मेरा नाम राहुल है। उम्र पच्चीस साल। दिल्ली में नौकरी करता हूँ, पर गाँव का लड़का हूँ। गर्मी की छुट्टियों में गाँव आया था। मौसी के यहाँ ठहरा था क्योंकि मम्मी-पापा तीर्थ यात्रा पर चले गए थे। मौसी की बेटी का नाम प्रिया है। उम्र बाईस-तेईस के आसपास। गोरी-चिट्टी, गोल-मटोल शरीर, बड़े-बड़े स्तन जो ब्लाउज में फिट नहीं बैठते, पतली कमर और भारी नितंब। चेहरे पर हमेशा एक शर्मीली सी मुस्कान रहती।
गाँव में अकेला घर था। मौसी दिनभर खेत में रहतीं, मौसाजी शहर में काम करते। प्रिया कॉलेज की पढ़ाई छोड़कर घर पर ही रहती थी। शुरू के दो दिन सामान्य रहे। तीसरे दिन दोपहर का समय था। धूप तेज थी। मैं आँगन में चारपाई पर लेटा किताब पढ़ रहा था। प्रिया अंदर कमरे में थी।
अचानक प्रिया बाहर आई। चेहरा लाल-लाल, आँखें झुकी हुई। उसने धीरे से कहा, “राहुल भैया… थोड़ा पानी पिला दो न… गला सूख रहा है।”
मैंने पानी दिया। उसने गिलास लेते हुए हाथ छुआ तो एक अजीब सी सिहरन हुई। मैंने देखा उसकी साड़ी का पल्लू ढीला था, गले की हड्डी साफ दिख रही थी। उसने पानी पिया और बोली, “भैया… मुझे कुछ तकलीफ हो रही है… नीचे… बहुत जलन हो रही है।”
मैंने चौंककर पूछा, “क्या हुआ प्रिया? डॉक्टर को बुलाऊँ?”
वह शरमा गई। आँखें फर्श पर गड़ाए बोली, “नहीं… वैसी कोई बात नहीं… बस… खुजली हो रही है… बहुत जोर से… रातभर नींद नहीं आई। मौसी से कहा तो बोलीं गर्म पानी से नहाना, पर आराम नहीं मिला।”
मैंने हँसते हुए कहा, “खुजली तो दवा से जाती है। तुम बताओ कहाँ हो रही है?”
प्रिया का चेहरा और लाल हो गया। उसने धीरे से कहा, “भैया… वहाँ… नीचे… चूत में… बहुत जल रही है… हाथ भी नहीं लगा पा रही। छूने से और जलन बढ़ जाती है।”
मेरा दिल जोर से धड़कने लगा। मैंने उसकी ओर देखा। वह शर्मा रही थी, साड़ी के पल्लू को कसकर पकड़े हुए थी। मैंने कहा, “अगर बहुत तकलीफ है तो दिखा तो सही। मैं देखूँ क्या समस्या है। डॉक्टर तो गाँव में दूर है।”
प्रिया ने सिर हिलाया, “नहीं भैया… शर्म आती है… तुम भाई जैसे हो… कैसे दिखाऊँ?”
मैंने धीरे से उसका हाथ पकड़ लिया, “प्रिया, तकलीफ हो रही है तो बताओ। मैं कुछ गलत नहीं करूँगा। सिर्फ देखूँगा।”
वह कुछ देर चुप रही। फिर धीरे से बोली, “ठीक है… पर आँखें बंद रखना… और जल्दी से देख लेना।”
हम अंदर कमरे में चले गए। प्रिया ने दरवाजा बंद किया। हाथ काँप रहे थे। उसने साड़ी ऊपर की और पेटीकोट नीचे सरकाया। सफेद पैंटी में गीलापन साफ दिख रहा था। वह लेट गई, आँखें बंद किए, दोनों पैर जोड़कर। मैंने धीरे से पैंटी का किनारा खींचा।
उसकी चूत सूजी हुई थी, गुलाबी, और थोड़ी सूजन। बाल साफ कटे हुए थे। मैंने उंगली हल्के से छुआ तो वह सिहर उठी, “आह… भैया… हल्का… जल रहा है।”
मैंने कहा, “प्रिया, ये खुजली नहीं लग रही। शायद गर्मी की वजह से सूजन है। थोड़ा सा तेल लगा दूँ?”
