तलाकशुदा स्वाति की चूत में फिर से लंड गया

मेरा नाम स्वाति है। उम्र चौंतीस साल। दो साल पहले मेरा तलाक हो चुका था। पति का नाम राहुल था। शादी के सात साल बाद उसने एक दिन कहा, “तुम में वह बात नहीं रही जो पहले थी।” असल में बात यह थी कि उसे ऑफिस की एक लड़की से प्रेम हो गया था। वह लड़की मुझसे छोटी थी, ज्यादा हँसती थी और राहुल के अहंकार को ज्यादा सहलाती थी। अदालत में कागजात साइन करते समय मैंने सिर्फ इतना कहा था, “जाओ। आजाद हो जाओ।” अंदर से मैं पूरी तरह टूट चुकी थी, लेकिन आँसू नहीं दिखाए। घर लौटकर एक घंटे तक बाथरूम में सिर रखे रोई थी। फिर आईने के सामने खड़ी हुई और खुद से कहा, “अब तू अकेली है। और अकेली ही रहेगी।” तलाक के बाद मैंने शहर के एक शांत इलाके में छोटी-सी कैफे खोली। नाम रखा – “थोड़ी सी देर”। सुबह दस बजे खुलती, रात ग्यारह बजे बंद। दो वेटर, एक रसोइया और मैं। भीड़ कभी ज्यादा नहीं होती थी, लेकिन इतनी हो जाती थी कि किराया और घर का खर्च निकल जाए। मैं ज्यादातर काउंटर पर बैठती या किचन में ऑर्डर चेक करती। लोग मुझे “स्वाति मैडम” कहकर बुलाते। कुछ पुरुष ग्राहक जानबूझकर देर तक बैठे रहते और बातें करते, लेकिन मैंने सबको दूरी पर रखा। तलाक के बाद मैंने किसी मर्द को अपने करीब नहीं आने दिया। शरीर की जरूरतें थीं, बहुत थीं, लेकिन मैंने उन्हें दबाना सीख लिया था। रात को कभी-कभी उँगलियों से काम चला लेती, लेकिन उसके बाद और अकेलापन बढ़ जाता। मेरा शरीर अभी भी ठीक था। कद पाँच फुट छह इंच। चेहरा थोड़ा थका हुआ, लेकिन आँखें गहरी थीं। स्तन भारी और गोल थे। कमर पतली। गाँड भरी हुई। जब मैं कैफे में घूमती तो कई पुरुष मेरी चाल देखकर रह जाते। लेकिन मुझे इसकी आदत हो गई […]

मेरा नाम स्वाति है। उम्र चौंतीस साल। दो साल पहले मेरा तलाक हो चुका था।

पति का नाम राहुल था। शादी के सात साल बाद उसने एक दिन कहा, “तुम में वह बात नहीं रही जो पहले थी।” असल में बात यह थी कि उसे ऑफिस की एक लड़की से प्रेम हो गया था। वह लड़की मुझसे छोटी थी, ज्यादा हँसती थी और राहुल के अहंकार को ज्यादा सहलाती थी। अदालत में कागजात साइन करते समय मैंने सिर्फ इतना कहा था, “जाओ। आजाद हो जाओ।” अंदर से मैं पूरी तरह टूट चुकी थी, लेकिन आँसू नहीं दिखाए। घर लौटकर एक घंटे तक बाथरूम में सिर रखे रोई थी। फिर आईने के सामने खड़ी हुई और खुद से कहा, “अब तू अकेली है। और अकेली ही रहेगी।”

तलाक के बाद मैंने शहर के एक शांत इलाके में छोटी-सी कैफे खोली। नाम रखा – “थोड़ी सी देर”। सुबह दस बजे खुलती, रात ग्यारह बजे बंद। दो वेटर, एक रसोइया और मैं। भीड़ कभी ज्यादा नहीं होती थी, लेकिन इतनी हो जाती थी कि किराया और घर का खर्च निकल जाए। मैं ज्यादातर काउंटर पर बैठती या किचन में ऑर्डर चेक करती। लोग मुझे “स्वाति मैडम” कहकर बुलाते। कुछ पुरुष ग्राहक जानबूझकर देर तक बैठे रहते और बातें करते, लेकिन मैंने सबको दूरी पर रखा। तलाक के बाद मैंने किसी मर्द को अपने करीब नहीं आने दिया। शरीर की जरूरतें थीं, बहुत थीं, लेकिन मैंने उन्हें दबाना सीख लिया था। रात को कभी-कभी उँगलियों से काम चला लेती, लेकिन उसके बाद और अकेलापन बढ़ जाता।

