चूत से चुकाया किराया | संगीता की मजबूरी

मेरा नाम संगीता है। उम्र अब उनतीस साल की हो चली है। कभी-कभी खुद को आईने में देखती हूँ तो यकीन नहीं होता कि शादी को इतने साल हो गए। शादी हुई थी सिर्फ सत्रह साल की उम्र में। गाँव में तब यही रिवाज था। पढ़ाई छूट गई, ससुराल आ गई। पति रमेश तब ठीक-ठाक लगता था। थोड़ा बहुत कमाता था, बातें भी करता था। लेकिन शादी के तीन-चार साल बाद ही शराब ने उसे ऐसा जकड़ा कि अब वो इंसान कम, नशेड़ी ज्यादा लगने लगा। जो भी पैसे आते, आधा ठेके पर ही रह जाता। घर में दो बच्चे हैं। बेटा गौरव आठ साल का हो गया है, बेटी अंजलि पाँच की। दोनों को स्कूल भी भेजना पड़ता है, खाना भी देना पड़ता है। ऊपर से किराया। कहाँ से भेंटा करें इतना सब।

हम रहते हैं शहर के एक पुराने इलाके में। मकान छोटा सा है, दो कमरे और एक रसोई। मकान मालिक का नाम संजय है। उम्र उनका छियालीस-सैंतालीस के बीच होगी। पत्नी है उनकी, नाम सुनते हुए कानों में पड़ा है—सुनीता। दो बच्चे भी हैं, दोनों कॉलेज जाते हैं। यानी पूरा परिवार है। संजय खुद पास ही एक छोटी सी किराने की दुकान चलाते हैं। देखने में साधारण आदमी हैं, पेट थोड़ा निकला हुआ, बाल पतले होते जा रहे हैं, लेकिन आँखों में एक चालाकी हमेशा रहती है। किराया सात हजार है। पिछले तीन महीने से हमसे एक भी रुपया नहीं चुका। पहले महीने उन्होंने हल्के से याद दिलाया, दूसरे महीने थोड़ा सख्त हुए, तीसरे महीने अब साफ कहने लगे कि या तो पैसे दो, नहीं तो मकान खाली करो।(#hindi sex katha, )

रमेश जब भी घर में होता, संजय के सामने हाथ जोड़ता और वादा करता कि अगले हफ्ते तक पूरे पैसे जमा कर देगा। लेकिन पैसे आते ही शराब में उड़ जाते। मैं सब कुछ देखती रहती। बच्चों के सामने झगड़ा नहीं करती, लेकिन रात को जब रमेश नशे में धुत होकर खर्राटे लेने लगता, तो मैं आँखें खोले लेटी रहती। मन में एक ही सवाल घूमता—अब कितने दिन और इस तरह चलेगा? मकान निकल गया तो बच्चे कहाँ रहेंगे? स्कूल कैसे जाएँगे?

एक मंगलवार की दोपहर थी। बच्चे स्कूल चले गए थे। रमेश सुबह-सुबह ही निकला था, शायद फिर किसी अड्डे पर होगा। मैं घर में अकेली बैठी पुरानी साड़ी के किनारे सही कर रही थी कि दरवाजे पर दस्तक हुई। संजय खड़े थे। हाथ में कोई बैग नहीं था, बस चेहरे पर वही गंभीर भाव।

“संगीता, घर में हो क्या? थोड़ा समय है?” “हाँ… आइए संजय जी।”

वो अंदर आए। मैंने जल्दी से कुर्सी पोंछी और पानी का गिलास दिया। वो बैठ गए, पानी पिया, फिर सीधे बात पर आए। “तीन महीने पूरे हो गए। अब और टालने का कोई मतलब नहीं। या तो इस हफ्ते तक पैसे जमा करो, या फिर मकान खाली करने की तैयारी रखो। मेरी भी मजबूरी है। घर का खर्च चलाना पड़ता है, बच्चों की फीस है।”

उनकी बात सुनकर मेरे पेट में जैसे कुछ गिर गया। आवाज मेरी काँप गई। “संजय जी, इस महीने जरूर कुछ न कुछ हो जाएगा। रमेश ने कहा है कि उसके एक रिश्तेदार से पैसे आने वाले हैं…” “रमेश की बातों का अब कोई वजन नहीं बचा,” उन्होंने मेरी बात काटते हुए कहा। आवाज में थकान थी। “मैंने काफी लगा लिया। अब नहीं लगा सकता।”

मैं चुप हो गई। आँखों में आँसू आ गए लेकिन मैंने उन्हें रोकने की कोशिश की। बच्चों का चेहरा आँखों के सामने घूम गया। गौरव की स्कूल ड्रेस, अंजलि की छोटी-छोटी चप्पलें… सब कुछ डगमगा रहा था। संजय कुछ देर तक चुपचाप मुझे देखते रहे। फिर उनकी आवाज थोड़ी बदल गई।

