मेरा नाम यश है। उम्र बाईस साल। एमबीए फर्स्ट ईयर में हूँ। शहर के एक अच्छे कॉलेज में। मेरा एक नया दोस्त बना है—आयोग। वो भी उसी क्लास में है। दोनों की समझ काफी मिल गई है। साथ में लाइब्रेरी, कैन्टीन, कभी-कभी मूवी। आयोग के घर का माहौल भी सामान्य है। माँ-बाप दोनों हैं। एक बड़ी बहन है जिसका नाम उसने कभी-कभी लिया है, लेकिन मैंने उसे देखा नहीं था।
उस दिन की बात है। सुबह कॉलेज जाने का टाइम था। आयोग का मैसेज आया—
“यार पिक अप कर लेना। बहन को छोड़ना है घर पर। रास्ते में कॉलेज आ जाएगा।”
मैंने बुलेट निकाली। काले रंग की। चश्मा लगाया। ब्लैक जैकेट। बाल थोड़े बिखरे हुए। आईने में देखा तो खुद को ठीकठाक लग रहा था। आयोग के घर पहुँचा। गेट के बाहर खड़ी रहा। हॉर्न दिया।
दरवाजा खुला और जो लड़की निकली… मैं एक पल के लिए रुक गया।
वो साड़ी में थी। हल्के गुलाबी रंग की। ब्लाउज थोड़ा टाइट। कमर साफ दिख रही थी। बाल अभी-अभी धोए हुए लग रहे थे—लंबे, काले, और खुले। कुछ बाल कंधे पर गिरे हुए थे। चेहरा इतना साफ और चमकदार था कि देखे बिना रहा नहीं जाता। गोरी त्वचा। आँखें बड़ी। होठ हल्के गुलाबी। साड़ी में उसका फिगर एकदम हाय-हाय था। स्तन भारी और गोल। साड़ी का पल्लू बार-बार सरक रहा था और वो संभाल रही थी। कमर पतली। और चलते समय गाँड का हिलना… मैंने नजरें हटाने की कोशिश की लेकिन हट नहीं पाईं।
वो मेरे करीब आई। मैंने चश्मा थोड़ा ऊपर उठाया। हमारी निगाहें मिलीं।
वो भी मुझे देख रही थी। बुलेट पर बैठा, चश्मा, जैकेट। उसकी निगाह मेरे चेहरे पर कुछ सेकंड ठहरी। फिर मेरे हाथों पर। फिर वापस आँखों में। मैंने भी उसकी आँखों में देखा। कुछ पल दोनों सिर्फ देखते रहे। कोई मुस्कुराहट नहीं। बस एक अजीब सा सन्नाटा। दिल की धड़कन तेज हो गई थी।
तभी आयोग बाहर निकला। “ये यश है। मेरा फ्रेंड। और ये मेरी बहन प्रियंका।”
प्रियंका ने हल्के से सिर हिलाया। “हाय।” आवाज धीमी और मीठी थी।
मैंने भी जवाब दिया। “हाय।”
आयोग पीछे बैठ गया। प्रियंका साइड में। उसकी साड़ी का पल्लू मेरे हाथ से छू गया। हल्की खुशबू आई। बालों की। साबुन और कुछ फूलों जैसी। मैंने गाड़ी स्टार्ट की। रास्ते में आयोग बातें कर रहा था लेकिन मेरा ध्यान बार-बार साइड मिरर में जा रहा था। प्रियंका का चेहरा। हवा से उड़ते बाल। कभी-कभी वो मेरी तरफ देख लेती। जब हमारी निगाहें मिलती तो वो झट से आगे देख लेती।
