भतीजे ने मेरी गांड मारी। मौसी की चुदाई की कहानी।

plot : Family sex story – Mausi bhatija: भतीजे कबीर ने मौसी सुमन की चूत और गांड दोनों चोदी। Full hot mausi ki gaand chudai explicit story.

मेरा नाम सुमन है। उम्र बयालीस साल। पति रिटायर हो चुके हैं और ज्यादातर समय गाँव में ही रहते हैं। मेरी बहन उषा के घर में कुछ काम आ पड़ा था। उसके पति को अचानक बाहर के शहर में ट्रांसफर वाला काम मिला था और दोनों पति-पत्नी को आठ दिन के लिए जाना पड़ रहा था। घर में अकेला उनका बेटा कबीर रह जाता। कबीर पच्चीस साल का हो चुका है। पढ़ाई पूरी करके शहर में ही एक कंपनी में काम करता है। बहन ने फोन पर कहा, “दीदी, तुम आ जाओ न। कबीर अकेला रहेगा तो मुझे चैन नहीं पड़ेगा। तुम रहोगी तो मुझे भी सुकून रहेगा।” ये antarvasana family sex story आप pranaykatha पर पढ़ रहें है।

मैंने सोचा, आठ दिन की बात है। घर का काम भी हल्का रहेगा। सो अगले ही दिन मैं उनके घर पहुँच गई। कबीर स्टेशन पर लेने आया था। पहले भी मिल चुकी थी उससे, लेकिन इस बार लगा जैसे वह और लंबा हो गया है। कंधे चौड़े, आवाज में गहराई। उसने मेरा बैग उठाया और बोला, “मौसी, आप क्यों तकलीफ कर रही हैं। मैं अकेला भी रह लेता।”

मैंने हँसकर कहा, “अकेला रहना और अकेले रहने का इंतजाम होना दो अलग बातें हैं बेटा। चलो।”

घर पहुँचकर मैंने अपना सामान उसके माता-पिता वाले कमरे में रखा। कबीर अपना कमरा संभालता था। पहले दो दिन बिल्कुल सामान्य बीते। मैं सुबह उठकर नाश्ता बनाती, वह ऑफिस चला जाता। शाम को लौटता तो दोनों खाना खाते और थोड़ी बातें करते। वह अपनी नौकरी की बातें बताता, मैं गाँव की। लेकिन धीरे-धीरे कुछ छोटे-छोटे वाकये होने लगे जिनका असर दोनों पर पड़ने लगा।

तीसरे दिन की सुबह की बात है। मैं नहाने गई थी। बाथरूम का दरवाजा अंदर से ठीक से बंद नहीं हुआ था। हवा से थोड़ा खुल गया। मैं बाल धो रही थी। साबुन की झाग आँखों में चली गई तो मैंने आँखें बंद कर लीं। तभी अचानक दरवाजे की हल्की सी आवाज आई। मैंने आँखें खोलीं तो देखा कबीर दरवाजे के पास खड़ा है। उसका चेहरा लाल हो चुका था। मेरी साड़ी भीगकर शरीर से चिपक गई थी और ब्लाउज के ऊपर से स्तनों का उभार साफ दिख रहा था।

उसने जल्दी से नजरें फेर लीं और बोला, “मौसी… सॉरी… दरवाजा खुला था… मैं पानी लेने आया था।”

मैंने तौलिया खींचकर शरीर ढक लिया। “कोई बात नहीं। अब तो देख ही लिया।” मेरी आवाज में हल्की हँसी थी, लेकिन अंदर एक अजीब सी घबराहट भी थी। कबीर चला गया। मैंने दरवाजा ठीक से बंद किया। नहाते हुए बार-बार वही दृश्य याद आ रहा था—उसकी आँखों में जो एक पल के लिए ठहर गई थीं।

उस शाम खाना खाते समय कबीर थोड़ा चुप था। मैंने पूछा, “कुछ गड़बड़ है क्या?”

