संगिता जान चूत की दुकान | तेल वाली भाभी की चुदाई

मेरा नाम सुशांत है। उम्र चौबीस साल। शहर के पुराने इलाके में एक छोटी फैक्ट्री में अकाउंट्स का काम करता हूँ। घर लौटते समय रोज़ एक तेल की दुकान से गुजरना पड़ता है। बोर्ड पर लिखा है— “संगिता तेल भंडार”।

दुकान की मालकिन संगिता है। उम्र पैंतीस। शादीशुदा। पति का नाम रमेश। वो पास वाली हार्डवेयर की दुकान चलाते हैं। सभ्य आदमी हैं। न ज्यादा बोलते हैं, न किसी से झगड़ा करते हैं। सुबह दुकान खोलते हैं, शाम को बंद करके घर चले जाते हैं। संगिता ज़्यादातर अकेली ही तेल की दुकान संभालती है।

संगिता देखने में साधारण नहीं है। गोरी त्वचा, तेज आँखें, और शरीर ऐसा कि साड़ी में भी छुप नहीं पाता। स्तन भारी हैं, कमर पतली, और चलते समय गाँड का हिलना नजर खींच लेता है। लेकिन वो फ्लर्ट नहीं करती। ग्राहकों से बात सीमित रखती है। मुस्कुराती है, लेकिन सीमा के अंदर।

एक शाम मैं तेल लेने गया। रमेश भैया अपनी दुकान पर थे। संगिता अकेली बैठी तराजू साफ कर रही थी। मैंने बोतल माँगी। उसने तेल तौला और पैसे लिए। लेते-देते हमारी उँगलियाँ छू गईं। उसने जल्दी से हाथ खींच लिया।

“कुछ और चाहिए?” “नहीं।”

मैं निकल गया। लेकिन उस छोटे से स्पर्श के बाद दिमाग में उसकी उँगलियों की गर्माहट रह गई।

दो दिन बाद फिर गया। इस बार बरसात हो रही थी। मैं दुकान के अंदर खड़ा हो गया। संगिता ने तौलिया दिया। “पोंछ लो। भीग गए हो।”

मैंने तौलिया लिया। बातें हल्की हुईं। मौसम की, इलाके की। फिर उसने पूछा, “तुम रोज़ इसी समय गुजरते हो। फैक्ट्री में हो?” “हाँ।” “अकेले रहते हो?” “हाँ। परिवार गाँव में है।”

उसने सिर्फ सिर हिलाया। ज्यादा कुछ नहीं पूछा। लेकिन जब मैं जा रहा था तो उसने कहा, “अगली बार छतरी ले लिया करो।”

छोटी सी बात थी। लेकिन आवाज में एक हल्की सी नमी थी।

एक हफ्ते बाद की बात है। शाम का समय था। रमेश भैया किसी रिश्तेदार के यहाँ गए हुए थे। दुकान पर सिर्फ संगिता थी। मैंने जानबूझकर तेल की जगह सरसों का तेल माँगा जो उनके यहाँ कम बिकता था। उसे बोतल पीछे से लानी पड़ी। झुकते समय साड़ी का पल्लू सरक गया। ब्लाउज का गड्ढा साफ दिख गया। मैंने नजरें घुमा लीं।

संगिता ने पल्लू ठीक किया और बोली, “देख लिया ना? अब बोतल पकड़ो।” आवाज में हल्की झुंझलाहट थी, लेकिन गुस्सा नहीं।

मैंने पैसे देते हुए कहा, “सॉरी।” वो मुस्कुराई। पहली बार थोड़ा खुले अंदाज में। “सॉरी मत कहो। औरत का शरीर है। देखने में बुरा नहीं लगता। लेकिन सीमा का ख्याल रखना।”

उस दिन की बात मेरे दिमाग में घर कर गई।

अगले दिन मैंने तय किया कि सिर्फ तेल लेने नहीं, बात करने रुकूँगा। दुकान पर पहुँचा तो संगिता हिसाब की कॉपी में कुछ लिख रही थी। मैंने साधारण स्वर में कहा, “आजकल व्यापार कैसा चल रहा है?”