वह बोली, “नहीं… मत लगाओ… और जलन होगी… छोड़ दो भैया… मैं खुद कर लूँगी।”
मैंने हाथ हटा लिया। वह उठने लगी तो मैंने कहा, “रुको। अगर इतनी जलन है तो ठंडा पानी से धो लो। मैं बाहर हूँ।”
प्रिया ने सिर हिलाया। मैं बाहर आ गया। आधे घंटे बाद वह आई। चेहरा और लाल। बोली, “भैया… और बढ़ गई… अब तो चल भी नहीं पा रही। कुछ करो न…”
मैंने कमरे में वापस ले जाकर दरवाजा बंद किया। प्रिया फिर लेट गई। इस बार उसने खुद पैंटी उतार दी, पर आँखें बंद रखीं। उसकी चूत अब और गीली थी। मैंने हल्के हाथ से दोनों होंठ खोले। अंदर से गाढ़ा सफेद पानी जैसा निकल रहा था।
मैंने कहा, “प्रिया, ये सिर्फ खुजली नहीं है। तुम्हारी चूत बहुत गीली हो गई है। शायद… इच्छा की वजह से भी हो।”
वह बोली, आवाज काँपती हुई, “नहीं भैया… ऐसी कोई बात नहीं… मैं कुँवारी हूँ… कभी किसी ने छुआ तक नहीं… बस जलन हो रही है… कृपया कुछ करो… सहन नहीं हो रहा।”
मैंने अपनी उंगली पर थूक लगाकर हल्के से उसके छेद पर लगाया। वह जोर से सिहर उठी, “आह्ह… भैया मत करो… दर्द हो रहा है… निकालो…”
मैंने रुका नहीं। धीरे-धीरे उंगली अंदर घुसाई। बहुत टाइट थी। कुँवारी का निशान साफ था। प्रिया की साँसें तेज हो गईं। वह दोनों हाथों से चादर कसकर पकड़े हुए थी।
“भैया… धीरे… बहुत दर्द… आह… निकाल दो… मैं चिल्लाऊँगी…”
मैंने कहा, “चिल्ला मत। मौसी आ जाएँगी। थोड़ा सह लो। अंदर सूजन है, दबाऊँगा तो आराम मिलेगा।”
मैंने उंगली अंदर-बाहर की। प्रिया की आवाज दबी-दबी निकल रही थी, “आह… भैया… और अंदर मत… टूट जाएगी… छोड़ो न…”
मैंने दूसरी उंगली भी लगाने की कोशिश की। वह और जोर से बोली, “नहीं… दो मत… एक ही काफी… आह्ह… क्या कर रहे हो तुम…”
मैंने उंगलियाँ निकालकर अपना मुँह उसके पास ले गया। जीभ से चाटा। प्रिया की कमर उछल गई, “भैया… ये क्या… जीभ… मत लगाओ… शर्म आ रही है… आह्ह…”
मैंने उसके क्लिटोरिस को चूसा। वह दोनों पैर फैलाने लगी, फिर सिकोड़ने लगी। “भैया… बंद करो… मुझे अच्छा नहीं लग रहा… पर… आह… थोड़ा और… नहीं… मत…”
मैंने जीभ अंदर घुसाई। उसका पानी मेरे मुँह में आ रहा था। प्रिया अब दोनों हाथों से मेरे सिर को पकड़ने लगी, फिर छोड़ने लगी। “भैया… रुक जाओ… मैं… मैं गीली हो जाऊँगी… आह्ह… क्या हो रहा है…”
मैंने अपना लंड बाहर निकाला। वह पूरा खड़ा हो चुका था। प्रिया ने आँखें खोलीं। देखकर वह घबरा गई, “भैया… ये… इतना बड़ा… मत डालो… मैं मर जाऊँगी… दर्द से…”
मैंने कहा, “प्रिया, अगर खुजली मिटानी है तो अंदर तक साफ करना पड़ेगा। डर मत। धीरे डालूँगा।”
वह रोने जैसी आवाज में बोली, “नहीं… कृपया… मैं तैयार नहीं… कुँवारी हूँ… बाद में शादी कैसे होगी… छोड़ दो…”
