मेरा नाम रिया है। उम्र इक्कीस साल। कॉलेज के दूसरे साल में हूँ। लोग मुझे शरीफ, पढ़ाकू और थोड़ी सी शर्मीली लड़की समझते हैं। मैं भी वही चेहरा लेकर घूमती हूँ। साफ सुथरीkurtis, हल्के रंग की Dupatta, बाल हमेशा बाँधे हुए। आदित्य मेरा बॉयफ्रेंड है। दो साल से साथ हैं। वह अच्छा है। बहुत अच्छा। मेरे लिए पानी का गिलास लेकर आता है, बर्थडे पर फूल देता है, और जब मैं बीमार पड़ती हूँ तो रात भर जागकर बैठता है। लेकिन सेक्स में… वह बिल्कुल बच्चों जैसा है। हल्के धक्के, दस-बारह मिनट, और फिर मेरे गले लगकर सो जाता है। मेरी चूत हर बार अधूरी रह जाती है। अंदर एक भूख बाकी रह जाती है जो मैं किसी को बता नहीं पाती।
यही भूख मुझे कर्ण तक ले गई।
कर्ण फाइनल ईयर का था। कॉलेज में उसका नाम काफी था। लंबा, कंधे चौड़े, बाँहों पर नसें उभरी हुई, हल्की दाढ़ी, और आँखों में वो बात जो लड़कियों को घबरा देती थी। वह मुझसे सीधे बात बहुत कम करता था। बस कभी-कभी लाइब्रेरी में, कैंटीन में या कॉरिडोर में मेरी तरफ देख लेता। वो नज़रें ऐसी होती थीं जैसे वह मेरे कपड़ों के अंदर झाँक रहा हो। पहली बार जब उसकी नज़र मुझ पर पड़ी थी, तो मुझे गुस्सा आया था। फिर अजीब सा सिहरन हुआ था। और फिर… मैं खुद उसकी नज़रों का इंतज़ार करने लगी थी।
प्रोजेक्ट के लिए मुझे उसकी मदद की जरूरत पड़ी। वह कंप्यूटर लैब का इंचार्ज था। एक शाम मैं लैब गई। छह बज रहे थे। ज्यादातर छात्र चले गए थे। लैब में हल्की ठंडक थी और कंप्यूटरों की हल्की आवाज़। कर्ण कुर्सी पर बैठकर फोन चला रहा था। उसने सिर उठाया, मुझे ऊपर से नीचे तक देखा और बोला, “रिया… अकेली आई है?”
“हाँ। प्रोजेक्ट में थोड़ी हेल्प चाहिए थी।” “आ जा। दरवाज़ा बंद कर दे।”
मैंने दरवाज़ा बंद किया। दिल जोरों से धधक रहा था। वह मेरे पास आया। मेरे लैपटॉप की तरफ देखने के बजाय मेरी आँखों में देखा। “तेरा बॉयफ्रेंड… आदित्य है ना? वह तुझे ठीक से चोदता भी है या सिर्फ़ हाथ पकड़कर घूमता है?”
सवाल इतना खुला था कि मैं हक्की-बक्की रह गई। गाला लाल हो गया। “तुम… तुम कैसे बात कर रहे हो?” “जो पूछ रहा हूँ। तेरी आँखों में भूख साफ दिखती है। आदित्य से नहीं भरेगी तू।”
उसने मेरा हाथ पकड़ा और अपनी जींस के ऊपर रख दिया। उसके लंड का तना हुआ आकार मेरी हथेली के नीचे साफ महसूस हो रहा था। मोटा, लंबा और गरम। “छू के देख। यह वाला तुझे अधूरा नहीं छोड़ेगा।”
मैंने हाथ नहीं हटाया। उँगली से हल्के से दबाया। कर्ण की साँस भारी हो गई। उसने मेरा चेहरा दोनों हाथों से पकड़ा और जोर से चूम लिया। जीभ अंदर घुस आई। एक हाथ से मेरे टॉप के अंदर घुसकर ब्रा के हुक खोले। मेरे स्तन बाहर आते ही उसने दोनों को जोर से मसला। निप्पल को उँगली से दबाया और मोड़ा। दर्द और मज़े का मिश्रण था।
“आह… धीरे…” “धीरे नहीं चलेगा तेरे साथ रिया।”
उसने मुझे लैब की टेबल पर लिटा दिया। जींस और पैंटी एक झटके में नीचे खींच ली। मेरी चूत उसके सामने खुली थी। वह झुका और बिना किसी प्रस्तावना के जीभ अंदर डाल दी। जोर-जोर से चाटने लगा। कभी क्लिटोरिस को मुँह में लेकर चूसता, कभी पूरी जीभ छेद में घुसाकर हिलाता। मैं टेबल पर लेटी हुई कराह रही थी। बाल बिखर गए थे। आधे घंटे के अंदर मैं दो बार झड़ चुकी थी। जाँघें काँप रही थीं।
