मेरा नाम काव्या है। उम्र बत्तीस। नॉएडा के एक फ्लैट में अकेली रहती हूँ। पति सिंगापुर में प्रोजेक्ट पर हैं पिछले आठ महीनों से। वीडियो कॉल पर बात होती है, सेक्स की बात भी होती है, लेकिन शरीर की प्यास स्क्रीन से नहीं बुझती।
मैं नाइट शिफ्ट में काम करती हूँ। एक इंटरनेशनल कॉल सेंटर में। रात के ग्यारह बजे निकलती हूँ, सुबह सात बजे लौटती हूँ। फ्लैट में ज्यादातर समय अंधेरा ही रहता है। अकेली। चुप। और बहुत देर से… भूखी।
उस रात की बात है। शिफ्ट में कोई खास कॉल नहीं थे। बोरियत हो रही थी। हेडफोन लगाए मैं अपनी कुर्सी पर बैठी थी कि अचानक एक कॉल आया। नंबर अननोन था। आमतौर पर ऐसे नंबर अटेन्ड नहीं करते, लेकिन उस रात मैंने अटेन्ड कर लिया।
आवाज़ आई। पुरुष। भारी। थोड़ी कर्कश। “क्या नाम है आपका?”
मैंने कंपनी वाला स्क्रिप्ट पढ़ना शुरू किया। “सर, मैं काव्या बोल रही हूँ। आपका अकाउंट…”
उसने बीच में काट दिया। “स्क्रिप्ट मत पढ़ो। अपनी असली आवाज़ में बोलो।”
मैं चुप रही। “बोलो। तुम्हारी आवाज़ में एक थकान है… और उसके नीचे कुछ और भी है।”
मेरा हाथ माउस पर ठहर गया। “आप कौन हैं?” “कोई नहीं। बस एक आदमी जो रात के तीन बजे अकेला है। और तुम भी अकेली लगती हो।”
मैंने कॉल कट करनी चाही। लेकिन उँगली नहीं हिली। “तुम्हारा पति कहाँ है?” उसने फिर पूछा। “सिंगापुर।” शब्द मुँह से निकल गए। पता नहीं क्यों।
वो हल्का सा हँसा। “अच्छा। तो शरीर कितने दिन से भूखा है?”
मैंने जवाब नहीं दिया। लेकिन साँसें थोड़ी तेज हो गई थीं। हेडफोन में उसकी साँसें भी साफ आ रही थीं।
“बोलो काव्या। झूठ मत बोलो। तुम्हारी आवाज़ पहले से भारी हो गई है।”
मैंने आँखें बंद कर लीं। “बहुत दिन हो गए।”
“कितने?” “…छह महीने से ज्यादा।”
लाइन पर सन्नाटा पसर गया। फिर उसकी आवाज़ आई। बहुत धीमी। “अपना हाथ नीचे ले जाओ।”
मैंने चारों तरफ देखा। केबिन में कोई नहीं था। ज्यादातर लोग हेडफोन लगाए अपनी स्क्रीन में व्यस्त थे। “क्या?” “हाथ। अपनी स्कर्ट के अंदर। अभी।”
मेरा हाथ काँप रहा था। लेकिन मैं स्कर्ट के नीचे ले गयी। पैंटी के ऊपर से। “पहुँच गया?” “हाँ…” “अब अंदर। धीरे से।”
उँगली पैंटी के अंदर चली गई। मैं पहले से गीली थी। खुद को भी हैरानी हुई। एक अनजान आवाज़… और शरीर ने पहले ही जवाब दे दिया था।
“कितनी गीली है?” “बहुत…” मेरी आवाज़ काँप गई।
“दो उँगली करो। और क्लिट पर अंगूठा रखो।”