मैंने उसके पैर और फैलाए। लंड का सिरा उसके छेद पर रखा। धीरे से दबाव दिया। प्रिया चिल्लाई, “आह्ह्ह… दर्द… बहुत दर्द… निकालो भैया… प्लीज…”
मैंने एक झटके में आधा अंदर कर दिया। झिल्ली टूटी। खून निकला। प्रिया की आँखों से आँसू बहने लगे। वह दोनों हाथों से मेरे सीने को धकेल रही थी, “निकालो… निकालो… दर्द असहनीय… मैं मर जाऊँगी…”
मैं रुका रहा। अंदर पूरी तरह घुसाया। प्रिया की चूत मेरे लंड को कसकर जकड़े हुए थी। मैंने धीरे-धीरे हिलाना शुरू किया।
“आह… भैया… धीरे… और धीरे… पूरा मत… आधा ही… आह्ह…”
मैंने कहा, “प्रिया, साँस लो। दर्द कम होगा। तुम्हारी चूत अब खुल रही है।”
वह रोते हुए बोली, “क्यों कर रहे हो ये… मैंने कुछ नहीं किया… छोड़ दो… मौसी आ जाएँगी…”
मैंने उसकी छातियों को सहलाया। ब्लाउज के बटन खोले। बड़े-बड़े स्तन बाहर निकले। निप्पल कड़े हो चुके थे। मैंने एक को मुँह में लिया। प्रिया की आवाज बदलने लगी, “आह… भैया… ये मत… चूसो मत… पर… अच्छा लग रहा… नहीं… दर्द अभी भी…”
मैंने गति बढ़ाई। अब पूरा लंड अंदर-बाहर हो रहा था। खून और पानी मिला हुआ था। प्रिया की चूत अब थोड़ी ढीली पड़ रही थी।
“भैया… और जोर से मत… आह्ह… क्या हो रहा है मुझसे… शरीर काँप रहा है… रुक जाओ…”
मैंने कहा, “प्रिया, तुम्हारी खुजली अब मिट रही है। देखो कितना पानी निकल रहा है।”
वह शर्माते हुए बोली, “मत देखो… शर्म आ रही… आह… थोड़ा और अंदर… नहीं… मतलब… आह्ह…”
मैंने उसके पैर कंधों पर रख दिए। गहरी चुदाई शुरू की। हर धक्के पर प्रिया की आवाज निकल रही थी, “आह… भैया… मार मत इतना… चूत फट जाएगी… पर… मत रुको… दर्द कम हो रहा… आह्ह…”
मैंने उसकी गांड को भी सहलाया। उंगली वहाँ लगाने की कोशिश की तो वह बोली, “वहाँ मत… सिर्फ चूत… बस… आह… भैया तुम्हारा लंड बहुत मोटा है… पूरा समा नहीं रहा…”
आधे घंटे तक मैंने उसे चोदा। प्रिया अब खुद कमर हिलाने लगी थी। उसकी आवाज बदल चुकी थी, “भैया… और तेज… खुजली पूरी मिट गई… पर अब कुछ और हो रहा… अंदर गरम… आह्ह… मैं… मैं झड़ने वाली हूँ…”
मैंने जोर लगाया। प्रिया का शरीर ऐंठ गया। वह जोर से चिल्लाई, “आह्ह्ह… भैया… हो गया… पानी… बहुत पानी… रुक जाओ…”
उसकी चूत ने मेरे लंड को जोर से जकड़ लिया। पानी की धार निकली। मैंने भी नियंत्रण खो दिया। पूरा वीर्य उसके अंदर उड़ेल दिया।
प्रिया हाँफ रही थी। आँखों में आँसू थे, पर चेहरे पर एक अजीब सी सुकून की भावना। वह बोली, “भैया… क्या किया तुमने… मैं… मैं अब कुँवारी नहीं रही… क्या होगा…”
मैंने उसके माथे को चूमा, “प्रिया, खुजली तो मिट गई न? अब आराम से सो जा।”