वो हैरान हुई। ग्राहक आमतौर पर इतनी बात नहीं करते थे। “ठीक-ठाक। तुम पूछ क्यों रहे हो?” “ऐसे ही। रोज़ आना-जाना रहता है। थोड़ी पहचान हो गई है।”

थोड़ी देर बातें हुईं। फैक्ट्री की, इलाके की महंगाई की। फिर अचानक उसने कहा, “तुम्हारी उम्र में लड़के आमतौर पर सिर्फ देखने आते हैं। बात कम करते हैं।” “मैं वैसा नहीं हूँ।” वो मेरी आँखों में देखती रही। फिर धीमे से बोली, “शायद।”

उस शाम जब मैं निकल रहा था तो उसने पीछे से कहा, “कल अगर समय हो तो रुककर चाय पी लेना। अकेले बैठे-बैठे दिन लंबा लगता है।”

मैंने मुड़कर देखा। उसकी आँखों में थकान थी। और उसके नीचे कुछ और भी—शायद बात करने की इच्छा।

रात को अपने कमरे में लेटे हुए मुझे समझ आ रहा था कि ये सिर्फ चाय की पेशकश नहीं थी। लेकिन संगिता ने कोई सीधा संकेत नहीं दिया था। पति रमेश भैया अच्छे आदमी थे। घर का माहौल भी सामान्य लगते थे। फिर भी मेरी तरफ से जो निगाहें और बातें हो रही थीं, वो सामान्य नहीं रह गई थीं।

अगली शाम चाय पीने का निमंत्रण मेरे दिमाग में घूमता रहा।

और मैं तय नहीं कर पा रहा था कि जाऊँ… या न जाऊँ।

अगली शाम मैं दुकान पर पहुँचा। दिल जोर से धधक रहा था। संगिता अकेली बैठी थी। रमेश भैया की हार्डवेयर दुकान बंद थी। शायद आज जल्दी चले गए थे।

संगिता ने मुझे देखा और हल्की मुस्कान दी। “आ गए। सोचा था शायद न आओ।” “चाय का वादा था।” “हाँ। आओ अंदर।”

वो मुझे दुकान के पीछे वाले छोटे कमरे में ले गई। वहाँ एक छोटा सा स्टोव और दो कुर्सियाँ थीं। उसने चाय बनाई। बातें पहले जैसी सामान्य रहीं—इलाके की, मौसम की, व्यापार की। लेकिन कमरे का माहौल अलग था। बंद जगह। पास-पास कुर्सियाँ। उसकी साड़ी का हल्का इत्र।

चाय पीते-पीते वो अचानक बोली, “तुम रोज़ आते हो। बातें भी करने लगे हो। रमेश को पता चल गया तो क्या सोचेंगे?” “मैं कुछ गलत नहीं कर रहा।” “गलत और सही की सीमा कभी-कभी धुंधली हो जाती है सुशांत।”

उसने मेरी तरफ देखा। आँखों में थकान के साथ एक सवाल भी था। मैंने नजरें नहीं हटाईं। थोड़ी देर सन्नाटा रहा। फिर उसने विषय बदल दिया।

उसके बाद के तीन-चार दिनों में मैं रोज़ शाम को रुकने लगा। कभी चाय, कभी सिर्फ बात। संगिता धीरे-धीरे खुलने लगी। एक दिन उसने बताया कि रमेश बहुत अच्छे आदमी हैं। न कोई बुरी आदत, न कोई शिकायत। घर का ख्याल रखते हैं। लेकिन पिछले दो-तीन साल से दोनों के बीच बातें सिर्फ जरूरत की रह गई हैं। रात को वो थककर सो जाते हैं। वो जागती रहती है।

“अकेलापन होता है,” उसने एक दिन बहुत धीमे से कहा। मैंने कोई जवाब नहीं दिया। बस सुना।

एक शाम बारिश अचानक तेज हो गई। मैं दुकान के अंदर खड़ा था। संगिता ने पर्दा गिरा दिया ताकि पानी अंदर न आए। कमरा और छोटा लगने लगा। दोनों खड़े थे। बातें रुक-रुककर हो रही थीं। अचानक बिजली चली गई। अंधेरा।

“जनरेटर नहीं है,” संगिता बोली। आवाज हल्की काँप रही थी।

अंधेरे में उसकी साँसें करीब महसूस हो रही थीं। मैंने अपना फोन निकाला और टॉर्च ऑन की। रोशनी उसके चेहरे पर पड़ी। बाल थोड़े बिखरे हुए थे। साड़ी का पल्लू एक तरफ सरका हुआ था। गला और हल्का गड्ढा दिख रहा था।

“टॉर्च बंद कर दो,” उसने कहा। मैंने बंद कर दी। अंधेरा फिर से छा गया।

कुछ पल बाद संगिता की आवाज आई, “तुम बहुत करीब खड़े हो।” “जगह कम है।” “फिर भी…”

उसका हाथ मेरी बाजू से छू गया। जानबूझकर या अनजाने में—पता नहीं। मैंने हिलकर जवाब नहीं दिया। फिर उसका हाथ फिर से आया। इस बार मेरी छाती पर। हल्का सा। जैसे जाँच रही हो।

“सुशांत…” “हाँ।” “तुम्हारा दिल जोर से धधक रहा है।”

