आंटी… बस एक बार

मेरा नाम रोहित है। उम्र चौबीस साल। कानपुर में रहता हूँ। पिछले महीने मेरे मौसी के बेटे की शादी थी। पूरा परिवार जयपुर चला गया। शादी तीन दिन की थी – सांगत, मेहंदी और फेरों वाला दिन। मैं अकेला गया क्योंकि पापा-मम्मी किसी और रिश्तेदार की शादी में व्यस्त थे।

शादी वाले घर में बहुत भीड़ थी। रिश्तेदार दूर-दूर से आए हुए थे। दूसरे दिन मेहंदी के शाम को मैं पहली बार साधना आंटी को देखा। वह मेरी दादी की किसी चचेरी बहन की बेटी थीं। मतलब बहुत दूर का रिश्ता। उम्र कोई अड़तीस-उन्तालीस साल की होंगी। गोरी, लंबी, भारी शरीर। साड़ी में उनका बदन ऐसे फिट था जैसे किसी ने गढ़ा हो। चूचियाँ बड़ी और भारी, कमर पतली, गांड गोल और मांसल। बाल लंबे, चेहरा आकर्षक। पति उनके साथ नहीं थे। सुना था कि दोनों के बीच ठीक नहीं चल रहा।

पहले दिन सिर्फ नजरें मिलीं। साधना आंटी ने मुझे देखा और हल्की सी मुस्कुरा दीं। “तू रोहित है न? कितना बड़ा हो गया।” आवाज में मिठास थी। मैंने नमस्ते किया और आगे बढ़ गया। लेकिन दिमाग में उनकी छवि घूमती रही। रात को जब सब सो गए तो मैं छत पर बैठा उनकी कल्पना करने लगा। उनकी साड़ी के अंदर का शरीर, उनकी जाँघें, उनकी चूत… लंड तन गई। मैंने मुठ मार ली।

मेहंदी के कार्यक्रम में महिलाएँ अंदर हॉल में थीं। मैं बाहर गार्डन में खड़ा था। अचानक साधना आंटी निकलकर आईं। उन्होंने पानी माँगा। मैंने गिलास दिया। उनके हाथ में मेहंदी लगी हुई थी। गिलास लेते समय उनकी उँगलियाँ मेरे हाथ से रगड़ गईं। उन्होंने जल्दी से हाथ खींच लिया लेकिन नजरें कुछ पल के लिए मिलीं।

“गर्मी बहुत है,” उन्होंने कहा।
“हाँ आंटी…”

वे चली गईं। लेकिन उस छोटे से स्पर्श ने मुझे बेचैन कर दिया। रात भर मुझे उनकी उँगलियों का स्पर्श याद आता रहा।

फेरों वाले दिन सुबह जल्दी उठ गया। बाथरूम के बाहर लाइन लगी थी। मैं इंतजार कर रहा था तभी साधना आंटी नहाकर निकलीं। बाल खुले और गीले, गले तक पानी के छींटे, साड़ी हल्की सी भीगी हुई। ब्लाउज शरीर से चिपक रहा था। उनकी चूचियों की गोलाई और निप्पलों का हल्का उभार साफ दिख रहा था।

मेरी निगाहें वहीं अटक गईं। साधना आंटी ने मुझे देखते हुए जल्दी से पल्लू ठीक किया। “रोहित… इधर क्यों खड़ा है?”
“बाथरूम के लिए…”
उन्होंने हल्की सी मुस्कान दी और जल्दी से चली गईं। लेकिन जाते-जाते उनकी गांड की हरकत मेरी आँखों में बस गई। उस दिन पूरा समय मैं उनके शरीर को याद करता रहा। दोपहर में जब वे मुझे पानी देने आईं तो मैंने जानबूझकर उनका हाथ छू लिया। उन्होंने हाथ तो खींच लिया लेकिन कुछ नहीं कहा। बस एक अजीब सी नजर से देखा।

शादी खत्म होने के बाद ज्यादातर मेहमान चले गए। घर में सिर्फ नजदीकी रिश्तेदार रह गए। मैं जिस कमरे में ठहरा था वह ऊपर की मंजिल पर था। साधना आंटी का कमरा भी उसी कॉरिडोर में था। रात के लगभग एक बजे मुझे प्यास लगी। पानी लेने निकला तो देखा कि साधना आंटी के कमरे का दरवाजा आधा खुला है। अंदर हल्की रोशनी थी।

