मेरा नाम सोनाली है। उम्र सत्ताईस साल हो गई है। गुरुग्राम में रहती हूँ अपने पति प्रकाश के साथ एक अच्छे सोसाइटी वाले फ्लैट में। प्रकाश एक सोशल मीडिया कंपनी में एचआर है। सुबह लगभग नौ बजे ऑफिस निकल जाता है और ज्यादातर रात के आठ-नौ बजे ही घर लौटता है। हमारी शादी को दो साल पूरे हो चुके हैं। शादी से पहले मैं दिल्ली में रहती थी। उस समय मेरी जिंदगी बिलकुल अलग थी। शरीर मेरा खतरनाक किस्म का है। लोग सड़क पर पीछे मुड़-मुड़कर देखते हैं। कद साढ़े पाँच फुट का है। गोरी और चमकदार त्वचा। चेहरा तेज और आकर्षक। आँखों में हमेशा एक गंदी सी चमक रहती है। स्तन 36डी साइज के भारी और गोल हैं। निप्पल बड़े और बहुत संवेदनशील। कमर 26 की पतली। गाँड 38 की पूरी गोल और उभरी हुई। जाँघें मोटी और मुलायम। शादी से पहले मैंने कम से कम दस अलग-अलग लंड लिए थे। किसका लंड है, कैसा है, लंबा है या मोटा, गोरा है या काला—मुझे कभी कोई फर्क नहीं पड़ा। एक लंड पर टिके रहना मेरी फितरत में ही नहीं है। जब तक नया लंड नहीं मिलता, चूत की प्यास शांत नहीं होती। शादी के बाद भी तीन-चार नए लंड ले चुकी हूँ, लेकिन पिछले छह महीनों से कोई नया लंड हाथ नहीं लगा। प्रकाश अच्छी तरह चोदता है। जोर से पेलता है, गालियाँ भी देता है जब मूड में होता है। लेकिन नई-नई लंड की आदत मुझे इतनी गहरी पड़ चुकी है कि बिना बदले मन नहीं भरता। मेरी चुदाई की बहुत सारी कहानियाँ हैं। आज उनमें से एक कहानी सुनाऊँगी।
उस दिन की सुबह प्रकाश ऑफिस जाने से पहले मुझे माथे पर चूमकर निकला। “देर से आऊँगा शायद। मीटिंग है।” मैंने हाँ में जवाब दिया और उसे दरवाजे तक छोड़ने गई। पिछले तीन-चार दिनों से हमारे बीच चुदाई नहीं हुई थी। प्रकाश थककर आता था। कभी सिर दर्द की शिकायत करता, कभी ऑफिस का स्ट्रेस बताता। मैं भी ज्यादा जोर नहीं डालती थी। लेकिन शरीर नहीं मान रहा था। सुबह उठते ही चूत में हल्की-हल्की खुजली शुरू हो गई थी। जैसे कोई धीमी सी आग सुलग रही हो अंदर। नाश्ता बनाया। पोहा खाया। टीवी चालू किया। लेकिन ध्यान कहीं नहीं लग रहा था। बार-बार पैरों को रगड़ रही थी। चूत की पंखुड़ियाँ हल्की सी गीली होने लगी थीं।
घड़ी में साढ़े नौ बज रहे थे। मैं बेडरूम में गई। आईने के सामने खड़ी रही। कपड़े अभी भी पहने हुए थे—ढीला सा टॉप और लोअर। लेकिन अंदर से शरीर पहले से गरम हो रहा था। मैंने टॉप उतारा। ब्रा में बंद भारी स्तन बाहर की तरफ धकेले जा रहे थे। ब्रा के हुक खोले। स्तन मुक्त हो गए। निप्पल पहले से कड़े थे। मैंने दोनों हाथों से मसला। हल्की कराह निकल गई। फिर लोअर और पैंटी एक साथ नीचे कर दिए। अब पूरी नंगी खड़ी थी।