उसने सिर हिलाया। “नहीं मौसी। बस ऑफिस का काम।”

रात को मैं अपने कमरे में लेटी थी। नींद नहीं आ रही थी। दिमाग में सुबह वाला वाकया घूम रहा था। मैंने खुद को डांटा—ये तेरा भतीजा है सुमन। लेकिन शरीर में एक हल्की सी बेचैनी रह गई।

चौथे दिन दोपहर की बात है। कबीर ऑफिस से जल्दी लौट आया। सिर दर्द की शिकायत कर रहा था। मैंने कहा, “लेटना। तेल लगा दूँ?”

वह अपने कमरे में लेट गया। मैं तेल लेकर गई। उसके सिर में तेल लगाने लगी। उंगलियाँ उसके बालों में फैल रही थीं। फिर गर्दन पर। कंधों पर। उसकी शर्ट की कॉलर थोड़ी खुली हुई थी। मेरी उंगलियाँ अनजाने में उसके कंधे की नंगी त्वचा पर चली गईं। वह हल्का सा सिहर उठा।

“दर्द कम हुआ?” मैंने पूछा।

“हाँ मौसी… आपका हाथ अच्छा लग रहा है।”

मैंने हँसकर कहा, “बच्चे हो तुम अभी भी।” लेकिन अंदर कुछ और ही चल रहा था। उसके शरीर की गर्मी मेरे हाथों में उतर रही थी। मैंने जल्दी से तेल लगाना खत्म किया और कमरे से बाहर आ गई। अपने कमरे में जाकर आईने के सामने खड़ी रही। चेहरा थोड़ा गरम लग रहा था। ये antarvasana mausi bhatija sex story आप pranaykatha पर पढ़ रहें है।

पाँचवें दिन शाम को एक और वाकया हो गया। मैं किचन में खड़ी सब्जी काट रही थी। अचानक चाकू हाथ से छूट गया और मेरी उंगली कट गई। खून निकलने लगा। मैंने आवाज दी। कबीर दौड़ा आया। उसने मेरा हाथ पकड़ा। उसके बड़े हाथों में मेरा हाथ छोटा लग रहा था। वह मुझे सिंक के पास ले गया, पानी से धोया, फिर फर्स्ट एड बॉक्स से बैंडेज निकालकर लगाने लगा।

उसके अंगूठे मेरी हथेली पर रगड़ रहे थे। हमारी साँसें एक-दूसरे के करीब थीं। मैंने ऊपर देखा तो उसकी निगाह मेरे चेहरे पर थी। कुछ पल दोनों एक-दूसरे को देखते रहे। फिर उसने धीरे से कहा, “हो गया मौसी। अब ध्यान रखना।”

मैंने हाथ खींच लिया। “धन्यवाद।” लेकिन उस छोटी सी छुअन का असर देर तक बना रहा। रात को बिस्तर पर लेटे हुए मुझे बार-बार उसका चेहरा याद आ रहा था। उसकी आँखें, उसके हाथ। मैंने करवट बदली। शरीर में एक अजीब सी गर्मी फैल रही थी। बहुत दिनों बाद ऐसी बेचैनी महसूस हो रही थी।

छठे दिन रात को टीवी देख रहे थे। पुरानी फिल्म चल रही थी। मैं सोफे पर बैठी थी। साड़ी का पल्लू थोड़ा खिसक गया था। कबीर की नजर बार-बार उस तरफ जा रही थी। मैंने जानबूझकर पल्लू नहीं ठीक किया। अंदर एक शरारत सी चल रही थी। फिल्म खत्म होने के बाद वह बोला, “मौसी, आप बहुत अकेली रहती होंगी गाँव में।”

मैंने मुस्कुराकर कहा, “आदत हो गई है बेटा। तुम्हारे मौसाजी ज्यादातर खेत-खलिहान में ही रहते हैं।”

उसने कुछ और पूछना चाहा लेकिन रुक गया। बात वहीं रह गई। लेकिन हवा में कुछ बदल चुका था।

सातवें दिन दोपहर की बात है। मैं अपने कमरे में कपड़े बदल रही थी। साड़ी खोली थी। सिर्फ पेटीकोट और ब्लाउज में थी। अचानक दरवाजे पर दस्तक हुई। मैंने सोचा कबीर ऑफिस गया होगा। “आ जाओ।”