“तुम बहुत परेशान हो रही हो। यह मैं देख सकता हूँ। बैठो तो सही।”

मैंने कुर्सी के किनारे बैठना ठीक समझा। वो मेरी तरफ देख रहे थे। उनकी निगाह मेरे चेहरे पर थी, फिर धीरे-धीरे नीचे सरककर मेरे गले पर आई, फिर साड़ी के पल्लू के किनारे पर। मैंने पल्लू खींचकर छाती ढक ली। लेकिन उन्होंने नजरें नहीं हटाईं।

“संगीता, तुम्हारे पास पैसे नहीं हैं। यह बात साफ है। मकान खाली करना भी तुम्हारे लिए आसान नहीं। बच्चे छोटे हैं। मैं भी कोई बेदर्द आदमी नहीं हूँ। लेकिन… कोई और तरीका निकाले बिना अब काम नहीं चलेगा।”

मेरा दिल जोर से धड़कने लगा। उनकी बात का मतलब समझने में देर नहीं लगी। लेकिन साफ शब्दों में सुनने की हिम्मत नहीं हो रही थी। “क्या कहना चाह रहे हैं आप?” मैंने हिम्मत करके पूछा। आवाज बहुत धीमी निकल पाई।

संजय थोड़ी देर चुप रहे। फिर आवाज और धीमी करके बोले, “तुम समझदार औरत हो। मैं भी आदमी हूँ। घर में पत्नी है, बच्चे हैं, लेकिन… कभी-कभी कुछ जरूरतें रह जाती हैं जो घर में पूरी नहीं हो पातीं। अगर तुम… मेरी वो जरूरत पूरी कर दो, तो किराये के पैसे… माफ किए जा सकते हैं। हर महीने।”

कमरे में जैसे हवा ठहर गई हो। मैं उनकी बात सुनकर हिल नहीं पा रही थी। इतने साफ और सीधे तरीके से किसी ने मुझे पहले कभी नहीं कहा था। अंदर गुस्सा उछला, शर्म से चेहरा जलने लगा, और उसके नीचे एक भारी मजबूरी बैठ गई। बच्चों की याद आई। स्कूल की फीस, राशन का तेल, दाल… और सिर पर छत।

“मैं शादीशुदा हूँ संजय जी,” मैंने धीमे से कहा। “मेरे बच्चे हैं।” “मुझे पता है। इसीलिए यह बात यहीं की यहीं रहेगी। न तुम्हारा पति जानेगा, न मेरी पत्नी, न कोई और। सिर्फ हम दोनों।”

मैंने सिर उठाकर उनकी आँखों में देखा। उनमें कोई खुली क्रूरता नहीं थी। बस एक साफ हिसाब-किताब था, और उसके नीचे हल्की सी भूख भी। मैंने साड़ी का पल्लू फिर से कसकर पकड़ लिया। मन के अंदर दो आवाजें लड़ रही थीं। एक कह रही थी—संगीता, तू गिर रही है। इज्जत का क्या होगा। दूसरी आवाज कह रही थी—बच्चे कहाँ जाएँगे? मकान निकल गया तो सड़क पर सोएँगे क्या?

“मुझे… सोचने का थोड़ा समय दीजिए,” मैंने कहा। संजय ने सिर हिलाया। “दो दिन। उससे ज्यादा नहीं दे सकता। फिर फैसला तुम्हें खुद करना होगा।”

वो उठे और चले गए। दरवाजा बंद होते ही मैं वहीं फर्श पर बैठ गई। आँसू अब नहीं रुक रहे थे। कितनी नीचे गिर गई हूँ मैं। पहले पति की शराब ने जिंदगी बर्बाद की, अब मकान मालिक ये बात कह रहा है। लेकिन सबसे ज्यादा डरावना तो यह था कि अंदर कहीं कोई बहुत छोटा सा हिस्सा इस प्रस्ताव को पूरी तरह से नकार नहीं रहा था। शरीर की कोई पुरानी भूख भी थी। रमेश अब महीनों से छूता तक नहीं था। नशे में आकर सो जाता था। कब से किसी ने मुझे औरत की तरह छुआ था?

रात को रमेश जब लौटा तो पूरा नशे में धुत था। उसने खाना माँगा। मैंने चुपचाप परोस दिया। बच्चों को सुलाया। फिर रसोई के कोने में जाकर बैठ गई। मन में संजय की आवाज बार-बार घूम रही थी। उनकी निगाह, उनका साफ प्रस्ताव, और वो दो दिन का समय।

अगले दिन सुबह बच्चों को स्कूल पहुँचाकर आई। आईने के सामने खड़ी हुई। उनतीस साल का चेहरा थका हुआ लग रहा था। आँखों के नीचे हल्के काले घेरे। लेकिन शरीर अभी भी संभला हुआ था। मैंने साड़ी बदली। थोड़ा सा साफ कपड़ा पहना। खुद को देखकर शर्म आई। क्या मैं सच में ये सब सोच रही हूँ? क्या मैं इतनी गिर चुकी हूँ?