मैंने उसका हाथ पकड़ लिया। हटाया नहीं। बस पकड़े रहा। अंधेरे में दोनों की साँसें तेज हो गई थीं। संगिता ने हाथ नहीं खींचा। उल्टे उँगलियाँ मेरी उँगलियों में फँस गईं।

“ये गलत है,” उसने फुसफुसाया। “तो छोड़ दो हाथ,” मैंने कहा।

वो नहीं छोड़ी।

बिजली अचानक वापस आ गई। दोनों ने झट से हाथ छोड़ दिए। संगिता ने मुड़कर तौलिया उठाया और व्यस्त होने का नाटक करने लगी। चेहरा लाल था। मैंने भी नजरें घुमा लीं।

“अब जाओ,” उसने बिना मुड़े कहा। “देर हो गई।” मैं निकल आया। लेकिन शरीर में एक अजीब सी बेचैनी रह गई।

अगली शाम मैं फिर गया। संगिता ने इस बार सीधे कहा, “आज चाय नहीं। तुम चले जाओ।” “क्यों?” “कल रात जो हुआ… वो नहीं होना चाहिए था।” “हुआ क्या? सिर्फ हाथ छूए थे।” वो मेरी तरफ मुड़ी। आँखों में गुस्सा और कुछ और था। “सिर्फ हाथ नहीं थे सुशांत। तुम समझते हो। और मैं भी समझती हूँ।”

मैंने एक कदम करीब बढ़ाया। “तो फिर क्यों बुलाया था चाय पर बार-बार?” संगिता चुप रही। उसकी साँसें तेज हो गई थीं। मैंने और एक कदम बढ़ाया। अब बहुत करीब था। उसकी गरमाहट महसूस हो रही थी।

“रमेश अच्छे आदमी हैं,” उसने दोहराया। “मैं जानता हूँ।” “फिर तुम यहाँ क्यों खड़े हो?” “क्योंकि तुमने रोका नहीं।”

संगिता ने आँखें बंद कर लीं। फिर खोलीं। इस बार उनमें हार थी। उसने धीमे से कहा,

“पर्दा गिरा दो।”

मैंने पीछे मुड़कर दुकान का पर्दा गिरा दिया। कमरे में सिर्फ हम दोनों रह गए। संगिता दीवार से लगी खड़ी थी। मैं उसके करीब गया। इस बार उसने दूर नहीं किया। मेरे हाथ उसकी कमर पर रखे। साड़ी के ऊपर से भी गर्माहट आ रही थी।

“एक बार…” उसने फुसफुसाया। “सिर्फ एक बार। फिर कभी नहीं।”

मैंने उसका चेहरा उठाया। होठ बहुत करीब थे।

“झूठ बोल रही हो,” मैंने कहा। “शायद।”

फिर उसके होठ मेरे होठों से छू गए। पहले हल्का सा। फिर गहरा। संगिता की साँसें तेज हो गईं। उसके हाथ मेरी पीठ पर आ गए। चुंबन लंबा होता गया। मेरा हाथ उसकी कमर से सरककर गाँड पर चला गया। साड़ी के ऊपर से भी गोलाई और नरमी साफ महसूस हो रही थी। संगिता ने विरोध नहीं किया। उल्टे अपने शरीर को मेरे शरीर से और सटा दिया।

लंड पूरी तरह तन चुका था। पैंट में धक्का मार रहा था। संगिता के पेट से छू रहा था। उसने महसूस किया। चुंबन तोड़कर धीमे से बोली,

“दरवाजे का हुक लगा दो…”

मैंने दरवाजे का हुक लगा दिया। कमरे में सिर्फ हमारी साँसें थीं। संगिता दीवार से लगी खड़ी थी। चेहरा लाल। आँखों में डर और इच्छा दोनों। मैं उसके करीब गया। दोनों हाथ उसकी कमर पर रखे और फिर से होठों पर चुंबन कर दिया। इस बार गहरा। जीभ से जीभ लड़ी। संगिता की साँसें तेज हो गईं। उसके स्तन मेरे सीने से दब रहे थे।

मैंने साड़ी का पल्लू हटाया। ब्लाउज के हुक खोले। एक-एक करके। ब्लाउज ढीला पड़ा तो मैंने उसे नीचे सरका दिया। ब्रा में बंद भारी स्तन सामने आ गए। मैंने ब्रा के ऊपर से दबाया। संगिता की कराह हल्की सी निकली। फिर ब्रा के हुक खोले। स्तन मुक्त हो गए। गोरे, भारी, और निप्पल कड़े। मैंने एक निप्पल मुँह में लिया और जोर से चूसा।

“आह्ह… सुशांत… धीरे…”