आईने में अपना नंगा बदन देखा। गोरी चमकदार त्वचा पर सुबह की रोशनी फैल रही थी। भारी 36डी के स्तन गोल और सघन थे, निप्पल गुलाबी और तने हुए खड़े थे। पतली कमर से लेकर चौड़ी और उभरी गाँड तक का कर्व इतना सेक्सी था कि खुद को देखकर भी चूत में हलचल मच जाती। जाँघें मोटी, मुलायम और चिकनी थीं। उनके बीच गुलाबी चूत हल्के बालों वाली और पहले से चमक रही थी। पूरा शरीर ऐसा गदराया और भूखा लग रहा था जैसे कोई भी मर्द देख ले तो लंड तुरंत खड़ा कर ले।
मैं बिस्तर पर लेट गई। सिरहाने तकिया लगाया। दोनों टाँगें फैलाईं। एक हाथ से अपने स्तन को मसलने लगी। निप्पल को उँगलियों के बीच लेकर मरोड़ा। दूसरे हाथ को धीरे-धीरे नीचे ले गई। पहले जाँघों के अंदरूनी हिस्से को सहलाया। फिर चूत की पंखुड़ियों पर उँगली फेरी। हल्की सी गीली थी। क्लिट पर गोला बनाने लगी। खुजली एकदम तेज हो गई। आँखें बंद कर लीं। उँगली अंदर डाली। गरम और नरम दीवारें मिल गईं। धीरे-धीरे अंदर-बाहर करने लगी। दूसरी उँगली भी डाल दी। अब दो उँगलियाँ चूत में चली रही थीं। आवाज आने लगी—चप-चप।
दिमाग में पुराने लंड घूमने लगे। दिल्ली वाले वो लंबे वाले लड़के का लंड याद आया जो बहुत गहराई तक जाता था। फिर वो मोटा वाला जिसकी नसें उभरी हुई थीं। शादी के बाद वाला वो ड्राइवर याद आया जिसने कार में ही चोदा था। हर एक का अंदाज अलग था। लेकिन पिछले छह महीने से सिर्फ प्रकाश का ही लंड मिला था। अच्छा था, मोटा भी था, लेकिन नया नहीं था। नई लंड की भूख अलग होती है। वो पहली बार वाला रोमांच, वो अजनबी गंध, वो अलग अंदाज से पेलना—वो सब याद करके चूत और गीली हो गई।
उँगली की गति तेज कर दी। तीसरी उँगली भी अंदर घुसा दी। कमर अपने आप ऊपर-नीचे हिलने लगी। दूसरे हाथ से दोनों स्तनों को जोर-जोर से मसल रही थी। निप्पल इतने कड़े हो गए थे कि दर्द होने लगा लेकिन मजा भी आ रहा था। “आह्ह… और अंदर… फाड़ दे किसी… नया लंड चाहिए…” खुद से बातें करने लगी। आवाज दबी-दबी निकल रही थी। बिस्तर पर पानी के धब्बे फैलने लगे। जाँघें काँप रही थीं। मैंने उँगलियाँ और तेज की। क्लिट पर अंगूठे से दबाव देते हुए अंदर की उँगलियाँ घुमाने लगी। शरीर अकड़ने लगा। साँसें रुकने लगीं। अचानक एक जोर का झटका लगा। चूत ने उँगलियों को जकड़ लिया। पानी की धार निकल पड़ी। मैं तकिया दबाकर कराह उठी। पहली बार झड़ गई।
