बारिश वाली रात में देवर ने अकेली भाभी की चुदाई | देवर भाभी सेक्स स्टोरी

थाली में रोटी रखते समय आवाज़ आई।

“ और गरम रोटी ले आऊँ?”

मैंने सिर हिलाया। वो रसोई से निकली। साड़ी की पल्लू सरक कर कमर तक आ गई थी। पीछे से बाँधे बालों में से दो-तीन लटें छूट कर गाल पर चिपक रही थीं। पसीना हल्का-हल्का चमक रहा था।

मैं सौरभ हूँ। बत्तीस साल। दिल्ली में प्राइवेट नौकरी। पिछले हफ़्ते ट्रांसफर हो गया था इस शहर में। किराए का फ्लैट अभी मिला नहीं था, सो भैया के यहाँ ठहर गया। भैया दो हफ़्ते की ट्रेनिंग पर बाहर थे। घर में सिर्फ भाभी और मैं।

भाभी का नाम है रेणु। उम्र उनतीस। कद ठीक-ठाक। गोरी नहीं, गेहुँआ रंग। लेकिन रंगत साफ। आँखें थोड़ी बड़ी, बात करते समय सीधे देखती हैं। साड़ी या सूट में बदन का आकार छिपता नहीं। छाती भारी है, साड़ी का पल्लू बार-बार सरकता है। कमर पतली नहीं, लेकिन हिप्स भरे हुए। चलते समय हल्का लचक होता है। पहले जब भैया होते थे तो वो मुझसे सिर्फ जरूरी बात करती थी। अब अकेले में आवाज़ थोड़ी नरम हो गई है।

रात का खाना खा लिया। मैं बैठक में टीवी चालू किए बैठा था। वो बर्तन धोकर आई और मेरे सामने वाली कुर्सी पर बैठ गई। पहले कभी नहीं बैठती थी इतनी देर।

“किराए का फ्लैट मिला या नहीं?” उसने पूछा।

“अभी दो-तीन दिन लगेंगे।”

“कोई जल्दी नहीं। जब तक चाहो रह सकते हो।” इतना कह कर वो चुप हो गई। टीवी की आवाज़ के बीच सिर्फ पंखे की आवाज़ चल रही थी।

मैंने साइड से देखा। साड़ी का पल्लू फिर सरक आया था। ब्लाउज़ का गहरा गला साफ दिख रहा था। उसने ठीक नहीं किया। जानबूझकर या भूल से, पता नहीं।

“पानी पियोगे?” वो उठी।

“हाँ।”

वो रसोई गई। मैंने टीवी का वॉल्यूम कम कर दिया। वापस आकर गिलास मेरे हाथ में दिया। उंगलियाँ छू गईं। ठंडी नहीं थीं। थोड़ी गर्म। गिलास देते समय उसकी नज़र मेरे चेहरे पर रुकी। दो पल। फिर हटा ली।

“सो जाओगे या और बैठोगे?” उसने पूछा।

“थोड़ी देर।”

वो अपने कमरे की तरफ चली गई। दरवाज़ा पूरी तरह बंद नहीं किया। हल्का सा खुला छोड़ दिया।

मैं बैठा रहा। गिलास खाली कर चुका था। दिमाग में उसकी वो दो पल वाली नज़र घूम रही थी। और वो पल्लू जो उसने ठीक नहीं किया था।

अगली सुबह मैं नहा कर निकला तो वो आँगन में कपड़े सुखा रही थी। साड़ी की जगह इस बार सूट पहना था। दुपट्टा कंधे पर लापरवाही से डाला हुआ। झुक कर क्लिप लगाते समय उसकी कमर की तरफ मेरी नज़र चली गई। सूट पीछे से थोड़ा चिपक रहा था।

“चाय बना दूँ?” उसने बिना मुड़े पूछा।

“मैं बना लेता हूँ।”

“नहीं, बैठो।”

