संगिता की चुदाई: अशोक सर ने छात्रा को चोद कर रंडी बना दिया

मेरा नाम अशोक है। आज मेरी उम्र पैंतीस साल हो गई है। बालों में सफेदी आनी शुरू हो गई है, माथे पर हल्की रेखाएँ पड़ गई हैं। लोग मुझे गंभीर प्रोफेसर समझते हैं। विश्वविद्यालय में साहित्य पढ़ाता हूँ। छात्र मेरा आदर करते हैं, सहकर्मी मेरी बात ध्यान से सुनते हैं। लेकिन कभी-कभी रात के अंधेरे में जब मैं अकेला बैठता हूँ, तो एक चेहरा याद आ जाता है। संगिता का।

वह याद इतनी साफ है कि लगता है कल की बात हो। उस समय मैं उनतीस साल का था। और संगिता… इक्कीस की।


उस साल मैं एक प्राइवेट कॉलेज में अंग्रेजी साहित्य पढ़ा रहा था। कॉलेज छोटा था, लेकिन नाम अच्छा था। मैंने वहाँ तीन साल पहले जॉइन किया था। पढ़ाने का तरीका मेरा थोड़ा सख्त था। कक्षा में अनुशासन पसंद था। छात्र मुझे “सर” कहकर बुलाते, और मैं दूरी बनाए रखता। लेकिन संगिता पहली बार जब कक्षा में आई, तो वह दूरी थोड़ी हिल गई।

संगिता औसत छात्रा नहीं थी। लंबे काले बाल जो हमेशा एक साधारण सी पट्टी से बँधे रहते, गोरा-गेहुँआ चेहरा, बड़ी-बड़ी आँखें जिनमें एक अजीब सी चुप्पी रहती। वह कम बोलती थी। कक्षा में सवाल कम पूछती, लेकिन जब जवाब देती तो बिल्कुल सटीक। उसकी कॉपी में लिखावट सुंदर होती, और विचार साफ। मैंने नोटिस किया कि वह अक्सर खिड़की के पास वाली सीट पर बैठती। अकेली। दोस्त कम लगते थे।

एक दिन कक्षा के बाद वह मेरे पास आई। हाथ में एक किताब थी — वर्जीनिया वूल्फ की। “सर, इस पर थोड़ा और समझना था। अगर आपका समय हो तो…” आवाज़ धीमी थी, लेकिन आँखों में जिद थी। मैंने समय दिया। अगले दिन लUNCH ब्रेक में।

वही से सब शुरू हुआ।

पहले हम सिर्फ़ किताबों पर बात करते। वह बहुत पढ़ी-लिखी थी। घर में माहौल ठीक नहीं लगता था। पिता सरकारी नौकरी में थे, माँ बीमार रहती थीं। संगिता घर का बहुत सारा काम संभालती थी। उसने एक दिन बीच में ही कह दिया था, “सर, घर में किताबें पढ़ने का समय निकालना भी मुश्किल हो जाता है कभी-कभी।” मैंने सिर्फ़ सिर हिलाया था। लेकिन उस दिन उसके चेहरे पर जो थकान थी, वह मुझे छू गई।

धीरे-धीरे हमारी मुलाकातें बढ़ गईं। सप्ताह में दो-तीन बार वह मेरे विभाग वाले छोटे से कमरे में आ जाती। दरवाज़ा खुला रहता। हम साहित्य की बात करते, फिर जीवन की। वह मुझसे उम्र में आठ साल छोटी थी, लेकिन बातें उसकी परिपक्व लगतीं। मैं खुद को याद दिलाता रहता — “यह छात्रा है। दूरी बनाए रख।”

लेकिन शरीर दूरी की भाषा नहीं समझता।

एक शाम की बात है। कॉलेज लगभग खाली हो चुका था। बाहर हल्की बारिश हो रही थी। संगिता मेरे कमरे में बैठी थी। हम टी.एस. एलियट पर बात कर रहे थे। अचानक बिजली चली गई। कमरे में अँधेरा छा गया। जनरेटर आने में समय लगता था। मैंने मोबाइल की टॉर्च जलाई। रोशनी में उसका चेहरा दिखा। बालों से पानी की बूंदें टपक रही थीं। साड़ी का पल्लू गीला हो गया था और ब्लाउज के ऊपर चिपक गया था।

मैंने नज़रें हटा लीं। “तुम भीग गई हो। घर चली जाओ, बारिश रुकने तक रुकना।” उसने सिर हिलाया। “सर, आज घर में कोई नहीं है। माँ अस्पताल में हैं। पिताजी ड्यूटी पर।” फिर हल्के से बोली, “थोड़ी देर और बैठूँ?”