फिर उसने अपनी जींस खोली। लंड बाहर निकला। आदित्य से काफी बड़ा और मोटा। सिर चमक रहा था। उसने मेरे मुँह के सामने पकड़ लिया। “चूस। और आँखें मुझमें डाल के चूस।”
मैंने लंड मुँह में लिया। वह मेरे बाल पकड़कर धीरे-धीरे धक्के देने लगा। गले तक जा रही थी। आँखों से पानी आने लगा। थूक लंड पर गिरकर चमक रहा था। कर्ण गाली देता जा रहा था। “हाँ… ऐसी चुदाई चूस… कॉलेज की टॉपर बनके… शरीफ लड़की बनके…”
फिर उसने मुझे पलटा। टेबल के किनारे से सटाकर पीछे से चूत में लंड धकेल दी। एक झटके में आधी अंदर चली गई। मैंने जोर से चीख मारी। उसने दूसरा धक्का मारा – पूरी लंड जड़ तक। फिर वह जानवर की तरह चोदने लगा। टेबल जोर-जोर से हिल रही थी। मेरे स्तन टेबल पर रगड़ खा रहे थे।
“बोल… कैसी लग रही है असली लंड?” “बहुत… बहुत मोटी… जोर से चोद… फाड़ दे…” “आदित्य ऐसा चोदता है क्या?” “नहीं… वह तो बच्चों का खिलौना है…”
कर्ण जोर से हँसा और रफ्तार और बढ़ा दी। उसने मेरी गाँड पर जोर-जोर से थप्पड़ मारे। फिर लंड निकालकर गाँड की सेंध पर लगा दी। “ले, गाँड में भी।”
मैंने दाँत भींचकर सिर हिलाया। वह धीरे-धीरे अंदर गया। दर्द तेज़ था। आँखों से आँसू आ गए। लेकिन जब पूरी लंड गाँड में समा गई तो उसने रुककर पूछा, “अब चोदूँ?” “हाँ… चोद… जोर से चोद…”
उसने जोर से गाँड मारी। मैं मुँह दबाए चीख रही थी। कर्ण एक हाथ से मेरे बाल पकड़े हुए था, दूसरे से मेरी चूत में उँगली घुमा रहा था। दोनों छेद एक साथ भरे हुए थे। शरीर पागल हो रहा था। आखिर में उसने लंड निकालकर फिर चूत में डाली और अंदर ही जोर से झड़ गया। गर्म पानी की तेज़ धार महसूस हुई। वह मेरे ऊपर गिरा और भारी साँसें लेते हुए बोला, “अब से तू मेरी है। आदित्य को रख ले… लेकिन जब भी मैं बुलाऊँ, तू आएगी। समझी?”
मैंने कुछ नहीं कहा। सिर्फ़ हाँ में सिर हिलाया। शरीर अभी भी काँप रहा था।
उस रात के बाद मेरी जिंदगी दो हिस्सों में बँट गई।
दिन में आदित्य के साथ कैफे, होल्डिंग हैंड्स, मीठी बातें, मूवी डेट्स। और खाली पीरियड्स या शाम को कर्ण के साथ।
कर्ण मुझे कॉलेज के अलग-अलग कोनों में बुलाता। कभी लाइब्रेरी के आखिरी रैक के पीछे जहाँ कोई नहीं आता था। कभी पुरानी बिल्डिंग की छत पर। कभी उसके हॉस्टल रूम में। हर बार वह और गंदा होता जा रहा था। और मैं… मैं हर बार और खुलती जा रही थी।
एक दिन उसने मुझे अपने हॉस्टल रूम में बुलाया। दरवाज़ा बंद किया और बोला, “आज मेरे दो यार भी आएँगे। तू तैयार रह।” पहले मैंने मना किया। फिर उसने मेरी चूत में उँगली डालते हुए कहा, “तैयार रह। वरना आदित्य को सब बता दूँगा।” मैं चुप रह गई।
थोड़ी देर बाद उसके दो दोस्त आ गए। कमरे में तंबाकू और शराब की गंध थी। कर्ण ने मुझे घुटनों के बल बिठाया। खुद पीछे से चोदने लगा और उसके दोस्त अपना लंड बारी-बारी से मेरे मुँह में ठूंसने लगे। गालियाँ चल रही थीं। “देखो सालो… कॉलेज की टॉपर रिया… कितनी बेशर्म होकर लंड चूस रही है…” “आदित्य को पता चल जाए तो?” मैं मुँह में लंड लिए सिर्फ़ आँखें बंद किए हुए थी। शरीर गद्दार था। खतरा जितना बढ़ता, चूत उतनी ही ज्यादा पानी छोड़ती। उस दिन तीनों ने मुझे बारी-बारी से चोदा। कर्ण ने आखिर में मेरी गाँड में झड़ा। जब वे सब चले गए तो मैं फर्श पर गिरी रही। शरीर में कोई ताकत नहीं बची थी।