मैं धीरे से पास गया। अंदर वे बिस्तर पर बैठी थीं। साया पहना हुआ था। पतला। उनकी जाँघें खुली हुई थीं और एक हाथ से वे अपनी गर्दन सहला रही थीं। शायद अकेलापन। मैं वहाँ से हटने ही वाला था कि उन्होंने सिर उठाया और मुझे देख लिया।

दोनों की नजरें मिलीं। कुछ पल की खामोशी। फिर उन्होंने धीरे से कहा, “रोहित… पानी पीने आया था?”
“हाँ आंटी…”
“अंदर आ जा। गिलास रख दे।”

मैं अंदर गया। दरवाजा पीछे से हल्का सा बंद हो गया। साधना आंटी ने गिलास लिया। उनके साया का गला ढीला था। चूचियों की गहरी दरार साफ दिख रही थी। मैंने नजरें फेर लीं।

“इतनी रात को जाग क्यों रहे हो?” उन्होंने पूछा।
“नींद नहीं आ रही आंटी।”
वे थोड़ी देर चुप रहीं। फिर बोलीं, “मुझे भी नहीं आ रही। पति के बिना अकेलापन सताता है।”

बातें होने लगीं। धीरे-धीरे व्यक्तिगत। उन्होंने बताया कि उनके पति पिछले एक साल से लगभग अलग ही रहते हैं। “शरीर की जरूरतें तो रहती हैं रोहित… लेकिन कोई नहीं होता।” उनकी आवाज में थकान और हल्की सी बेचैनी थी। मैं चुपचाप सुन रहा था। मेरी लंड तन चुकी थी।

तभी बिजली चली गई। अंधेरा हो गया। सिर्फ खिड़की से हल्की चाँदनी आ रही थी। साधना आंटी ने मेरा नाम लिया, “रोहित…” उनकी आवाज काँप रही थी। मैं उनके करीब चला गया। अंधेरे में मेरा हाथ उनकी जाँघ से जा लगा। उन्होंने हाथ नहीं हटाया। बस साँस तेज हो गई।

मैंने धीरे से कहा, “आंटी… अगर आपको बुरा लगे तो रोक दीजिएगा।”
उन्होंने कुछ नहीं कहा। मैंने हाथ और ऊपर सरकाया। साया के अंदर कोई पैंटी नहीं थी। मेरी उँगलियाँ उनकी जाँघ की नरम त्वचा पर फिसलती हुई उनकी चूत के पास पहुँच गईं। वे काँप उठीं लेकिन बोलीं नहीं।

मैंने उँगली से उनकी चूत छुई। गीली थी। हल्की सी। मैंने एक उँगली अंदर डाली। साधना आंटी ने मुँह दबा लिया। “रोहित… यह गलत है… हम रिश्तेदार हैं…”
“आंटी… बस एक बार… अगर आपको मना करना है तो अभी कह दीजिए।”

वे चुप रहीं। मैंने उँगली धीरे-धीरे अंदर-बाहर करनी शुरू की। उनकी चूत गरम और तंग थी। दूसरी उँगली भी डाल दी। साधना आंटी की कराह दबी हुई निकल रही थी। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा लेकिन हटाने की बजाय और अंदर दबा दिया। “धीरे… कोई सुन लेगा…”

मैंने उनका साया ऊपर किया। भारी चूचियाँ बाहर आ गईं। निप्पल सख्त। मैंने एक निप्पल मुँह में लिया और चूसा। साधना आंटी के हाथ मेरे बालों में थे। “आह्ह… मत चूसो इतना जोर से…” लेकिन उनका शरीर मेरे मुँह की तरफ दब रहा था। मैं दोनों चूचियाँ बारी-बारी से चूसता रहा। उँगलियाँ उनकी चूत में तेज हो गईं। दस-बारह मिनट बाद वे काँपते हुए झड़ गईं। पानी मेरी हथेली पर लग गया।

वे जोर से साँस ले रही थीं। “अब जा… किसी ने देख लिया तो…”
मैं उठा। मेरी लंड पैंट में फटी जा रही थी। साधना आंटी ने मेरी तरफ देखा। उनकी आँखों में शर्म और हल्की सी इच्छा दोनों थीं। “कल… अगर मौका मिला तो…” इतना कहकर उन्होंने चेहरा दूसरी तरफ कर लिया।

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