मैंने मना नहीं किया। अँधेरे में हम बात करते रहे। टॉर्च की रोशनी कम कर दी थी। उसकी आवाज़ और करीब लग रही थी। अचानक उसने पूछा, “सर, आप कभी अकेला महसूस करते हैं?” सवाल सीधा था। मैं थोड़ी देर चुप रहा। फिर बोला, “कभी-कभी।” “मैं रोज़ महसूस करती हूँ,” उसने कहा। “घर में लोग हैं, लेकिन कोई नहीं है।”

उस दिन कुछ और नहीं हुआ। लेकिन जब वह जा रही थी, तो दरवाज़े पर खड़ी होकर थोड़ी देर रुक गई। मानो कुछ कहना चाहती हो। फिर चली गई। रात को मुझे नींद नहीं आई। उसका गीला ब्लाउज, उसकी आवाज़, उसका अकेलापन — सब याद आ रहा था। मैंने खुद को कोसा। “यह गलत है अशोक। तू शिक्षक है।”

लेकिन अगले दिन जब वह कक्षा में आई और मेरी तरफ देखा, तो उसकी आँखों में कुछ ऐसा था जो पहले नहीं था। एक सवाल। एक इंतज़ार।


अगले दो हफ्ते तनाव बढ़ता गया। हमारी मुलाकातें लंबी होने लगीं। कभी-कभी मैं जानबूझकर कमरे का दरवाज़ा थोड़ा बंद रखता। वह पास बैठने लगी। एक दिन उसकी साड़ी का पल्लू मेरे हाथ पर पड़ गया। दोनों एक पल के लिए रुक गए। मैंने पल्लू हटाया, लेकिन उँगली उसके हाथ से छू गई। बिजली सी दौड़ गई।

उसने धीरे से कहा, “सर… आप मुझे डांटते क्यों नहीं?” “किस बात के लिए?” “इस बात के लिए कि मैं इतनी देर रुक जाती हूँ। कि मैं आपके करीब बैठती हूँ।” मैंने उसकी तरफ देखा। आँखों में डर था, लेकिन उसके नीचे कुछ और भी था। हिम्मत। “संगिता, तुम मेरी छात्रा हो।” “हाँ,” उसने कहा। “लेकिन क्या शिक्षक को भी कभी किसी छात्रा की जरूरत महसूस होती है?”

सवाल ने मुझे अंदर तक हिला दिया। मैंने जवाब नहीं दिया। बस खड़ा होकर खिड़की के पास चला गया। बाहर अँधेरा हो रहा था। पीछे से उसकी आवाज़ आई, “मैं गलत जगह पर हूँ ना सर?” मैंने मुड़कर देखा। वह कुर्सी पर बैठी थी। आँखें नम थीं। “नहीं,” मैंने धीरे से कहा। “तुम गलत जगह पर नहीं हो। मैं ही… गलत सोच रहा हूँ।”

उस दिन पहली बार मैंने उसका हाथ पकड़ा। सिर्फ़ पकड़ा। कोई चुंबन नहीं, कोई और स्पर्श नहीं। बस उसका हाथ अपनी हथेली में लिया। उसका हाथ ठंडा था। हम दोनों खामोश रहे। फिर उसने अपना हाथ धीरे से निकाला और चली गई।

रात भर मुझे उसकी उँगलियों की याद आई।


तीसरे हफ्ते की एक शाम सब बदल गया।

कॉलेज में वार्षिक समारोह की तैयारी चल रही थी। कक्षाएँ जल्दी खत्म हो गईं। मैं अपने कमरे में अकेला बैठकर पेपर जाँच रहा था। दरवाज़े पर दस्तक हुई। संगिता थी। हाथ में एक छोटा सा डिब्बा। “सर, माँ ने मिठाई बनाई थी। आपके लिए लाई हूँ।” मैंने डिब्बा लिया। “धन्यवाद। अंदर आ जाओ।”

वह अंदर आई। दरवाज़ा उसके पीछे बंद हो गया। इस बार किसी ने नहीं खोला। कमरे में पंखा चल रहा था। वह मेरे सामने वाली कुर्सी पर बैठ गई। मैंने मिठाई रखी और उसकी तरफ देखा। आज उसकी आँखों में वो पुरानी हिचकिचाहट नहीं थी। कुछ और था। फैसला।

“सर,” उसने धीरे से कहा। “मैं रात भर जागकर सोचती हूँ। आपके बारे में।” मैंने कुछ नहीं कहा। “आप मुझे रोक क्यों नहीं देते?” “क्योंकि…” मेरी आवाज़ भारी हो गई। “क्योंकि मैं खुद को नहीं रोक पा रहा।”