एक और दिन उसने मुझे कॉलेज के पीछे वाली दीवार से लगाकर खड़े-खड़े चोदा। लोग थोड़ी दूर से गुजर रहे थे। मैं मुँह दबाए सह रही थी। कर्ण मेरे कान में कह रहा था, “अगर कोई देख ले तो? तेरी इज्जत के लाले पड़ जाएँगे… फिर भी तू कितनी गीली हो रही है रिया।” सच था। खतरे का नशा अलग ही था।
आदित्य को धीरे-धीरे शक होने लगा। एक शाम उसने मेरा हाथ पकड़कर कहा, “रिया तू बदल गई है। पहले इतनी दूर नहीं रहती थी मुझसे। कोई और तो नहीं है?” मैंने आँखों में आँसू लाकर झूठ बोला, “प्रोजेक्ट का बहुत लोड है। तुम ही तो हो मेरे।” वह विश्वास कर गया। क्योंकि वह अच्छा था। और अच्छे लोग आसानी से विश्वास कर जाते हैं।
दो महीने बाद कर्ण का मूड अचानक बदल गया। उसने मुझे रात को अपने रूम में बुलाया। दरवाज़ा बंद करके बोला, “कल मेरा फाइनल इंटरव्यू है। शहर छोड़ रहा हूँ। आज तेरी आखिरी चुदाई है मेरे साथ।”
मैंने उसकी तरफ देखा। अजीब सा दर्द हुआ। सोचा नहीं था कि वह सच में चला जाएगा। “तो आज…” “आज मैं तुझे इतना चोदूँगा कि तू सालों तक भूल नहीं पाएगी।”
उसने मुझे लगभग चार घंटे तक चोदा। पहले मुँह में। गले तक। आँखों से आँसू निकल रहे थे। फिर चूत में। गहरे और भारी धक्के। फिर गाँड में। दर्द के साथ मज़ा। बीच-बीच में वह मुझे पानी पिलाता, मेरी चूत चाटता, फिर से शुरू कर देता। गालियाँ, थप्पड़, बाल खींचना, गला हल्का दबाना — सब कुछ। एक बार तो उसने मुझे बाँधकर चोदा। मैं बिलकुल बेबस थी। आखिर में जब वह झड़ रहा था तो मेरे मुँह में झड़ा और बोला, “निगल। आखिरी निशान के तौर पर।”
मैंने निगल लिया।
वह जब थककर सो गया तो मैंने चुपचाप कपड़े पहने। उसके माथे पर एक हल्की सी चुंबन दी और कमरे से निकल गई।
बाहर रात काफी हो चुकी थी। कॉलेज के गेट तक पैदल चलते हुए दिमाग में बहुत कुछ चल रहा था। आदित्य मुझे प्यार करता है। कर्ण ने मुझे चोदा। और मैं… मैं दोनों के बीच की वो लड़की बन गई हूँ जो अब न तो पूरी शरीफ रह गई, न पूरी रंडी।
अगले दिन कर्ण कॉलेज नहीं आया। उसके जाने की खबर फैल गई। आदित्य ने मुझे मैसेज किया, “आज मिलते हैं?” मैंने जवाब दिया, “हाँ।”
रात को जब आदित्य मुझे चोद रहा था — अपने उसी हल्के, प्यार भरे अंदाज़ में — तो मेरी आँखों में आँसू आ गए। उसने पूछा, “क्या हुआ?” मैंने सिर हिलाया, “कुछ नहीं। बस प्यार आ गया।”
लेकिन सच ये था कि उस पल मेरी चूत में आदित्य का लंड था, और दिमाग में कर्ण का मोटा लंड और उसकी गालियाँ घूम रही थीं।
अब कई महीने बीत गए। कर्ण कहाँ है, मुझे नहीं पता। आदित्य अभी भी मेरे साथ है। अभी भी प्यार करता है। लेकिन रात को जब अकेली होती हूँ, तो उँगलियाँ अपनी चूत में डाल लेती हूँ और कर्ण का चेहरा याद करती हूँ। उसकी गालियाँ, उसके थप्पड़, उसकी मोटी लंड जब मेरी गाँड में पूरी समा जाती थी…
शायद कुछ भूखें कभी पूरी नहीं होतीं। वे बस अंदर दबी रह जाती हैं। और कभी-कभी रात के अँधेरे में निकलकर याद दिला देती हैं कि तू एक बार पूरी तरह चोदी जा चुकी है… और उसके बाद बाकी सब कुछ फीका है।