लेकिन मन नहीं भरा। खुजली पूरी तरह मिटी नहीं थी। उल्टे और साफ महसूस हो रही थी। मैंने उँगलियाँ निकालीं। चमक रही थीं। मुँह में ले लेकर चूस लिया। अपनी ही चूत का स्वाद। फिर से उँगलियाँ वापस चूत में डाल दीं। इस बार और तेज गति से। दूसरी हाथ से गाँड के छेद को भी सहलाने लगी। हल्की सी उँगली वहाँ भी घुमाई। शरीर फिर से गरम होने लगा। दिमाग में कोई अजनबी लंड की कल्पना करने लगी—मोटा, नसदार, जो बिना पूछे जोर से पेल दे। आँखें बंद किए हुए कमर उछालने लगी। स्तन हाथों से दब रहे थे। निप्पल मरोड़े जा रहे थे। “कोई आ जाए… कोई नया… चूत में डाल दे…” गाली निकालने लगी खुद से। दूसरी बार झड़ने के करीब थी। उँगलियाँ पागलों की तरह चल रही थीं। चूत की आवाज पूरे कमरे में गूँज रही थी। शरीर काँप उठा। फिर से पानी निकल पड़ा। इस बार और ज्यादा। जाँघें गिली हो गईं। बिस्तर गीला हो गया।
मैं हाँफते हुए लेटी रही। उँगलियाँ अभी भी अंदर थीं। धीरे-धीरे निकालीं। चूत हल्की सूजी हुई लग रही थी। लेकिन खुजली पूरी तरह शांत नहीं हुई थी। शरीर में एक अजीब सी बेचैनी बाकी थी। जैसे उँगलियों से काम नहीं चलने वाला। नया लंड चाहिए था। कोई अजनबी। कोई ऐसा जो पहली बार चोदे और जोर से चोदे।
घड़ी की तरफ देखा। लगभग साढ़े दस बज रहे थे। कमरे में मेरी गंध फैली हुई थी। नंगा बदन पसीने से चमक रहा था। स्तन पर उँगलियों के लाल निशान थे। जाँघों के बीच पानी की चमक। आँखों में अभी भी वो वाली भूख बाकी थी।
मैं उठकर आईने के सामने खड़ी हो गई। नंगा बदन फिर से निहारा। हाथ से चूत सहलाई। अभी भी गीली थी। खुजली हल्की-हल्की महसूस हो रही थी। मन में एक ही बात घूम रही थी—आज कोई नया लंड मिल जाए तो कितना अच्छा हो।
फिंगरिंग के बाद भी मन नहीं भरा था। चूत अभी भी मचल रही थी। उँगलियों से जो पानी निकला था वो जाँघों पर सूखने लगा था लेकिन अंदर की जलन वैसी की वैसी बनी हुई थी। मैं बिस्तर से उठी। नंगी ही कमरे में चहल-कदमी करने लगी। हर कदम के साथ स्तन हिल रहे थे। आईने के सामने जाकर रुकी। चेहरा लाल था। आँखों में वो वाली भूख साफ झलक रही थी। हाथ से फिर से चूत सहलाई। अभी भी गीली थी। हल्की सी उँगली अंदर ली तो शरीर ने फिर से प्रतिक्रिया दी। लेकिन उँगली अब काफी नहीं लग रही थी। लंड चाहिए था। नया लंड। कोई अजनबी।
मैंने अलमारी खोली। एक पतला सा गाउन निकाला। हल्के गुलाबी रंग का। रेशमी। अंदर कुछ नहीं पहना। न ब्रा, न पैंटी। गाउन पहनते ही स्तन साफ साफ उभर आए। निप्पल कपड़े से चिपककर तने हुए दिख रहे थे। गाउन की स्लिट जाँघ तक खुली हुई थी। हर कदम पर जाँघें झलक जाती थीं। मैंने बाल बिखरे ही छोड़ दिए। आईने में देखा तो लग रहा था जैसे जानबूझकर किसी को लुभाने निकली हूँ। शायद थी भी।
बाहर हॉल में आई। घड़ी में बारह बज रहे थे। पेट में भूख भी थी और नीचे भी। किचन में गई। कुछ बनाया नहीं। बस फ्रिज से ठंडा पानी निकाला और पी लिया। फिर खिड़की के पास वाली कुर्सी पर जाकर बैठ गई। गाउन का पल्ला एक तरफ सरका दिया। एक जाँघ दूसरी पर चढ़ाई। चूत की हवा लगने से हल्की ठंडक हुई लेकिन मजा आया। बाहर सड़क और सामने वाली बिल्डिंग साफ दिख रही थी।