दरवाजा खुला। कबीर खड़ा था। उसका चेहरा देखकर मैं समझ गई कि उसने सब देख लिया। मेरा ब्लाउज आधा खुला था। स्तनों का ऊपरी हिस्सा साफ दिख रहा था। पेटीकोट की पतली पट्टी कमर पर थी।

वह बोला, “मौसी… माफ़ करना… मैंने सोचा आप सो रही होंगी।”

मैंने जल्दी से साड़ी उठा ली। “कोई बात नहीं। अब तो आ ही गए।” मेरी आवाज में हल्की कंपन थी। वह चला गया। लेकिन उस दिन के बाद दोनों के बीच एक अजीब सी खामोशी छा गई। बातें कम हो गईं। नजरें मिलते ही हट जातीं। ये antarvasana mausi ki chudai आप pranaykatha पर पढ़ रहें है।

आठवें दिन शाम को बारिश शुरू हो गई। बिजली चली गई। घर में मोमबत्ती जलानी पड़ी। हम दोनों हॉल में बैठे थे। अंधेरा और बारिश की आवाज। कबीर ने अचानक कहा, “मौसी, क्या आपको कभी लगता है कि जिंदगी में कुछ अधूरा रह गया है?”

मैंने उसकी तरफ देखा। मोमबत्ती की रोशनी में उसका चेहरा गंभीर लग रहा था। “सबको लगता है बेटा। तुम्हें क्यों याद आ गया अचानक?”

उसने कहा, “आपको देखकर। आप इतनी… खूबसूरत हो। और अकेली।”

मेरा दिल तेज धड़कने लगा। “कबीर… ऐसी बातें नहीं करते।”

वह मेरे पास खिसक आया। “मौसी, उस दिन बाथरूम में… फिर तेल लगाते समय… उंगली कटने पर… और कल जब आप कपड़े बदल रही थीं… मैं खुद को रोक नहीं पा रहा हूँ।”

मैंने उसकी तरफ देखा। उसकी आँखों में स्पष्ट वासना थी। और मेरे अंदर भी वही आग सुलग रही थी जो पिछले सात दिनों से दबी हुई थी। मैंने धीरे से कहा, “ये गलत है कबीर। मैं तुम्हारी मौसी हूँ।”

“मुझे पता है।” उसने मेरा हाथ पकड़ लिया। “लेकिन आज रात के बाद आप चली जाएंगी। और मैं… मैं बर्दाश्त नहीं कर सकता।”

बारिश की आवाज और तेज हो गई। मोमबत्ती की लौ काँप रही थी। मैंने उसका हाथ नहीं छुड़ाया। कुछ पल की खामोशी के बाद मैंने फुसफुसाकर कहा, “दरवाजा बंद कर दो।”

उसने दरवाजा बंद किया। वापस आकर मेरे सामने खड़ा हो गया। मैंने उसका चेहरा दोनों हाथों में लिया। “सिर्फ आज रात। कल के बाद कुछ नहीं। समझे?”

उसने सिर हिलाया। फिर झुककर मेरे होठों पर अपने होठ रख दिए। पहले हल्के, फिर गहरे। उसकी जीभ मेरे मुँह में घुस आई। मैंने जवाब दिया। इतने सालों बाद किसी मर्द का स्वाद। उसका हाथ मेरी कमर पर था। फिर ऊपर सरककर मेरे स्तन पर आ गया। ब्लाउज के ऊपर से मसलने लगा।

मैंने उसकी शर्ट के बटन खोले। छाती पर हाथ फेरा। वह मेरी साड़ी का पल्लू हटा रहा था। ब्लाउज के हुक खोले। स्तन बाहर आ गए। उसने एक निप्पल मुँह में ले लिया और चूसने लगा। जीभ से घुमाता, दाँतों से हल्के काटता। मेरी कराह निकल गई। “आह… कबीर…”

उसने मुझे सोफे पर लिटा दिया। साड़ी और पेटीकोट एक साथ खींचकर नीचे कर दिए। पैंटी भी। मेरी चूत उसके सामने थी। वह घुटनों के बल बैठा और मुँह लगा दिया। जीभ की गर्माहट से मेरा शरीर सिहर उठा। वह चाट रहा था—कभी क्लिट पर, कभी अंदर तक जीभ डालकर। दो उंगलियाँ भी अंदर कर दीं। मैं उसकी बालों में उंगलियाँ फँसाए हुए कराह रही थी।

“आह… वहाँ… हाँ… और तेज…”

मेरा पहला ऑर्गेज्म जल्दी आ गया। शरीर काँप उठा। पानी उसकी जीभ पर बह गया। वह उठा। अपनी पैंट खोली। लंड बाहर आया—मोटा, लंबा, नसों से भरा। मैंने उसे हाथ में लिया। हिलाया। फिर मुँह में ले लिया। गहरे तक। वह मेरे सर को पकड़कर धीरे-धीरे हिला रहा था।

कुछ देर बाद वह बोला, “मौसी… अब अंदर जाने दो।”

मैं लेट गई। उसने मेरी टाँगें फैलाईं और लंड चूत पर रखा। धीरे-धीरे अंदर धकेला। पूरा अंदर जाने पर दोनों की साँसें रुक गईं। फिर वह हिलने लगा। धक्के तेज होते गए। मेरे स्तन उसके हर धक्के के साथ काँप रहे थे। वह कभी मेरे होठ चूमता, कभी निप्पल चूसता।

“मौसी… कितनी टाइट हो… आह…”

मैंने उसके कूल्हे पकड़कर और अंदर खींचा। “जोर से… कबीर… और जोर से चोदो…”

वह पलट गया। मुझे घुटनों के बल कर दिया। पीछे से घुस गया। दोनों हाथों से मेरे कूल्हे पकड़कर जोर-जोर से ठोकने लगा। गांड पर थप्पड़ भी मारे। आवाज पूरे कमरे में गूँज रही थी। मेरी चूत से पानी की आवाज आ रही थी।

फिर उसने अचानक कहा, “मौसी… गांड में भी लेने दो।”

मैंने पीछे मुड़कर देखा। उसकी आँखों में पागलपन था। मैंने सिर हिलाया। “धीरे से…”

उसने थूक लगाकर लंड गांड की सेंध पर रखा। धीरे-धीरे दबाव दिया। दर्द हुआ। मैंने तकिया दबा लिया। “आह्ह्ह… कबीर… धीरे…”

आधा अंदर गया। फिर पूरा। उसने कुछ पल रोका। फिर बहुत धीमे धक्के शुरू किए। गांड की टाइटनेस से वह और पागल हो रहा था। एक हाथ से मेरी चूत में उंगलियाँ डाल दीं। दोनों साथ। मैं पागलों की तरह कराहने लगी। ये antarvasana desi mausi sex story आप pranaykatha पर पढ़ रहें है।

“आह… अह… फाड़ मत देना… लेकिन मत रुकना…”

वह तेज होता गया। हर धक्के के साथ मेरी गांड काँप रही थी। मैं दूसरी बार आ गई। फिर तीसरी बार। वह भी अब नियंत्रण खो चुका था। जोर से धक्का देते हुए अंदर ही झड़ गया। गर्म वीर्य की धार महसूस हुई।

दोनों पसीने से तर थे। वह मेरे ऊपर गिर गया। हम दोनों हांफ रहे थे। कुछ देर बाद उसने धीरे से कहा, “मौसी… एक बार और…”

मैंने मुस्कुराकर उसके लंड को छुआ। अभी भी आधा सख्त था। “रात अभी बाकी है।”

उस रात हमने तीन बार और किया। एक बार खड़े होकर दीवार के सहारे, एक बार कुर्सी पर, और आखिरी बार मैं ऊपर बैठकर। सुबह होते-होते मेरी गांड में हल्की जलन थी और चूत सूजी हुई थी। लेकिन मन में एक अजीब सी शांति थी।

सुबह कबीर मुझे स्टेशन छोड़ने आया। गाड़ी में बैठते समय उसने मेरा हाथ पकड़ा। “मौसी… फिर आना।”

मैंने सिर्फ मुस्कुराकर सिर हिलाया। ट्रेन चल पड़ी। खिड़की से बाहर देखते हुए मैं सोच रही थी—आठ दिन पहले जो महिला इस घर में आई थी, वह लौटते समय वही नहीं रही थी।

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