मैं बैठक में जा कर अखबार खोल लिया। थोड़ी देर में वो चाय लेकर आई। कप रखते समय उसकी बाजू मेरे कंधे से रगड़ गई। हल्की सी। कोई माफी नहीं माँगी। बस कप रख कर चली गई।

दोपहर को बिजली चली गई। पंखा बंद। कमरा गर्म। मैं छत पर चला गया। थोड़ी देर बाद वो भी आई। हाथ में दो गिलास नींबू पानी। एक मेरे पास रख दिया। खुद पास वाली दीवार से लगा कर खड़ी हो गई।

धूप तिरछी पड़ रही थी। उसके गले पर पसीने की छोटी-छोटी बूँदें थीं। दुपट्टा पूरी तरह कंधे से सरक चुका था। ब्लाउज़ के ऊपर की हड्डी साफ दिख रही थी।

“भैया कब आ रहे हैं?” मैंने पूछा।

“बारह दिन और।” उसने जवाब दिया। आवाज़ में कोई शिकायत नहीं थी। सिर्फ जानकारी।

हम दोनों चुपचाप खड़े रहे। नींबू पानी खत्म हो चुका था। गिलास उसकी उंगलियों में घूम रहा था।

अचानक हवा का एक झोंका आया। उसका दुपट्टा उड़ कर मेरे हाथ से छू गया। उसने पकड़ने की बजाय देखा। मैंने भी देखा। दुपट्टा मेरे हाथ में था।

वो आगे बढ़ी। दुपट्टा लेने के लिए। मेरे बहुत करीब आ गई। इतनी करीब कि उसकी साँस मेरे गले पर महसूस हुई। दुपट्टा लेते समय उसकी उंगलियाँ मेरी हथेली पर रुक गईं। एक सेकंड से ज्यादा।

फिर उसने दुपट्टा लिया और सीढ़ियों की तरफ बढ़ गई।

नीचे जाते समय उसकी आवाज़ आई, बिना मुड़े—

“शाम को बाज़ार से कुछ सामान लाना है। चलोगे?”

मैंने जवाब दिया, “हाँ।”

बाज़ार से लौटते समय बारिश शुरू हो गई। अचानक। दोनों बिना छाते के थे। रिक्शा मिला नहीं। एक पुरानी बस स्टॉप के नीचे खड़े हो गए। जगह कम थी। उसके शरीर का एक हिस्सा मेरे बाजू से सटा हुआ था। गीला सूट शरीर से चिपक रहा था। ब्लाउज़ के अंदर ब्रा की लाइन साफ दिख रही थी।

वो बोली, “रुक जाती तो बेहतर था।”

मैंने कुछ नहीं कहा। बारिश की आवाज़ में उसकी साँसें भी मिल रही थीं। एक बार उसका हाथ मेरे हाथ से टकराया। इस बार किसी ने नहीं हटाया। दो-तीन सेकंड तक उंगलियाँ एक-दूसरे से लिपटी रहीं। फिर बारिश थमने लगी।

घर पहुँचे तो दोनों पूरी तरह भीग चुके थे। उसने कहा, “नहा लो पहले। सर्दी लग जाएगी।”

मैं नहा कर निकला तो वो भी नहा चुकी थी। सूट की जगह इस बार ढीला कुर्ता और पैजामा पहना था। बाँधने वाले बाल खुले थे। गीले बालों से पानी की बूँदें कंधों पर गिर रही थीं। कमरा गर्म था। पंखा चल रहा था।

रात का खाना दोनों ने चुपचाप खाया। बर्तन उसने धोए। मैं बैठक में बैठा रहा। थोड़ी देर बाद वो आई और मेरे पास वाली कुर्सी पर बैठ गई। टीवी चालू था लेकिन आवाज़ कम रखी हुई थी।

“तुम्हें यहाँ रहना ठीक लग रहा है?” उसने अचानक पूछा।

“हाँ।”