एक बजे के करीब खाना खाने का मन हुआ लेकिन कुछ बनाने का नहीं। मैं खिड़की के पास ही बैठी रही। गाउन इतना पतला था कि अगर कोई ध्यान से देखे तो स्तनों की शक्ल और निप्पल साफ नजर आ जाएँ। मैं जानबूझकर ऐसे ही बैठी थी। मन में अजीब से ख्याल आ रहे थे। अचानक सामने वाली बिल्डिंग के गेट पर एक डिलीवरी बॉय दिखा। हाथ में थैला। हेलमेट उतार रहा था। जवान था। शरीर ठीकठाक लग रहा था। मैंने ध्यान से देखा। वो अंदर गया। कुछ देर बाद फिर बाहर निकला। बाइक पर बैठकर चला गया।
उसी पल दिमाग में एक ख्याल कौंधा।
क्यों न किसी ऐसे लड़के से चुदवा लिया जाए? डिलीवरी बॉय। नया लंड भी मिल जाएगा। कोई जानने वाला भी नहीं होगा। कानों कान खबर तक नहीं पहुँचेगी। पति ऑफिस में। सोसाइटी में कोई पूछने वाला नहीं। बस एक अजनबी आए, चोदे, और चला जाए।
मैंने ख्याल को दबाने की कोशिश की। लेकिन चूत ने और जोर से मचलना शुरू कर दिया। जैसे वो ख्याल सुन रही हो। मैंने टाँगें और फैला दीं। गाउन ऊपर हो गया। नंगी चूत खिड़की के पास हवा में थी। उँगली फिर से चली गई। लेकिन इस बार मन नहीं लगा। उँगली निकाल ली।
बहुत देर तक सोचती रही। सही-गलत का हिसाब लगाती रही। फिर अचानक फैसला कर लिया। मोबाइल उठाया। फूड ऐप खोला। पिज़्ज़ा सर्च किया। एक लार्ज पिज़्ज़ा चुना। एड्रेस कन्फर्म किया। पेमेंट कैश ऑन डिलीवरी रखा। ऑर्डर प्लेस करते समय दिल जोर से धधक रहा था। आँखों के सामने सिर्फ एक बात थी—काश आने वाला लड़का हट्टा-कट्टा हो। अच्छा लंड वाला हो।
ऑर्डर हो गया। बीस मिनट का समय दिखा। मैं कुर्सी से उठी। गाउन ठीक किया। लेकिन निप्पल अभी भी साफ उभर रहे थे। बाल संभाले नहीं। चेहरे पर हल्की क्रीम लगाई ताकि चमक बनी रहे। फिर दरवाजे के पास वाले सोफे पर बैठ गई। टाँगें क्रॉस किए। हर दो मिनट पर घड़ी देख रही थी। चूत की खुजली अब और तेज हो गई थी। जैसे शरीर जानता हो कि नया लंड आने वाला है।
ठीक बीस मिनट बाद घंटी बजी।
दिल बैठ सा गया। मैंने गहरी साँस ली और दरवाजा खोला।
सामने एक लड़का खड़ा था। उम्र बाईस-तेईस की होगी। गोरा सा चेहरा। बाल थोड़े बिखरे। कंधे चौड़े। टी-शर्ट में बदन की बनावट साफ झलक रही थी। पतला नहीं था। ठीकठाक मांसपेशियाँ थीं। जींस में लम्बी टाँगें। हाथ में पिज़्ज़ा का बॉक्स।
“मैडम… आपका पिज़्ज़ा,” उसने कहा। आवाज साफ थी।
मैंने मुस्कुराते हुए दरवाजा और खोला। “अंदर रख दो। पैसे अंदर से लाती हूँ।”
वो थोड़ा हिचकिचाया लेकिन अंदर आ गया। मैंने दरवाजा बंद कर दिया। वो हॉल में खड़ा रहा। मैं पैसे लेने कमरे की तरफ मुड़ी। चलते समय जानबूझकर थोड़ा धीरे चली। गाउन पतला था। पीछे से मेरी गाँड की गोलाई साफ उभर रही होगी। हर कदम पर गाँड हिल रही थी। मुझे पता था वो देख रहा है।