घर पहुँचा। प्रियंका उतर गई। आयोग भी। जाते-जाते प्रियंका ने एक बार फिर मुड़कर देखा। मैंने भी देखा। फिर वो अंदर चली गई।
कॉलेज जाते समय आयोग बोला, “बहन है मेरी। शादीशुदा। पति बैंगलोर में है। लड़ाई हो गई थी तो मायके आ गई है। कुछ दिन रुकेगी।”
मैंने बस “अच्छा” कहा। लेकिन दिमाग में वो साड़ी, वो बाल, वो निगाहें घूम रही थीं।
रात को कमरे में लेटा तो नींद नहीं आई। बार-बार प्रियंका याद आ रही थी। साड़ी में उसका मिल्की बदन। जैसे कोई दूध में नहाया हो। भारी स्तन। पतली कमर। जब वो चल रही थी तो गाँड का गोलाई से हिलना। मैंने आँखें बंद कीं। ख्याल आया कि अगर वो साड़ी का पल्लू गिर जाए… ब्लाउज के हुक खुल जाएँ…
हाथ अपने आप नीचे चला गया। लंड पहले से तना हुआ था। मैंने धीरे-धीरे दबाना शुरू किया। प्रियंका का चेहरा आँखों के सामने था। उसकी आँखें। उसके होठ। मैंने सोचा अगर वो मेरे ऊपर हो… साड़ी ऊपर उठी हो… मैं उसके स्तन मुँह में ले रहा हूँ…
मुठ तेज हो गई। कुछ देर में ही मैं जोर से झड़ गया। पेट पर गर्म वीर्य गिरने लगा। साँसें तेज थीं। लेकिन मन शांत नहीं हुआ। उल्टे और बेचैनी बढ़ गई।
अगली सुबह फिर वही हुआ। आयोग ने फिर मैसेज किया। “आज भी पिकअप कर लेना यार। बहन को जाना है मार्केट।”
मैं पहुँचा। फिर से वही बुलेट। चश्मा। प्रियंका इस बार हल्की नीली साड़ी में निकली। बाल फिर से धोए हुए। खुले। चेहरे पर हल्की सी मुस्कान थी। हमारी निगाहें फिर मिलीं। इस बार थोड़ी देर और टिकी रहीं।
“गुड मॉर्निंग,” मैंने कहा। “गुड मॉर्निंग,” उसने जवाब दिया। आवाज में हल्की शरमाहट थी।
रास्ते में हवा तेज थी। साड़ी का पल्लू उड़ रहा था। एक बार तो उसका पेट साफ दिख गया। चिकनी त्वचा। मैंने नजरें सड़क पर केंद्रित रखने की कोशिश की। लेकिन दिल जोर-जोर से धड़क रहा था।
मार्केट पहुँचा। प्रियंका उतरते समय बोली, “थैंक यू यश।”
पहली बार उसने मेरा नाम लिया। आवाज कानों में रह गई।
रात को फिर वही बेचैनी। इस बार मैंने फोन उठाया। इंस्टाग्राम खोला। आयोग के फॉलोअर्स में जाकर प्रियंका का अकाउंट ढूँढा। प्राइवेट था। मैंने फ्रेंड रिक्वेस्ट भेज दी। कैप्शन कुछ नहीं लिखा। बस रिक्वेस्ट।
भेजने के बाद फोन रख दिया। दिल जोर से धधक रहा था। मन में एक ही ख्याल था—क्या वो स्वीकार करेगी?