दोपहर को संजय फिर से आए। इस बार उन्होंने किराये की बात दोहराई। मैं चुपचाप सुनती रही। जब वो जाने वाले हुए तो मैंने हिम्मत करके आवाज निकाली, “संजय जी… कल… कल मैं बताऊँगी। जो आपने कहा था… उसके बारे में।”

वो रुक गए। मेरी तरफ मुड़े। उनकी आँखों में हल्की सी चमक थी। “ठीक है। कल इंतजार रहेगा। सोच-समझकर फैसला लेना।”

वो चले गए। लेकिन जाने से पहले उनकी निगाह एक बार फिर मेरे शरीर पर धीरे से घूमी। इस बार मैंने पल्लू नहीं खींचा। जानबूझकर नहीं खींचा। अंदर कुछ टूट रहा था। इज्जत वाली संगीता और मजबूरी वाली संगीता एक-दूसरे से लड़ रही थीं। और लग रहा था कि मजबूरी वाली संगीता धीरे-धीरे लेकिन पक्के तौर पर जीत की तरफ बढ़ रही है।

रात भर नींद नहीं आई। सुबह होते-होते मन लगभग तय हो चुका था। बच्चों की वजह से। छत की वजह से। और हाँ, शरीर की उस दबी हुई भूख की वजह से भी, जिसे मैं अब और झुठला नहीं पा रही थी।

अगली सुबह बच्चे स्कूल चले गए। रमेश भी किसी बहाने घर से निकल चुका था। मैं अकेली थी। रात भर जितना सोचा था, उतना ही मन उलझा रह गया था। लेकिन अब पीछे हटने का कोई रास्ता नहीं दिख रहा था। किराया नहीं भरा तो मकान से हाथ धोना पड़ेगा। बच्चों को कहाँ ले जाऊँगी? इसी उलझन में बैठी थी कि दरवाजे पर फिर दस्तक हुई। संजय थे।

संजय ने दरवाजा बंद किया और मेरी तरफ बढ़ा। मेरा दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। शरीर काँप रहा था लेकिन मैं हटी नहीं। उसने मेरा पल्लू एक झटके में हटा दिया और कमर से खींचकर अपने करीब कर लिया। उसका मुँह मेरे मुँह पर आ गया। चुंबन में कोई नमी नहीं थी, बस एक भूखी जल्दी थी। उसकी जीभ मेरे होठों को खोलती हुई अंदर घुस आई। मैंने आँखें बंद कर लीं। इतने सालों बाद किसी और मर्द का स्वाद। रमेश के नशे भरे मुँह से बिल्कुल अलग।

उसके हाथ पीछे जाकर मेरे ब्लाउज के हुक खोलने लगे। एक… दो… तीन। ब्लाउज ढीला पड़ गया। उसने उसे नीचे सरका दिया। मेरी छातियाँ बाहर आ गईं। संजय ने दोनों को अपने मोटे हाथों में ले लिया और जोर से मसला। निप्पल उसके हथेलियों के नीचे दब गए। फिर उसने झुककर एक निप्पल मुँह में ले लिया और जोर से चूसने लगा। दाँतों से हल्का काटा। मेरे मुँह से कराह निकल गई।

“आह्ह… छोड़ो… दर्द हो रहा है…” “सह ले। आज से तेरी ये चूचियाँ भी किराये में शामिल हैं,” उसने मुँह हटाकर कहा और दूसरी छाती पर टूट पड़ा।

मैं दीवार के सहारे खड़ी काँप रही थी। संजय ने मेरी साड़ी और पेटीकोट एक साथ नीचे गिरा दिए। अब मैं सिर्फ पैंटी में थी। उसने पैंटी के अंदर हाथ डाल दिया। उसकी मोटी उँगली सीधे मेरी चूत पर जा लगी। “हम्म… सूखी तो नहीं है। थोड़ी गीली हो रही है।”

मुझे शर्म से गर्दन झुका लेना था लेकिन शरीर झूठ नहीं बोल रहा था। उसने पैंटी नीचे खींच दी। मैं पूरी नंगी हो गई। संजय ने मुझे धक्का देकर बिस्तर पर गिरा दिया। खुद खड़े-खड़े पैंट और बनियान उतारे। उसका लंड बाहर निकल आया—मोटा नहीं, लेकिन सख्त खड़ा था। नसें फूली हुई थीं। करीब छह इंच। उसने मेरे बाल पकड़कर सिर उठाया।