कमरे में जाकर पर्स से पैसे निकाले। आईने में एक नजर खुद को देखा। निप्पल गाउन से पूरी तरह चिपककर तने हुए थे। चूत की नमी जाँघों तक लग रही थी। मैंने पैसे लिए और वापस हॉल में आई।
लड़का अभी भी वहीं खड़ा था। उसकी निगाहें मेरे शरीर पर थीं। जब मैं करीब पहुँची तो उसने जल्दी से नजरें हटाईं। लेकिन देर हो चुकी थी। मैंने देखा था।
मैंने पैसे उसकी तरफ बढ़ाए। “कितने हुए?” “चार सौ बीस,” उसने कहा। आवाज थोड़ी भारी हो गई थी।
मैंने नोट दिए। उसकी उँगलियाँ मेरे हाथ से छू गईं। दोनों एक पल रुक गए। मैंने हाथ नहीं हटाया तुरंत। वो भी नहीं हटाया। फिर उसने पैसे लिए।
“नमस्ते,” उसने कहा और जाने को मुड़ा।
मैंने अचानक बोल दिया, “पानी पी लोगे? धूप तेज है बाहर।”
वो रुका। मेरी तरफ देखा। निगाहें फिर से मेरे स्तनों पर चली गईं। गाउन के अंदर कुछ नहीं है ये साफ समझ में आ रहा होगा। उसने गला साफ किया।
“जी… ठीक है।”
मैंने मुस्कुरा दिया। “बैठो। अभी लाती हूँ।”
वो सोफे पर बैठ गया। मैं किचन की तरफ गई। पानी का गिलास भरते समय दिल जोरों से धधक रहा था। चूत की खुजली अब असहनीय हो गई थी। आईने में अपना गाउन देखा। निप्पल पूरी तरह तने हुए। शरीर तैयार था।
गिलास लेकर वापस आई। उसके करीब जाकर गिलास दिया। इस बार जानबूझकर और करीब खड़ी हो गई। मेरी जाँघ उसके घुटने से लगभग छू रही थी।
“नाम क्या है तुम्हारा?” मैंने पूछा। “राहुल,” उसने जवाब दिया।
मैंने उसके शरीर को ध्यान से देखा। कंधे अच्छे थे। बाजू में हल्की नसें। सीना चौड़ा। पेट सपाट। जींस में उभार साफ नहीं दिख रहा था लेकिन बदन देखकर लगता था कि लंड भी ठीकठाक होगा। चेहरा भी बुरा नहीं था। आँखें बड़ी थीं। जब मेरी निगाहें उससे मिलीं तो उसने नजर नहीं हटाई।
“अकेला रहता है?” मैंने धीमे से पूछा। “जी। रूम पर।”
मैंने गिलास उसके हाथ में और कसकर दिया। उँगलियाँ फिर छू गईं। इस बार मैंने हटाई नहीं।
“अच्छा लग रहा है तुम्हारा बदन,” मैंने साफ कह दिया। राहुल की साँस थोड़ी तेज हो गई। उसने गिलास नीचे रखा। मेरी तरफ देखा।
“मैडम…” “सोनाली। नाम से बुलाओ।”
कमरे में सन्नाटा पसर गया। सिर्फ पंखे की आवाज आ रही थी। मेरी चूत की धड़कन साफ महसूस हो रही थी। राहुल अभी भी बैठा था। लेकिन उसकी निगाहें अब छुप नहीं रही थीं। वो मेरे स्तनों को देख रहा था। निप्पलों को देख रहा था। और मैं जानबूझकर साँस ले-लेकर उन्हें और तना रही थी।
मैं राहुल के और करीब खिसक गई। गाउन का पल्ला एक तरफ था। जाँघ साफ दिख रही थी। मैंने धीमे से पूछा,
“टिप चाहिए?”