मैंने वैसा ही किया। आँखें बंद थीं। आसपास की आवाज़ें दूर होने लगीं। सिर्फ उसकी साँसें और मेरे अपने अंदर की गीली आवाज़ रह गई।
“जोर से करो। जैसे कोई तुम्हें देख रहा हो… लेकिन कोई देख नहीं रहा।”
उँगलियाँ तेज चलने लगीं। मैं कुर्सी पर थोड़ी और खिसक गई। साँसें नियंत्रण से बाहर होने लगीं। माइक अभी भी ऑन था।
“आवाज़ मत निकालना। सिर्फ साँसें। मैं सुन रहा हूँ।”
मैंने निचला होंठ दाँतों में दबा लिया। शरीर काँप रहा था। अचानक वो बोला,
“आज नहीं झड़ोगी। मैं कहूँगा तब।”
मेरी उँगलियाँ रुक गईं। “क्यों?” “क्योंकि तुम्हें सिर्फ उँगलियों से राहत नहीं चाहिए। तुम्हें किसी के लंड की आवाज़ चाहिए। उसकी गंध चाहिए। उसका वजन चाहिए।”
मैंने कुछ नहीं कहा। “कल रात बारह बजे फिर कॉल करना। उसी नंबर पर। और उस समय… घर पर होना। अकेली।”
कॉल कट हो गई।
मैं कुर्सी पर बैठी रही। उँगलियाँ अभी भी गीली थीं। जाँघों के बीच धड़कन हो रही थी। स्क्रीन पर टाइमर चल रहा था। शिफ्ट खत्म होने में दो घंटे बाकी थे।
लेकिन दिमाग में सिर्फ एक बात घूम रही थी—
कल रात बारह बजे। उसी आवाज़ ने मुझे उँगलियों से रोक दिया था। और अब शरीर उसी आवाज़ का इंतजार कर रहा था।
अगली रात घर लौटते समय मेरी उँगलियाँ स्टीयरिंग पर बार-बार फिसल रही थीं। शिफ्ट में एक भी कॉल पर ध्यान नहीं दिया था। दिमाग में सिर्फ वही आवाज़ घूम रही थी—“कल रात बारह बजे। घर पर होना। अकेली।”
फ्लैट में घुसते ही लाइटें जलाए बिना दरवाजा बंद किया। पर्दे गिरा दिए। गाउन पहना, अंदर कुछ नहीं। घड़ी में ग्यारह बजकर सैंतालीस मिनट थे। मैं सोफे पर बैठ गई। मोबाइल हाथ में था। नंबर सेव नहीं किया था, लेकिन याद था।
बारह बजते ही मैंने डायल कर दिया। एक रिंग… दो… तीन।
कॉल उठा। “समय पर हो,” आवाज़ आई। पहले जैसी ही भारी।
“हाँ।” “कहाँ हो?” “घर। अकेली।” “क्या पहना है?” “गाउन। अंदर कुछ नहीं।”
वो थोड़ी देर चुप रहा। फिर बोला, “सोफे पर लेट जाओ। टाँगें फैलाओ।”
मैंने वैसा ही किया। गाउन ऊपर खिसक गया। ठंडी हवा ने नंगी चूत को छू लिया। “उँगली मत लगाना आज। सिर्फ सुनना।”
मैंने हाथ रोक लिया। “बोलो काव्या… कल मेरी आवाज़ सुनकर कितनी देर तक सो नहीं पाई?” “बहुत देर तक।” “क्या सोचा?” “तुम्हारे लंड के बारे में। कैसा होगा। कितना मोटा होगा। कैसे पेलोगे।”
वो हल्का सा हँसा। आवाज़ और भारी हो गई। “आज तुम्हें सिर्फ मेरी आवाज़ से झड़ाना है। उँगली की इजाजत नहीं। समझी?”