वह उठी और मेरे पास आई। मेरी कुर्सी के सामने खड़ी हो गई। फिर धीरे से मेरे घुटनों के बीच बैठ गई। उसका चेहरा मेरे चेहरे के बहुत करीब था। “एक बार,” उसने फुसफुसाया। “बस एक बार देख लेना है कि शिक्षक का स्पर्श कैसा होता है।”

मैंने उसके बालों में हाथ डाला। बहुत नरम। फिर उसका चेहरा अपने करीब लाया और चूम लिया। पहला चुंबन धीमा था। जैसे दोनों डर रहे हों। फिर गहरा होता गया। उसकी जीभ मेरे मुँह में आ गई। मैंने उसे अपनी गोद में खींच लिया। साड़ी का पल्लू एक तरफ गिर गया। मेरे हाथ उसकी कमर पर थे। उसके स्तन मेरे सीने से दब रहे थे।

चुंबन टूटा तो दोनों की साँसें तेज़ चल रही थीं। “संगिता… यह सही नहीं है।” “मुझे सही नहीं चाहिए सर,” उसने जवाब दिया। “मुझे आप चाहिए।”

मैंने उसे उठाया और टेबल पर बैठा दिया। उसके बाल खोल दिए। फिर ब्लाउज के हुक एक-एक करके खोले। उसके स्तन बाहर आए — गोल, सख्त निप्पल वाले। मैंने दोनों को हाथों में लिया और मसला। फिर मुँह में एक निप्पल ले लिया। उसने कराहते हुए मेरे बाल पकड़ लिए। “आह… सर…”

मैंने उसकी साड़ी ऊपर की और पेटीकोट के अंदर हाथ डाल दिया। पैंटी पहले से गीली थी। उँगली जब अंदर गई तो वह और भी गीली मिल। उसने अपने होंठ दबा लिए। मैंने पैंटी एक तरफ की और दो उँगलियाँ अंदर डाल दीं। धीरे-धीरे बाहर-अंदर करने लगा। उसका सिर पीछे की तरफ झुक गया।

“सर… और…”

मैंने उसे टेबल से उतारा। खुद कुर्सी पर बैठा और उसे अपनी गोद में बैठा लिया। आमने-सामने। उसकी साड़ी पूरी तरह बिखर चुकी थी। मैंने अपनी पैंट खोली। लंड बाहर निकला — पूरी तरह तना हुआ। संगिता ने नीचे देखा। थोड़ी देर तक बस देखती रही। फिर धीरे से अपना हाथ बढ़ाकर उसे पकड़ लिया।

“बड़ा है,” उसने फुसफुसाया। मैंने उसकी चूत को अपने लंड पर रगड़ा। गीलापन फैल गया। फिर धीरे-धीरे अंदर धकेलना शुरू किया। वह बहुत टाइट थी। आधी लंड जाते ही उसने मेरे कंधे दबा दिए। “दर्द हो रहा है…” “सह लो,” मैंने धीरे से कहा। “धीरे-धीरे ले लो।”

मैंने रुक-रुक कर पूरी लंड अंदर तक डाली। जब जड़ तक पहुँची तो दोनों एक पल के लिए रुक गए। उसकी चूत मेरे लंड को कस रही थी। फिर मैंने हिलेगा शुरू किया। धीमे लंबे धक्के। टेबल हिलने लगी। संगिता मेरे गले में मुँह दबाए कराह रही थी।

“सर… जोर से… थोड़ा और जोर से…”

मैंने रफ्तार बढ़ा दी। अब धक्के गहरे और तेज़ थे। उसकी साड़ी पूरी तरह कमरे के फर्श पर गिर चुकी थी। सिर्फ़ ब्लाउज आधा खुला उसके शरीर पर लटका था। मैंने उसके दोनों स्तन मुँह में लेकर चूसे और नीचे से लगातार चोदता रहा। कमरे में सिर्फ़ हमारी साँसों और शरीर की आवाज़ थी।

थोड़ी देर बाद मैंने उसे टेबल पर लिटा दिया। उसकी टाँगें मेरे कंधों पर थीं। अब और गहराई तक जा रहा था। हर धक्के पर उसकी आँखें बंद हो जातीं। “मैं झड़ने वाली हूँ सर…” “झड़ जा,” मैंने कहा। “मेरे अंदर झड़।”

वह काँप उठी। उसकी चूत जोर से सिकुड़ी और पानी की एक हल्की धार मेरे लंड पर महसूस हुई। मैंने रफ्तार और बढ़ा दी। कुछ ही पल में मैं भी अंदर ही झड़ गया। गर्म पानी की तेज़ धार उसके अंदर फूट पड़ी। मैं उसके ऊपर गिरा रहा। दोनों पसीने से तर थे।