“अकेला घर… कभी-कभी अजीब लगता है।” इतना कह कर वो चुप हो गई। उसकी उंगलियाँ कुर्सी के हैंडल पर दब रही थीं।

मैंने उसकी तरफ देखा। कुर्ते का गला थोड़ा खुला था। अंदर कुछ नहीं दिख रहा था, लेकिन हड्डी की लकीर साफ थी। उसने मेरी नज़र पकड़ ली। इस बार आँखें नहीं हटाईं।

“क्या देख रहे हो?” आवाज़ में नाराज़गी नहीं थी। सिर्फ सवाल था।

“तुम्हें।”

वो हँसी नहीं। बस साँस भारी कर दी। फिर धीरे से बोली, “भैया को फोन आया था। ट्रेनिंग और लंबी हो गई। बीस दिन हो जाएँगे।”

मैंने सिर हिलाया। कमरे में पंखे की आवाज़ के अलावा कुछ नहीं था। वो कुर्सी से उठी। मेरे बहुत करीब से गुज़री। कुर्ते का किनारा मेरे हाथ से छू गया।

“सो जाओगे?” उसने पूछा। आवाज़ कम थी।

“अभी नहीं।”

वो अपने कमरे की तरफ गई। दरवाज़ा फिर से आधा खुला छोड़ दिया। अंदर लाइट जल रही थी।

मैं दस-पंद्रह मिनट बैठा रहा। फिर उठा। उसके कमरे के दरवाज़े तक गया। अंदर से कोई आवाज़ नहीं आ रही थी। मैंने हल्के से धक्का दिया। दरवाज़ा और खुल गया।

वो बिस्तर पर बैठी थी। बालों को सुखा रही थी। मुझे देखकर रुकी। तौलिया हाथ में था। कुर्ता एक तरफ से कंधे से सरक चुका था। गोरा कंधा साफ दिख रहा था।

“क्या हुआ?” उसने पूछा। आवाज़ में घबराहट थी, लेकिन रोकने वाली नहीं।

मैं अंदर चला गया। दरवाज़ा पीछे से बंद कर दिया। क्लिक की आवाज़ दोनों ने सुनी। वो तौलिया नीचे रख दिया। मेरी तरफ देखती रही।

मैं पास गया। उसके सामने खड़ा हो गया। उसने सिर उठाया। आँखों में डर और कुछ और दोनों थे। मैंने हाथ बढ़ा कर उसके खुले कंधे को छुआ। उंगलियाँ उसकी त्वचा पर फिसलीं। वो काँपी, लेकिन हटी नहीं।

“सौरभ…” नाम लेते समय उसकी आवाज़ काँप गई।

मैंने जवाब नहीं दिया। झुक गया। उसके होंठों के बहुत करीब। साँसें मिल रही थीं। उसने आँखें बंद कर लीं। मैंने होंठ रख दिए। पहले हल्के से। फिर जोर से। उसके होंठ मुलायम थे। थोड़ी देर बाद उसने भी जवाब दिया। हाथ मेरे कुर्ते पर आ गए। पकड़ लिया।

चुंबन लंबा चला। मैंने उसका कुर्ता ऊपर की तरफ सरकाया। उसने मना नहीं किया। बस साँसें तेज़ हो गईं। कुर्ता सिर के ऊपर से निकल गया। अंदर सिर्फ ब्रा थी। काली। भारी छाती को कस कर पकड़े हुए। मैंने ब्रा का हुक खोला। धीरे से। ब्रा आगे से खुल गई। गोरे, भारी बूब्स बाहर आ गए। निप्पल सख्त हो चुके थे।

मैंने एक निप्पल मुँह में लिया। चूसा। जीभ घुमाई। वो पीछे की तरफ झुक गई। बिस्तर पर हाथ रख कर संभली। हल्की आवाज़ निकली उसके मुँह से। मैंने दूसरा भी उसी तरह किया। उसके हाथ मेरे बालों में घुस गए।

