मेरा नाम अभिनव है, मैं 24 साल का हूँ, और मुंबई की एक चॉल में रहता हूँ। केमिकल इंजीनियरिंग का आखिरी साल चल रहा है, और साथ में एक छोटी कंपनी में इंटर्नशिप भी कर रहा हूँ। महीने के पंद्रह हज़ार मिल जाते हैं, जो मेरे लिए काफी है क्योंकि मैं अपनी बहन और बहनोई के साथ रहता हूँ, और खर्चा बँटता है। बहनोई फैक्ट्री में काम करता है, सुबह निकलता है, रात को लौटता है। बहन भी गारमेंट्स फैक्ट्री में, दिनभर गायब। तो दिन में मैं अक्सर अकेला होता हूँ, कॉलेज या इंटर्नशिप से आने के बाद।
हमारी चॉल धारावी के पास है, भाईचारा चॉल। यहाँ सब एक-दूसरे को जानते हैं, कभी-कभी बहुत ज़्यादा। पानी की लाइन में लड़ाई, सीढ़ियों पर थूक, रात को किसी के चुदाई की आवाज़, ये सब इतना कॉमन है कि अब किसी को फर्क नहीं पड़ता। मेरा कमरा ऊपर छत पर है, एक छोटा सा कमरा, जिसमें एक बिस्तर, एक टेबल, और एक खिड़की जो नीचे की गली की तरफ खुलती है।
ठीक नीचे, मेरे कमरे के नीचे, रहती है रितु।
रितु के बारे में मैंने पहली बार सुना था जब मैं यहाँ आया, तीन साल पहले। लोग कहते थे, “विधवा है, अकेली रहती है, ससुराल से निकाल दी गई।” मैंने उसे देखा था कुछ दिन बाद, जब वो सीढ़ियों से उतर रही थी। मैं ऊपर जा रहा था, वो नीचे आ रही थी, और हमारी नज़रें मिलीं। उसने मुस्कुराया, एक हल्की सी, और मैंने भी मुस्कुरा दिया। तब मुझे लगा, वो कोई 35-36 साल की होगी, शायद और।
बाद में पता चला, वो 38 साल की है। पति का देहांत हुए चार साल हो गए, लिवर फेल होके। कोई बच्चा नहीं था, इसलिए ससुराल वालों ने कोई मतलब नहीं रखा, निकाल दिया। अपने मायके आई, पर मायके में भी जगह नहीं थी, भाइयों की शादी हो गई थी, भाभियाँ नहीं चाहती थीं। तो उसने ये चॉल का एक कमरा किराए पर ले लिया, छोटा सा, एक कोना, जिसमें एक चूल्हा, एक बिस्तर, और एक बल्ब जो पीली रोशनी देता है।
अब उसका figure। मैंने उसे पहली बार ठीक से देखा था एक महीने बाद, जब वो नहाकर आ रही थी, बालों में तौलिया, सूखी हुई साड़ी में। मैं सीढ़ियों पर बैठा था, मोबाइल चला रहा था, और वो आई, गीली, ताज़ी। 5’4″ कद, रंग गेहुँआ, जैसे धूप में सिकी हुई मिट्टी, जो मुंबई की धूप में रहने वालों का होता है। चूचियाँ… 36D, मैंने अनुमान लगाया, क्योंकि वो कसी नहीं थीं, थोड़ी ढीली, पर निप्पल मोटे, ब्लाउज से खड़े दिखते थे, खासकर जब वो झुकती। कमर 32, पेट थोड़ा निकला हुआ, पर वो निकलाव जो शादीशुदा औरतों में आता है, जो कहते हैं “उम्र का असर”, पर मुझे वो सेक्सी लगता था। गांड 40, हाँ, मैंने एक बार उसे साड़ी में देखा था, जब वो झुकी थी, और दोनों गोलाई अलग-अलग उभरी हुई थीं, मोटी, भारी, जब वो सीढ़ियाँ चढ़ती तो साड़ी में से एक-एक करके उछलतीं। जाँघें मोटी, एक-दूसरे से रगड़ती हुई चलती थी, बीच में वो दरार, जो मैं सोच-सोचकर हिलाता था, रात को, अपने कमरे में, खिड़की से झाँकते हुए।
