मैं रंडी तेरे आँगन की | हवेली की रांड बनने की कहानी

मेरा नाम रुखसार है। उम्र उस वक्त पच्चीस के करीब रही होगी। मैं इस हवेली के पिछवाड़े वाले नौकरों के कमरे में पिछले साढ़े तीन साल से रह रही थी। पहले मालिक ने मुझे यहाँ छोड़ा था। वो बुजुर्ग आदमी था, बीमारी बढ़ने पर विदेश चला गया और वापस नहीं लौटा। जाने से पहले उसने सिर्फ इतना कहा था कि जब तक नई व्यवस्था नहीं हो जाती, तुम यहीं रहना। उसके बाद कोई नहीं आया। हवेली वीरान पड़ गई। मैं अकेली रह गई उस बड़े से आँगन और टूटी-फूटी दीवारों के बीच।

जब नए मालिक आए, तब पहली बार मुझे डर लगा। नाम था रणवीर सिंह ठाकुर। उम्र क़रीब बयालीस। लंबे कद के, गेहुँए रंग के, घनी मूंछें और तेज़ आँखें। अमीर व्यापारी थे। उन्होंने ये पुरानी हवेली सिर्फ इसलिए खरीदी थी क्योंकि उन्हें लगता था कि पुरानी चीज़ों में एक अलग तरह की शान होती है। वो अकेले आए थे। कोई बीवी-बच्चे साथ नहीं थे।

पहली मुलाकात आँगन में हुई। मैं झाड़ू लगा रही थी जब उनकी गाड़ी अंदर घुसी। मैंने सर झुका लिया। उन्होंने मुझसे पूछा, “तुम यहाँ क्या कर रही हो?”

मैंने सच बता दिया। कि पिछले मालिक ने छोड़ दिया था और मेरे पास जाने के लिए कोई जगह नहीं है। उन्होंने कुछ देर मेरी ओर देखा। उनकी निगाहें मेरे चेहरे से नीचे सरककर मेरे जिस्म पर ठहर गईं। मैंने उस दिन एक पुरानी साड़ी पहन रखी थी जो कई जगह से घिस चुकी थी। ब्लाउज भी ढीला पड़ गया था।

उन्होंने कहा, “अगर रहना है तो शर्तें माननी पड़ेंगी।”

मैंने सिर उठाकर देखा। उनकी आँखों में साफ लिखा था कि वो क्या चाह रहे हैं। मुझे समझते देर नहीं लगी। मेरे पास विकल्प भी क्या था? न कोई घर, न कोई रिश्तेदार जो अपनाने को तैयार हो। मैंने धीरे से कहा, “जो हुक्म होगा।”

उसी शाम उन्होंने मुझे मुख्य हवेली के अंदर बुलाया। आँगन बहुत बड़ा था। बीच में एक पुराना नीम का पेड़ और चारों तरफ बरामदे। उन्होंने कहा कि अब से ये आँगन सिर्फ उनका निजी इलाका रहेगा। और मैं… मैं उनकी संपत्ति।

पहले हफ्ते में उन्होंने मुझसे सिर्फ बात की। कभी चाय लाने को कहा, कभी कपड़े प्रेस करने। लेकिन हर बार उनकी निगाहें मेरे शरीर पर टिक जातीं। जब मैं झुकती तो मेरी साड़ी का पल्लू सरक जाता और वो देखते रहते। एक दिन उन्होंने मुझे अपने कमरे में बुलाया और कहा, “साड़ी ठीक से बाँधो। इतनी ढीली क्यों रखती हो?”

मैंने कहा, “हुजूर, ये पुरानी है।”

उन्होंने पास आकर मेरी साड़ी का पल्लू extrakt किया और खुद बाँधने लगे। उनके हाथ जब मेरी कमर पर पड़े तो मेरे शरीर में एक हल्की सी सिहरन दौड़ गई। उन्होंने जानबूझकर अपने अंगूठे को मेरी कमर की हड्डी पर दबाया। मैंने साँस रोक ली। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “अब से जब भी मेरे सामने आना तो कमर नंगी रखना। सिर्फ साड़ी लपेट लेना।”

मैंने सिर झुका लिया।

अगले दिन से वही शुरू हो गया। मैं आँगन में काम करती तो सिर्फ साड़ी लपेटे। ब्लाउज नहीं पहनती। जब हवा चलती तो साड़ी का पल्लू उड़ जाता और मेरी पीठ और आधा सीना खुल जाता। वो बरामदे में कुर्सी लगाकर चाय पीते और मुझे देखते रहते। कभी-कभी बुलाते और कहते, “इधर आ।”

मैं जाती तो वो अपनी उँगली से मेरी साड़ी का पल्लू हटा देते और मेरे स्तनों को देखते। छूते नहीं थे। बस देखते। एक दिन उन्होंने कहा, “तुम्हारे पिछले मालिक भी क्या यही करते थे?”