मैंने उसे बिस्तर पर लिटा दिया। पैजामा नीचे खींचा। पैंटी भी साथ में आ गई। उसकी चूत के बाल साफ किए हुए थे। हल्के। मैंने उंगली से छुआ। गीली थी। अंदर जाने पर उसने जाँघें थोड़ी भींच लीं, फिर छोड़ दीं। दो उंगलियाँ अंदर चली गईं। धीरे-धीरे अंदर-बाहर। वो कमर हिलाने लगी। आँखें बंद थीं। होंठ काटे हुए।

मैंने अपना कुर्ता और पेंट उतारा। लंड पूरी तरह खड़ा था। उसके पास ले गया। उसके मुँह के सामने। उसने आँखें खोलीं। देखा। फिर धीरे से हाथ बढ़ा कर पकड़ लिया। हिलाया। अनिश्चित तरीके से। मैंने उसके सिर के नीचे हाथ रखा और लंड उसके होंठों पर लगाया। उसने मुँह खोला। हल्के से चूसा। फिर और अंदर लिया। दाँत लग गए थोड़े, लेकिन मैंने कुछ नहीं कहा। उसके बाल पकड़ कर धीरे-धीरे हिलाया।

थोड़ी देर बाद मैंने लंड निकाला। उसके पैर फैलाए। बीच में खड़ा हो गया। लंड उसके चूत के मुँह पर रखा। रगड़ा। वो देख रही थी नीचे। जब मैंने धीरे से अंदर धकेला तो उसकी साँस रुक गई। आधा अंदर गया। चूत बहुत तंग थी। कस रही थी।

“आह्ह…” पहली बार उसकी आवाज़ जोर से निकली।

मैंने थोड़ा रुका। फिर और अंदर गया। पूरा। उसकी नाखून मेरी बाजू में चुभ गए। आँखें बड़ी हो रखी थीं। मैंने धीरे-धीरे धक्का शुरू किया। हर धक्के के साथ उसकी छाती ऊपर-नीचे हो रही थी।

मैंने धीरे-धीरे रफ्तार बढ़ाई। उसकी चूत इतनी तंग थी कि हर धक्के पर लंड को कस कर दबोच लेती। अंदर की दीवारें गर्म और चिकनी हो चुकी थीं। रेणु की साँसें बिखरी हुई थीं। आँखें कभी बंद हो जातीं, कभी मेरा चेहरा देखतीं।

“और अंदर…” उसने फुसफुसाया। आवाज़ काँप रही थी।

मैंने उसके दोनों पैर अपने कंधों पर रख दिए। कोण बदल गया। लंड और गहराई तक चला गया। इस बार उसकी आवाज़ रुक नहीं पाई। हल्की सी चीख निकली। मैंने एक हाथ उसके मुँह पर रख दिया। वो काटने लगी मेरी हथेली। दूसरे हाथ से उसका एक बूब्स मसल रहा था। निप्पल उंगलियों के बीच दब रहा था।

धक्के तेज़ हो गए। बिस्तर की चर्र-चर्र की आवाज़ कमरे में गूँज रही थी। बाहर बारिश की आवाज़ के साथ मिल गई थी। पसीना दोनों के शरीर पर चमक रहा था। उसकी जाँघें मेरे कमर पर लिपटने लगीं। नाखून पीठ पर फिर रहे थे।

मैंने लंड बाहर निकाला। उसे पलट दिया। घुटनों के बल। पीछे से देखा तो उसकी गांड गोल और तनी हुई थी। बीच में चूत लाल और खुली हुई। मैंने लंड फिर से अंदर धकेला। एक झटके में पूरा। रेणु ने तकिया दबा लिया मुँह में। आवाज़ दबी-दबी निकल रही थी।