राहुल ने मेरी आँखों में देखा। गला सूखा। “जी… मैडम।”
मैंने मुस्कुराते हुए गाउन के फीते खोल दिए। गाउन कंधों से सरककर फर्श पर गिर गया। मैं पूरी नंगी उसके सामने खड़ी थी। भारी स्तन, तने निप्पल, चमकती हुई गीली चूत।
“टिप में अपना शरीर दे रही हूँ। लेना है तो ले। नहीं तो पिज़्ज़ा लेकर निकल जा।”
राहुल की साँसें तेज हो गईं। उसने मुझे ऊपर से नीचे तक देखा। लंड पैंट में तन चुका था। मैंने इशारे से कहा,
“निकाल। दिखाने में शर्म आती है क्या?”
उसने जल्दी-जल्दी बेल्ट खोली। जींस और अंडरवियर एक साथ नीचे सरका दिए। लंड बाहर निकल आया। साढ़े छह इंच का। मोटा। ऊपर की तरफ मुड़ा हुआ। नसें साफ उभरी हुईं। टोपा चमक रहा था। मैंने झुककर उसे हाथ में लिया। गर्म और सख्त। हल्के से ऊपर-नीचे किया।
“ये टिप चलेगी?” मैंने पूछा।
राहुल सिर्फ सिर हिला पाया। मैंने लंड के टोपा पर उँगली फेरी और बोली, “बोल। चलेगी या नहीं?” “चलेगी मैडम… बहुत अच्छी है।”
मैं घुटनों के बल बैठ गई और राहुल का लंड दोनों हाथों में पकड़ लिया। पहले टोपा चाटा, फिर पूरा मुँह में ले लिया और गला तक धकेलने लगी। उसने मेरे बाल पकड़कर जोर-जोर से मुँह चोदना शुरू कर दिया, थूक बह रहा था और मैं गोलियाँ निकाल रही थी—“चूस… पूरा निगल ले रंडी…”
राहुल सोफे पर लेट गया और मैं उसके ऊपर उलटी चढ़ गई। मेरी चूत उसके मुँह पर थी और लंड मेरे मुँह में। दोनों एक साथ चाटने और चूसने लगे—वो मेरी क्लिट चूस रहा था, मैं उसका लंड गला तक ले जा रही थी। कमरे में सिर्फ चप-चप और मेरी गंदी कराहें गूँज रही थीं।
मैं लेटी रही और राहुल ने मेरे भारी स्तनों को दोनों तरफ से दबाकर अपना लंड बीच में फँसा लिया। थूक लगाकर जोर-जोर से रगदने लगा। निप्पल उसके लंड से छू रहे थे। मैं नीचे से देख रही थी और बोली—“स्तनों को भी चोद… आज पूरा शरीर इस्तेमाल कर…”
राहुल ने मुझे खिड़की के पास खड़ा करके आगे झुका दिया। मेरी गाँड ऊपर थी, टाँगें फैली हुईं। उसने पीछे से एक झटके में लंड अंदर पेला और मेरी कमर पकड़कर जोर-जोर से ठोकने लगा। मैं शीशे पर हाथ रखकर गाली निकाल रही थी—“फाड़ दे… और तेज… मादरचोद…”
मुझे बिस्तर पर लिटाकर राहुल ने मेरी दोनों टाँगें अपने कंधों पर रख लीं। पूरा लंड गहराई तक जा रहा था। हर धक्के के साथ मेरी आवाज टूट रही थी और मैं खुद अपनी टाँगें और फैला रही थी। “पूरा अंदर… बच्चेदानी तक ले जा…”
“कितने लंड चोद चुकी हो?” उसने हाँफते हुए पूछा। “गिनना बंद कर दिया। तू बस पेल।”