उस रात फिर मुठ मारी। इस बार और जोर से। आँखों के सामने प्रियंका थी। साड़ी में। बाल बिखरे। और मैं उसके शरीर को छू रहा था।
रिक्वेस्ट भेजने के बाद भी नींद नहीं आई।
सुबह उठकर पहली नजर फोन पर गई।
नोटिफिकेशन जल रहा था।
प्रियंका ने फ्रेंड रिक्वेस्ट स्वीकार कर ली थी।
फ्रेंड रिक्वेस्ट स्वीकार होने के बाद के कुछ दिन अजीब से बीते।
मैं रोज आयोग को लेने उसके घर जाता। कभी सुबह कॉलेज के लिए, कभी शाम को कहीं और। हर बार जब गेट के बाहर खड़ा होता तो नजर ऊपर की खिड़कियों और बालकनी पर चली जाती। कई बार प्रियंका बालकनी में खड़ी मिलती। कभी बाल सुखाती, कभी फोन पर बात करती, कभी बस बाहर देख रही होती। जब हमारी निगाहें मिलती तो दोनों एक-दो सेकंड के लिए रुक जाते। वो मुस्कुराती नहीं थी। मैं भी नहीं। बस देखते रहते। फिर वो अंदर चली जाती। लेकिन वो चुपचाप देखना दोनों के बीच एक अनकही बात पैदा कर रहा था। रात को जब मैं अपने कमरे में लेटा होता तो उसी निगाह का ख्याल आकर लंड खड़ा कर देता।
एक दोपहर की बात है। मुझे टी-शर्ट्स खरीदनी थीं। कॉलेज के पास ही एक मॉल है। मैं वहाँ पहुँचा। पुरुष सेक्शन में घूम रहा था कि अचानक नज़र सामने वाली तरफ चली गई। प्रियंका वहाँ खड़ी थी। जींस और एक हल्के रंग के टॉप में। बाल खुले। चेहरे पर हल्की मेकअप। वो महिलाओं वाले सेक्शन में कपड़ों की रैक देख रही थी।
मैं पास गया। “दीदी…”
प्रियंका ने मुड़कर देखा। पहले थोड़ा हैरान हुई, फिर हल्की मुस्कान दी। “अरे यश। तुम यहाँ?” “टी-शर्ट लेने आया था। आप?” “मैं भी कुछ टॉप्स देख रही हूँ।”
फिर उसने अचानक कहा, “और हाँ… दीदी मत कहा करो। नाम से बुलाओ। प्रियंका।”
मैंने सिर हिलाया। “ठीक है… प्रियंका।” नाम लेते ही एक अजीब सा नशा सा लगा। वो मुस्कुराई।
“चलो, मेरी मदद कर दो। मुझे कुछ टॉप्स ट्राई करने हैं। बताना कौन सा अच्छा लग रहा है।”
मैं उसके साथ ट्रायल रूम वाले सेक्शन में चला गया। प्रियंका अंदर गई। कुछ देर बाद पर्दा हटा। पहला टॉप पहना था—ब्लैक, थोड़ा टाइट। स्तनों का उभार साफ दिख रहा था। उसने घूमकर पूछा, “कैसा लग रहा है?” “अच्छा लग रहा है,” मैंने कहा। आवाज थोड़ी भारी निकल गई।
वो फिर अंदर चली गई। दूसरा टॉप। फिर तीसरा। चौथा। वो लगभग सात-आठ टॉप्स ट्राई कर चुकी थी। हर बार पर्दा हटने पर मेरी नजर उसके शरीर पर चली जाती। एक टॉप तो इतना फिट था कि उसकी कमर और स्तनों की शक्ल एकदम साफ उभर आई थी। मैंने कई बार गला साफ किया। लंड पैंट में हल्का तन रहा था।
आखिर में एक गहरा लाल टॉप पहना। पीछे से हुक लगाना था। वो पर्दा हटाकर बोली, “यश… पीछे हुक नहीं लग रहा। थोड़ी मदद करोगे?”
