मेरा नाम रोहन है। उम्र चौबीस। शहर की नौकरी छोड़कर गाँव आया हूँ दस दिन के लिए। घर पुराना है। पीछे एक छोटा सा टूटा-फूटा कमरा है जहाँ मैं सामान रखकर अकेला सोता हूँ। मम्मी-पापा दिन भर खेत और रिश्तेदारों में व्यस्त रहते हैं।
सुमन आंटी हमारे घर से ठीक पीछे रहती हैं। फूफा जी के निधन के बाद अकेली। उम्र बयालीस के आसपास। देसी औरत। साड़ी हमेशा सादी। बाल बांधे हुए। चेहरे पर कोई मेकअप नहीं। लेकिन शरीर उनका गाँव की औरतों जैसा नहीं। जब वो चलती हैं तो साड़ी के नीचे से गाँड की भारी गोलाई साफ झलकती है। ब्लाउज हमेशा टाइट लगता है। स्तन भारी हैं, छुपाए नहीं छुपते।
पहले तीन दिन कुछ खास नहीं हुआ। आंटी सुबह दूध देने आतीं। नमस्ते करतीं। कभी-कभी मुस्कुरा देतीं। बातें कम। लेकिन एक बात बार-बार नजर आती—जब वो मेरे सामने झुकतीं तो ब्लाउज का गड्ढा गहरा हो जाता और उनकी निगाहें मेरे चेहरे पर कुछ पल ज्यादा ठहर जातीं।
चौथे दिन दोपहर की बात है। घर पर कोई नहीं था। मैं पीछे वाले कमरे में पंखा चलाकर लेटा था। नहाकर निकला था। तौलिया कमर में बांधे। तभी आंटी आईं। हाथ में कोई जड़ी-बूटी का पैकेट।
“रोहन… ये तुम्हारी मम्मी के लिए छोड़ा है। वो नहीं मिलीं।”
मैंने पैकेट लिया। तौलिया थोड़ा ढीला था। आंटी की नजर मेरे सीने से होती हुई नीचे गई। तौलिया के उभार पर। एक पल के लिए रुकीं। फिर उन्होंने नजरें हटा लीं।
“शहर में जिम जाता है?” “हाँ।” “दिखता है।”
वो जाने वाली थीं। लेकिन दरवाजे पर रुक गईं। पीठ मेरे तरफ थी। बोलीं,
“तौलिया सही से बांध लिया कर। गाँव में लोग देख लेते हैं।”
मैंने कुछ नहीं कहा। आंटी चली गईं। लेकिन उनके जाने के बाद भी कमरे में उनकी गंध रह गई—साबुन और हल्की पसीने की।
रात को नींद नहीं आई। बार-बार वो वाली नजर याद आ रही थी जो तौलिया पर ठहरी थी। लंड तन गया। मैंने कुछ नहीं किया। बस लेटा रहा।
पाँचवें दिन सुबह आंटी फिर आईं। इस बार दूध का गिलास लेकर। “पियो। शहर वाला दूध नहीं होता।”
मैंने गिलास पकड़ा। उनकी उँगलियाँ मेरे हाथ से छू गईं। इस बार उन्होंने हाथ जल्दी नहीं हटाया। हल्के से दबाया। फिर छोड़ा।
“तुम्हारे फूफा जी भी ऐसे ही थे। चुप। लेकिन आँखों में बात रखते थे।”
मैंने दूध पी लिया। आंटी मेरे पास वाली चारपाई पर बैठ गईं। साड़ी का पल्लू ठीक करते हुए बोलीं,
“रात को जागता है तू। रोशनी जलती दिखती है।” “नींद नहीं आती कभी-कभी।” “अकेले में नींद कम आती है। मुझे भी यही होता है।”
बात यहीं खत्म हो जानी चाहिए थी। लेकिन आंटी उठीं नहीं। उनकी साँसें थोड़ी तेज लग रही थीं। कमरे में पंखा चल रहा था। तौलिया अभी भी कमर में था। आंटी ने अचानक पूछा,
“शहर में कोई है?” “नहीं।” “तो शरीर कैसे शांत करता है?”