मैंने सच बता दिया। हाँ, वो भी कभी-कभी बुलाते थे। लेकिन उतनी हिम्मत नहीं थी जितनी इनमें थी। रणवीर ने मेरी ठोड़ी पकड़कर ऊपर उठाई और कहा, “मैं उनके जैसा नहीं हूँ। मैं अधूरा नहीं छोड़ता।”

उस रात मुझे नींद नहीं आई। मेरे कमरे की खिड़की से मुख्य आँगन दिखता था। चाँद की रोशनी में नीम का पेड़ हिल रहा था। मुझे याद आया कि पिछले मालिक ने एक बार मुझे उसी पेड़ से बाँधने की बात कही थी, लेकिन किया नहीं था। रणवीर ने शायद वही अधूरा काम पूरा करना चाहा था।

तीसरे हफ्ते में उन्होंने पहली बार छुआ।

शाम का समय था। मैं आँगन में फर्श पोंछ रही थी। उन्होंने पीछे से आकर मेरी कमर में दोनों हाथ डाल दिए। मैं थम गई। उनके हाथ गर्म थे। उन्होंने साड़ी को थोड़ा नीचे सरकाया और मेरी नंगी कमर पर अपनी हथेली फेरने लगे। फिर धीरे से ऊपर बढ़े और मेरे स्तनों को नीचे से थाम लिया।

मैंने कुछ नहीं कहा। सिर्फ साँस तेज़ हो गई।

उन्होंने मेरे कान के पास मुँह लाकर कहा, “अब से जब भी मैं आँगन में बैठूँ, तुम नंगी होकर मेरे सामने खड़ी रहोगी। समझी?”

मैंने सिर हिलाया।

“बोल।”

“जी हुजूर।”

“नहीं। कुछ और बोल।”

मैं समझ गई। आवाज़ काँपते हुए बोली, “जी… मैं आपकी रांड हूँ।”

उन्होंने मेरे स्तनों को ज़ोर से दबाया और कहा, “पूरा बोल।”

“मैं… मैं रांड हूँ आपके आँगन की।”

उन्होंने मुझे छोड़ दिया और मुस्कुराए। “अब रोज़ यही अभ्यास करना। जब तक ये वाक्य तुम्हारी जीभ पर न चढ़ जाए।”

उस दिन के बाद से तनाव बढ़ता ही गया। सुबह उठते ही मुझे उनके कमरे में चाय लेकर जाना पड़ता। कभी वो बिस्तर पर लेटे होते और मुझे नंगी खड़ी रहने को कहते। कभी अपनी उँगली से इशारा करके पास बुलाते और मेरी जाँघों के अंदरूनी हिस्से पर हाथ फेरते। लेकिन आगे नहीं बढ़ते।

एक शाम उन्होंने कुछ मेहमान बुलाए। दो आदमी थे, उनके कारोबारी साथी। आँगन में कुर्सियाँ लग गईं। शराब के गिलास आए। उन्होंने मुझे इशारे से बुलाया और कहा, “आज इनके सामने खड़ी रहना।”

मैं साड़ी लपेटे खड़ी रही। हवा में पल्लू उड़ रहा था। दोनों मेहमान मेरी ओर देख रहे थे। रणवीर ने शांति से कहा, “साड़ी हटा।”

मेरे हाथ काँप रहे थे। लेकिन मैंने साड़ी खोल दी। अब मैं पूरी तरह नंगी थी उस बड़े आँगन में, नीम के पेड़ के नीचे, तीन मर्दों के सामने।

रणवीर ने मुस्कुराते हुए कहा, “अब घुटनों के बल बैठ जा और वही बोल जो मैंने सिखाया है।”

मैं घुटनों के बल बैठ गई। ज़मीन ठंडी थी। मैंने सर झुकाए हुए कहा, “मैं रांड हूँ आपके आँगन की।”