मैंने अंदर कदम रखा। ट्रायल रूम छोटा था। प्रियंका ने बाल एक तरफ किए और पीठ कर ली। टॉप का पिछला हिस्सा खुला हुआ था। उसकी नंगी पीठ मेरे बिल्कुल सामने थी। गोरी, चिकनी त्वचा। रीढ़ की हड्डी की हल्की लकीर। बीच में ब्रा का हुक। मैंने हुक पकड़ा। उँगलियाँ उसकी त्वचा से छू गईं। हल्की गर्माहट महसूस हुई। दिल जोर से धधक रहा था। लंड पूरी तरह तन गया। मैंने जल्दी से हुक लगा दिया।
“हो गया,” मैंने कहा। आवाज काँप गई थी।
प्रियंका ने मुड़कर देखा। इतनी करीब थी कि उसकी साँस मुझ पर पड़ रही थी। हमारी निगाहें मिलीं। कुछ पल कोई नहीं बोला। फिर उसने धीमे से कहा, “थैंक यू।”
मैं बाहर आ गया। थोड़ी देर बाद प्रियंका ने भी टॉप लिया और मेरे साथ पुरुष सेक्शन में आ गई। उसने मुझे तीन-चार टी-शर्ट्स पकड़ाईं। “ये वाली तुम पर अच्छी लगेंगी। ट्राई करके देखो।”
मैंने ट्राई की। वो बाहर खड़ी राय देती रही। एक टी-शर्ट के बारे में बोली, “ये वाली लो। तुम्हारे कंधों पर अच्छी बैठ रही है।”
उसकी बातों में एक अलग सा अपनापन था। बिल देने के बाद मैंने कहा, “आपको घर छोड़ दूँ?” वो थोड़ा सोची। फिर बोली, “चलो।”
बुलेट पर वो पीछे बैठी। इस बार उसका हाथ मेरे कंधे पर था। हल्की पकड़। लेकिन पकड़ महसूस हो रही थी। रास्ते में हवा उसके बालों को उड़ा रही थी। कभी-कभी उसके बाल मेरे गले से छू जाते। घर पहुँचा तो उतरते समय उसने कहा, “आज मदद के लिए थैंक यू यश।”
रात को इंस्टाग्राम पर मैसेज आया।
प्रियंका: आज मॉल में अचानक मिल गए। मैं: हाँ। अच्छे टॉप्स चुने आपने। प्रियंका: तुमने मदद की ना। हुक लगाने में तो विशेष योगदान रहा।
मैंने देखा। दिल तेज धड़क रहा था।
मैं: वो तो इमरजेंसी थी। प्रियंका: हम्म। इमरजेंसी में तुम काम आ गए।
फिर धीरे-धीरे चैट लंबी होने लगी। पहले सामान्य बातें। कॉलेज। मौसम। फिर थोड़ी प्राइवेट। एक रात उसने पूछा,
प्रियंका: तुम रात को देर तक जागते हो क्या? मैं: कभी-कभी। प्रियंका: क्यों? मैं: ऐसे ही। ख्याल आते रहते हैं। प्रियंका: किसके?
मैंने जवाब नहीं दिया। सिर्फ एक स्माइली भेजी। उसने भी स्माइली भेजी।
अगले कुछ दिनों में मिलना-जुलना आम हो गया। कभी मार्केट में, कभी आयोग के घर पर। बातें पहले से ज्यादा होने लगीं। कभी-कभी चैट में हल्की सी नौटंकी भी आ जाती।
एक रात उसने मैसेज किया: “आज बालकनी में खड़े-खड़े क्या सोच रहे थे?”
मैंने जवाब दिया: “आपको।”
थोड़ी देर बाद उसका रिप्लाई आया: “सोचते रहो। बुरा नहीं लगता।”
मैंने फोन रखा। लंड पहले से तना हुआ था।
अब सिर्फ निगाहें नहीं रह गई थीं। बातें भी गंदी होने की तरफ बढ़ने लगी थीं।
परीक्षाएँ शुरू हो गई थीं।
आयोग ने कहा कि रोज़ उसके घर आकर साथ पढ़ा जाए। उसके घर का माहौल शांत रहता था। मैं रोज़ शाम को पहुँचने लगा। आयोग का कमरा ऊपर था। नीचे हॉल और किचन। प्रियंका अक्सर घर में ही रहती। कभी चाय लेकर आती, कभी पानी, कभी बस दरवाजे से झाँककर देख जाती।
धीरे-धीरे उसने संकेत देने शुरू कर दिए।
एक दिन चाय रखते हुए बोली, “तुम रोज़ आते हो… घर वाले खुश हैं। मैं भी।”
दूसरे दिन मेरे नोट्स देखते हुए कहा, “तुम्हारे हाथ अच्छे हैं यश। लिखाई भी साफ… और पकड़ भी मजबूत लगती है।”
तीसरे दिन जब आयोग बाथरूम गया तो पास आकर धीमे से बोली, “रात को देर तक जागते हो ना? मैंने तुम्हारा लास्ट सीन इंस्टा पर देखा। सोये नहीं थे क्या?”