सवाल सीधा था। मैंने जवाब नहीं दिया। आंटी ने मेरी तरफ देखा। आँखों में शर्म नहीं थी। सिर्फ एक थकी हुई सी जिज्ञासा थी।
“दिखा,” उन्होंने बहुत धीमे से कहा। “क्या?” “जो तौलिया के नीचे है। दिखा।”
मैंने तौलिया खोला। लंड बाहर आ गया। आधा तना हुआ। आंटी की नजर वहीं ठहर गई। उन्होंने कोई टिप्पणी नहीं की। बस देखती रहीं। फिर उठकर मेरे करीब आईं।
“छूऊँ?”
मैंने सिर हिलाया। आंटी का हाथ मेरे लंड पर रखा। ठंडा था पहले। फिर गरम हो गया। हल्के से ऊपर-नीचे किया। लंड पूरी तरह तन गया। सात इंच। मोटा। आंटी की साँसें भारी हो गईं।
“बाप रे…” उन्होंने सिर्फ इतना कहा।
फिर वो घुटनों के बल बैठ गईं। लंड को करीब से देखा। उँगली से टोपा सहलाया। एक बूँद पानी निकल आया। आंटी ने उसे उँगली पर लिया और अपने होंठों पर लगा लिया।
“कड़वा है,” उन्होंने कहा। फिर मुस्कुराईं।
उसके बाद उन्होंने अपना मुँह खोला और टोपा अंदर ले लिया। सिर्फ टोपा। जीभ घुमाई। फिर धीरे-धीरे और अंदर लिया। मैंने उनके बाल नहीं पकड़े। बस देखा। आंटी का गला भर गया। आँखों में पानी आ गया। लेकिन उन्होंने लंड बाहर नहीं निकाला। गले तक ले गईं।
एक पल के लिए पूरा लंड उनके मुँह और गले में समाया रहा। फिर उन्होंने बाहर निकाला। लार की लाइन लंड से उनके होंठ तक जुड़ी थी।
“गले तक चला गया,” उन्होंने साँस लेते हुए कहा। “हाँ।” “कल फिर आना। दोपहर को। घर पर कोई नहीं होगा।”
आंटी उठीं। साड़ी ठीक की। मेरी तरफ एक बार देखा। “तौलिया बांध ले। ठंड लग जाएगी।”
वो चली गईं।
मैं वैसे ही खड़ा रहा। लंड अभी भी तना हुआ था। गले तक लंड लेने वाली आंटी की आँखों में पानी और उनके होंठों पर लार की चमक याद आ रही थी।
अगले दिन दोपहर का समय था। घर पर सच में कोई नहीं था। मम्मी-पापा रिश्तेदारों के यहाँ गए थे। मैं पीछे वाले कमरे में इंतजार कर रहा था। तौलिया की जगह इस बार सिर्फ पैंट पहनी थी।
आंटी आईं। सादी साड़ी में। पल्लू कसकर बांधा हुआ। लेकिन आँखों में कल वाली बात साफ थी। उन्होंने दरवाजा बंद किया और सीधे मेरे पास आईं।
“निकाल,” उन्होंने फिर वही कहा।
मैंने पैंट खोली। लंड पहले से तना हुआ बाहर आ गया। आंटी ने इसे देखा और बिना एक शब्द कहे घुटनों के बल बैठ गईं। उन्होंने लंड दोनों हाथों में पकड़ा और टोपा मुँह में ले लिया। इस बार जल्दबाजी नहीं थी। धीरे-धीरे चाटा। जीभ से नसें सहलाईं। फिर गला खोलकर लंड को अंदर लेना शुरू किया।