“मुँह खोल।”

मैंने हिचकिचाते हुए मुँह खोला। उसने अपना लंड मेरे होठों पर रगड़ा, फिर अंदर ठेल दिया। गला भर गया। आँखों में आँसू आ गए। संजय ने मेरे सिर को पकड़कर धीरे-धीरे आगे-पीछे करने लगा। “चूस… किराया चुकाना है तो ठीक से चूस…”

मैंने आँखें बंद करके उसकी बात मानी। जीभ घुमाई, थूक से गीला किया। कुछ देर तक वो मेरे मुँह में ही खेलता रहा। फिर अचानक लंड निकाल लिया और मुझे उलटा कर दिया। पेट के बल लिटाकर मेरे कूल्हे ऊपर कर दिए।

“गाँड ऊँची कर। चूत दिखा।”

मैंने शर्म के मारे चेहरा चादर में छुपा लिया। उसने मेरे दोनों लोथड़े फैलाए और अपना लंड मेरी चूत के मुँह पर रखा। एक जोर का धक्का दिया। आधा लंड अंदर घुस गया। दर्द से मेरी सिसकी निकल गई। उसने बिना रुके दूसरा धक्का मारा। पूरा लंड मेरी चूत में धँस गया।

“आह्ह्ह… धीरे… फट जाएगी…” “फटने दे। तीन महीने का किराया एक साथ वसूल रहा हूँ,” उसने कहा और कमर चलाने लगा।

पहले धीरे, फिर तेज। हर धक्के के साथ मेरी चूत की आवाज निकलने लगी—चप-चप-चप। बिस्तर की चरमराहट और उसकी भारी साँसें कमरे में गूँज रही थीं। उसने मेरी कमर पकड़ रखी थी और जोर-जोर से ठोक रहा था। मेरी छातियाँ बिस्तर से रगड़ खा रही थीं। निप्पल जल रहे थे।

“बोल… कैसा लग रहा है?” “दर्द… हो रहा है…” “दर्द सह। आगे जाकर मजा भी आने लगेगा।”

वो सच कह रहा था। कुछ देर बाद दर्द कम होने लगा। उसकी हर धक्के के साथ अंदर एक गरमाहट फैलने लगी। मैंने अपनी मर्जी से कमर नहीं हिलाई, लेकिन शरीर थोड़ा-थोड़ा जवाब देने लगा। संजय ने मेरा बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा और और तेज कर दिया।

“आज से यह चूत मेरी है। हर महीने। समझी?” मैंने सिर्फ हाँ में सिसकी भरी।

वो पागलों की तरह पेल रहा था। मेरी चूत पूरी तरह खुल चुकी थी। अचानक उसने लंड बाहर निकाला, मुझे पलटा और फिर से ऊपर से घुसा दिया। इस बार मेरी जाँघें उसके कंधों पर थीं। वो गहराई तक जा रहा था। मैंने चादर को दोनों हाथों से पकड़ रखा था। आँखों से आँसू बह रहे थे—दर्द के भी, मजे के भी, और अपनी गिरती इज्जत के भी।

“मैं झड़ने वाला हूँ… अंदर ही छोड़ूँगा,” उसने हाँफते हुए कहा। मैंने कुछ नहीं कहा। कुछ तेज धक्कों के बाद उसका शरीर अकड़ गया। गर्म वीर्य की धार मेरे अंदर छूटने लगी। एक… दो… तीन। मैं महसूस कर सकती थी कि वो मेरे अंदर भर रहा है। संजय कुछ पल वैसे ही पड़ा रहा, फिर लंड बाहर निकाला। मेरी चूत से उसका पानी धीरे-धीरे बाहर बहने लगा। जाँघों तक फैल गया।

वो बिस्तर के किनारे बैठ गया। पसीने से तर। मैं लेटी रही। पैर फैले हुए। चूत में जलन हो रही थी। संजय ने अपनी पैंट पहनी, कमीज के बटन लगाए और मेरे तरफ देखकर बोला,

“आज से हर महीने इसी तरह। कभी मना मत करना। किराया माफ रहेगा। और हाँ… अगली बार मुँह से भी ठीक से लेना। आज तो बस आजमाया है।”

मैंने सिर मोड़ लिया। जवाब देने की ताकत नहीं थी। वो दरवाजा खोलकर चला गया। मैं वैसे ही लेटी रही। छत को देखती रही। जाँघों के बीच उसकी गंदगी सूख रही थी। आँखों में आँसू थे, लेकिन मन में एक अजीब सुकून भी था। मकान बच गया था। बच्चों की छत बच गई थी।

लेकिन कीमत मैंने अपनी चूत से चुकाई थी। और अब हर महीने चुकानी थी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *