plot : chachi ki chudai Desi gaon ki chachi sex story: 41 saal ki pyasi chachi ne gaon ke mazdoor se apni chut aur gaand dono fadwa li. Bahut gandi hardcore story.
गाँव की चाची की चुदाई की बात जब भी सुनते हो तो लोग सोचते हैं कि सब कुछ एकदम से हो जाता है। कोई लड़का आता है, औरत तुरंत पानी हो जाती है, और फिर चुदाई। असल जिंदगी में ऐसा नहीं होता। कम से कम मेरे साथ तो नहीं हुआ।
मेरा नाम सुमित्रा है। उम्र इकतालीस साल चल रही है। मध्य प्रदेश के एक छोटे से गाँव में रहती हूँ। गाँव का नाम लेने से कोई फायदा नहीं। वैसे भी ऐसे गाँव सैकड़ों हैं जहाँ लोग अभी भी बैल गाड़ी से खेत जाते हैं और औरतों की इज्जत का मतलब सिर्फ चुप रहना समझा जाता है। शादी को बाईस साल हो चुके हैं। पति का नाम रामप्रसाद है। वह नहर और सड़क के ठेके पर काम करता है। साल में आधे से ज्यादा समय बाहर ही रहता है। कभी पंद्रह दिन, कभी डेढ़ महीना। घर में मैं और मेरी सास। सास अब बुजुर्ग हो चुकी हैं, ज्यादा चल-फिर नहीं पातीं। बेटा इंदौर में कॉलेज में पढ़ता है। घर में ज्यादातर समय सिर्फ मैं होती हूँ। ये antarvasana chachi ki chudai आप pranaykatha पर पढ़ रहें है।
शरीर मेरा अब वैसा नहीं रहा जैसा बीस साल पहले था। लेकिन बिगड़ा भी नहीं। कद औसत है। रंग गेहुँआ। गर्मी और खेत के काम से त्वचा थोड़ी कठोर हो गई है। स्तन भारी हो गए हैं। पहले छोटे और तने हुए थे, अब वजनदार हैं और ब्लाउज के अंदर उनकी मौजूदगी साफ महसूस होती है। कमर अभी भी संभली हुई है क्योंकि मजदूरी बंद नहीं की। कूल्हे चौड़े हो गए हैं। साड़ी पहनने पर गांड की गोलाई छुपती नहीं। बालों में सफेदी आ गई है, लेकिन मैं उसे काला नहीं करती। आँखों के नीचे हल्की रेखाएँ पड़ गई हैं। कुल मिलाकर एक ऐसी औरत जो अब जवान नहीं रही, लेकिन जिसका शरीर अभी भी भूखा है।
भूख की बात मैंने पहले कभी किसी से नहीं की। पति जब घर आते हैं तो हफ्ते-दस दिन में दो-तीन बार संबंध बना लेते हैं। जल्दी-जल्दी। बिना बात किए। कभी मेरे चेहरे की तरफ देखे बिना। मैंने कभी मना नहीं किया। लेकिन संतुष्टि नाम की चीज गायब हो गई थी। रात को जब नींद नहीं आती तो मैं उंगली से काम चलाती। शर्म के मारे मुंह में कपड़ा दबा लेती। कभी-कभी आँसू भी आ जाते। उम्र के साथ शरीर की जरूरत कम होने की बजाय और बढ़ गई थी। यह बात मैंने सिर्फ अपने तक रखी।
रग्घू को मैं सालों से जानती थी। गाँव का ही लड़का। बाप मजदूर था, खुद भी खेतों में काम करता। उम्र पच्चीस-छब्बीस की होगी। शरीर धूप और मेहनत से गढ़ा हुआ। बाजू मोटी। छाती चौड़ी। चेहरे पर हमेशा हल्की दाढ़ी का छाया रहता। बात कम करता। जब बोलता तो सीधा। मेरी खेत की मेड़ पर अक्सर पानी पीने रुक जाता। कभी-कभी मैं उसे छाछ या पानी दे देती। बातें सीमित रहतीं—फसल कैसी है, बारिश कब आएगी, मजदूरी कितनी मिली। उसकी निगाहें कभी-कभी मेरे शरीर पर ठहर जातीं। मैं जानती थी। लेकिन मैंने कभी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। न हँसी, न नाराजगी। बस नजरें फेर लेती।
पिछले महीने की बात है। पति फिर से अठारह दिन के लिए बाहर गए थे। गर्मी कड़ी चल रही थी। दोपहर का समय। मैं खेत से लौट रही थी। सिर पर पल्लू रखा था, लेकिन पसीने से ब्लाउज पूरी तरह भीग चुका था। कपड़ा शरीर से चिपक गया था। निप्पल की शक्ल साफ उभर आई थी। रग्घू मेड़ पर बैठे-बैठे बीड़ी पी रहा था। उसने मुझे देखा। उसकी निगाह मेरे सीने पर रुकी और हटी नहीं। मैंने पल्लू सँभाला और आगे बढ़ गई। दिल तेज धड़क रहा था। गुस्सा आना चाहिए था। लेकिन आया नहीं। एक अजीब सी बेचैनी पैदा हो गई जो शाम तक बनी रही।
रात को खाट पर लेटे-लेटे बार-बार वही पल याद आ रहा था। उसकी आँखें। मेरा भीगा ब्लाउज। मैंने हाथ नीचे ले जाकर अपनी चूत पर रखा। बालों के बीच उंगली सरकाई। गीली थी। मैंने आँखें बंद कर लीं और उंगली घुमाने लगी। दिमाग में रग्घू का चेहरा आ गया। उसका मोटा हाथ। मैंने जोर से उंगली अंदर धकेली। दर्द और मजे के बीच में कहीं खो गई। जब पानी निकला तो मुंह में साड़ी का कोना दबा लिया ताकि आवाज बाहर न जाए। उसके बाद नींद आई। लेकिन नींद में भी वही बेचैनी बाकी रही।
अगले दिन कुएँ पर मुलाकात हो गई। शाम का समय था। ज्यादातर औरतें पानी भरकर जा चुकी थीं। मैं अकेली थी। रग्घू बाल्टी लेकर आया। उसने बिना कुछ बोले मेरी बाल्टी पहले भर दी। दोनों के हाथ एक साथ रस्सी पर गए। उसके हाथ खुरदरे थे और गर्मी से गरम। उंगलियाँ छू गईं। उसने इस बार हाथ नहीं हटाया तुरंत। कुछ पल तक दोनों के हाथ जुड़े रहे। फिर उसने बाल्टी मेरे सिर पर रखने में मदद की। खड़े-खड़े बोला, “चाची, अकेली इतनी देर मत निकला करो। गाँव में बातें बन जाती हैं।”
मैंने उसकी तरफ देखा। आँखों में सीधापन था, कोई हंसी नहीं। “तुम भी तो अकेले ही निकले हो,” मैंने कहा।
वह बोला, “मैं मर्द हूँ। मेरे साथ कुछ नहीं होता।”
मैं घर लौटी तो देर तक उस बात पर सोचती रही। मर्द और औरत का फर्क। भूख का फर्क। रात को फिर वही बेचैनी। इस बार मैंने सिर्फ उंगली नहीं की। आईने के सामने खड़ी रही। ब्लाउज खोला। स्तनों को देखा। हाथ से मसला। निप्पल सख्त हो गए। फिर पेटticoat ऊपर किया और चूत को देखा। बाल घने हो गए थे। मैंने उन्हें सहलाया। उंगली अंदर डाली। इस बार दिमाग में साफ-साफ रग्घू का लंड घूम रहा था—मोटा, काला, नसों वाला। मैंने दो उंगलियाँ कर लीं। खड़े-खड़े हिले। जब शरीर काँपने लगा तो दीवार का सहारा लिया। पानी निकलने के बाद शर्म आई। लेकिन शर्म के नीचे एक और बात थी—संतुष्टि नहीं हुई थी। उंगलियों से अब काम नहीं चल रहा था।
तीसरी मुलाकात ने तनाव को और बढ़ा दिया।
एक शाम खेत से लौटते समय मौसम अचानक बदला। बादल घिर आए और जोरों की बारिश शुरू हो गई। मैं मेड़ के पास एक पुराने पेड़ के नीचे खड़ी हो गई। रग्घू भी वहीँ आ गया। दोनों भीग चुके थे। उसके लुंगी और बनीयन शरीर से चिपक गए थे। छाती की मांसपेशियाँ साफ दिख रही थीं। मेरी साड़ी पूरी तरह भीगकर शरीर से चिपक गई थी। ब्लाउज पारदर्शी हो गया था। निप्पल की काली शक्ल साफ नजर आ रही थी। मैंने पल्लू से ढकने की कोशिश की लेकिन गीला पल्लू बार-बार सरक जा रहा था।
रग्घू ने मेरी तरफ देखा। इस बार उसकी निगाह हटी नहीं। वह बोला, “चाची, आपके घर तक पहुँचा दूँ?”
मैंने सिर हिलाया। दोनों चल दिए। बारिश में। रास्ते में उसके हाथ की पीठ मेरी बाजू से कई बार छू गई। एक बार तो उसका हाथ मेरी कमर पर टिक गया जैसे संभाल रहा हो। मैंने हटाया नहीं। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। घर पहुँचे तो सास अंदर सो रही थीं। मैंने रग्घू को आँगन में खड़ा छोड़ दिया और अंदर से तौलिया और एक सूखी लुंगी निकालकर लाई।
“लुंगी बदल लो। भीग गए हो,” मैंने कहा। ये antarvasana chachi sex story आप pranaykatha पर पढ़ रहें है।
वह आँगन में ही लुंगी बदलने लगा। मैंने पीठ कर ली। लेकिन नजर पीछे की तरफ चली गई। उसकी गांड की मांस तनी हुई थी। जब उसने लुंगी बाँधी तो आगे की तरफ मोटा उभार साफ दिख रहा था। वह तना हुआ था। मैंने नजर फेर ली। गला सूख गया था।
वह जाने से पहले बोला, “चाची, अगर रात को कुछ काम हो तो बुलाना। मैं पास के ही खेत में रहता हूँ।”
मैंने कुछ नहीं कहा। सिर्फ सिर हिलाया। दरवाजा बंद करके अंदर आई तो पैर काँप रहे थे। साड़ी बदली। ब्लाउज बदला। लेकिन शरीर की गर्मी नहीं गई। रात को खाट पर लेटे-लेटे बार-बार उसका भीगा शरीर याद आ रहा था। वह उभार याद आ रहा था। मैंने हाथ नीचे ले जाया। चूत पूरी तरह भीगी हुई थी। उंगली अंदर गई तो आवाज निकली। मैंने मुंह दबा लिया। उस रात मैंने देर तक किया। दो उंगलियाँ, फिर तीन। लेकिन संतुष्टि नहीं मिली। शरीर और बेचैन हो गया।
अगले तीन-चार दिन मैंने जानबूझकर उससे कम बात की। खेत पर जाती तो दूसरी मेड़ से लौटती। कुएँ पर देर से जाती। लेकिन तनाव कम होने की बजाय बढ़ता जा रहा था। रातें मुश्किल हो रही थीं। नींद नहीं आती थी। शरीर में एक अजीब सी जलन रहती थी। मैंने एक रात तय किया कि अब उंगली भी नहीं करुँगी। लेकिन आधी रात को खुद को रोक नहीं पाई। इस बार दिमाग में साफ-साफ कल्पना थी—रग्घू मेरी साड़ी खोल रहा है, मेरे स्तन मसल रहा है, और अपना मोटा लंड मेरी चूत में धकेल रहा है। मैंने उंगलियाँ जोर-जोर से अंदर-बाहर कीं। शरीर काँप उठा। पानी निकला। लेकिन उसके बाद आँखों में आँसू आ गए। अकेली पड़ गई थी मैं अपनी ही भूख के साथ।
फिर वह दिन आया।
पति के आने में अभी नौ दिन बाकी थे। दोपहर का समय। गर्मी बहुत थी। मैं घर में अकेली थी। सास अपनी बहन के घर गई हुई थीं। रग्घू अचानक फाटक पर दिखाई दिया। हाथ में कुछ नहीं था। बस खड़ा था। मैं बाहर गई।
“क्या है?” मैंने पूछा। आवाज में नाराजगी लाने की कोशिश की लेकिन नाराजगी निकली नहीं।
वह बोला, “चाची, आपके खेत की मेड़ टूट रही है उस तरफ। पानी निकल जाएगा। अभी ठीक कर दूँ?”
मैंने सिर हिलाया। वह काम करने चला गया। मैं अंदर चली गई। लेकिन मन बाहर ही रह गया। एक घंटे बाद वह काम खत्म करके आया। पसीने से तर। बनीयन शरीर से चिपका हुआ। उसने पानी माँगा। मैंने लोटा दिया। वह पीता रहा और मुझे देखता रहा। अचानक बोला, “आप रात को सो नहीं पातीं ना?”
मेरा हाथ रुक गया। “क्या मतलब?”
वह बोला, “मेरे घर की खिड़की से आपके आँगन की तरफ दिखता है। रात को आपकी खाट की आवाज आती है कभी-कभी। और आपकी साँसें।”
मेरा चेहरा जल गया। गुस्सा, शर्म और एक अजीब सी नमी सब एक साथ। मैंने कुछ नहीं कहा। वह मेरा लोटा रखकर एक कदम करीब आ गया। उसकी आवाज बहुत धीमी थी।
“चाची, अगर कोई मदद चाहिए तो बोलिए। मैं कुछ नहीं बोलूँगा गाँव में।”
मैंने उसकी आँखों में देखा। कोई हंसी नहीं थी। कोई मजाक नहीं था। सिर्फ एक सीधी बात थी। मेरी चूत ने उसी पल पानी छोड़ दिया। मैंने महसूस किया कि मेरी पैंटी गीली हो गई। पैरों में कमजोरी आ गई।
मैंने सिर्फ इतना कहा, “शाम को आना। सास नहीं होंगी।”
वह कुछ नहीं बोला। बस सिर हिलाया और चला गया।
दरवाजा बंद करके मैं दीवार से लग गई। दिल इतनी जोर से धड़क रहा था कि कानों में आवाज आ रही थी। हाथ काँप रहे थे। मैंने नीचे हाथ रखा। पैंटी पूरी तरह भीगी हुई थी। उंगली से छुआ तो चूत ने और पानी छोड़ा।
शाम होने में अभी तीन घंटे थे।
और मैं जानती थी कि अब पीछे लौटने का कोई रास्ता नहीं बचा। शरीर ने फैसला कर लिया था। मन अभी भी हिचकिचा रहा था। लेकिन हिचकिचाहट के नीचे एक और आवाज थी जो बार-बार एक ही बात कह रही थी—आज रात रग्घू के मोटे लंड की जरूरत है। उंगलियों से अब काम नहीं चलने वाला।
मैं नहाया। साफ साड़ी पहनी। बाल खोले। आईने में खुद को देखा। आँखों में एक अजीब सी चमक थी जो सालों से नहीं देखी थी।
अब सिर्फ शाम का इंतजार था।
शाम के छह बज रहे थे जब फाटक पर खड़खड़ाहट हुई। दिल मेरी छाती में जोर-जोर से धड़क रहा था। मैंने साड़ी के पल्लू को ठीक किया, बालों को एक बार फिर सँवारा और दरवाजा खोला। रग्घू खड़ा था। नहाया हुआ। अलग लुंगी पहनी थी। बनीयन साफ था। लेकिन आँखों में वही सीधी भूख थी जो दोपहर में देखी थी।
“आ जा,” मैंने धीरे से कहा। आवाज मेरे अपने कानों को भी अजीब लगी।
वह अंदर आया। मैंने दरवाजा बंद किया और आड़ लगा दी। सास अपनी बहन के घर ही रुकी हुई थीं। बेटा शहर में। पति दूर। पूरा घर सिर्फ हम दो लोगों का था। रग्घू आँगन में खड़ा रहा। मैं उसके सामने खड़ी थी। दोनों में से कोई कुछ नहीं बोल रहा था। सिर्फ साँसें चल रही थीं।
वह एक कदम आगे बढ़ा। फिर एक और। अब वह मेरे बिल्कुल करीब था। उसकी छाती से मेरे स्तनों की दूरी बस कुछ अंगुल की रह गई थी। उसने अपना हाथ उठाया और मेरे गाल पर रखा। हाथ खुरदरा था। गरम था। मैं काँप गई। उसने मेरा चेहरा ऊपर उठाया और आँखों में देखा।
“डर रही हो?” उसने पूछा।
“हूँ,” मैंने सच बोला।
“तो भी बुलाया?”