रितु से मेरी बात कभी ज़्यादा नहीं हुई। “पानी आया?” “हाँ भैया।” इतना। पर मैं देखता था, रात को जब मैं अपने कमरे की खिड़की से झाँकता, नीचे रितु का कमरा, बल्ब पीला, छाया दीवार पर। कभी-कभी वो अपने ब्लाउज के हुक खोलती, साँस लेती, और मेरा लंड पैंट में कैद होकर तड़पता। मैं सोचता, क्या वो जानती है कि मैं देख रहा हूँ? शायद नहीं, पर शायद हाँ भी। कभी-कभी वो खिड़की की तरफ देखती, और मैं पीछे हट जाता, दिल तेज़ धड़कता।
एक दिन, बारिश। मुंबई की वो बारिश जो अचानक आती है, बिना बताए, और सब कुछ गीला कर देती है। मैं छत पर कपड़े लेने आया, क्योंकि मेरी बहन ने सुबह कपड़े डाले थे, और मुझे याद आया कि मैंने अपनी एक शर्ट भी डाली थी। रितु भी आई, अपने कपड़े लेने, क्योंकि उसके भी बारिश में भीगने वाले थे। सीढ़ियाँ फिसलन भरी थीं, पानी से, मिट्टी से, क्योंकि छत से पानी नीचे बह रहा था।
रितु फिसली, अचानक, मैंने पकड़ा। मेरा हाथ उसकी कमर पर गया, और मेरी उँगलियाँ… मेरी उँगलियाँ उसकी गांड की दरार में धँस गईं, मोटी, नरम, गर्म, साड़ी के ऊपर से भी। वो पलटी, आँखों में कुछ, डर, और कुछ और भी, शायद आश्चर्य, शायद कुछ और।
“ओह…” रितु ने कहा, मेरी आँखों में देखते हुए, “धन्यवाद भैया…”
“कोई बात नहीं…” मैंने कहा, हाथ हटाया, पर महसूस किया, मेरी उँगलियाँ गीली थीं, पसीने से, या कुछ और। मैंने सूंघा, एक हल्की सी, अजीब सी खुशबू, जो मैंने पहले कभी नहीं महसूस की थी।
रितु चली गई, साड़ी का पल्लू हवा में उड़ा, गांड मटकाते हुए, और मैं… मैं छत पर ही खड़ा रहा, बारिश में भीगता, लंड खड़ा, सोचता, क्या वो गीली पसीने से थी, या कुछ और। और वो आँखों में क्या था, जो मैंने देखा, डर, या कुछ और, कुछ जो मुझे अब भी सोचने पर मजबूर कर रहा था।
उस दिन के बाद, मैं रितु से मिलता तो वो हल्की सी मुस्कुरा देती, पर पहले जैसी नहीं। पहले वो मुस्कुराहट औपचारिक थी, अब कुछ और था, कुछ जो मुझे समझ नहीं आ रहा था।
मेरा कमरा छत पर है, और छत पर पानी की टंकी है, जिससे पूरे चॉल में पानी जाता है। टंकी के पास एक छोटा सा बाथरूम है, जो सबके लिए कॉमन है, पर दिन में ज़्यादातर खाली रहता है क्योंकि सब काम पर होते हैं। रितु का कमरा नीचे है, पर वो नहाने छत पर ही आती है, क्योंकि नीचे पानी की सुविधा नहीं है।