चौथे दिन तो और साफ कहा, “तुम जब भी घर आते हो… मैं ऊपर से सुनती हूँ। तुम्हारी आवाज पहचान जाती हूँ।”
मैं हर बार सिर्फ मुस्कुराकर रह जाता। लेकिन अंदर लंड तन जाता।
तीसरे दिन की शाम थी। घर में माँ-बाप नहीं थे। कहीं रिश्तेदारों के घर गए हुए थे। सिर्फ हम तीन। आयोग, मैं और प्रियंका। हम ऊपर कमरे में पढ़ रहे थे। अचानक आयोग के फोन पर उसकी गर्लफ्रेंड का कॉल आया। वो बात करते-करते नीचे चला गया। फिर बाहर निकला।
“यार दस-पंद्रह मिनट में आता हूँ। वो पास में ही है। तुम पढ़ते रहना।”
मैं अकेला रह गया। थोड़ी देर बाद प्रियंका कमरे में आई। हाथ में दो कप चाय थे। उसने एक कप मेरे पास रखा और बगल वाली कुर्सी पर बैठ गई।
“मदद चाहिए तो बोलो। मैं भी एमबीए कर चुकी हूँ।”
वो पास खिसक आई। किताब की तरफ झुकी। उसका टॉप थोड़ा आगे झुका हुआ था। गला काफी खुला। भारी स्तनों का गहरा गड्ढा साफ दिख रहा था। गोरी त्वचा। ब्रा का हल्का किनारा। मैंने नजरें हटाने की कोशिश की लेकिन हट नहीं पाईं। लंड एकदम तन गया। पैंट में तंबू की तरह उभड़ आया। मैंने किताब अपनी गोद में रख ली। छुपाने की कोशिश की।
प्रियंका ने मेरी तरफ देखा। फिर किताब की तरफ। फिर वापस मेरी आँखों में। वो समझ गई थी।
“किताब क्यों रखी गोद में?” उसने धीमे से पूछा। “ऐसे ही…” “ऐसे ही नहीं। दिखा।”
मैं चुप रहा। प्रियंका ने किताब हटा दी। पैंट में तना हुआ लंड साफ दिख रहा था। उसने हल्की मुस्कान दी।
“इतना… मेरी वजह से?”