“हाँ।”
उसने और कुछ नहीं पूछा। बस अपना दूसरा हाथ मेरी कमर पर रखा और मुझे अपने शरीर से सटा लिया। उसके लंड का मोटा उभार मेरे पेट से जा लगा। कठोर। गर्म। मैंने आँखें बंद कर लीं। उसने मेरा पल्लू खींचकर नीचे गिरा दिया। फिर ब्लाउज के हुक खोले। एक… दो… तीन। ब्लाउज खुल गया। उसके हाथ सीधे मेरे नंगे स्तनों पर चले गए। भारी स्तन उसकी हथेलियों में समा गए। उसने जोर से मसला। निप्पल उसके अंगूठों के नीचे दब गए। दर्द हुआ। लेकिन वह दर्द नीचे जाकर मेरी चूत में तकलीफ बन गया। ये antarvasana desi gaon ki chudai आप pranaykatha पर पढ़ रहें है।
“आह…” मेरी सिसकारी निकल गई।
वह झुका और एक निप्पल मुंह में ले लिया। दाँतों से काटा। जीभ से गोल-गोल घुमाया। दूसरे स्तन को हाथ से मसलता रहा। मैं उसकी गर्दन पकड़कर खड़ी रही। पैर काँप रहे थे। उसने ब्लाउज पूरी तरह उतारकर फेंक दिया। फिर मेरी साड़ी की घुंडी खोली। साड़ी सरक कर पैरों में गिर गई। अब मैं सिर्फ घाघरा और पैंटी में थी। उसने घाघरा भी नीचे खींच दिया। पैंटी के ऊपर से उसकी हथेली मेरी चूत पर रख दी।
“इतनी गीली,” वह बोला। “दोपहर से गीली है क्या?”
मैंने जवाब नहीं दिया। उसने पैंटी के अंदर हाथ डाल दिया। उंगली सीधे मेरी चूत की फाँकों के बीच में घुस गई। गीलापन उसके नाखून तक लग गया। उसने उंगली अंदर धकेली। एकदम। मैंने उसके कंधे में मुंह दबा लिया। उंगली अंदर-बाहर होने लगी। चपचप की आवाज आने लगी।
“चोद कुत्ते…” मैंने दाँत पीसकर कहा। “उंगली मत चला। लंड निकाल और चोद।”
वह हँसा। कम आवाज में। फिर उसने अपनी लुंगी एक झटके में खोल दी। लंड बाहर निकल आया। काला। मोटा। नसों से भरा हुआ। सिर चमक रहा था और पहले से ही लसलसाई चमक निकली हुई थी। मेरी चूत ने देखकर एक और पानी की धारा छोड़ दी जो जांघों से नीचे बहने लगी।
उसने मुझे धक्का देकर खाट पर गिरा दिया। खुद मेरे पैरों के बीच आ गया। दोनों जांघें फैलाईं। लंड का मोटा सिर मेरी चूत के मुंह पर टिकाया। आँखों में देखा। फिर बिना किसी और चेतावरी के कमर का जोर लगाया।
“आअअह्ह्ह्ह!”
सिर्फ सिर अंदर गया था और लगा जैसे कोई लोहे का गरमागरम रॉड धँस गया हो। मेरी चूत की दीवारें चीख उठीं। सालों बाद इतनी मोटाई महसूस हो रही थी। पति का लंड इतना मोटा कभी नहीं था। रग्घू रुका नहीं। दूसरे धक्के में और आधा अंदर धकेल दिया। तीसरे धक्के में पूरा लंड जड़ तक घुस गया। उसके अंडकोष मेरी गांड से जा टकराए। मेरी आँखों से आँसू बह निकले। नाखून उसकी पीठ में गड़ गए।
“चोद कुत्ते चोद!” मैंने चीखकर कहा। “जोर से चोद… पूरी चूत फाड़ दे!”
वह हिलने लगा। लंबे-लंबे, भारी धक्के। हर धक्के के साथ मेरी चूत की गीली आवाज पूरे कमरे में गूँज रही थी। खाट की पाटी खटखटा रही थी। वह मेरे ऊपर पूरी तरह लेट गया। छाती से मेरे स्तन दब गए। उसका मुंह मेरे कान के पास था।
“तेरी चूत कितनी गरम है चाची… सालों से कितने लंड के बिना पड़ी थी ये?”