मेरा शरीर अभी भी ठीक था। कद पाँच फुट छह इंच। चेहरा थोड़ा थका हुआ, लेकिन आँखें गहरी थीं। स्तन भारी और गोल थे। कमर पतली। गाँड भरी हुई। जब मैं कैफे में घूमती तो कई पुरुष मेरी चाल देखकर रह जाते। लेकिन मुझे इसकी आदत हो गई थी। अब किसी की नजर की परवाह नहीं करती थी। हर रात कैफे बंद करने के बाद अकेली हिसाब मिलाती, फिर ऊपर अपने छोटे से फ्लैट में चली जाती। फ्लैट में सिर्फ एक बेडरूम, एक छोटा किचन और एक बाथरूम था। दीवारों पर कोई फोटो नहीं थी। राहुल की कोई निशानी मैंने रखी नहीं थी।

यश आया मार्च के तीसरे हफ्ते में। उम्र पच्चीस। कॉलेज का आखिरी साल छोड़ चुका था क्योंकि घर की आर्थिक स्थिति खराब हो गई थी। उसने सीधे कहा, “मैडम, मुझे काम चाहिए। कुछ भी कर लूँगा।” मैंने उसे वेटर के रूप में रख लिया। तनख्वाह आठ हजार तय हुई। यश चुपचाप काम करता। मेहनती था। टेबल साफ करता, ऑर्डर लेता, कभी-कभी कॉफी भी बना देता। बातें कम करता था। लेकिन उसकी आँखें बहुत बोलती थीं। जब मैं काउंटर पर बैठी होती तो वह बार-बार मेरी तरफ देख लेता। मैं नज़रें फेर लेती, लेकिन अंदर एक हल्की सी हलचल हो जाती।

पहले पंद्रह दिन सिर्फ काम की बातें हुईं। फिर एक दिन मेरी चुटकी किचन के बर्तन में कट गई। खून निकल आया। यश तुरंत पास आया। उसने अपने रूमाल से मेरा हाथ दबाया। “दर्द हो रहा है मैडम?” मैंने सिर हिलाया। यश का स्पर्श गर्म था। इतने दिनों बाद किसी मर्द ने मुझे छुआ था। मेरी साँस थोड़ी तेज हो गई। यश ने भी महसूस किया, लेकिन कुछ नहीं बोला। बस पट्टी बाँध दी।

उस दिन के बाद दूरी धीरे-धीरे कम होने लगी। यश कभी चाय बनाकर दे देता, कभी मेरे बालों में अटकी पिन ठीक कर देता। एक दिन उसने सीधे पूछ लिया, “मैडम, आप तलाकशुदा हो न?”

मैंने उसकी तरफ देखा। “हाँ। तुम्हें कैसे पता?”

“लोग बात करते हैं। और… आप बहुत अकेली लगती हो।”

मैं चुप रही। शाम को घर जाकर लंबे समय तक आईने में अपना चेहरा देखा। दो साल बाद किसी ने मुझे अकेला कहा था। और अजीब बात यह थी कि बुरा नहीं लगा।

अप्रैल की एक शुक्रवार की रात बारिश हो रही थी। कैफे में ग्राहक बहुत कम थे। दस बजे के बाद तो सिर्फ दो टेबल बचीं। ग्यारह बजते-बजते सब चले गए। यश ने शटर नीचे किया। बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी। मैं किचन में आखिरी बर्तन धो रही थी। अचानक बिजली चली गई। पूरा कैफे अंधेरे में डूब गया। सिर्फ बाहर की स्ट्रीट लाइट की हल्की पीली रोशनी खिड़की से आ रही थी।

“जनरेटर चालू करूँ?” यश ने अंधेरे में पूछा।

“नहीं। आज छोड़ो। बारिश है। जल्दी बंद कर देते हैं।”

अंधेरे में दोनों की साँसें साफ सुनाई दे रही थीं। यश नजदीक आकर खड़ा हो गया। मुझे उसकी गंध आ रही थी – हल्का सा साबुन और पसीना। “मैडम, आप हमेशा इतनी अकेली क्यों रहती हो?”