आधा… फिर और… फिर गले तक।
मेरा लंड उनके गले में पूरी तरह समा गया। आंटी की आँखों में पानी आ गया। लेकिन उन्होंने बाहर नहीं निकाला। दस-बारह सेकंड तक वैसा ही रखा। फिर धीरे-धीरे बाहर खींचा। लार की मोटी लाइन लंड से उनके होंठ तक जुड़ी थी। वो साँस लेने के लिए रुकीं। फिर से मुँह में ले लिया।
इस बार उन्होंने गति बढ़ा दी। सिर आगे-पीछे होने लगा। गला चोदने की आवाज़ आने लगी—घप-घप। थूक बहकर उनके स्तनों पर गिर रहा था। मैंने उनके बाल पकड़ लिए। आंटी ने विरोध नहीं किया। उल्टे अपना मुँह और ढीला छोड़ दिया ताकि लंड आसानी से गले तक जा सके।
“आंटी… गला… पूरी…” उन्होंने जवाब में सिर्फ गले की आवाज़ निकाली और लंड को और गहराई तक ले गईं। नाक मेरी जाँघ से छू रही थी। पूरा लंड उनके मुँह और गले में था।
थोड़ी देर बाद उन्होंने लंड निकाला। हाँफ रही थीं। होठ लाल और चमक रहे थे। “बैठ जा,” उन्होंने कहा।
मैं चारपाई पर बैठ गया। आंटी मेरे घुटनों के बीच में आ गईं। उन्होंने फिर से लंड मुँह में लिया। इस बार दोनों हाथों से मेरे अंडकोष सहलाते हुए चूसने लगीं। कभी सिर्फ टोपा, कभी आधा, कभी पूरा गले तक। हर बार जब लंड गले में जाता तो उनकी आँखों से पानी की बूँदें निकलतीं, लेकिन वो रुकीं नहीं।
मैंने उनका ब्लाउज ऊपर कर दिया। भारी स्तन बाहर आ गए। आंटी ने लंड मुँह से निकाले बिना ही अपने स्तनों को मेरे लंड पर रगदना शुरू कर दिया। फिर फिर से मुँह में ले लिया। अब वो स्तनों के बीच लंड रगदते हुए कभी-कभी गले तक ले जा रही थीं।
“आंटी… मैं ज्यादा देर नहीं रोक पाऊँगा…” उन्होंने लंड बाहर निकाला और बोलीं, “रोक। अभी नहीं। मैंने कहा था गले तक लूँगी… पूरा हिसाब चुकता करना है।”
फिर से मुँह में लिया। इस बार उन्होंने मेरा हाथ अपने सिर पर रखा। इशारा साफ था—धक्के मारो। मैंने उनके बाल पकड़कर धीमे-धीमे मुँह चोदना शुरू किया। आंटी ने गला पूरा खोल दिया। लंड बार-बार गले में समा रहा था। थूक की आवाज़ तेज हो गई। उनकी आँखों से लगातार पानी बह रहा था। नाक से साँस ले रही थीं। लेकिन मुँह नहीं हटाया।
मैं पागल हो रहा था। “आंटी… गला फट जाएगा…” उन्होंने लंड बाहर निकाला। लार मुँह से टपक रही थी। “फटने दे… गाँव वाली आंटी तेरा लंड गले तक ले रही है… मजा आ रहा है न?”
