है? या सिर्फ शरीर की प्यास है?”
मैंने ईमानदारी से कहा, “माँ… दोनों। मैं खुद को रोक नहीं पा रहा। रोज तुम्हें सोच-सोच कर पानी निकालता हूँ।”
माँ की आँखें भर आईं। उन्होंने मुझे अपनी ओर खींचा और पहली बार अपने बेटे के होठों पर होठ रख दिए। चुंबन पहले हल्का था, फिर गहरा होता गया। जीभें मिल गईं। माँ ने मेरे बालों में हाथ फेरते हुए कहा, “आज के बाद माँ और बेटा नहीं रहेंगे अंकिता… सिर्फ दो शरीर रहेंगे जो एक-दूसरे की प्यास बुझाएंगे।”

उन्होंने मेरी जांघिया नीचे सरका दी। मेरी लंड बाहर निकल आई। माँ ने उसे हाथ में लिया। “पापा से भी बड़ी है… माँ इसे चखे?” उन्होंने धीरे से लंड मुँह में ली। पहले सिरा चाटा, फिर अंदर लिया। गला तक नहीं जा पाईं लेकिन जीभ से चारों तरफ चाट रही थीं। लार टपकने लगी। मैंने उनके बाल पकड़ लिए। माँ दस-बारह मिनट तक मुँह से सेवा करती रहीं। फिर उठकर मेरे ऊपर बैठ गईं।

“अब माँ को अपनी चूत में ले… धीरे से।”

उन्होंने लंड का सिरा अपनी चूत पर रखा और धीरे-धीरे बैठनी शुरू की। आधा अंदर गया तो माँ की साँस रुक गई। “आह्ह… बड़ा है बेटा…” फिर पूरी लंड अंदर ले लीं। दोनों कुछ पल हिले नहीं। फिर माँ ऊपर-नीचे होने लगीं। धीरे-धीरे। चूचियाँ मेरे चेहरे के सामने थीं। मैंने निप्पल मुँह में ले लिए और चूसने लगा। माँ की गति बढ़ने लगी। “चोद माँ को… अपनी माँ की चूत चोद… जोर से…” मैंने उनके कूल्हे पकड़कर नीचे से धक्के लगाने शुरू कर दिए। बिस्तर चरमरा रहा था। माँ की कराहें दबी हुई थीं। बीस मिनट बाद माँ जोर से काँपते हुए झड़ गईं। उनकी चूत ने लंड को जकड़ लिया। मैंने भी अंदर ही वीर्य छोड़ दिया।

हम दोनों पसीने से भीगे हुए लेटे रहे। माँ ने मेरा सिर अपनी चूचियों पर रख लिया। “अब रोज रात आना बेटा। माँ की प्यास अब सिर्फ तू ही बुझाएगा।”

अगली रात माँ खुद मेरे कमरे में आईं। इस बार उन्होंने खुद पहल की। पहले उन्होंने मेरी लंड लंबे समय तक चूसी, फिर कुत्ते की पोजीशन में आ गईं। “पीछे से चोद… माँ को अपनी कुतिया बना…” मैंने पीछे से पूरी ताकत से पेलना शुरू किया। थप्पड़ मारे। माँ की गांड लाल हो गई। मैंने एक उँगली उनकी गांड में डाली तो वे और जोर से कराह उठीं। “हाँ… वहाँ भी… माँ की गांड भी तेरी है…” उस रात मैंने उनकी चूत और गांड दोनों में वीर्य छोड़ा।

तीसरी रात हमने और आगे बढ़कर खेला। माँ ने मुझे दीवार से लगाकर खड़े-खड़े चोदने को कहा। उनकी टाँगें मेरी कमर पर थीं। चूचियाँ मेरे मुँह में। हम दोनों पागलों की तरह कराह रहे थे। माँ बार-बार कह रही थीं, “अपनी माँ को रंडी बना दे… रोज चोद… कभी मत छोड़…”

उसके बाद लगभग हर रात यही सिलसिला चलने लगा। कभी माँ के कमरे में, कभी मेरे कमरे में। कभी सिर्फ उँगलियों और जीभ से घंटों खेलते, कभी पूरी रात लंड चूत और गांड में जाती रहती। माँ अब खुलकर गंदी बातें करने लगीं। “बेटा अपनी माँ की चूत फाड़ दे”, “माँ के मुँह में पानी छोड़”, “गांड में डाल कर माँ को अपनी रखैल बना दे”।

घर में अब सिर्फ दो शरीर रह गए थे जो एक-दूसरे की हवस बुझाते थे। माँ और बेटा का रिश्ता रात के अंधेरे में बदल चुका था… एक ऐसी प्यास में जो अब कभी बुझने वाली नहीं थी।

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