मैंने नोटिस किया था, उसका टाइम। दोपहर को दो बजे, जब सब काम पर होते हैं, चॉल सुनसान होता है। वो बाल्टी और मग लेकर आती, बाथरूम में जाती, और आधे घंटे बाद निकलती, गीले बालों में, ताज़ी साड़ी में। मैंने कभी ध्यान नहीं दिया, पर उस दिन के बाद… उस दिन के बाद मेरी नज़रें उसे ढूँढने लगीं।
एक दिन, मैं इंटर्नशिप से जल्दी आ गया, दोपहर के एक बजे। मेरा कमरा गर्म था, तो मैंने खिड़की खोली, हवा के लिए। खिड़की से सीधा नज़ारा बाथरूम की छत पर जाता है, जहाँ कपड़े सूखते हैं। मैंने देखा, रितु पहले से वहाँ थी, बाल्टी रखी, और वो… वो अपनी साड़ी उतार रही थी।
मैंने पीछे हटना चाहा, पर पैर नहीं हिले। वो साड़ी उतारी, ब्लाउज उतारा, और फिर पेटीकोट। मैंने देखा, उसकी पीठ, गेहुँआ रंग, कमर पर एक मोल, और नीचे… नीचे सिर्फ एक पैंटी, सफेद, पुरानी, थोड़ी पीली हो गई थी, और वो गांड… वो गांड जो मैंने छुआ था, अब सामने, मोटी, गोल, पैंटी में से उभरी हुई।
मैंने साँस रोका, खिड़की के किनारे से झाँका। वो मुड़ी, और मेरी आँखें… मेरी आँखें उसकी चूचियों पर टिकीं। 36D, मैंने सही अनुमान लगाया था, ढीली, पर निप्पल मोटे, गहरे भूरे, खड़े, शायद हवा से, शायद कुछ और। उसने बाल्टी उठाई, पानी डाला, और अपने ऊपर बहाया।
पानी, उसके बालों से, गर्दन से, चूचियों से, पेट से, पैंटी में, और नीचे… मैंने देखा, पैंटी गीली हो गई, चिपक गई, और अंदर से वो दरार, चूत का shape, साफ दिख रहा था, उभरी हुई, गीली।
“क्या देख रहे हो भैया?”
मैं चौंक गया, पीछे हटा, पर फिर देखा, रितु मेरी तरफ देख रही थी, मुस्कुरा रही थी, हाथ में बाल्टी, पानी टपक रहा था।
“मैं… मैं…” मैंने हकलाया, “खिड़की… हवा…”
“हवा?” वो हँसी, एक हल्की सी, शरारती, “मेरी चूचियों में हवा है?”
“नहीं… वो…” मेरे कान लाल हो गए।
“आ जाओ नीचे,” वो बोली, अपने बालों से पानी निचोड़ते हुए, “मेरी बाल्टी भारी है, उठाने में मदद करो।”
मैंने सोचा, नहीं जाऊँगा, पर पैर खुद चल पड़े। नीचे गया, छत पर, बाथरूम के पास। रितु खड़ी थी, सिर्फ पैंटी में, चूचियाँ बाहर, पानी से तर, और मुझे देख रही थी, मेरी आँखों में, मेरी पैंट में, जहाँ मेरा लंड खड़ा था, साफ दिख रहा था।
“क्या हुआ?” वो पूछी, आँखें मेरी पैंट पर, “कुछ तो खड़ा है तुम्हारे अंदर…”
“वो… वो…” मैंने हिचकिचाया।
“बाल्टी उठाओ,” वो आदेश दिया, मुस्कुराते हुए, “फिर बताऊँगी क्या है।”
मैंने बाल्टी उठाई, भारी, पानी से भरी। रितु पास आई, उसकी चूची मेरी बाँह से छू गई, गीली, नरम, और मैं काँप उठा।
“काँप क्यों रहे हो?” वो पूछी, मेरे कान में फुसफुसाते हुए, “ठंड लग रही है? या कुछ और गरम हो रहा है?”