मैंने जवाब नहीं दिया। बस बोली, “काम खत्म करो यश।”

लेकिन यश ने पीछे हटने की बजाय और पास आ गया। उसकी छाती मेरी पीठ से छू रही थी। मेरी कमर में करंट सा दौड़ गया। यश ने धीरे से मेरे बाल एक तरफ किए और गर्दन पर होंठ रख दिए। हल्के से चूमा। फिर थोड़ा और जोर से।

“यश… यह नहीं…” मेरी आवाज काँप रही थी।

“मुझे रोक दो मैडम। अगर सच में नहीं चाहिए तो रोक दो।”

मैं नहीं रोक पाई। दो साल का दबा हुआ अकेलापन एक पल में टूट गया। मैंने आँखें बंद कर लीं। यश ने और जोर से चूमना शुरू किया। गर्दन, कान के नीचे, कंधे की हड्डी। उसका एक हाथ आगे आकर मेरे स्तन पर रख गया। कुर्ती और ब्रा के ऊपर से मसलने लगा। मेरी निप्पल तुरंत सख्त हो गई। मैं हल्के से कराह उठी।

“आह्ह…”

यश ने मुझे घुमाया। अंधेरे में भी हमारे चेहरे पास थे। उसने होंठों पर होंठ रख दिए। इस बार चुंबन गहरा और भूखा था। जीभ अंदर तक चली गई। मैंने भी जवाब देना शुरू कर दिया। दोनों के शरीर एक-दूसरे से चिपक गए। यश का लंड पूरी तरह सख्त होकर मेरी जाँघ से टकरा रहा था। मुझे उसका आकार महसूस हो रहा था। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था।

यश ने मुझे किचन की प्लेटफॉर्म पर बैठा दिया। कुर्ती ऊपर उठाई। ब्रा के हुक खोले। मेरे भारी स्तन बाहर आ गए। अंधेरे में भी उनकी गोलाई महसूस हो रही थी। यश ने दोनों को हाथों में लिया और जोर से मसला। फिर मुँह में एक निप्पल ले लिया और चूसने लगा। दाँत से हल्के से काटा। मेरी उँगलियाँ उसके बालों में फंस गईं।

“धीरे… बहुत तेज कर रहा है…”

यश नहीं माना। दूसरे स्तन पर चला गया। नीचे से उसका हाथ स्कर्ट के अंदर घुस गया। पैंटी के ऊपर से चूत सहला रहा था। मैं पहले से गीली थी। दो साल की सूखी प्यास एक साथ उमड़ रही थी। यश ने पैंटी साइड में की और एक उँगली अंदर डाल दी। मेरी कमर उछल गई।

“इतनी गीली… मैडम आप कितनी तरस रही थीं…”

मैं शर्म से कुछ नहीं बोली। बस पैर और चौड़े कर दिए। यश ने दूसरी उँगली भी डाल दी। अंदर-बाहर करने लगा। साथ में मेरे स्तन चूसता रहा। मेरी कराहें किचन में गूँज रही थीं। थोड़ी देर में ही मेरा शरीर काँपने लगा। मैं झड़ गई। यश की उँगलियाँ और गीली हो गईं।

यश ने अपनी पैंट और अंडरवियर एक साथ नीचे किए। उसका लंड बाहर आया। मोटा, लंबा, नसें फूली हुई, सिर चमक रहा था। मैंने अंधेरे में भी उसका आकार महसूस किया। दिल बैठ गया। राहुल का इतना बड़ा नहीं था। यश ने मेरे पैर और फैलाए। लंड को चूत पर रखा और धीरे से धक्का दिया।

“आह्ह्ह्ह…” मेरी आवाज निकल गई।

आधा लंड अंदर गया। दो साल बाद किसी का लंड मेरी चूत में प्रवेश कर रहा था। यश ने और धक्का मारा। पूरा लंड अंदर तक समा गया। हम दोनों एक पल के लिए रुक गए। मेरी आँखें बंद थीं। साँसें उखड़ी हुई थीं। यश ने धीरे से पूछा, “दर्द हो रहा है?”

“थोड़ा… लेकिन मत निकाल… हिलना शुरू कर…”

यश हिलने लगा। पहले बहुत धीमे। हर धक्के पर मेरी चूत फैल रही थी। फिर गति तेज हुई। प्लेटफॉर्म पर मेरी गाँड ठक-ठक की आवाज करने लगी। मेरे भारी स्तन उछल रहे थे। यश ने एक स्तन मुँह में ले लिया और नीचे जोर-जोर से धक्के मारने लगा। मैंने अपने दोनों पैर उसकी कमर पर लपेट लिए।

“जोर से… और जोर से चोदो… आज पूरी तरह चोदो मुझे यश…”

यश ने मेरी कमर कसकर पकड़ी और तेज हो गया। हर धक्के पर गीली आवाज आ रही थी – चप-चप-चप। मैं बार-बार कराह रही थी। मेरी चूत यश के लंड को जकड़ रही थी। थोड़ी देर बाद यश ने मुझे प्लेटफॉर्म से उतारा, उलटा किया और पीछे से फिर से घुसा दिया। एक हाथ से मेरे बाल पकड़े हुए थे, दूसरे हाथ से मेरी गाँड मसल रहा था।