एक मेहमान हँसा। दूसरे ने कुछ कहा जो मैं साफ नहीं सुन पाई। रणवीर ने मेरी तरफ देखा और बोला, “जोर से।”

मैंने आवाज़ ऊँची की, “मैं रांड हूँ आपके आँगन की।”

उन्होंने सिर हिलाया। “अब रेंगकर मेरे पास आ।”

मैं चारों हाथ-पैरों पर रेंगने लगी। आँगन की ठंडी ज़मीन मेरे घुटनों और हथेलियों को छू रही थी। जब मैं उनके पास पहुँची तो उन्होंने मेरा सर उठाया और अपने घुटने पर रख लिया। उनके हाथ मेरे बालों में थे।

उन्होंने मेहमानों से कहा, “ये अभी अधूरी है। कुछ दिनों में पूरी तरह तैयार हो जाएगी।”

उस रात उन्होंने मुझे अपने कमरे में नहीं बुलाया। मुझे अपने पुराने कमरे में ही सोने को कह दिया। लेकिन सोते समय मेरे कानों में उनकी आवाज़ गूँज रही थी। और मेरी जीभ बार-बार वही वाक्य दोहरा रही थी।

मैं रांड हूँ आपके आँगन की।

अगली सुबह जब मैं चाय लेकर गई तो उन्होंने बिस्तर पर बैठे-बैठे मुझे नंगी खड़ा रखा और बहुत देर तक सिर्फ देखा। फिर बोले, “आज रात से असली शुरुआत होगी। आँगन में।”

मेरे पेट के अंदर कुछ सिमट गया। डर था, लेकिन उसके नीचे एक अजीब सी बेचैनी भी थी। पिछले साढ़े तीन साल से कोई मुझे इस तरह नहीं देखता था। कोई इतनी साफ नीयत से नहीं चाहता था।

मैंने चाय का कप उनके हाथ में दिया। उनकी उँगलियाँ मेरे हाथ से छू गईं। उन्होंने धीरे से कहा, “आज रात जब मैं बुलाऊँ, तो गले में सिर्फ एक रस्सी लेकर आना। बाकी कुछ नहीं।”

मैंने सिर झुकाया।

“बोल।”

मेरी आवाज़ इस बार थोड़ी स्थिर थी।

“जी हुजूर। मैं रांड हूँ आपके आँगन की।”

उन्होंने मुस्कुराते हुए सिर हिलाया।

बाहर निकलते समय मेरे पैर काँप रहे थे। आँगन में नीम की पत्तियाँ हिल रही थीं। मुझे लग रहा था कि ये पेड़ भी जानता है कि आज रात यहाँ क्या होने वाला है।

और मैं… मैं तैयार हो रही थी।

रात के ग्यारह बजे उनके आदमी ने मुझे बुलाया। मैंने गले में मोटी रस्सी बाँधी और बाकी बदन नंगा रखा। आँगन में कदम रखते ही मेरे पैर थोड़ा थरथराने लगे। मोमबत्तियाँ जल रही थीं। नीम के पेड़ के चारों तरफ लाल रस्सियाँ लटकी हुई थीं। रणवीर कुर्सी पर बैठे थे। उनके दोनों तरफ वही दो मेहमान थे। तीनों शराब के गिलास घुमा रहे थे।

मेरे नंगे जिस्म पर उनकी निगाहें टकराईं तो एक ने नीचे से ऊपर तक देखा और होंठ चाटे। रणवीर ने मुझे पास बुलाया। जब मैं उनके सामने खड़ी हुई तो उन्होंने रस्सी का सिरा पकड़कर खींचा और मुझे अपने घुटनों के बीच खड़ा कर दिया। उनके दोनों हाथ मेरे स्तनों पर आ गए। उन्होंने उन्हें जोर से दबाया, निपल्स को अंगूठे और उंगली के बीच मरोड़ा। दर्द हुआ लेकिन मैं चुप रही। फिर उन्होंने झुककर एक निपल मुँह में ले लिया और दाँतों से हल्का काटा। मेरे मुँह से हल्की सिसकी निकल गई।

“आज रात ये आँगन तुम्हारा असल घर बनेगा,” उन्होंने कहा। “और तुम इसकी रांड। खुद बोलो।”

मेरी आवाज़ काँप रही थी। “मैं रांड हूँ आपके आँगन की।”

“और जोर से। इनके सामने।”

“मैं रांड हूँ आपके आँगन की!”