मैंने जवाब नहीं दिया। वो और करीब आ गई। उसका हाथ मेरी जाँघ पर रखा। फिर धीरे-धीरे ऊपर सरका। पैंट के ऊपर से लंड को दबाया।
“कितना सख्त है… कितने दिन से तन रहा है ये?” “जब से तुम्हें देखा है,” मैंने सच बोल दिया।
प्रियंका ने दरवाजे की तरफ देखा। फिर उठकर लॉक लगा दिया। वापस आई तो सीधे मेरे ऊपर बैठ गई। कुर्सी पर। उसने मेरा चेहरा दोनों हाथों में लिया और जोर से चुंबन कर दिया। जीभ अंदर घुस आई। मैंने उसकी कमर पकड़ ली। टॉप के अंदर हाथ डालकर ब्रा के ऊपर से स्तन मसले। भारी और नरम।
“जल्दी कर… आयोग कब भी आ सकता है,” उसने हाँफते हुए कहा।
मैंने उसका टॉप ऊपर किया। ब्रा खोल दी। भारी गोरे स्तन बाहर आ गए। निप्पल कड़े थे। मैंने एक मुँह में लिया और जोर से चूसा। प्रियंका ने मेरे बाल पकड़ लिए।
“हाgent… और जोर से चूस…”
मैंने दोनों स्तनों को बारी-बारी चूसा। दाँतों से हल्का काटा। प्रियंका कराह रही थी। फिर उसने मेरी पैंट खोली। लंड बाहर निकाला। आँखें बड़ी हो गईं।
“मोटा है… अच्छा है।”
वो कुर्सी से उतरी। घुटनों के बल बैठ गई और लंड मुँह में ले लिया। पहले टोपा चाटा। फिर गहराई तक ले गई। गला तक। मैंने उसके बाल पकड़कर हल्के धक्के दिए। वो चूसती रही। थूक बह रहा था।
थोड़ी देर बाद वो उठी। जींस और पैंटी एक साथ नीचे कर दी। फिर मेरे ऊपर बैठ गई। लंड को अपनी चूत पर रखा और धीरे-धीरे अंदर लेने लगी।
“आह्ह… कितना मोटा… धीरे…”
पूरा अंदर जाने के बाद वो रुक गई। दोनों की साँसें तेज थीं। फिर उसने कमर हिलानी शुरू की। ऊपर-नीचे। मैंने उसके स्तन मुँह में लिए और चूसने लगा। प्रियंका जोर-जोर से कराह रही थी।
“चोद… यश… और तेज… दोस्त की बहन की चूत चोद…”
मैंने उसकी कमर पकड़कर खुद भी धक्के मारने शुरू कर दिए। कुर्सी चरमरा रही थी। प्रियंका की चूत गरम और गीली थी। लंड को कसकर पकड़ रही थी। मैंने उसे उठाया और बिस्तर पर लिटा दिया। टाँगें फैलाईं और जोर से पेलने लगा।
“हाँ… ऐसे… गहरा… फाड़ दे…” “कितनी गरम चूत है तेरी प्रियंका… दोस्त की बहन होकर इतनी चुदने वाली…” “चुद रही हूँ… तेरे लंड से… और जोर से पेल…”
मैंने उसकी टाँगें कंधों पर रख लीं। पूरा लंड अंदर तक जा रहा था। प्रियंका के नाखून मेरी पीठ पर गड़ रहे थे। स्तन ऊपर-नीचे उछल रहे थे। कमरे में सिर्फ हमारी साँसें और चप-चप की आवाजें थीं।
“मैं झड़ने वाली हूँ… यश… साथ में झड़…” “अंदर छोड़ूँ?” “हाँ… अंदर ही छोड़… भर दे…”
कुछ तेज धक्कों के बाद दोनों एक साथ झड़ गए। मेरा वीर्य उसकी चूत में छूटने लगा। प्रियंका जोर से काँप रही थी। चूत ने लंड को बार-बार जकड़ा। दोनों पसीने से तर थे।
थोड़ी देर हम वैसे ही पड़े रहे। फिर प्रियंका ने धीमे से कहा, “आयोग आ जाएगा। उठ।”
हम दोनों जल्दी से कपड़े पहनने लगे। प्रियंका ने आईने में खुद को देखा। बाल बिखरे थे। होठ सूजे। उसने मुझे देखा और बोली,
“ये सिर्फ आज की बात नहीं है यश। जब भी मौका मिलेगा… लेना।”
मैंने सिर हिलाया। लंड अभी भी आधा तना था। नीचे कदमों की आवाज आई। आयोग आ रहा था।
प्रियंका ने दरवाजा खोला और सामान्य स्वर में बोली, “चाय पी लो दोनों। मैं नीचे जा रही हूँ।”
वो चली गई। मैं किताब खोलकर बैठ गया। दिल अभी भी जोर-जोर से धधक रहा था। जाँघों पर उसकी खुशबू बाकी थी।
और मन में एक ही बात थी—दोस्त की बहन की चूत अब मुझे मिल चुकी थी।