“मैडम… आपकी चूत अभी भी कितनी टाइट है…”

“चुप कर… और चोद… बात मत बना…”

यश और तेज हो गया। उसकी जाँघें मेरी गाँड से टकरा रही थीं। थोड़ी देर बाद उसने लंड निकाला, थूक लगाया और गाँड के छेद पर रखा। मैं सहम गई। “वहाँ नहीं… यश…”

“सिर्फ थोड़ा सा… अगर दर्द हो तो रोक देना।”

उसने धीरे-धीरे दबाव दिया। आधा लंड गाँड में चला गया। मैंने अपनी बाँह में मुँह दबा लिया। दर्द था, लेकिन साथ में एक अजीब दबाव और मजा भी था। यश ने धीरे-धीरे पूरा अंदर तक धकेल दिया। फिर बहुत धीमे धक्के मारने लगा। मेरी आँखों से आँसू निकल आए, लेकिन मैंने रोका नहीं। दस-बारह धक्के बाद यश ने फिर से लंड निकाला और चूत में डाल दिया। अब दोनों जगह से गीलापन बह रहा था।

आखिर में यश ने मुझे फिर से प्लेटफॉर्म पर बैठाया। चेहरा पास लाकर चूमा। नीचे लंड पागलों की तरह चल रहा था। “मैडम… मैं झड़ने वाला हूँ…”

“अंदर झाड़… मेरी चूत में भर दे…”

यश ने आखिरी जोरदार धक्के मारे और रुक गया। गरम-गरम माल की धार मेरी चूत में छूटने लगी। एक के बाद एक। इतना ज्यादा कि बाहर भी निकल आया। हम दोनों लंबे समय तक वैसे ही रहे। पसीने से तरबतर। साँसें उखड़ी हुई।

बाद में हम किचन की फर्श पर बैठ गए। मैंने धीरे से कहा, “यह सिर्फ आज की बात थी। कल से फिर सामान्य रहना।”

यश ने मेरा चेहरा अपनी तरफ घुमाया। अंधेरे में भी उसकी आँखें चमक रही थीं। “नहीं मैडम। अब सामान्य नहीं होगा। आपने दो साल बाद अपना शरीर मुझे दिया है। अब मैं छोड़ने वाला नहीं।”

मैं कुछ नहीं बोली। अंदर ही अंदर एक डर था और एक सुकून भी।

उस रात हम दोनों ऊपर मेरे फ्लैट में गए। नहाया। फिर बिस्तर पर दोबारा किया। इस बार धीमे और लंबे समय तक। यश ने मेरे शरीर की हर जगह चूमी। मेरे शरीर पर दो साल का अकेलापन जैसे उतर रहा था। जब दूसरी बार यश ने मेरी चूत में माल भरा तो मेरी आँखों से आँसू आ गए। यश ने पूछा, “दर्द हो रहा है?”

“नहीं… रो रही हूँ क्योंकि… बहुत दिनों बाद किसी ने मुझे औरत की तरह छुआ है।”

सुबह जब यश जाने लगा तो मैंने दरवाजे पर खड़े होकर कहा, “आज शाम को जल्दी बंद करते हैं।”

यश मुस्कुराया। “जैसी मैडम की इच्छा।”

उस दिन के बाद कैफे की रातें बदल गईं। ग्राहक चले जाने के बाद यश शटर नीचे करता और फिर हम किचन या ऊपर फ्लैट में एक-दूसरे को चोदते। कभी जल्दी, कभी घंटों। मैं अब खुद पहल करने लगी थी। कभी-कभी यश के काम करते समय पीछे से जाकर उसका लंड पकड़ लेती। कभी नहाते हुए बुला लेती।

एक रात यश ने मुझे चारपाई पर घोड़ी बनाकर रखा और बहुत देर तक पीछे से चोदा। मेरे मुँह से निकल रहा था, “फाड़ दे… मेरी चूत फाड़ दे अपने लंड से…” यश ने मेरी गाँड पर कई थप्पड़ मारे। लाल निशान उभर आए। जब उसने अंदर झाड़ा तो मैं पूरी तरह ढह गई।

दो महीने बाद मेरी जिंदगी पूरी तरह बदल चुकी थी। तलाक का दर्द अब भी कहीं था, लेकिन शरीर की भूख अब बुझने लगी थी। यश सिर्फ मेरा हेल्पर नहीं रह गया था। वह मेरा लंड था। मेरी रातों का मालिक था।

और मुझे अब कोई शर्म नहीं आती थी यह कहते हुए कि तलाक के बाद पहली बार किसी मर्द का लंड मेरी चूत में गया… और वह लंड यश का था।

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