“जोर से…” उसने तकिया हटा कर कहा।

मैंने कमर पकड़ ली। दोनों हाथों से। और तेज़ पेलने लगा। हर धक्के के साथ उसकी गांड मेरे पेट से टकरा रही थी। आवाज़ गंदी और तेज़ हो गई थी। चूत से पानी की आवाज़ आने लगी। वो एक बार काँपी। फिर और जोर से। उसके पैर लड़खड़ा गए। मैंने कमर और कस कर पकड़ी।

थोड़ी देर बाद मैंने उसे फिर से सीधा लिटाया। इस बार उसके ऊपर लेट गया। छाती से छाती। पसीना मिल रहा था। चुंबन लिया। गहरा। जीभ से जीभ। नीचे लंड लगातार चल रहा था। धीमे नहीं। तेज़ और गहरा। उसकी आँखों में पानी आ गया था। लेकिन रोक नहीं रही थी। उल्टे कमर उठा-उठा कर जवाब दे रही थी।

“सौरभ… मैं…” उसकी आवाज़ टूट गई। पूरा शरीर अकड़ गया। चूत ने लंड को इतना जोर से दबाया कि मैं भी लगभग पहुँच गया। लेकिन रोका। बाहर निकाला।

उसने हाँफते हुए पूछा, “अंदर क्यों नहीं…”

मैंने जवाब नहीं दिया। उसके मुँह के पास लंड ले गया। उसने खुद पकड़ कर मुँह में ले लिया। इस बार दाँत नहीं लगे। जीभ घुमा रही थी। गलियाते हुए चूस रही थी। मैंने बाल पकड़ कर थोड़ा और अंदर धकेला। आँखें उसकी नम थीं। लेकिन रोक नहीं रही थी।

दोबारा चूत में डाला। अब और आसानी से घुस रहा था। लेकिन फिर भी कसवट बाकी थी। मैंने एक पैर उसके कंधे पर चढ़ाया। कोण और तेज़ हो गया। धक्के ऐसे लग रहे थे जैसे साँस निकल जाएगी उसकी। वो चिल्ला रही थी। दबी आवाज़ में। तकिया मुँह में दबाए।

“और… मत रुक…”

मैं नहीं रुका। कमर के बल पेलता रहा। पसीना आँखों में आ रहा था। उसकी चुचियाँ मेरे सीने से रगड़ खा रही थीं। निप्पल सख्त। मैंने एक को मुँह में लिया और काटा हल्के से। वो फिर से काँप गई। इस बार लंबा। चूत में स्पंदन साफ महसूस हो रहा था।

मैं भी नहीं रोक पाया। अंतिम कुछ धक्के बहुत गहरे लगाए। और अपना पानी उसकी चूत के अंदर ही छोड़ दिया। गाढ़ा। लगातार। उसके अंदर भरता रहा।

दोनों रुके रहे। मैं उसके ऊपर ही था। लंड अभी भी अंदर। धड़कनें तेज़। साँसें मिल रही थीं। बाहर बारिश अब मंद पड़ चुकी थी।

थोड़ी देर बाद मैंने लंड बाहर निकाला। सफेद पानी उसकी चूत से धीरे-धीरे बाहर आ रहा था। जाँघों तक फैल गया। उसने जाँघें नहीं मिलाईं। बस देखती रही।

मैं उसके पास लेट गया। उसने अपना सिर मेरे कंधे पर रख दिया। बाल मेरे सीने पर फैल गए। कोई बात नहीं हुई लंबे समय तक। सिर्फ पंखा चल रहा था।

फिर उसने धीरे से कहा, “दरवाज़े पर कुंडी लगा देना।”

मैं उठा। दरवाज़े पर कुंडी लगाई। वापस आकर उसके गले में हाथ डाल दिया। उसने भी अपना हाथ मेरी छाती पर रख दिया।

रात अभी बाकी थी। बारह दिन और बाकी थे।

मैंने उसका चेहरा अपनी तरफ घुमाया। इस बार चुंबन हल्का था। लेकिन लंबा। उसके होंठ अब मेरे होठों को पहचान रहे थे।

बाहर हल्की बारिश फिर से शुरू हो गई थी।

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