वह चुपचाप लेटी रही। थोड़ी देर बाद बोली, “भैया… रात को… अगर फिर हो तो… बताना… पर धीरे से करना… दर्द अभी भी है…”
शाम को मौसी आईं। प्रिया ने कुछ नहीं कहा। रात को जब सब सो गए, प्रिया मेरे कमरे में आई। दरवाजा बंद करके बोली, “भैया… फिर से जलन हो रही है… थोड़ी…”
मैंने उसे बिस्तर पर लिटाया। इस बार उसने खुद साड़ी और ब्लाउज उतार दिए। नंगी लेट गई। शर्माते हुए बोली, “देखो मत इतना… पर… कर दो… जो दोपहर में किया था…”
मैंने फिर से उसका मुँह चूसा, स्तन दबाए, चूत चाटी। प्रिया अब कम हिचकिचा रही थी। “भैया… उंगली… दो उंगलियाँ… आह… अच्छा लग रहा… लंड भी डालो… पर धीरे…”
मैंने इस बार उसे घोड़ी बनाकर चोदा। प्रिया के नितंब मेरे हाथों में थे। हर धक्के पर वह बोली, “आह… भैया… और गहरा… चूत की दीवारों को छू रहा… आह्ह… मत निकालो बाहर… अंदर ही…”
मैंने उसकी गांड पर थप्पड़ मारा। वह सिहर उठी, “मत मारो… पर… थोड़ा और… आह…”
रातभर हमने तीन बार किया। प्रिया अब खुद ऊपर चढ़कर बैठ गई। उसके बड़े स्तन मेरे चेहरे पर झूल रहे थे। वह बोली, “भैया… मैं खुद हिलाऊँ… तुम बस पकड़ो… आह… चूत फैल गई तुम्हारे लंड से… कितना मजा आ रहा…”
सुबह होते-होते प्रिया पूरी तरह भीग चुकी थी। वीर्य उसकी टाँगों से बह रहा था। वह मेरे सीने से लगकर लेटी बोली, “भैया… खुजली तो मिट गई… पर अब रोज होगी क्या? तुम शहर वापस जाओगे तो क्या करूँगी?”
मैंने हँसते हुए कहा, “जब भी आएगी, मिटा दूँगा।”
अगले दिनों में ये सिलसिला जारी रहा। कभी खेत के पीछे झाड़ियों में, कभी रात को छत पर। प्रिया हर बार शुरू में हिचकिचाती, “भैया… आज मत… मौसी पास हैं… दर्द होगा…” पर जब लंड अंदर जाता तो आवाजें दबाने लगती, “आह… चुप… मत बोलो इतना जोर से… चूत फट रही… पर मत रुको…”
एक दिन मौसी गाँव से बाहर गईं। पूरा दिन हमने बिस्तर पर बिताया। प्रिया ने खुद कहा, “भैया… आज गांड भी कर दो… सुना है मजा आता है… पर बहुत दर्द होगा न?”
मैंने तेल लगाया। धीरे-धीरे घुसाया। प्रिया चिल्लाई, “आह्ह्ह… निकालो… बहुत दर्द… टूट गई… भैया प्लीज…”
मैं रुका रहा। थोड़ी देर बाद उसने कहा, “थोड़ा और… अब कम हो रहा… आह… अजीब सा लग रहा… पर… जारी रखो…”
उस दिन प्रिया की दोनों जगहें भरी रहीं। शाम को जब मौसी लौटीं, प्रिया मुश्किल से चल पा रही थी। उसने मुझसे कहा, “भैया… कल फिर… पर आज रात आराम…”
कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। जब मैं दिल्ली लौटा तो प्रिया फोन पर रोई, “भैया… खुजली फिर शुरू… तुम्हारे बिना कैसे… जल्दी आओ…”
मैंने वादा किया। और वादा निभाया भी।