मैंने गति बढ़ा दी। ऊपर-नीचे। स्तन उसके चेहरे के सामने झूलने लगे। राहुल ने दोनों मुँह में लेने की कोशिश की। मैंने उसका सिर दबा दिया। निप्पल उसके मुँह में चले गए। वो जोर-जोर से चूसने लगा। दाँत भी लगा दिए। दर्द और मजे का मिश्रण था।
मैंने उसकी छाती पर नाखून गड़ा दिए और जोर-जोर से कूदने लगी। चूत की आवाज आने लगी। गीली-गीली। राहुल के हाथ मेरी गाँड पर थे। वो नीचे से भी धक्के मार रहा था। अचानक उसने कहा,
“मैडम… गांड भी दे दो। बहुत मन कर रहा है।”
मैंने तुरंत गति रोकी। उसके बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा और गाली दी,
“तेरे जैसे भिखारी को गांड नहीं दूँगी। इसे मैंने सबसे बड़े रंडीबाज अमीर के लिए रखा है। चुपचाप चोद और निकल।”
राहुल की आँखें फटी रह गईं। लेकिन लंड और सख्त हो गया। मैंने फिर से हिलना शुरू किया। इस बार और तेज।
“ले रंडी का लंड… जोर से ले… चूत फाड़ दे आज…” मैं खुद गाली निकाल रही थी।
राहुल ने अचानक मुझे उलटा कर दिया। सोफे पर लिटाया। मेरी दोनों टाँगें उसके कंधों पर रखीं और खड़े होकर पेलने लगा। गहराई तक। हर धक्के के साथ मेरी गाँड सोफे पर पट-पट की आवाज कर रही थी। स्तन इधर-उधर हिल रहे थे। मैंने अपने ही स्तन पकड़कर मसले।
“आह्ह… ऐसे ही… और तेज… पूरा अंदर… मादरचोद…”
वो मेरी टाँगें और फैलाकर कमरतोड़ गति से चोदने लगा। पसीना दोनों के शरीर पर चमक रहा था। चूत की आवाज पूरे हॉल में गूँज रही थी। मैंने उसके हाथ पकड़कर अपने गले पर रख दिए।
“दबा… हल्का गला दबा… और पेल…”
राहुल ने गला हल्का दबाया और धक्के और तेज कर दिए। मेरी आँखों के सामने अंधेरा छा गया। मजा सीमा पार कर गया। शरीर अकड़ गया। चूत ने उसके लंड को जोर से जकड़ लिया। मैं काँपते हुए झड़ गई। पानी की धार निकली। राहुल भी रोक नहीं पाया। गरम वीर्य की तेज धार मेरे अंदर छोड़ दी। एक-एक करके। पूरा भर दिया।
दोनों हाँफ रहे थे। राहुल मेरे ऊपर गिरा रहा। लंड अभी भी अंदर था। थोड़ी देर बाद उसने निकाला। वीर्य मेरी जाँघों से बहकर सोफे पर गिरने लगा। मैं करवट लेकर लेटी रही।
राहुल ने पैसे और पिज़्ज़ा का बॉक्स उठाया। कपड़े पहनने लगा। जाते-जाते बोला,
“मैडम… फिर कभी ऑर्डर करना।”
मैंने आँखें खोले बिना जवाब दिया, “जब चूत में खुजली होगी… तब।”
दरवाजा बंद होते ही मैं नंगी ही सोफे पर फैली रही। जाँघों के बीच उसका पानी अभी भी गर्म था। चूत हल्की सूजी हुई थी। लेकिन खुजली पूरी तरह मिट चुकी थी।
पहली बार किसी डिलीवरी बॉय से चुदवाया था। और मजा… पुराने दस लंडों से किसी भी तरह कम नहीं था।