“चोद… बात मत कर… चोद…”
वह और तेज हो गया। अब धक्के इतने जोर के थे कि मेरी गांड हर बार खाट पर पटखनी खा रही थी। उसकी कमर की हर हरकत में उसका मोटा लंड मेरी चूत की सबसे गहरी जगह को ठोक रहा था। पानी की आवाज और तेज हो गई। मेरी जांघें काँप रही थीं। मैंने पैर उसकी कमर पर लपेट लिए और एड़ियों से उसकी गांड को और अंदर धकेलने लगी।
“और अंदर तक… कुत्ते… मार… जोर से मार…”
उसने अचानक लंड बाहर निकाल लिया। मेरी चूत खुली की खुली रह गई। फड़क रही थी। लाल हो चुकी थी। वह मुझसे बोला, “पलट।”
मैंने करवट ली। वह मेरे पीछे आ गया। मेरे कूल्हे उठाकर गांड ऊँची कर दी। फिर से लंड का सिर लगाया और एक ही झटके में पूरा धँस दिया। इस कोण से और भी गहरा लग रहा था। उसने मेरे बाल मुट्ठी में भर लिए और सिर पीछे खींच लिया। दूसरे हाथ से मेरी कमर पकड़ी और कुत्ते की तरह हिसकाने लगा। जोर-जोर से। तेज।
“बोल… कैसी लग रही है गाँव के मजदूर की लंड?” “मस्त लग रही है… चोद… और तेज चोद…” “तेरी ये बुढ़ी चूत अब मेरी हो गई समझी? रोज़ चोदूँगा इसे।” “चोद… रोज़ चोद… बस आज पूरी तरह फाड़ दे…”
वह पागलों की तरह पेल रहा था। हर धक्के के साथ मेरी आवाज निकल रही थी। स्तन हवा में झूल रहे थे। मुंह से लार की एक लकीर लटक गई थी। अचानक उसने मेरी चूत के ऊपर वाले हिस्से पर अंगूठा रखा और जोर-जोर से रगड़ने लगा। शरीर में बिजली सी दौड़ गई। मेरी चूत ने उसके लंड को जकड़ना शुरू कर दिया।
“निकाल रही हूँ… कुत्ते… निकाल रही हूँ…” ये antarvasana hardcore chudai आप pranaykatha पर पढ़ रहें है।
शरीर अकड़ गया। पैर काँपने लगे। चूत की दीवारें बार-बार सिकुड़कर उसके लंड को दूध निकालने की कोशिश करने लगीं। पानी की एक तेज धारा छोटी। वह रुका नहीं। मेरी ऑर्गेज्म के दौरान और जोर से ठोकता रहा। जब मैं ढीली पड़ने लगी तो उसने लंड बाहर निकाला।
“मुंह खोल,” वह बोला।
मैंने मुंह खोला। उसने अपना चमकता हुआ, मेरी चूत के रस से लथपथ लंड मेरे मुंह में ठूस दिया। गला भर गया। आँखों से पानी आ गया। वह मेरे बाल पकड़कर मुंह में हिसकाने लगा। मैंने गला खोल दिया। लंड गले के पीछे तक जा रहा था। लार बहकर स्तनों पर गिर रही थी।
थोड़ी देर बाद उसने लंड निकाला और फिर से चूत में डाल दिया। इस बार वह मुझे उठाकर दीवार से सटा दिया। मेरे पैर उसकी कमर पर थे। वह खड़े-खड़े पेलने लगा। गुरुत्वाकर्षण की वजह से लंड और गहराई तक जा रहा था। मेरी पीठ दीवार पर रगड़ खा रही थी।
“आह्ह… मर गई… बहुत गहरा…” “सह ले चाची… अभी तो शुरू किया है…”
वह कम से कम बीस-पच्चीस मिनट तक उसी तरह ठोकता रहा। फिर उसने मुझे फिर से खाट पर लिटाया। मेरी दोनों टाँगें उसके कंधों पर रख दीं। अब वह पूरी तरह ऊपर से पेल रहा था। हर धक्का गर्भ तक लग रहा था। मेरी आवाजें अब चीख बन चुकी थीं।
“चोद कुत्ते चोद… मार… मार… पूरी चूत हरामी बना दे…”
उसने अचानक गति और तेज कर दी। खाट की पाटी टूटने के कगार पर थी। पसीने से दोनों के शरीर चमक रहे थे। उसकी छाती के बाल मेरे स्तनों से चिपक रहे थे। अचानक उसका शरीर तन गया।
“ले… ले जा… सारा अंदर ले जा…”
वह गहराई तक धँस गया और रुक गया। गर्म वीर्य की मोटी धार मेरे अंदर छूटने लगी। एक… दो… तीन… चार… इतना ज्यादा कि मेरी चूत से बाहर निकलकर गांड और जांघों पर बहने लगा। वह मुझ पर गिर पड़ा। दोनों हांफ रहे थे। उसका लंड अभी भी मेरी चूत में धड़क रहा था।
कुछ देर बाद वह बोला, “अब गांड भी दूँ?”
