अनन्या की कॉलेज वासना: वीरान ने शरीफ लड़की को रातभर चोदा

मेरा नाम अनन्या है। उम्र इक्कीस साल। कॉलेज के दूसरे साल में हूँ। लोग मुझे शांत, पढ़ाकू और थोड़ी सी गंभीर लड़की समझते हैं। मैं भी वही चेहरा लेकर घूमती हूँ। बाल ज्यादातर बाँधे हुए, हल्के रंग के कपड़े, और बातें कम। लेकिन अंदर एक बेचैनी थी जो मैं किसी को नहीं बता पाती थी।

मेरा बॉयफ्रेंड कबीर था। डेढ़ साल से साथ थे। वह अच्छा था। जिम्मेदार, प्यार करने वाला, और हमेशा मेरे भविष्य की बात करता। लेकिन सेक्स में वह बहुत सावधान रहता। जैसे मैं टूट जाऊँगी। हल्के स्पर्श, हल्के चुंबन, और जब बात आगे बढ़ती तो वह जल्दी में निपट लेता। मेरी शरीर की असली भूख कभी पूरी नहीं होती थी। कई रातें मैं जागकर छत को घूरती रहती और सोचती कि क्या सेक्स सिर्फ़ इतना ही होता है।

इसी अधूरेपन के बीच वीरान आया।

वीरान फाइनल ईयर में था। कॉलेज में उसका नाम काफी था। लंबा, गेहुँआ रंग, तेज़ आँखें, और बात करने का अंदाज़ ऐसा कि लड़कियाँ उसकी तरफ आकर्षित होतीं और लड़के जलते। वह मुझसे सीधे बात कम करता था। लेकिन जब भी हमारी नज़रें मिलतीं, तो वह एक पल के लिए रुककर देखता। वो नज़रें उलटी-सीधा नहीं देखती थीं। वे धीरे-धीरे ऊपर से नीचे जातीं, जैसे वह मेरे कपड़ों के अंदर का नक्शा बना रहा हो। पहली बार जब ऐसा हुआ था, तो मुझे गुस्सा आया था। दूसरी बार अजीब सा सिहरन हुआ था। तीसरी बार मैंने खुद उसकी नज़रों का इंतज़ार करना शुरू कर दिया था।

हमारा पहला असली संपर्क ग्रुप प्रोजेक्ट की वजह से हुआ। तीन छात्र और मैं। वीरान भी उसी ग्रुप में था। मीटिंग्स लाइब्रेरी में होती थीं। पहले दो मीटिंग्स सामान्य रहीं। लेकिन तीसरी मीटिंग में बाकी लोग चले गए और हम दोनों रह गए। बाहर बारिश हो रही थी। लाइब्रेरी का वह कोना काफी शांत था।

वीरान ने अचानक पूछा, “तुम्हारा बॉयफ्रेंड… कबीर है ना? वह तुम्हें देखकर खुश रहता होगा।” मैंने सिर हिलाया। “हाँ।” “और तुम?” उसने मेरी तरफ देखा। “तुम भी उतनी ही खुश हो?”

सवाल सीधा था। मैंने जवाब देने की बजाय फाइल बंद कर दी। “यह तुम्हारा काम नहीं है वीरान।” वह हल्का मुस्कुराया। “शायद। लेकिन तुम्हारी आँखें कहती हैं कि कुछ अधूरा है।”

मैं उठकर चली गई। लेकिन उसकी बात पूरे दिन मेरे दिमाग में घूमती रही।

अगले कुछ दिनों में हमारी मुलाकातें बढ़ गईं। कभी कैंटीन में, कभी कॉरिडोर में, कभी प्रोजेक्ट के बहाने। वीरान सीधे कुछ नहीं कहता था। बस पास बैठ जाता, कभी-कभी जानबूझकर मेरे हाथ से अंगुली टकरा देता, या मेरी कॉपी लेते समय उँगली मेरे हाथ पर फेर देता। हर बार एक छोटी सी बिजली सी दौड़ जाती। मैं खुद को याद दिलाती कि मेरा बॉयफ्रेंड है। लेकिन शरीर नहीं मानता था।