मैंने गला साफ किया। “हाँ…”
फिर उसकी आवाज़ बदल गई। धीमी। गंदी। बहुत करीब। “कल्पना करो… मैं तुम्हारे फ्लैट में हूँ। दरवाजा बंद है। तुम सोफे पर लेटी हो। मैं तुम्हारे पास खड़ा हूँ। मेरा लंड पहले से तना हुआ है। तुमने अभी तक देखा नहीं। सिर्फ महसूस कर रही हो।”
मेरी साँसें तेज हो गईं। जाँघें अपने आप भींच गईं। “अब मैं घुटनों के बल बैठता हूँ। तुम्हारी टाँगें फैलाता हूँ। साँस तुम्हारी चूत पर पड़ रही है। गरम। तुम काँप रही हो।”
मैंने तकिया दबा लिया। “जीभ निकली। पहले पंखुड़ियाँ चाटीं। फिर क्लिट। धीरे-धीरे। तुमने मेरे बाल पकड़ लिए। कमर उछल रही है। लेकिन मैं रोक रहा हूँ। सिर्फ चाट रहा हूँ। अंदर नहीं जा रहा।”
मेरी कराह निकल गई। “आवाज़ मत रोको। मैं सुनना चाहता हूँ।”
मैंने आँखें बंद कर लीं। उसकी आवाज़ कानों में घुल रही थी। “अब दो उँगली अंदर कर रहा हूँ। तुम्हारी चूत इतनी गीली है कि आवाज़ आ रही है। चप-चप। तुम मेरे मुँह पर पानी छोड़ना चाहती हो। लेकिन मैंने मना किया है। आज सिर्फ आवाज़ से।”
मेरा शरीर काँप रहा था। हाथ अपने आप नीचे जा रहा था। “हाथ मत लगाना काव्या। सिर्फ मेरी आवाज़ से झड़ो। बोलो… कैसा लग रहा है?” “पागल… कर रही हो… बहुत…” “और होगा। कल्पना करो मेरा लंड अब तुम्हारे मुँह में है। गला तक। तुम आँसू बहा रही हो लेकिन चूस रही हो। मैं तुम्हारे बाल पकड़कर मुँह चोद रहा हूँ। गंदी आवाज़ें आ रही हैं।”
मैं करवट लेकर लेट गई। टाँगें और फैलीं। गाउन पूरी तरह ऊपर था। नंगी। अकेली। और किसी अनजान आदमी की आवाज़ से भीग रही थी।
“अब लंड तुम्हारी चूत पर है। रगड़ रहा हूँ। अंदर नहीं डाल रहा। सिर्फ टोपा अंदर-बाहर कर रहा हूँ। तुम पागल हो रही हो। भीख माँग रही हो।” “डालो… प्लीज… डालो…” मेरी आवाज़ टूट गई। “नहीं। आज नहीं। आज सिर्फ आवाज़। झड़ो।”
शरीर ने जवाब दे दिया। एक लंबी कंपकंपी दौड़ गई। मैंने तकिया मुँह पर दबा लिया और काँपते हुए झड़ गई। बिना एक भी उँगली लगाए। सिर्फ उसकी आवाज़ से। पानी जाँघों तक बह निकला।
लाइन पर उसकी साँसें तेज चल रही थीं। “अच्छी लड़की। अब सुनो…”
मैं हाँफते हुए बोली, “क्या?” “कल रात। उसी समय। लेकिन इस बार कॉल नहीं। मैं तुम्हारे फ्लैट के बाहर खड़ा हूँगा। दरवाजा खोलोगी या नहीं… ये तुम्हें तय करना है।”
कॉल कट होने से पहले उसने आखिरी लाइन कही, “अगर दरवाजा खोला… तो फिर सिर्फ आवाज़ नहीं रहेगी। याद रखना।”
लाइन मुर्दा हो गई।
मैं सोफे पर नंगी पड़ी रही। शरीर अभी भी काँप रहा था। जाँघों के बीच उसकी काल्पनिक जीभ और लंड की याद बची हुई थी।
कल रात। दरवाजे के बाहर। एक अनजान आदमी।
और मुझे फैसला करना था—खोलना है… या नहीं।
अगली रात घर पहुँचते ही हाथ काँप रहे थे। शिफ्ट में एक मिनट भी शांत नहीं बैठी थी। बार-बार घड़ी देखी। ग्यारह बजकर पचास मिनट पर मैंने गाउन पहना। अंदर फिर कुछ नहीं। बाल खोले। चेहरा धोया। फिर दरवाजे के पास वाले सोफे पर बैठ गई।
बारह बजे किलिंग पर दस्तक हुई। हल्की। सिर्फ दो बार।
दिल इतनी जोर से धधक रहा था कि कानों में आवाज़ आ रही थी। मैंने दरवाजे तक जाते हुए तीन बार सोचा—मत खोल। पागल हो गई है तू। अनजान आदमी है।
फिर भी हाथ ने हुक खोला।
