सासुमा का भोसड़ा। सास दामाद सेक्स स्टोरी।

Plot: Family sex story – Desi saas damad chudai: Kanpur ke Amit ne sasumaa Kamla ka bhosada choda. Full hot saasu maa ki chudai explicit story.

मेरा नाम अमित शर्मा है। उम्र तीस। कानपुर के एक मध्यमवर्गीय मोहल्ले में रहता हूँ। शादी को चार साल हो चुके थे प्रिया से। प्रिया अच्छी पत्नी थी, समझदार भी। लेकिन पिछले डेढ़ साल से हमारे बीच वह पुरानी गर्मी नहीं बची थी। काम का दबाव, घर के खर्चे, और थकान ने हमें धीरे-धीरे अलग कर दिया था। ये antarvasana family sex story आप प्रणयकथा pranaykatha पर पढ़ रहें है। हफ्ते में एक बार भी शरीर छूना मुश्किल हो गया था।

प्रिया की माँ, मेरी सासुमा, कमला देवी। उम्र पैंतालीस। विधवा। पति की मौत को ग्यारह साल हो चुके थे। वे हमारे साथ ही रहती थीं। घर का सारा काम संभालतीं, रसोई से लेकर कपड़ों तक। शरीर से वे अभी भी जवान लगतीं। गोरा रंग, लंबे बाल जिनमें हल्की सफेदी आ गई थी, भारी लेकिन सधे हुए स्तन, और चौड़ी कमर के नीचे गोल-मटोल गांड। जब वे साड़ी पहनतीं तो पल्लू बार-बार खिसक जाता और उनकी गोल गर्दन व कंधे दिख जाते। मैंने कई बार अपनी नजरें फेर ली थीं। मन में ख्याल आता तो खुद को डांटता – ये तुम्हारी सासुमा हैं, माँ समान।

पिछले महीने प्रिया अपनी मौसी के यहाँ जयपुर चली गई। पंद्रह दिन के लिए। घर में सिर्फ मैं और सासुमा रह गए। पहले चार-पाँच दिन बिल्कुल सामान्य बीते। सुबह मैं ऑफिस जाता, वे घर का काम करतीं। शाम को दोनों खाना खाते, थोड़ी बात करते और अपने-अपने कमरे में सो जाते। लेकिन घर में एक अजीब सी खामोशी छाई रहती थी।

छठे दिन की शाम की बात है। ऑफिस से थककर लौटा तो देखा सासुमा छत पर कपड़े सुखा रही हैं। हल्की पीली साड़ी पहनी हुई। हवा से पल्लू उड़ रहा था। उनकी कमर की लकीर साफ दिख रही थी। ब्लाउज थोड़ा ऊपर उठ गया था। मैंने आवाज दी, “माँ, उतर आइए, ठंड लग जाएगी।”

वे मुड़ीं। माथे पर पसीना था। मुस्कुराईं। “आ गए बेटा? हाथ-मुँह धो लो। आलू-परठा बनाए हैं।”

खाना खाते समय दोनों चुप थे। फिर सासुमा ने धीरे से कहा, “अमित, तुम बहुत थके रहते हो nowadays। प्रिया भी कहती थी। कुछ परेशानी है क्या?”

मैंने सिर हिलाया। “नहीं माँ, बस काम का बोझ है।”

वे कुछ देर देखती रहीं। फिर बोलीं, “तुम दोनों में बात कम हो गई है। मैं देख रही हूँ। शादीशुदा जिंदगी में सिर्फ बातों से काम नहीं चलता बेटा।”

मेरा चेहरा गरम हो गया। मैंने जल्दी से नजरें नीचे कर लीं। सासुमा ने और कुछ नहीं कहा।

रात को नींद नहीं आ रही थी। ग्यारह बज गए थे। मैं पानी पीने उठा। किचन में रोशनी जल रही थी। सासुमा वहाँ खड़ी थीं। बर्तन धो रही थीं। उनकी साड़ी का पल्लू एक तरफ पड़ा था। ब्लाउज गीला हो गया था और शरीर से चिपक रहा था। पीछे से उनकी गांड की गोलाई साफ नजर आ रही थी। मैंने खांस दिया। ये antarvasana family sex story आप प्रणयकथा pranaykatha पर पढ़ रहें है।

वे चौंकीं। “अभी तक नहीं सोए?”

“नींद नहीं आ रही। आप भी इतनी रात तक…”

“आदत हो गई है।” वे मुड़ीं। गीले हाथ से बाल ठीक किए। ब्लाउज का एक बटन खुला हुआ था। हल्का सा गड्ढा दिख रहा था। मेरी नजर वहीं अटक गई। उन्होंने भी देख लिया। चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आई, लेकिन उन्होंने पल्लू ठीक कर लिया।

“सो जाओ बेटा। कल ऑफिस भी जाना है।”

मैं लौट आया। लेकिन दिमाग में वह नजारा घूमता रहा। लंड तन गया। मैंने खुद को रोका। “ये गलत है अमित। ये तुम्हारी सासुमा हैं।” लेकिन शरीर नहीं माना। आधी रात को मैंने चुपके से हिलाया और सो गया।

अगले दिन रविवार था। सुबह देर से उठा। सासुमा आँगन में बाल सुखा रही थीं। बाल खुले थे। गीली साड़ी में उनका शरीर और निखर रहा था। मैंने चाय बनाई और दोनों आँगन में बैठ गए।

बातचीत सामान्य थी – मौसम, महंगाई, प्रिया का फोन। फिर सासुमा ने अचानक कहा, “अमित, तुम्हें पता है न… तुम्हारे ससुर की मौत के बाद मैंने कभी किसी पुरुष को पास नहीं फटकने दिया। इज्जत की बात थी। लेकिन कभी-कभी रातें बहुत लंबी हो जाती हैं।” ये antarvasana family sex story आप प्रणयकथा pranaykatha पर पढ़ रहें है।

मैंने चुपचाप उनकी तरफ देखा। उनकी आँखों में अकेलापन साफ था। कोई वासना नहीं, सिर्फ थकान और तन्हाई।

“माँ… आप…”

“कुछ नहीं।” वे उठ खड़ी हुईं। “मैं खाना लगाती हूँ।”

दोपहर बाद मैं अपने कमरे में लेटा था। अचानक दरवाजे पर दस्तक हुई। सासुमा खड़ी थीं। हाथ में तेल की शीशी थी।

“सर दर्द कर रहा है तुम्हारा? कल से देख रही हूँ। आओ, मालिश कर दूँ।”

मैं इनकार नहीं कर पाया। बिस्तर पर पेट के बल लेट गया। सासुमा मेरे पास बैठ गईं। उनके हाथ मेरे सर पर फिरे। फिर गर्दन पर। तेल की महक और उनके हाथों की गर्माहट से शरीर सिहर उठा। उनके हाथ कंधों पर आए, फिर पीठ पर। साड़ी का पल्लू मेरे बगल में गिर गया। उनकी साँस मेरे कान के पास महसूस हो रही थी।

“ज्यादा जोर से दुख तो नहीं रहा?” उन्होंने पूछा।

“नहीं माँ… अच्छा लग रहा है।”

उनके हाथ कमर तक आ गए। फिर रुके। कुछ पल की खामोशी। फिर उन्होंने धीरे से कहा, “अमित… अगर तुम चाहो तो मैं नीचे भी… यानी पीठ के निचले हिस्से की भी कर दूँ।”

मेरा दिल जोरों से धड़कने लगा। मैंने कुछ नहीं कहा। बस हल्के से सिर हिलाया। उनके हाथ मेरी पैंट के ऊपर कमर पर फिरे। फिर धीरे से पैंट के अंदर। मेरी गांड पर तेल लगाती हुईं वे मालिश करने लगीं। उंगलियाँ अंदर की तरफ सरक रही थीं। मेरा लंड बिस्तर में दबकर तन चुका था।

अचानक उनका हाथ आगे की तरफ बढ़ गया। मेरी जांघ के अंदर। फिर रुक गया। ये antarvasana family sex story आप प्रणयकथा pranaykatha पर पढ़ रहें है।

“माँ…” मेरी आवाज फटी हुई निकली।

“बोलो बेटा।”

“ये… ये गलत है।”

“मुझे पता है।” उनकी आवाज भी काँप रही थी। “लेकिन आज मैं नहीं रोक पा रही खुद को। तुम भी नहीं रोक पा रहे। है न?”