“बुआ… वो…” मैंने कहा।
“बुआ?” वो हँसी, “मैं तुम्हारी बुआ थोड़ी हूँ… मैं तो सिर्फ रितु हूँ… एक अकेली औरत… जिसकी चूत बहुत दिनों से खाली है…”
मैंने बाल्टी गिरा दी, पानी छलक गया, मेरी पैंट गीली हो गई, और रितु… रितु मुस्कुरा रही थी, मेरी पैंट देखते हुए, जहाँ मेरा लंड खड़ा था, पानी से गीला, और और भी साफ दिख रहा था।
“अब तो पूरा गीला हो गया,” वो बोली, और झुकी, मेरी पैंट के सामने, अपने हाथ से मेरे लंड को छुआ, एक पल के लिए, “ये… ये तो बहुत मोटा है… मेरी बाल्टी से भी भारी…”
“रितु…” मैंने कहा, ।
“चुप,” वो बोली, और उठी, मेरे होठों के पास, “अभी नहीं… अभी तो सिर्फ बाल्टी उठानी थी… बाकी… बाद में…”
वो चली गई, पैंटी में, गीले बालों में, और मैं… मैं छत पर खड़ा रहा, गीली पैंट में, खड़े लंड में, सोचता, क्या हुआ, और क्या होगा।
तीन दिन बाद, मेरी बहन और बहनोई गाँव गए, एक रिश्तेदार की शादी में। दो दिन के लिए घर खाली, सिर्फ मैं और… और रितु, नीचे, एक ही छत के नीचे। मैंने सोचा नहीं था कि कुछ होगा, पर शायद रितु ने सोचा था।
शाम को, छत पर, मैं कपड़े सुखा रहा था। रितु आई, साड़ी में, पर आज कुछ अलग। ब्लाउज का गला गहरा, पीछे से हुक खुले, चूचियाँ आधी बाहर, और साड़ी नीचे से कम कसी, जाँघें झाँक रही थीं, मोटी, गोरी, एक-दूसरे से रगड़ती हुई।
“क्या हाल है भैया?” वो बोली, पास आकर, इतने पास कि उसकी चूची मेरी बाँह से सटी।
“ठीक…” मैंने कहा, साँसें तेज़।
“अकेले हो ना आज?” वो पूछी, मेरे कान में, “तुम्हारी बहन गई है?”
“हाँ…” मैंने कहा, “दो दिन के लिए…”
“दो दिन…” वो मुस्कुराई, “बहुत है… मेरी चूत को शांत करने के लिए…”
मैंने पलटकर देखा, उसकी आँखों में वो आग, जो मैंने उस दिन देखी थी, पर अब और तेज़, और गहरी। “रितु… तुम…”
“मैं क्या?” वो हँसी, और अचानक, उसने अपनी साड़ी उठाई, ऊपर की, और मैंने देखा, नीचे कुछ नहीं, सिर्फ चूत, भूरी बालों से भरी, गीली, चूत के होठ फूले हुए, एक दरार, गहरी, प्यासी। “ये देख रहे हो? चार साल से खाली है… तुम्हारे लिए तरस रही है…”
मैं पागल हो गया, तीन दिन की तड़प, तीन दिन का इंतज़ार, और अब… मैंने उसे पकड़ा, कसकर, उसके होंठ चूसे, जीभ अंदर डाली, और वो भी मेरा साथ दे रही थी, काट रही थी, चूस रही थी।
“चल नीचे…” वो फुसफुसाई, “मेरे कमरे में… यहाँ कोई आ जाएगा…”
हम नीचे गए, उसके कमरे में, एक छोटा सा कमरा, एक बिस्तर, एक बल्ब पीला। उसने दरवाज़ा बंद किया, और मेरे सामने खड़ी हो गई, साड़ी उतारते हुए, ब्लाउज उतारते हुए, पेटीकोट उतारते हुए, और फिर… नंगी, पूरी, 38-32-40, चूचियाँ ढीली, निप्पल खड़े, पेट निकला, गांड मोटी, चूत गीली, भूरी बालों से भरी।
“क्या लग रही हूँ?” वो पूछी, घूमकर, गांड मुझे दिखाते हुए, “चोदने लायक?”