एक शाम की बात है। कॉलेज में कल्चरल प्रैक्टिस चल रही थी। मैं लेट तक रुकी थी। ज्यादातर छात्र जा चुके थे। मैं अपनी कॉपी लेने लाइब्रेरी के पुराने सेक्शन में गई तो वहाँ वीरान पहले से खड़ा था। खिड़की के पास। बाहर अँधेरा हो रहा था।

“तुम अभी तक यहाँ?” मैंने पूछा। “तुम्हारा इंतज़ार था,” उसने साफ कह दिया।

मैंने कुछ नहीं कहा। वह पास आया। इस बार दूरी बहुत कम थी। “अनन्या, तुम रोज़ मुझसे दूर भागती हो। लेकिन आँखें नहीं भागतीं।” “वीरान… यह सही नहीं है।” “क्या सही नहीं है? यह कि मैं तुम्हें चाहता हूँ? या यह कि तुम भी मुझे सोचती हो?”

मेरा गला सूख गया। मैंने जवाब नहीं दिया। उसने मेरा हाथ पकड़ लिया। इस बार मैंने नहीं छुड़ाया। उसकी हथेली गरम थी। उसने मुझे धीरे से अपनी तरफ खींचा और चूम लिया। पहला चुंबन धीमा था। फिर गहरा होता गया। उसकी जीभ मेरे मुँह में घुस आई। एक हाथ मेरी कमर पर था, दूसरा मेरे बालों में। मैंने भी जवाब देना शुरू कर दिया। चारों तरफ सन्नाटा था। सिर्फ़ हमारी साँसें और बारिश की आवाज़।

चुंबन टूटा तो दोनों की साँसें तेज़ थीं। “यहाँ नहीं,” मैंने फुसफुसाया। “तो कहाँ?” “तुम्हारे हॉस्टल में… अगर सुरक्षित हो।”

वीरान ने सिर हिलाया। हम अलग-अलग निकले। बीस मिनट बाद मैं उसके हॉस्टल रूम के बाहर खड़ी थी। दिल जोरों से धधक रहा था। उसने दरवाज़ा खोला और मुझे अंदर खींच लिया। दरवाज़ा बंद होते ही उसने मुझे फिर से चूम लिया। इस बार ज्यादा भूखा। उसके हाथ मेरे टॉप के अंदर घुस गए। ब्रा के हुक खोले। मेरे स्तन बाहर आते ही उसने दोनों को जोर से मसला। निप्पल को उँगली से दबाया।

“आह… धीरे…” “धीरे नहीं अनन्या। आज धीरे नहीं चलेगा।”

उसने मेरा टॉप और ब्रा दोनों उतार दिए। फिर जींस और पैंटी एक साथ नीचे खींच ली। मैं पूरी नंगी उसके सामने खड़ी थी। उसने मुझे घूरते हुए कहा, “कबीर ने कभी तुम्हें ऐसे देखा है?” मैंने सिर हिलाया। “नहीं।” “अच्छा।”

वह झुका और मेरे स्तन मुँह में ले लिया। जोर से चूसने लगा। दाँतों से हल्के से काटा। मैं दीवार का सहारा लिए खड़ी रही। उसका हाथ नीचे गया और उँगली मेरी चूत में घुस गई। मैं पहले से गीली थी। उसने दो उँगलियाँ अंदर डालकर तेजी से हिलानी शुरू कर दीं। मैं कराहने लगी।

थोड़ी देर बाद उसने मुझे बिस्तर पर लिटा दिया। खुद कपड़े उतारे। उसका लंड निकला — लंबा, मोटा और पूरी तरह तना हुआ। मैंने देखा और गला सूख गया। कबीर का इतना बड़ा नहीं था। उसने मेरे मुँह के सामने लंड पकड़ लिया। “चूस।”

मैंने मुँह खोला। वह धीरे-धीरे अंदर घुसाने लगा। मैंने चूसना शुरू किया। वह मेरे बाल पकड़कर हल्के धक्के देने लगा। गले तक। आँखों से पानी आने लगा लेकिन मैंने रोका नहीं। थोड़ी देर बाद उसने लंड निकाली और मेरे पैर फैला दिए।