कुछ देर हम वैसे ही पड़े रहे। फिर उसने धीरे से मेरे बाल सहलाते हुए कहा, “अब मैं आपकी छात्रा नहीं रही सर।” मैंने उसका चेहरा उठाया। “नहीं। अब तुम और कुछ हो।”

उस शाम हमने दो बार और किया। दूसरी बार उसने खुद मुँह के बल लेटकर गाँड उठाई। मैंने पीछे से चोदा। उसकी गाँड पर थप्पड़ मारते हुए। तीसरी बार उसने मेरे लंड को मुँह में लिया। पहली बार किसी छात्रा ने मेरे लंड को इतनी गहराई तक चूसा था। आँखों में आँसू थे उसके, लेकिन उसने रोका नहीं। जब मैंने उसके मुँह में झड़ा तो उसने सब निगल लिया।

रात के दस बज चुके थे जब वह कपड़े पहनकर जाने को हुई। दरवाज़े पर खड़ी होकर बोली, “कल भी आऊँ?” मैंने उसका हाथ पकड़ लिया। “आना।”


उसके बाद की तीन महीने एक अलग ही दुनिया थी।

हम दोनों पागलों की तरह मिलते। कभी कॉलेज के खाली कमरे में, कभी मेरे किराए के फ्लैट में, कभी कॉलेज के पीछे पुरानी लाइब्रेरी की इमारत में। संगिता हर बार और खुलती गई। पहले वह शर्माती थी, फिर खुद मांगने लगी।

एक दिन उसने कहा, “सर, आज मेरी गाँड में डालो।” मैंने धीरे-धीरे तैयारी की। बहुत सारा थूक लगाया। फिर धीरे-धीरे अंदर गया। वह तकिया दबाए लेटी रही। दर्द से आँखें बंद थीं, लेकिन पीछे की तरफ धक्के दे रही थी। जब पूरी लंड गाँड में समा गई तो उसने कहा, “अब चोदो… जोर से…”

मैंने जोर से चोदा। उसकी गाँड बहुत टाइट थी। हर धक्के पर वह दबी आवाज़ में कराहती। आखिर में मैंने उसकी गाँड में ही झड़ दिया। जब लंड निकाली तो सफेद पानी बाहर निकल रहा था। उसने मुड़कर देखा और मुस्कुराई। “अब मैं पूरी तरह आपकी हो गई सर।”

हमने बहुत कुछ किया उन तीन महीनों में। कभी मैंने उसे बाँधकर चोदा। कभी उसके मुँह में लंड डालकर गला चोदा। कभी उसे घोड़ी बनाकर दोनों छेद एक साथ उँगलियों से भरे। वह हर बार और बेशर्म होती गई। एक दिन उसने खुद कहा, “सर, आज गाली देकर चोदो। मुझे रंडी बोलो।”

मैंने बोला। और वह और भी गीली हो गई।

लेकिन हर खुशी के साथ डर भी था। कॉलेज में किसी को पता नहीं चला। हम बहुत सावधान थे। लेकिन एक बार लगभग पकड़े ही गए। विभाग के हेड अचानक कमरे में आ गए। संगिता ने जल्दी से किताब खोल ली और मैं खिड़की की तरफ मुड़ गया। दिल इतनी जोर से धधक रहा था कि सुनाई दे रहा था।

उस घटना के बाद हमने थोड़ी सावधानी बढ़ा ली।

तीन महीने बाद संगिता की अंतिम परीक्षाएँ आने वाली थीं। वह मुझसे बोली, “सर, परीक्षा के बाद मैं घर वापस चली जाऊँगी। शहर छोड़ना पड़ेगा।” मैंने उसका चेहरा देखा। आँखों में उदासी थी। “तुम जाओगी तो…” “तो क्या सर? आप मेरा क्या करेंगे? शादी?” वह हँसी। लेकिन हँसी में दर्द था। “आप शिक्षक हैं। मैं आपकी छात्रा रही। ये रिश्ता यहीं खत्म होना चाहिए।”

आखिरी बार हम मिले तो पूरी रात साथ रहे। मेरे फ्लैट में। उसने कहा, “आज जो करना है, कर लो। कल के बाद मैं नहीं मिल पाऊँगी।” मैंने उसे रात भर चोदा। हर अंदाज़ में। उसकी आँखों में आँसू थे, लेकिन वह मुस्कुरा रही थी। सुबह जब वह जाने लगी तो दरवाज़े पर खड़ी होकर बोली,

“अशोक सर… मैं आपको कभी नहीं भूलूँगी। आपने मुझे सिर्फ़ शरीर नहीं दिया। आपने मुझे एक बार जीना सिखाया।”

फिर वह चली गई।

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