उन्होंने रस्सी खींचकर मुझे नीचे झुका दिया। मैं घुटनों के बल बैठ गई। उन्होंने अपनी पैंट खोली और मोटा, कड़ा लंड मेरे मुँह के सामने निकाल लिया। मैंने मुँह खोला। उन्होंने बालों में हाथ डालकर अपना लंड मेरे मुँह में धकेल दिया। मैंने चूसना शुरू किया। लंड गरम था और थूक से गीला होते ही और सख्त हो गया। वे मेरे सिर को आगे-पीछे करने लगे। कभी गहराई तक धकेलते तो मेरी आँखों में आँसू आ जाते, लेकिन वे रुकते नहीं थे। पीछे बैठे दोनों आदमी देख रहे थे। एक ने अपनी पैंट पर हाथ रखा हुआ था।

थोड़ी देर बाद उन्होंने लंड निकाला। लार की लकीर मेरे मुँह से उनकी जाँघ तक लटकी थी। उन्होंने मुझे खड़ा किया और नीम के पेड़ तक घसीटा। मेरी दोनों कलाईयाँ ऊपर उठाकर पेड़ की शाखा से बाँध दीं। हाथ ऊपर तन गए। पैर ज़मीन पर थे लेकिन पूरा वजन कलाईयों पर आ रहा था। रस्सी कसी हुई थी।

रणवीर मेरे पीछे आए। उन्होंने मेरी जाँघें फैलाईं और दो उंगलियाँ मेरी चूत में धकेल दीं। मैं पहले से गीली थी। उन्होंने उंगलियाँ अंदर-बाहर कीं, फिर तीसरी भी जोड़ दी। मेरे मुँह से आवाज़ निकलने लगी। उन्होंने कहा, “देखो कितनी गीली है ये। पहले से तरस रही थी।”

फिर उन्होंने अपना लंड मेरी चूत के मुँह पर रखा और एक जोरदार धक्के में पूरा अंदर घुसा दिया। दर्द इतना तेज था कि मैं चीख पड़ी। उन्होंने एक हाथ से मेरा मुँह दबाया और कमर हिलानी शुरू कर दी। हर धक्के के साथ मेरा शरीर रस्सियों में झूल रहा था। नीम की छाल मेरी पीठ रगड़ रही थी। उनके लंड की मोटाई मुझे पूरा खोल रही थी। वे धीरे नहीं जा रहे थे। जोर-जोर से पेल रहे थे। मेरी चूत की आवाज़ आँगन में गूँज रही थी—गीली, चिपचिपी आवाज़।

जब उन्होंने एक लंबा धक्का मारकर मेरे अंदर ही पानी छोड़ दिया तो मैं ढीली पड़ गई। लेकिन उन्होंने लंड अंदर ही रखा। फिर एक मेहमान आया। उसने भी पीछे से प्रवेश किया। उसका लंड थोड़ा पतला था लेकिन लंबा। वह रणवीर से ज्यादा तेज पेल रहा था। मेरी कलाईयाँ रस्सी में जलने लगी थीं। दूसरा मेहमान मेरे सामने आया और अपना लंड मेरे मुँह में ठूंस दिया। अब मैं दोनों तरफ से इस्तेमाल हो रही थी। मुँह में लंड और पीछे चूत में दूसरा। मेरी आँखों से आँसू बह रहे थे लेकिन शरीर प्रतिक्रिया दे रहा था। चूत खुद सिकुड़-सिकुड़ कर उनके लंड को पकड़ रही थी।

वे बारी-बारी से बदलते रहे। कभी एक चूत में तो दूसरा मुँह में। कभी दोनों मेरे स्तनों को मसलते हुए सिर्फ देखते रहे जबकि तीसरा मुझे पेल रहा था। एक बार तो एक ने मेरे मुँह से लंड निकालकर मेरे चेहरे पर थप्पड़ मारे और फिर से मुँह में डाल दिया। मैंने जो भी कहा वह सिर्फ गड़बड़ाई हुई आवाज़ें थीं।

जब तीनों एक दौर पूरा कर चुके तो उन्होंने मुझे खोल दिया। मैं ज़मीन पर गिर पड़ी। मिट्टी मेरे पसीने और उनके पानी से चिपक गई। रणवीर ने रस्सी का सिरा फिर से पकड़ा और खींचा।