फिर से ले लिया। अब गति और तेज थी। वो खुद सिर झटके से आगे-पीछे कर रही थीं। कभी लंड को गले में रोक लेतीं, कभी बाहर निकालकर टोपा चाटतीं, फिर से गले तक ले जातीं। मेरे अंडकोष उनके हाथ में थे। वो हल्के से दबा रही थीं।
अचानक उन्होंने लंड गले में ही रखा और मेरी जाँघें पकड़ लीं। इशारा था—झड़। मैंने उनके बाल और जोर से पकड़े और गले में ही छोड़ दिया। गरम वीर्य की धार सीधे उनके गले में गई। आंटी ने सब निगल लिया। एक बूँद भी बाहर नहीं आने दी। लंड साफ होने तक मुँह में रखा। फिर धीरे-धीरे बाहर निकाला।
वो उठीं। होठ सूजे हुए। आँखें लाल। स्तन अभी भी बाहर। लार और वीर्य की चमक उनके होंठों पर थी।
“आज सिर्फ गला,” उन्होंने साँस लेते हुए कहा। “कल… चूत भी लूँगी। और फिर से गला भी।”
मैं अभी भी चारपाई पर बैठा था। लंड आधा तना हुआ। आंटी ने ब्लाउज ठीक किया। पल्लू व्यवस्थित किया। जाते-जाते मुड़ीं और बोलीं,
“रात को सोते समय याद रखना… तेरा लंड मेरे गले में कितनी बार गया।”
वो चली गईं।
कमरे में उनकी गंध और गले की गंदी आवाज़ें रह गईं। मैंने तौलिया उठाया। लेकिन लंड शांत नहीं हो रहा था।
अगले दिन दोपहर। घर फिर खाली था। आंटी आईं। इस बार साड़ी का पल्लू पहले से ढीला था। दरवाजा बंद करते ही उन्होंने सीधा कहा,
“आज पूरा लेना है। गला भी। चूत भी। निकाल।”
मैंने पैंट खोली। लंड तना हुआ बाहर आ गया। आंटी घुटनों के बल बैठ गईं और बिना देर किए पूरा लंड गले तक ले लिया। नाक मेरी जाँघ से सट गई। गला चोदने की भारी आवाज़ आने लगी। थूक बहकर उनके स्तनों पर गिर रहा था। मैंने उनके बाल पकड़कर जोर-जोर से मुँह चोदना शुरू किया।
“ले आंटी… गला फाड़ दे… गाँव वाली रंडी बनके लंड निगल…” आंटी की आँखों से पानी बह रहा था लेकिन उन्होंने मुँह नहीं हटाया। गला बार-बार लंड से भर रहा था।
पोजीशन 1 – मुँह चोदाई (ब्लोजॉब) मैं खड़ा था। आंटी घुटनों पर। दोनों हाथों से मेरे अंडकोष दबा रही थीं। लंड उनके गले में पूरा समा रहा था। हर धक्के के साथ उनकी गरदन की नसें फूल जातीं। थूक की धार ठोड़ी से होती हुई भारी स्तनों पर फैल रही थी। “चूस भोसड़ी वाली… पूरा निगल… गले तक ले… मादरचोद आंटी…” उन्होंने लंड बाहर निकाला। लार की मोटी लाइन टूटते-टूटते रह गई। “गला जल गया… अब चूत में डाल… फाड़ दे…”
पोजीशन 2 – मिश्नरी (टाँगें कंधों पर) मैंने आंटी को चारपाई पर लिटा दिया। साड़ी ऊपर की। ब्लाउज फाड़कर स्तन बाहर निकाले। उनकी दोनों टाँगें अपने कंधों पर रखीं और लंड चूत पर रखा। एक जोर का धक्का मारा। पूरा अंदर चला गया। “आह्ह्ह… मादरचोद… चूत फट गई… कितना मोटा…” मैंने रुके बिना पेलना शुरू किया। हर धक्के के साथ उनके भारी स्तन हिल रहे थे। मैंने दोनों निप्पल मरोड़ते हुए जोर-जोर से ठोका। “ले रंडी आंटी… ले… गाँव वाली चूत फाड़ रहा हूँ… बोल कैसा लग रहा है…” “फाड़ रहा है… पूरा फाड़ रहा है… और तेज… कमर तोड़ दे साले…” चूत की गीली आवाज़ आने लगी। मैंने उनकी टाँगें और फैला दीं। लंड पूरा निकलकर फिर जड़ तक जा रहा था।