मैंने आँखें खोलीं। शरीर में जान नहीं बची थी। लेकिन मुंह से निकला, “दे… कुत्ते… गांड भी फाड़…”
उसने लंड बाहर निकाला। मेरी चूत से उसका और मेरा मिलाजुला रस बह निकला। उसने मुझे घुटनों के बल किया। थूक लगाकर अपनी दो उंगलियाँ मेरी गांड के छेद में डाल दीं। फैलाया। फिर लंड का सिर लगाया और धीरे-धीरे दबाव दिया।
“आअअह्ह्ह… दर्द हो रहा है…” “सह ले… अभी अंदर जाएगा…”
वह धीरे-धीरे अंदर धकेलता गया। मेरी गांड फट रही थी। आँसू बह रहे थे। जब पूरा लंड अंदर तक चला गया तो उसने हिलना शुरू किया। पहले धीमे। फिर तेज। अब वह मेरी गांड चोद रहा था। एक हाथ से मेरे बाल पकड़े हुए और दूसरे हाथ से मेरी चूत मसल रहा था।
“कितनी टight गांड है तेरी चाची… चूत से भी ज्यादा…” “चोद… जोर से चोद… मार…”
वह कम से कम पंद्रह मिनट तक मेरी गांड ठोकता रहा। फिर निकाला और फिर से चूत में डाल दिया। अब वह बारी-बारी से दोनों छेदों में घुस रहा था। कभी चूत, कभी गांड। मेरी हालत खराब हो चुकी थी। शरीर काँप रहा था। आवाज बैठ गई थी।
आखिर में वह फिर से चूत में आया और जोर-जोर से कुछ धक्के मारकर दूसरी बार छोड़ दिया। इस बार और ज्यादा। मेरी चूत से बहकर खाट गीली हो गई।
वह मेरे पास गिर गया। दोनों के शरीर एक-दूसरे से चिपके हुए थे। पसीना, वीर्य, और चूत के रस की गंध पूरे कमरे में फैली हुई थी।
बहुत देर बाद वह बोला, “अब रोज़ आऊँगा। जब तक तेरा पति नहीं आता।”
मैंने उसकी छाती पर सिर रखा। आवाज मेरी अभी भी काँप रही थी।
“आना… लेकिन अगली बार और जोर से चोदना। आज तो सिर्फ चुदाई हुई है। अगली बार मेरी चूत और गांड दोनों याद रखें कि गाँव का कौन सा कुत्ता उनका मालिक है।”
वह हँसा। कम आवाज में। फिर उसका हाथ फिर से मेरी चूत पर चला गया। उंगली अंदर डाल दी।
“अब तीसरी बार,” वह बोला।
बाहर रात पूरी तरह गहरा चुकी थी। और अंदर गाँव की चाची की चुदाई का तीसरा दौर शुरू हो चुका था।
उस रात रग्घू ने मुझे पाँच बार चोदा। तीन बार चूत में, दो बार गांड में। जब वह आखिरी बार छोड़कर मेरे ऊपर गिरा तो मेरी चूत और गांड दोनों सुन्न पड़ चुकी थीं। सूजी हुई। लाल। वीर्य से लबालब।
सुबह जब वह गया तो मेरी चाल बिगड़ी हुई थी। साड़ी पहनते समय दर्द हो रहा था। लेकिन मन के अंदर एक अजीब सुकून था। उंगलियों की भूख अब मोटे लंड की भूख में बदल चुकी थी।
और यह भूख अब रुकने वाली नहीं थी।
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