दरवाजा धीरे से खुला। बाहर अंधेरा था। एक आदमी खड़ा था। कद लंबा। कंधे चौड़े। चेहरा आधी अंधेरे में छुपा हुआ। काला टी-शर्ट। जींस। आँखें मुझे देख रही थीं। वही आवाज़ थी जो दो रातों से मेरे कानों में घुली हुई थी।
“खोल दिया,” उसने सिर्फ इतना कहा।
मैंने दरवाजा और खोला। वो अंदर आ गया। मैंने पीछे से हुक लगा दिया। दोनों हॉल में खड़े थे। रोशनी नहीं जलाई थी। सिर्फ बालकनी से आती हल्की रोशनी में एक-दूसरे को देख रहे थे।
उसने एक कदम बढ़ाया। “डरी हुई हो?” “हाँ।” “फिर भी खोला।” “हाँ।”
वो और करीब आया। उसका हाथ मेरे गाल पर रखा। गरम था। फिर मेरे होठों पर उँगली फेरी। “दो रात से सिर्फ आवाज़ से चोदा तुम्हें। आज शरीर से चोदूँगा।”
मैंने जवाब में कुछ नहीं कहा। बस उसकी टी-शर्ट पकड़कर अपनी तरफ खींच ली। चुंबन भूखा था। दांतों से। जीभ से। उसके हाथों ने गाउन के फीते खोल दिए। गाउन फर्श पर गिर गया। मैं नंगी थी। उसने एक कदम पीछे हटकर मुझे देखा।
“कल्पना से बेहतर हो।”
फिर उसने मुझे सोफे पर धकेल दिया। खुद घुटनों के बल बैठा। मेरी टाँगें फैलाईं। बिना एक शब्द कहे मुँह चूत पर लगा दिया। जीभ ने सीधे क्लिट को पकड़ लिया। मैंने उसके बाल पकड़ लिए। दो रात से उसकी आवाज़ सुन-सुनकर जो भूख बढ़ी थी, अब उसके मुँह से उतर रही थी। वो चाट रहा था जैसे वाकई भूखा हो। उँगली अंदर गई। फिर दो। मैं कमर उछालने लगी।
“आह्ह… वहीं… और…”
उसने सिर उठाया। मुँह चमक रहा था। “आज झड़ने से पहले लंड लेगी।”
वो खड़ा हुआ। बेल्ट खोली। जींस नीचे की। लंड बाहर आया। कल्पना से मोटा। नसें उभरी हुईं। मैंने हाथ बढ़ाकर पकड़ा। गर्म। सख्त। उसने मेरे मुँह के पास लाया। मैंने खुद टोपा मुँह में ले लिया। गला तक धकेला। आँसू आ गए लेकिन रुकी नहीं। उसने बाल पकड़कर धीमे धक्के दिए।
थोड़ी देर बाद उसने लंड निकाला और मुझे उलटा कर दिया। घुटनों के बल। गाँड ऊपर। उसने लंड चूत पर रखा और एक झटके में अंदर तक पेल दिया।
“आह्ह्ह…”
दो रात की भूख एक साथ निकली। वो पेलने लगा। जोर से। बिना रुके। एक हाथ से मेरी कमर पकड़ी हुई थी, दूसरे से बाल। हर धक्के के साथ मेरी साँसें टूट रही थीं।
“बोल… किसकी आवाज़ से भीगी थी कल?” “तेरी… तेरी आवाज़ से…” “और आज?” “तेरे लंड से… फाड़ दे…”
उसने गति और तेज कर दी। शरीर पट-पट की आवाज कर रहा था। मैंने तकिया दबा लिया। वो झुका और मेरे कान में बोला,
“अब झड़। मेरे लंड पर झड़।”
शरीर ने उसी पल जवाब दे दिया। चूत ने उसे जकड़ लिया। मैं काँपते हुए झड़ गई। वो भी रोक नहीं पाया। गरम पानी की धार अंदर छोड़ दी। दोनों एक-दूसरे से चिपके हाँफ रहे थे।
थोड़ी देर बाद उसने लंड बाहर निकाला। मैं करवट लेकर लेट गई। वो मेरे बगल में बैठ गया। उँगली से मेरे बाल हटाते हुए बोला,
“नाम नहीं पूछूँगा। नंबर नहीं दूँगा। जब फिर से आवाज़ चाहिए होगी… तू कॉल करना। वही नंबर।”
मैंने आँखें बंद करके सिर हिलाया।
वो उठा। कपड़े पहने। दरवाजे तक गया। खोलने से पहले मुड़ा और बोला,
“अगली बार जब कॉल करना… तब बताना कि शरीर से संतुष्टि मिली या फिर से सिर्फ आवाज़ चाहिए।”
दरवाजा बंद हो गया।
मैं नंगी सोफे पर पड़ी रही। जाँघों के बीच उसका पानी अभी भी गर्म था। कमरे में उसकी गंध बची हुई थी।
और कानों में… अभी भी वही आवाज़ गूँज रही थी।