पोजीशन 3 – डोगी स्टाइल मैंने आंटी को पलट दिया। घुटनों के बल कर दिया। गाँड ऊपर। पीछे से लंड एक झटके में अंदर पेल दिया। दोनों हाथों से उनकी कमर पकड़कर जोर-जोर से ठोकने लगा। गाँड मेरे जाँघों से पट-पट टकरा रही थी। “आह्ह… अर्जुन… मार… और मार… भोसड़ी की… मेरी चूत फाड़ दे…” मैंने उनके बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा और और तेज पेलने लगा। “बोल रंडी… किसकी चूत चोदी जा रही है…” “तेरी आंटी की… तेरी गाँव वाली रंडी आंटी की चूत… चोद… फाड़ दे पूरी…” मैंने उनकी गाँड पर जोर का थप्पड़ मारा। फिर एक और। लाल निशान पड़ गए।
पोजीशन 4 – आंटी ऊपर (काउगर्ल) मैं चारपाई पर लेट गया। आंटी मेरे लंड के ऊपर आईं और खुद उसे अपनी चूत में उतराने लगीं। पूरा अंदर जाते ही वो रुक गईं। फिर कमर हिलानी शुरू की। ऊपर-नीचे। तेज। उनके भारी स्तन मेरे चेहरे पर झूलने लगे। मैंने दोनों मुँह में ले लिए और जोर से चूसने लगा। “कूद रंडी… जोर से कूद… लंड पर बैठके अपनी चूत फाड़…” आंटी पागलों की तरह उछल रही थीं। चूत की आवाज़ तेज हो गई। “ले… ले मेरी चूत… गाँव वाली आंटी तेरे लंड पर नाच रही है… मादरचोद…” मैंने उनकी गाँड पकड़कर नीचे से भी धक्के मारने शुरू कर दिए।
पोजीशन 5 – खड़े होकर उठाकर मैंने आंटी को उठा लिया। उनकी टाँगें मेरी कमर में लपेट दीं। खड़े-खड़े लंड अंदर पेला और दीवार से सटाकर जोर-जोर से चोदने लगा। हर धक्के के साथ उनकी पीठ दीवार से लग रही थी। स्तन मेरे चेहरे से सटे थे। “आह्ह्ह… उठाके चोद रहा है… साले… फाड़ दे… पूरी चूत फाड़ दे…” “ले आंटी… ले… गले तक लंड लिया था… अब चूत की ले… पूरी…” आंटी के नाखून मेरी पीठ पर गड़ गए। उनकी कराहें बेकाबू हो गईं।
मैंने आंटी की टाँगें और फैला दीं। लंड पूरा अंदर था। शरीर काँप रहा था। रोकने की कोशिश की लेकिन नहीं रुका।
“आंटी… निकलने वाला है… मुँह खोल…”
आंटी तुरंत समझ गईं। उन्होंने मुझे धक्का देकर अलग किया। खुद घुटनों के बल बैठ गईं और मुँह खोल लिया। मैंने उनके बाल पकड़े और लंड उनके मुँह में ठूंस दिया। जैसे ही वीर्य निकला, उन्होंने गला खोल दिया। गरम धारा सीधे उनके गले में गई। आंटी ने निगला। एक बार… फिर दूसरी… तीसरी। लंड अभी भी उनके मुँह में फड़क रहा था। उन्होंने सब पी लिया। फिर जीभ बाहर निकालकर टोपा साफ किया। एक बूँद भी नहीं बचा।
“देख… इतना गीली कर दी तूने। अब जाके शहर में याद रखना… गाँव वाली आंटी ने सिर्फ चूत नहीं… गला भी तेरे लंड का गुलाम बना लिया।”
मैं चारपाई पर बैठ गया। लंड ढीला पड़ रहा था। आंटी ने साड़ी ठीक की। ब्लाउज के फटे हुक को पल्लू से ढँका। दरवाजे तक गईं। हाथ दरवाजे पर रखकर मुड़ीं और आखिरी बार बोलीं,
“अगली बार जब आ… तो पहले गला खोलके आना। आज तो मैंने तेरा सारा पानी पी लिया। अगली बार चूत में भी जगह बनेगी।”
वो चली गईं।
कमरे में सिर्फ उनकी लार की गंध और मेरे लंड पर बची हुई नमी रह गई। मैंने तौलिया उठाया। लेकिन शरीर अभी भी भारी था। गले की याद… उनके निगलने की आवाज़… और आखिरी वाली बात कानों में घूम रही थी।
गाँव वाली देसी आंटी ने वाकई गले तक लंड लिया था। और इस बार सिर्फ लिया नहीं… पूरा निगल भी गई थी।