मैं पलटकर बैठ गया। उनकी आँखों में पानी था। मैंने उनका चेहरा दोनों हाथों में लिया। “माँ… मैं आपको माँ मानता हूँ।”

“मैं भी तुम्हें बेटा मानती हूँ। लेकिन आज… सिर्फ आज… मुझे भूलने दो।”

मैंने उन्हें चूम लिया। उनके होंठ सूखे थे, फिर धीरे-धीरे गीले हो गए। चुंबन गहरा होता गया। मेरा हाथ उनके ब्लाउज पर गया। बटन खोले। भारी स्तन बाहर आ गए। काले, बड़े निप्पल। मैंने एक को मुँह में लिया और चूसने लगा। सासुमा की कराह निकल गई।

“आह… अमित… कितने दिन बाद…”

मैंने उन्हें बिस्तर पर लिटा दिया। साड़ी खोली। पेटीकोट। फिर पैंटी। उनकी चूत मेरे सामने थी – मोटी, बालों से भरी, और पहले से चमक रही थी। मैंने मुँह लगा दिया। जीभ से धीरे-धीरे चाटा। क्लिट पर घुमाया। दो उंगलियाँ अंदर डालीं। सासुमा की टाँगें काँप रही थीं।

“उम्म… वहाँ… हाँ… और अंदर…”

मैंने उनकी गांड भी दबाई। एक उंगली गांड की सेंध पर फेरने लगा। वे झिझकीं। “अमित… वहाँ मत…”

“दर्द होगा क्या?”

“नहीं… बस… कभी किसी ने नहीं छुआ वहाँ।”

मैंने धीरे से उंगली अंदर धकेली। बहुत टाइट था। सासुमा जोर से कराह उठीं। “आह्ह्ह… निकालो मत… छोड़ो…”

मैंने चूत चाटते हुए गांड में उंगली चलाते रखा। थोड़ी देर में उनका शरीर ऐंठ गया। वे जोर से आईं। पानी मेरे मुँह और हाथ पर बह गया।

अब मैंने अपना कपड़ा उतारा। लंड उनके चेहरे के पास ले गया। उन्होंने खुद मुँह खोला। पहले सिर्फ सिर चूसा, फिर गहरा लिया। गले तक। आँखों से पानी आने लगा लेकिन रुकीं नहीं। मैंने उनके बाल पकड़कर धीरे-धीरे सर हिलाया। ये antarvasana family sex story आप प्रणयकथा pranaykatha पर पढ़ रहें है।

“माँ… बहुत अच्छा चूस रही हो…”

कुछ देर बाद मैंने उन्हें घुटनों के बल कर दिया। पीछे से उनकी चूत में लंड रखा। धीरे-धीरे अंदर धकेला। सासुमा की गांड मेरे पेट से टकरा रही थी। मैंने दोनों हाथों से उनके कूल्हे पकड़े और धक्के लगाने लगा। पहले धीमे, फिर तेज।

“आह… अह… अमित… जोर से… और जोर से चोदो…”

मैंने उनकी गांड पर थप्पड़ मारा। गोलाकार निशान पड़ गया। फिर और तेज ठोकने लगा। डेस्क नहीं, बिस्तर चरमरा रहा था। सासुमा का चेहरा तकिए में दबा था। कराहें निकल रही थीं।

मैंने उन्हें पलट दिया। मिशनरी। उनकी टाँगें मेरे कंधों पर। पूरा लंड अंदर तक। स्तन मुँह में ले लिए। चूसते हुए धक्के लगा रहा था। सासुमा के नाखून मेरी पीठ में गड़ गए।

“मैं… मैं फिर से आने वाली हूँ… अह्ह्ह…”

वे काँप उठीं। उनकी चूत ने मेरे लंड को जकड़ लिया। मैंने रुककर नहीं। बाहर निकाला और उनकी गांड की सेंध पर लंड रखा।

“माँ… क्या डालूँ?”

वे हांफ रही थीं। “डालो… आज सब कुछ सह लूँगी… तुम्हारा भोसड़ा… मेरा भोसड़ा… आज तुम्हारा है।”

मैंने थूक लगाकर धीरे-धीरे गांड में धकेला। बहुत टाइट था। सासुमा की आँखें बंद हो गईं। दर्द की शिकन। लेकिन उन्होंने मुझे रोका नहीं। आधा अंदर गया तो उन्होंने कहा, “पूरा… पूरा डालो बेटा…”

मैंने पूरा अंदर कर दिया। फिर धीरे-धीरे हिलाने लगा। गांड की गर्माहट पागल कर रही थी। मैंने उनकी चूत में उंगलियाँ डाल दीं। दोनों साथ। सासुमा पागलों की तरह कराह रही थीं।

“आह… अह… फाड़ दो… मेरी गांड फाड़ दो अमित…”

मैंने रफ्तार बढ़ा दी। थप-थप की आवाज पूरे कमरे में गूँज रही थी। उनकी मोटी गांड मेरे हर धक्के के साथ काँप रही थी। मैं और अंदर तक जा रहा था।

कुछ देर बाद मैंने उन्हें साइड में लिटाया। एक टाँग ऊपर उठाई। गांड में ही लंड रखे हुए धक्के लगा रहा था। उनके स्तन मुँह में ले लिए। काट-काट कर चूस रहा था। सासुमा की आवाज अब बैठने लगी थी।

“अमित… मैं… मैं मर जाऊँगी… इतना गहरा…”

मैंने उन्हें फिर से घुटनों के बल किया। इस बार और जोर से। एक हाथ से उनके बाल पकड़े, दूसरे से गांड दबाए। पूरा जोर लगाकर ठोक रहा था। सासुमा का शरीर आगे-पीछे हो रहा था। बिस्तर की चरमर हावी हो गई थी।

अंत में जब मैं आने वाला था तो बाहर निकाला। सासुमा ने खुद मुँह खोल दिया। मैंने उनके मुँह में और स्तनों पर पूरा वीर्य उड़ेल दिया। सफेद-सफेद धब्बे उनके चेहरे, होठों और भारी स्तनों पर फैल गए। उन्होंने जीभ निकालकर चाटा। फिर मुस्कुराईं। ये antarvasana family sex story आप प्रणयकथा pranaykatha पर पढ़ रहें है।

दोनों पसीने से तर थे। सासुमा मेरे सीने से चिपक गईं। उनकी साँस मेरे गले पर लग रही थी।

“आज के बाद…” मैंने धीरे से कहा।

“आज के बाद कुछ नहीं।” उन्होंने जवाब दिया। “प्रिया जब तक नहीं आती… ये रातें हमारी हैं। लेकिन कोई बात बाहर नहीं जाएगी। कभी नहीं।”

मैंने उन्हें कसकर पकड़ लिया। उनकी गांड पर हाथ फिराने लगा। अभी भी अंदर गरम थी।

“माँ…”

“हम्म?”

“आपका भोसड़ा… आज के बाद मेरा हो गया।”

वे हल्के से हँसीं। “ले ले बेटा। जो चाहे कर। बस… अगली बार थोड़ा और धीरे से शुरू करना।”

उस रात हमने दो बार और किया। एक बार चूत में, एक बार फिर गांड में। सुबह होते-होते सासुमा की गांड लाल हो चुकी थी। चलते समय वे हल्की शिकन के साथ चल रही थीं। लेकिन जब मेरी नजर उन पर पड़ती तो वे मुस्कुरा देतीं।

प्रिया के लौटने में अभी नौ दिन बाकी थे। और हर रात… सासुमा का भोसड़ा मेरा इंतजार कर रहा था।

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