रात के ढाई बज रहे थे।
देहरादून से दिल्ली की रात की बस में ज्यादातर यात्री सो चुके थे। एसी की ठंडक में बस की हल्की कंपन के अलावा कोई आवाज नहीं थी। मैं खिड़की वाली सीट पर बैठा हेडफोन लगाए था, लेकिन संगीत पर ध्यान नहीं था। दिमाग खाली चल रहा था।
तभी मेरी बगल वाली खाली सीट पर कोई रुका।
लड़की थी। जीन्स और ओवरसाइज टी-शर्ट में। बाल खुले और थोड़े बिखरे। चेहरा थका हुआ, लेकिन आँखें तेज। उसने थैला सीट के नीचे रखा और पूछा, “यह वाली खाली है ना?”
मैंने सिर्फ सिर हिलाया। वह बैठ गई। हल्की सी खुशबू आई – न परफ्यूम की, न साबुन की। बस शरीर की साफ सी गंध।
पहले पैंतालीस मिनट तक दोनों ने एक-दूसरे की तरफ देखा तक नहीं। बस ने एक तेज ब्रेक मारा तो उसका पानी की बोतल लुढ़कने लगी। मैंने झुककर पकड़ ली। हमारी उंगलियाँ एक सेकंड के लिए मिलीं। उसने बोतल लेते हुए कहा, “थैंक्स।” आवाज में नींद और थकान दोनों थे।
“कहाँ तक?” मैंने पूछा।
“कश्मीरी गेट। आप?”
“मैं भी उसी साइड।”
इतना काफी था बात शुरू होने के लिए। नाम रिया बताया उसने। लखनऊ से थी। नई नौकरी लगने वाली थी दिल्ली में। परिवार पीछे रह गया था। बॉयफ्रेंड दो महीने पहले छूट गया था। “अब अकेलापन ज्यादा चुभने लगा है,” उसने हल्के में कहा और खिड़की की तरफ देख लिया। मैंने भी अपनी बात रखी – दिल्ली में अकेला फ्लैट, नौकरी, और खाली शामें।
बातें बढ़ती गईं। कभी हँसी आ गई, कभी चुप्पी। बस की रोशनी बहुत कम थी। जब वह सिर पीछे टिकाती तो उसके गले की हल्की नस दिखती। एक बार नींद में उसका सिर मेरे कंधे से छू गया। वह चौंककर सीधी हुई, लेकिन फिर से झुकने में देर नहीं लगाई। इस बार जानबूझकर। मैंने कंधे को स्थिर रखा। उसके बालों की गंध सीधी साँस में जा रही थी।
रात के तीन बजने वाले थे जब बस ने एक लंबा स्टॉप लिया। ज्यादातर लोग सोए रहे। रिया ने अचानक पूछा, “आपके पास दिल्ली में पहले से कुछ बुक है?”
“नहीं। तुम्हारे पास?”
“नहीं। इतनी रात को अकेली… थोड़ा डर भी लग रहा है।”
मैंने एक पल सोचा। फिर कहा, “पास में एक छोटा-सा लॉज है। साफ रहता है। अगर चाहो तो वहाँ चल सकते हैं। अलग कमरे ले लेंगे।”
वह चुप रही। करीब आधा मिनट। फिर बोली, “चलो।”
लॉज का रिसेप्शन आधा सोया हुआ था। दो अलग कमरों की जगह सिर्फ एक डबल रूम बचा था। रिया ने मेरी तरफ देखा। उसकी आँखों में थकान थी, और कुछ और भी। मैंने पूछा, “अगर सही नहीं लग रहा तो कहीं और ढूँढते हैं।”
उसने थैला संभाला और बोली, “नहीं। रात भर की बात है।”
कमरा छोटा था। एक डबल बेड, फीकी रोशनी, और बाथरूम। रिया ने बाथरूम में जाकर चेहरा धोया। जब निकली तो टी-शर्ट के गले से पानी की कुछ बूँदें सरक रही थीं। बाल गीले थे। हम दोनों बिस्तर के किनारे बैठे। बातें फिर से शुरू हुईं, लेकिन अब आवाज बहुत धीमी थी। कमरे में सिर्फ हम दो की मौजूदगी थी।
रिया ने अचानक मेरी तरफ देखा। “तुम मुझे सिर्फ मदद के लिए लेकर आए हो?”