“हाँ…” मैंने कहा, अपने कपड़े उतारते हुए, “बहुत…”
मेरा लंड बाहर निकला, 7 इंच, मोटा, खड़ा, टिप से पानी टपक रहा था। रितु की आँखें बड़ी हुईं, “ये… ये तो बहुत मोटा है… मेरे पति का आधा था…”
“डर लग रहा है?” मैंने पूछा।
“नहीं…” वो मुस्कुराई, “भूख लग रही है… चूत की…”
वो घुटनों के बल बैठ गई, मेरा लंड पकड़ा, और मुँह में ले लिया, पूरा, एक ही बार में। मैं काँप उठा, “आह्ह… रितु…”
वो चूसने लगी, ज़ोर-ज़ोर से, कभी ऊपर, कभी नीचे, कभी जीभ से चाटती, कभी काटती, और मैं पागल हो रहा था, उसके बाल पकड़े, और उसका मुँह चोदने लगा, धक्के मारने लगा।
“चूस रांड…” मैंने कहा, पहली बार गाली, “चूस मेरा लंड…”
वो और तेज़ चूसने लगी, आँखें ऊपर करके मुझे देखते हुए, मुस्कुराते हुए, और मैंने महसूस किया, वो पागल है इसके लिए, गाली सुनने के लिए, रांड बनने के लिए।
“खड़ी हो…” मैंने कहा, उसे उठाया, बिस्तर पर लिटाया, पैर फैलाए, और उसकी चूत सामने, गीली, खुली, प्यासी। “ये क्या है?”
“मेरी चूत…” वो बोली, “चोदो इसे… फाड़ दो…”
“क्या बोल रांड?” मैंने कहा, उसकी चूत पर लंड रगड़ते हुए।
“चोदो मेरी चूत…” वो चीखी, “फाड़ दो इसे… मैं तुम्हारी रांड हूँ… तुम्हारी गुलाम…”
मैंने एक धक्के में अंदर डाला, पूरा, एक ही बार में, और वो चीखी, “आह्ह… मेरी माँ… फट गई… फट गई मेरी चूत…”
“चुप रांड…” मैंने कहा, धक्के मारते हुए, “तुम्हें यही चाहिए था ना… चार साल से तरस रही थी…”
“हाँ…” वो चीखी, “हाँ… तरस रही थी… तुम्हारे जैसे लंड के लिए… और ज़ोर से… फाड़ दो…”
मैंने और तेज़ धक्के मारे, चप चप की आवाज़, उसकी चूत से पानी बह रहा था, मेरे लंड पर, मेरी जाँघों पर, बिस्तर पर। उसकी चूचियाँ हिल रही थीं, मैंने एक पकड़ी, कसकर दबाई, नोचा, और वो और तेज़ चीखी, “आह्ह… मेरी चूची… फाड़ दो… सब फाड़ दो…”
“घुटनों पर आ…” मैंने कहा, उसे घुमाया, गांड मेरी तरफ, “आज तुम्हारी गांड भी मारूँगा…”
“नहीं…” वो काँपी, “वो… वो कभी नहीं गई…”
“आज जाएगी…” मैंने कहा, और एक धक्के में उसकी गांड में डाल दिया, पूरा, एक ही बार में।
“आह्ह… मेरी माँ…” वो चीखी, “फट गई… फट गई मेरी गांड…”
“चुप रांड…” मैंने कहा, धक्के मारते हुए, “ये तुम्हें चाहिए था… अकेली रहती हो… चूत मसलती हो… आज असली मर्द मिला है…”
“हाँ…” वो रोने लगी, खुशी से, दर्द से, “हाँ… असली मर्द… और ज़ोर से… फाड़ दो मेरी गांड…”
मैंने और तेज़ धक्के मारे, उसकी गांड में, फिर चूत में, फिर गांड में, बार-बार, और वो पागल हो गई, चीखती रही, “आह्ह… आह्ह… मैं झड़ रही हूँ… झड़ रही हूँ…”
“रुक…” मैंने कहा, बाहर निकाला, “मुँह खोल…”
वो पलटी, घुटनों के बल, मुँह खोला, और मैंने अपना लंड उसके मुँह में डाला, धक्के मारे, और झड़ गया, उसके मुँह में ही, गरम, गाढ़ा, बहुत सारा, और वो… वो पी गई, सब कुछ, एक बूंद भी नहीं छोड़ी, जीभ से चाटी, मुस्कुराते हुए।
“कैसा था?” मैंने पूछा, साँसें तेज़।
“अमृत…” वो बोली, मेरा लंड चूमते हुए, “फिर से दो…”

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