“रेंग।”

मैं चारों हाथ-पैरों पर रेंगने लगी। घुटने और हथेलियाँ आँगन की ठंडी मिट्टी में धँस रही थीं। वे कुर्सियों पर बैठे मुझे देख रहे थे। रणवीर ने कहा, “सिर ऊँचा रख। बोलती रह।”

मैं रेंगते हुए बोल रही थी, “मैं रांड हूँ आपके आँगन की… मैं रांड हूँ आपके आँगन की…”

जब मैं उनके पास पहुँची तो उन्होंने मुझे अपनी कुर्सी के नीचे धकेल दिया। मैं उनके पैरों के बीच बैठ गई और उन्होंने मेरा सिर दबाकर फिर से अपना लंड मेरे मुँह में डाल दिया। इस बार वे आराम से शराब पीते रहे। कभी-कभी मेरा सिर जोर से दबा देते तो लंड मेरे गले तक चला जाता और मैं खांसने लगती। फिर भी वे नहीं निकालते।

मेहमान धीरे-धीरे उठकर चले गए। अब आँगन में सिर्फ हम दोनों बचे थे। रणवीर ने मुझे उठाया और चारखट जैसी एक लकड़ी की मेज पर चित लिटा दिया जो वे पहले से लगवाकर रखे थे। मेरे हाथ-पैर चारों कोनों से बाँध दिए। मैं पूरी तरह फैली हुई थी। उन्होंने मेरे ऊपर चढ़कर फिर से अपनी चूत में प्रवेश किया। इस बार उन्होंने मेरी दोनों टाँगें अपने कंधों पर रख लीं और बहुत गहराई तक पेलने लगे। हर धक्के पर उनकी थैली मेरी गाँड से टकरा रही थी। मेरी चूत अब पूरी तरह खुल चुकी थी और उनकी हर हरकत को साफ महसूस कर रही थी।

वे झुककर मेरे स्तन मुँह में ले रहे थे, काट रहे थे, चूस रहे थे। मेरी आवाज़ अब काबू में नहीं रह रही थी। मैं उनके कान में बार-बार वही वाक्य दोहरा रही थी क्योंकि उन्होंने कहा था कि रुकना नहीं है। “मैं रांड हूँ आपके आँगन की… आपकी रांड… सिर्फ आपकी…”

आखिर में उन्होंने बहुत जोर से धक्के मारे और फिर से मेरे अंदर ही सब कुछ छोड़ दिया। इस बार इतना ज्यादा कि जब उन्होंने लंड निकाला तो उनका पानी मेरी जाँघों पर बहने लगा। वे मुझ पर ही गिरे रहे। उनकी भारी साँसें मेरे गले पर पड़ रही थीं।

काफी देर बाद उन्होंने रस्सियाँ खोलीं। मैं हिल भी नहीं पा रही थी। उन्होंने मुझे अपने कमरे में उठाकर ले गए। नहलाने के बाद एक सफेद साड़ी फेंकी और बोले, “अब से हर रात आँगन में आना। अकेला हूँ या मेहमान हों, फर्क नहीं पड़ता।”

मैंने सिर झुकाया।

“बोल।”

इस बार मेरी आवाज़ में थकान थी लेकिन काँप नहीं थी।

“मैं रांड हूँ आपके आँगन की।”


उस रात के बाद सब कुछ बदल गया। आँगन अब सिर्फ जगह नहीं रह गया था। वह मेरा रोज का सच बन गया था। कभी वे मुझे पेड़ से बाँधकर छोड़ देते और दूर बैठकर सिर्फ देखते। कभी मेहमानों के सामने मुझे रेंगने और माँगने पर मजबूर करते। मेरी शर्म धीरे-धीरे घिसती गई। जब गले में रस्सी पड़ती तो मेरा शरीर खुद प्रतिक्रिया देने लगता। चूत गीली हो जाती, निपल्स सख्त हो जाते।

अब जब भी मैं आँगन में कदम रखती हूँ तो नीम की पत्तियाँ हिलती हैं और मुझे लगता है कि यह पेड़ भी जानता है कि मैं कौन हूँ।

मैं उनकी रांड हूँ।
इस आँगन की।
और अब यह बात सिर्फ उनके मुँह से नहीं, मेरे अपने मुँह से भी उतनी ही सच्चाई से निकलती है।

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