मैंने जवाब नहीं दिया। बस उसकी आँखों में देखा। फिर उसका चेहरा अपने हाथों में लिया और चूम लिया। पहले बहुत धीरे। जब उसने होंठ खोले तो चुंबन गहरा हो गया। उसकी जीभ ने जवाब दिया। मेरे हाथ उसकी कमर पर थे। उसकी छाती मेरे शरीर से दब रही थी।
मैंने उसकी टी-शर्ट धीरे से ऊपर की। उसने हाथ उठा दिए। ब्रा नहीं पहनी थी। स्तन सीधे बाहर आ गए। गोल और भारी। मैंने एक निप्पल मुँह में लिया और धीरे-धीरे चूसा। रिया की साँस रुक गई। उसने मेरे बाल पकड़ लिए। मैंने दोनों तरफ बारी-बारी से मुँह फेरते हुए चूसा, जीभ फेरी, हल्का काटा। उसकी कमर मेरे हाथों में सिकुड़ रही थी।
“कबीर… रुको…” आवाज में मना नहीं था। बस घबराहट थी।
मैंने उसे बिस्तर पर पीछे की तरफ लेटा दिया। जीन्स का बटन खोला। जिपर धीरे से नीचे किया। जीन्स और पैंटी एक साथ खींचकर नीचे उतार दी। उसकी चूत के बाल हल्के और साफ थे। मैंने उंगली से छुआ – गर्म और पहले से गीली। एक उंगली अंदर गई। रिया की कमर उठ गई। दूसरी उंगली भी डाल दी। अंदर की मांस नरम और कसकर पकड़ने वाली थी। मैंने अंगूठे से क्लिट सहलाते हुए उंगलियाँ तेज कीं। रिया की कराहें दबी-दबी निकल रही थीं।
मैंने मुँह नीचे किया। जीभ उसकी चूत पर रखी और लंबा चाटा। ऊपर से नीचे। क्लिट को होंठों में लेकर चूसा। उंगलियाँ अंदर घूम रही थीं। रिया के दोनों हाथ चादर पकड़े हुए थे। उसकी जाँघें मेरे कानों से लग रही थीं। कुछ देर बाद उसका शरीर अकड़ा और एक लंबी काँप के साथ वह झड़ गई। उसका पानी मेरी जीभ पर फैल गया।
मैंने अपने कपड़े उतारे। लंड पूरी तरह खड़ा था। रिया ने आँखें खोलीं और उसे देखा। कोई शब्द नहीं बोली। मैंने उसके घुटने फैलाए। नोक उसकी चूत पर रखी। हल्का दबाव दिया। सिरा अंदर गया। रिया ने दाँत भींच लिए। और गहरा। आधा। फिर एक लंबा धक्का और पूरा लंड समा गया।
“आह्ह…” उसकी आवाज में दर्द और राहत दोनों थे।
मैं रुका रहा। उसकी चूत मुझे जोर से कस रही थी। फिर धीरे-धीरे हिलना शुरू किया। छोटे धक्के। हर बार अंदर जाते समय उसकी आँखें बंद हो जातीं। मैंने झुककर उसके स्तन चूसे। धीरे-धीरे रफ्तार बढ़ी। बिस्तर की हल्की आवाज आने लगी। रिया के नाखून मेरी पीठ पर लग रहे थे।
मैंने उसकी टाँगें अपने कंधों पर रख दीं। अब और गहरा जा रहा था। हर धक्का सीधा और भारी था। रिया की कराहें अब दब नहीं रही थीं। कमरे में गूँज रही थीं। मैंने उसे पलटा। घुटनों के बल कर दिया। पीछे से फिर से घुसा। इस बार और तेजी से। उसकी गाँड मेरे पेट से बार-बार टकरा रही थी। थप-थप की आवाज साफ थी। मैंने उसके बाल पकड़कर सिर थोड़ा पीछे खींचा और जोर-जोर से पेलने लगा।
रिया के मुँह से अब सिर्फ टूटी-फूटी आवाजें निकल रही थीं। मैंने काफी देर तक यही रखा। फिर लंड निकाला और उसके मुँह के पास ले गया। उसने खुद होंठ खोले। मैंने अंदर दिया। वह चूसने लगी – गीली, गरम और थोड़ी बेकाबू। लार उसके मुँह से बह रही थी। मैंने थोड़ी देर उसके मुँह में रखा, फिर वापस चूत में डाल दिया।
अब धक्के और तेज थे। रिया एक बार फिर काँप उठी। उसकी चूत ने लंड को जकड़ लिया। मैं भी रोक नहीं पाया। पूरा अंदर दबाया और झड़ गया। वीर्य की गर्म धार उसकी चूत में छूटती रही। रिया की जाँघें काँप रही थीं।
मैं उसके ऊपर गिरा रहा। दोनों के शरीर चिपक रहे थे। पसीना और साँसें। काफी देर तक कोई नहीं बोला। फिर मैंने धीरे से लंड बाहर निकाला। उसकी चूत से सफेद वीर्य धीरे-धीरे बाहर आने लगा और चादर पर फैल गया।
रिया ने आँखें खोलीं। मेरी तरफ देखा। आवाज में थकान और हल्की हँसी दोनों थीं।
“बस में मिली लड़की को लॉज पे ले जा के ठोका… अब बताओ, नींद आएगी?”
मैंने उसके माथे से बाल हटाए। “एक बार और। फिर सो जाना।”
रिया ने कुछ नहीं कहा। बस अपनी टाँगें फिर से फैला दीं।
रात अभी खत्म नहीं हुई थी।