मैंने दोनों स्तनों को बारी-बारी चूसा। दाँतों से हल्का काटा। संगिता के हाथ मेरे बालों में फँस गए। मैंने साड़ी का नाड़ा खोला। साड़ी नीचे गिर गई। सिर्फ पेटीकोट और पैंटी में खड़ी थी। पेटीकोट भी खींचकर नीचे कर दिया। अब सिर्फ पैंटी। मैंने पैंटी के ऊपर से उसकी चूत पर हाथ रखा। गरम और थोड़ी गीली।

संगिता ने मेरी पैंट का बटन खोला। जिपर नीचे किया। लंड बाहर निकल आया। तना हुआ। उसने हाथ में लिया और धीरे-धीरे ऊपर-नीचे किया।

“कितना सख्त है…”

मैंने उसे धीरे से फर्श पर बिछाए हुए बोरे पर लिटा दिया। पैंटी खींचकर निकाल दी। उसकी चूत सामने थी। थोड़ी बालों वाली। मैंने जाँघें फैलाईं और मुँह के पास ले गया। पहले हल्के से चाटा। फिर क्लिट पर जीभ घुमाई। संगिता की कमर उछल गई।

“आह्ह… वहाँ… और…”

मैंने जीभ अंदर तक घुसाई। चूत का पानी चाटने लगा। दो उँगलियाँ अंदर डालीं और चूसता रहा। संगिता दोनों हाथों से मेरा सिर दबा रही थी। उसकी कराहें दबी-दबी निकस रही थीं।

थोड़ी देर बाद वो खुद मुझे खींचकर ऊपर ले आई। “अब अंदर डालो… बर्दाश्त नहीं हो रहा…”

मैंने लंड उसके चूत के मुँह पर रखा। धीरे-धीरे धक्का दिया। गरम और टाइट दीवारें लंड को कस रही थीं। पूरा अंदर जाते ही दोनों रुक गए। संगिता की आँखें बंद थीं।

“हरकत करो…” उसने फुसफुसाया।

मैंने धीरे-धीरे पेलना शुरू किया। हर धक्के के साथ उसके स्तन हिल रहे थे। मैंने झुककर निप्पल मुँह में लिए और चूसते हुए गति बढ़ाई। संगिता की नाखून मेरी पीठ पर चल रहे थे।

“तेज… और तेज करो…”

मैंने टाँगें उसके कंधों पर रखीं और गहराई तक मारने लगा। चूत की आवाज आने लगी। गीली-गीली। संगिता खुलकर कराह रही थी।

“सुशांत… बहुत गहरा… आह्ह… वहाँ… मत रोको…”

मैंने उसकी गाँड के नीचे हाथ डालकर और ऊपर उठाया। लंड पूरा अंदर जा रहा था। संगिता की आँखें में आँसू आ गए थे। मजे के।

“मैं… मैं झड़ने वाली हूँ…” “साथ में,” मैंने कहा।

कुछ और जोरदार धक्कों के बाद संगिता का शरीर अकड़ गया। चूत ने लंड को जोर से जकड़ लिया। मैं भी उसी समय झड़ गया। गरम वीर्य की धार उसके अंदर छूटने लगी। दोनों काँप रहे थे।

थोड़ी देर हम वैसे ही पड़े रहे। साँसें धीमी होने में समय लगा। फिर मैंने लंड बाहर निकाला। वीर्य उसकी जाँघों पर बहने लगा। संगिता ने आँखें खोलीं। चेहरे पर थकान और संतुष्टि दोनों थी।

“कपड़े पहनो,” उसने धीमे से कहा। “कोई आ सकता है।”

हम दोनों चुपचाप कपड़े पहनने लगे। संगिता ने साड़ी संभाली। ब्लाउज के हुक लगाए। फिर मुड़कर मेरी तरफ देखा।

“ये सिर्फ आज की बात थी सुशांत। कल से फिर से ग्राहक और दुकानदार।” मैंने सिर हिलाया। “समझ गया।”

लेकिन दोनों जानते थे कि ये झूठ था।

मैं पर्दा हटाकर बाहर निकला। सड़क पर अंधेरा हो चुका था। पीछे मुड़कर देखा तो संगिता दरवाजे पर खड़ी थी। पल्लू से मुँह ढँके। आँखों में वो बात थी जो आज से पहले कभी नहीं थी।

उस रात के बाद मैं दुकान पर पहले से ज्यादा जाने लगा। कभी तेल के बहाने, कभी बिना बहाने। रमेश भैया जब अपनी दुकान पर होते तो सिर्फ नमस्ते होती। जब अकेली होती… तो पर्दा गिर जाता।

और धीरे-धीरे संगिता की दुकान में तेल के अलावा एक और चीज बिकने लगी। खुद संगिता जान।

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