“अब असली चीज़।”

उसने लंड को मेरी चूत पर रगड़ा और एक झटके में अंदर डाल दिया। मैंने जोर से कराह निकाली। वह बहुत गहराई तक चला गया। फिर धक्के शुरू किए — लंबे, भारी और लगातार। बिस्तर आवाज़ करने लगा। मेरे स्तन उसके हर धक्के के साथ हिल रहे थे। उसने मेरी दोनों टाँगें अपने कंधों पर रख लीं और और गहराई तक जाने लगा।

“बोल… कैसा लग रहा है?” “बहुत… बहुत गहरा… जोर से…” “कबीर ऐसा चोदता है क्या?” “नहीं… कभी नहीं…”

वीरान की रफ्तार बढ़ गई। वह गालियाँ देने लगा। “शरीफ लड़की… कॉलेज की गंभीर अनन्या… आज कितनी बेशर्म होकर चोद रही है…” मैं भी बोलने लगी। “जोर से… और जोर से चोद… फाड़ दे…”

उसने मुझे पलटा और पीछे से चोदा। एक हाथ से मेरे बाल पकड़े, दूसरे से मेरी गाँड पर थप्पड़ मारे। फिर लंड निकालकर गाँड की सेंध पर लगा दी। “यहाँ भी लेगी?” मैंने दाँत भींचकर कहा, “हाँ… धीरे से…”

वह धीरे-धीरे अंदर गया। दर्द तेज़ था। लेकिन जब पूरी लंड समा गई तो उसने रुककर पूछा, “अब?” “चोदो…”

उसने गाँड में जोरदार धक्के लगाने शुरू किए। मैं मुँह दबाए चीख रही थी। थोड़ी देर बाद उसने फिर चूत में डाल दिया और आखिर में अंदर ही झड़ गया। गर्म पानी की धार महसूस हुई। वह मेरे ऊपर गिरा रहा। दोनों पसीने से तर थे।

कुछ देर खामोशी रही। फिर उसने मेरे बाल सहलाते हुए कहा, “अब तू सिर्फ़ कबीर की नहीं रही अनन्या।”

मैंने कुछ नहीं कहा। बस उसकी छाती पर सर रखकर लेटी रही। शरीर में दर्द के साथ एक अजीब सा सुकून भी था। पहली बार लगा कि कोई मेरी भूख को समझकर चोद रहा है।

उस रात हमने दो बार और किया। दूसरी बार उसने मुझे खिड़की के पास खड़ा करके चोदा। बाहर अँधेरा था। डर और मज़े का मिश्रण पागल कर रहा था। तीसरी बार उसने मेरे मुँह में झड़ा और कहा, “निगल।” मैंने निगल लिया।

सुबह जब मैं निकली तो शरीर में थकान थी, लेकिन मन में एक अजीब सी शांति भी थी। कबीर ने मैसेज किया था — “रात को कहाँ थी?” मैंने जवाब दिया, “लाइब्रेरी में पढ़ाई कर रही थी।”

झूठ बोलते हुए हाथ नहीं काँपे।


अगले पंद्रह दिनों में हम मिले। कभी उसके हॉस्टल में, कभी कॉलेज के पुराने स्टोर रूम में, कभी बारिश में छाते के नीचे। हर बार वीरान और बेकाबू होता गया। और मैं… मैं हर बार और खुलती गई। कबीर के साथ सेक्स अब और भी फीका लगने लगा। एक दिन तो मैं उसके साथ लेटी हुई वीरान का लंड याद कर रही थी।

वीरान ने एक दिन कहा था, “तू अब वापस नहीं जा सकती अनन्या। तूने जो दरवाज़ा खोला है, वह आसानी से बंद नहीं होगा।”

मैंने जवाब नहीं दिया था। क्योंकि सच वही था।

अब रात को जब अकेली होती हूँ, तो सिर्फ़ वीरान के धक्के, उसकी गालियाँ और उसकी मोटी लंड याद आती है। कबीर का प्यार नहीं।

शायद कुछ भूखें इतनी गहरी होती हैं कि एक बार जाग जाएँ तो फिर सोती नहीं।

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